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विकास दुबे एनकाउंटर: जांच आयोग के अध्यक्ष जस्टिस बीएस चौहान के परिजन/रिश्तेदार निकले बीजेपी के बड़े नेता

यदि उच्चतम न्यायालय को लगता है कि केंद्र और राज्यों में भाजपा की सरकारों को कतिपय राजनीतिक दल और एक्टिविस्ट गैरजरूरी याचिकाएं दाखिल करके परेशान या शर्मसार करने का प्रयास कर रहे हैं या करते रहे हैं तो उन याचिकाओं को अर्थदंड सहित सरसरी तौर पर ही ख़ारिज कर देना चाहिए। कहा जाता है कि ईमानदार होना ही नहीं बल्कि दिखना भी चाहिए। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि अगर किसी आदेश से ईमानदारी, निष्पक्षता और नैसर्गिक न्याय की शुचिता पर सवाल उठता है तो भी उच्च न्यायपालिका को कई फर्क नहीं पड़ता।

विकास दुबे का एनकाउंटर यदि उच्चतम न्यायालय को सही लगता है तो जाँच आयोग बनाने का क्या औचित्य है, क्योंकि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस बीएस चौहान पर सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के साथ करीबी संबंध होने का आरोप है। यही नहीं आयोग के दूसरे सदस्य उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक केएल गुप्ता पर भी सवाल है कि उन्होंने टीवी साक्षात्कार में एनकाउंटर का समर्थन किया था और उनका सम्बन्ध  कानपुर जोन के आईजी मोहित अग्रवाल से है। अब आयोग की रिपोर्ट क्या होगी इस पर कुछ कहने की जरूरत नहीं है।

उच्चतम न्यायालय में विकास दुबे एनकाउंटर केस की जांच के लिए गठित जांच आयोग को रद्द करने और आयोग के सदस्यों के बारे में सही तथ्यों को कथित रूप से दबाने के लिए राज्य के पदाधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही जारी करने के निर्देशों की मांग की गई है। जस्टिस बीएस चौहान, जस्टिस शशिकांत अग्रवाल, केएल गुप्ता और रविंदर गौड़ को न्यायिक आयोग में नियुक्त करने के लिए जिम्मेदार सभी हित धारकों द्वारा न्यायालय में उच्च स्तर की धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय ने एक नया आवेदन दायर किया है।

उपाध्याय ने कहा है कि हाल ही में ऐसे तथ्य प्रकाश में आए हैं जो इन सदस्यों की स्वतंत्रता पर संदेह व्यक्त करते हैं। आवेदक ने ‘द वायर’ में प्रकाशित खबर के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त जस्टिस बीएस चौहान के सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के साथ करीबी संबंध होने का आरोप लगाया है।

उपाध्याय की याचिका में कहा गया है कि जस्टिस (सेवानिवृत्त) बीएस चौहान के दो तत्काल/करीबी रिश्तेदार, उनके भाई और ‘समधी’ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता हैं जो उत्तर प्रदेश में सरकार चला रही है। याचिका में केएल गुप्ता के संबंध में कहा गया है कि उनका संबंध कानपुर जोन के आईजी मोहित अग्रवाल से है, जहां विकास दुबे की कथित मुठभेड़ हुई थी और जो कथित रूप से फर्जी मुठभेड़ों में शामिल थे और इस तरह वो, जांच/पूछताछ के दायरे में आने के लिए बाध्य हैं। इसके आलोक में याचिका में कहा गया है कि न्यायिक आयोग के दो सदस्यों को हित और पूर्वाग्रह या उनके पक्ष में पूर्वाग्रह की आशंका के कारण आयोग का हिस्सा होने से अयोग्य ठहराया जाना चाहिए।

याचिका में कहा गया है कि उपरोक्त दो सदस्यों की राज्य प्रशासन के साथ सक्रियता और मिली भगत है क्योंकि भाजपा यूपी में सत्तारूढ़ पार्टी है और मुख्यमंत्री पर छह अभियुक्तों के फर्जी मुठभेड़ों में शामिल होने का आरोप है और ऐसा प्रतीत होता है कि दुबे की हत्या की स्वतंत्र जांच से संबंधित समस्या से जूझने में यूपी सरकार को अपरोक्ष सहायता प्रदान की गई है।

याचिका में कहा गया है कि न केवल उपरोक्त दो सदस्य बल्कि शशिकांत अग्रवाल और रविंदर गौड़ को भी आयोग से हटा दिया जाना चाहिए क्योंकि राज्य प्रशासन पर अब और भरोसा नहीं किया जा सकता है और न्यायिक आयोग/एसआईटी को न्यायालय द्वारा पूरी तरह से पुनर्गठित किए जाने की आवश्यकता है।

चूंकि हितों के अपने संघर्ष के कारण पूर्वोक्त सदस्यों के पक्षपाती होने की आशंका है, इसलिए उन्हें न्यायिक आयोग के सदस्य होने के अयोग्य ठहराया जाना चाहिए और यह न केवल वांछनीय है, बल्कि न्याय के हित में भी आवश्यक है, अच्छा है। उन्हें न्यायिक आयोग/एसआईटी से हटा कर और याचिकाकर्ता द्वारा सुझाए गए/नामित जागरूक और निष्पक्ष लोगों को लोगों के साथ प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए।

उपाध्याय द्वारा सुझाई गई सूची में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर, आरएम लोढ़ा, पूर्व न्यायाधीश संतोष हेगड़े, अनिल आर दवे, जस्टिस कुरियन जोसेफ, फकीर मोहम्मद इब्राहिम कलीफुल्ला, एम वाई इकबाल, एके पटनायक, विक्रमजीत सेन, केएस पनिकर राधाकृष्णन, और एचएल गोखले शामिल हैं।

न्यायिक आयोग/एसआईटी में पूर्वोक्त व्यक्तियों/सदस्यों की नियुक्ति, भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के मूल सिद्धांतों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है, जो कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 में निहित है। अंततः, निष्पक्ष और निष्पक्ष जांच/ट्रायल के लिए देश के लोगों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

उपाध्याय ने पहले आयोग में केएल गुप्ता को हटाने के लिए एक आवेदन दायर किया था जिसमें आरोप लगाया गया था कि उन्होंने मुठभेड़ के पुलिस संस्करण का समर्थन करते हुए प्रेस बयान जारी किए थे और वो इसलिए पक्षपाती थे। 28 जुलाई को उच्चतम न्यायालय ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि गुप्ता के बयानों को उनकी संपूर्णता पर विचार करने के बाद, कोई भी सही विचार वाला व्यक्ति यह नहीं सोचेगा कि वह पक्षपाती हैं।

22 जुलाई को उच्चतम न्यायालय ने आयोग  का गठन किया और जस्टिस बीएस चौहान को इसका नेतृत्व करने के लिए नियुक्त किया। समिति के सदस्यों के नाम उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तावित किए गए थे। न्यायमूर्ति शशिकांत अग्रवाल, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश, न्यायमूर्ति बीएस चौहान और के एल गुप्ता के अलावा आयोग के तीसरे सदस्य हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

This post was last modified on July 31, 2020 6:19 pm

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