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Wednesday, August 4, 2021

सरल भाषा में फैसला देना हुआ गुनाह! न्यायिक अफसर को किया बर्खास्त, हाईकोर्ट से बहाली

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क्या आप विश्वास करेंगे कि पंजाब  और हरियाणा उच्च न्यायालय के अधीन अधीनस्थ न्यायालयों के सीधी भर्ती के सुपीरियर ज्यूडिशियल सर्विस के अधिकारीयों के वार्षिक चरित्र पंजिका (एसीआर) में प्रतिकूल टिप्पणियाँ दर्ज़ करके उनका या तो कैरियर ख़राब कर दिया जाता है अथवा सेवा समाप्त कर दी जाती है। यह कार्य परिवीक्षा अवधि से लेकर वरिष्ठता के दौरान कभी भी कर दिया जाता है। कारण ऊपर बैठे किसी की सिफारिश न मानने का भी हो सकता है या फिर सामान्य श्रेणी में आरक्षित वर्ग का कोई प्रत्याशी मेरिट से न्यायिक अधिकारी बन जाता है जो समान्य श्रेणी के उच्च लोगों को पसंद नहीं आता। ऐसा ही एक मामला एक दलित न्यायिक अधिकारी का है जिसे इस आधार पर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया क्योंकि वह सरल भाषा में फैसले लिखती थीं। 10 साल की क़ानूनी लड़ाई के बाद पंजाब  और हरियाणा उच्च न्यायालय ने उनकी बहाली का आदेश दिया है।

पंजाब  और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक दशक पुराने आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसके तहत पंजाब सरकार द्वारा हाईकोर्ट की सिफारिश पर पंजाब सुपीरियर ज्यूडिशियल सर्विस के सदस्य के रूप में एक अतिरिक्त जिला और सेशन जज की सेवाएं समाप्त दी थी। जस्टिस जितेंद्र चौहान और गिरीश अग्निहोत्री की खंडपीठ ने राज्य और अन्य उत्तरदाताओं को आदेश दिया कि सभी परिणामी लाभों के साथ याचिकाकर्ता को छह सप्ताह के भीतर बहाल किया जाए।

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा है कि उसकी नजर में सरल भाषा में अभिव्यक्ति की सादगी किसी भी भाषा का एक आभूषण है, जिसे आम आदमी द्वारा समझा जाता है। जटिल वाक्य लिखने में, कभी-कभी विषय का सार खो जाता है। खंडपीठ ने हालांकि कहा कि इसे सकारात्मक रूप से और एक ताकत के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि यह आम जनता को सामग्री को बेहतर ढंग से समझने में सक्षम करेगा।

खंडपीठ ने कहा कि यह किसी के उद्देश्य की पूर्ति नहीं करता है। कैडर के कई अधिकारी देश के कई ऐसे स्कूलों से आते हैं, जो इस विदेशी भाषा में पारंगत नहीं हैं। इसलिए, हम अधिकारी के खिलाफ किसी भी प्रतिकूल निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए एक आधार के रूप में ही नहीं मानते हैं, बल्कि यह किसी भी लेखक की ताकत है।

खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया था; सभी तथ्यों को पूर्ण न्यायालय के ध्यान में नहीं लाया गया। कम संख्या में मामलों का निपटारा करने का कारण यह था क्योंकि उन्हें एक नए सत्र डिवीजन का प्रभार दिया गया था जहाँ मामलों की संख्या कम थी। इसके अलावा, इस नए न्यायालय में स्थानांतरित किए गए कई मामलों को भी स्थानांतरण से पहले लंबी तारीखें दी गई थीं। इसलिए, इस अदालत के न्यायिक अधिकारियों को कई मामलों को उठाने का अवसर नहीं मिला। जैसे, अदालत याचिकाकर्ता के इस रुख से सहमत थी कि उसे न तो अपने काम को बेहतर करने के लिए उचित समय/परिस्थितियां मिलीं और न ही किसी को प्रतिनिधित्व देने के लिए पर्याप्त समय दिया गया।

खंडपीठ ने यह भी दर्ज़ किया कि याचिकाकर्ता के रूप में उसी जिले में अन्य समकक्ष न्यायिक अधिकारियों द्वारा अर्जित इकाइयों की संख्या भी मोटे तौर पर याचिकाकर्ता के समान स्तर पर थी। इस प्रकार, याचिकाकर्ता के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता था। अपने निर्णयों में न्यायाधीश की सरल भाषा का उपयोग एक कमी नहीं है, बल्कि एक ताकत है।

खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के शैक्षणिक रिकॉर्ड से पता चलता है कि वह न्यायिक सेवाओं के लिए एक उज्ज्वल आकांक्षी रही है। यह भी नोट किया गया था कि वह केवल अनुसूचित जाति श्रेणी के तहत एकमात्र उम्मीदवार थी, जिसे सामान्य वर्ग में चयनित करने और योग्यता के क्रम में रखा गया था। योग्यता के समग्र क्रम में याचिकाकर्ता ने लिखित परीक्षा में बेहतर और उच्च अंक हासिल किया , यहां तक कि क्रम संख्या एक पर रखे गए उम्मीदवार से भी अधिक।

खंडपीठ ने कहा कि पिछली किसी भी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में याचिकाकर्ता को “संतोषजनक नहीं” कहा गया था। दूसरी ओर, यह बताया गया कि एक और न्यायिक अधिकारी जिसका प्रदर्शन ‘नाट अप टू द मार्क’ पाया गया था, को सेवा में बनाए रखा गया था।

28 अक्तूबर, 2010 को लिखे गए पत्र का हवाला देते हुए, याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता को 1 अप्रैल, 2009 से 31 मार्च, 2010 की अवधि के लिए और कार्य-कुशलता और न्याय की गुणवत्ता की निरीक्षण टिप्पणी से अवगत कराया गया था। जो इस वर्ष के पिछले एसीआर की तुलना में, इसे ‘संतोषजनक  के रूप में दर्ज किया गया था। रिकॉर्ड के अनुसार, याचिकाकर्ता ने अप्रैल 2010 से नवंबर 2010 तक, प्रति माह 75 से अधिक इकाइयां अर्जित कीं, दावा किया कि जून के महीने को छोड़कर, जब अदालत में छुट्टी है, नवंबर 2010 से जनवरी 2011 तक, उसने प्रति माह 100 से अधिक इकाइयों का अधिग्रहण / दावा किया है और यहां तक कि 17 कार्य दिवसों के साथ फरवरी तक उसने 50 से अधिक इकाइयों को अर्जित किया है।

यह भी दर्ज किया गया है कि निरीक्षण के समय, अधिकारी 22 फरवरी, 2011 से अपने कार्य को वापस लेने के बाद से अदालत में नहीं थी। कॉलम -7-अखंडता के खिलाफ, कोई शिकायत नहीं का उल्लेख किया गया है। इसके बावजूद, 14 जून, 2011 के एक आदेश के अनुसार, याचिकाकर्ता की सेवाओं को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की सिफारिशों पर समाप्त कर दिया गया।

खंडपीठ ने कहा कि इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, अधिकारी को उसकी क्षमता और प्रदर्शन को बढ़ाने के लिए परामर्श दिया गया है, निर्देशित किया गया है और योग्य माना गया है। हमें यह भी लगता है कि प्रारंभिक स्तर पर, युवा अधिकारियों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है ताकि वह या वह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करता है और समाज के सामान्य भलाई के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

याचिकाकर्ता ने कहा था कि उन्होंने 1999 में पंजाब सिविल सर्विस (ज्यूडिशियल ब्रांच) की परीक्षा दी थी, और दोबारा आवेदन करते समय सामान्य श्रेणी में लिखित परीक्षा में 8 वीं और मौखिक परीक्षा के बाद सामान्य श्रेणी में 10 वां स्थान हासिल किया था। वर्ष 2008 में पंजाब सुपीरियर ज्यूडिशियल सर्विस के तहत एएसजे के 21 पदों को सीधी भर्ती के कोटे के तहत विज्ञापित किया गया था। इस चयन प्रक्रिया में भी लिखित परीक्षा में 461 अंक और मौखिक परीक्षा में 125.6 अंक हासिल करके याचिकाकर्ता ने समग्र संयुक्त मेरिट सूची में पांचवां स्थान हासिल किया था। तदनुसार, 28 नवंबर, 2008 को याचिकाकर्ता को एएसजे के रूप में नियुक्ति दी गई थी, और 10 दिसंबर, 2008 को फरीदकोट जिले के मुक्तसर साहिब उप-मंडल में सक्षम प्राधिकारी के आदेश के तहत एएसजे के रूप में नियुक्त किया गया , जो 23 दिसंबर, 2009 को नए सत्र डिवीजन के रूप में नवगठित किया गया था। मुक्तसर साहिब सत्र अदालत को 8 जनवरी, 2010 को फरीदकोट जिला अदालत से अलग कर दिया गया और मुक्तसर साहिब में सत्र अदालतों ने 16 जनवरी, 2010 से कार्य करना शुरू कर दिया।

मामले की सुनवाई के बाद खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता लिखित परीक्षा में भी मेधावी थी और बेहतर एसीआर रखता थी। खंडपीठ ने कहा कि इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए, अधिकारी को उसकी क्षमता और प्रदर्शन को बढ़ाने के लिए एक परामर्श, मार्गदर्शन और हकदार होना चाहिए था। हमें यह भी लगता है कि प्रारंभिक स्तर पर, युवा अधिकारियों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है ताकि वह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करें और समाज के सामान्य भलाई के लिए इसका उपयोग किया जाए।

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 205 CWP-20375-2013 (O&M) Parveen Bali … PetitionerVS.State of Punjab and Ors. … Respondents Date of Decision: 03.12.2020 को अभी तीन दिन पहले अपने वेबसाईट पर अपलोड किया है

इसके पहले मार्च 19 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 10 साल बादसिविल जज (जूनियर डिविजन)की सेवाओं को बहाल कर दिया। यह आदेश अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान दिये। हाईकोर्ट ने न केवल न्यायिक अधिकारी को बहाल किया बल्कि अपने 2 जजों और उनके प्रशासनिक निर्णय की गलती भी उजागर की। इस मामले की सुनवाई जस्टिस निर्मलजीत कौर की अदालत में हुई। पंजाब स्टेट कौंसिल ने 8 मार्च को उन आदेशों को पेश किया जिसके बाद जस्टिस निर्मलजीत कौर ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को आदेश जारी करने के निर्देश दिये। हाईकोर्ट वादी अमरीश कुमार जैन के पोस्टिंग आदेश तुरंत जारी करने को कहा। इस मामले में जालंधर के तत्कालीन जिला व सत्र न्यायाधीश के वादी से नाखुश होने की बात सामने आयी कि उन्होंने पक्षपात से एसीआर प्रशासनिक जज को दी। बाद में प्रशासनिक न्यायाधीश ने भी उनकी रिपोर्ट तथ्य परखे बिना व विश्वास करके रिकार्ड में शामिल कर ली।
इसी तरह फरवरी 2020 में हरियाणा के पंचकूला के एक सिविल जज और हाईकोर्ट के जज के बीच कथित विवाद का मामला उच्चतम न्यायालय पहुंच गया। मामले में खास बात यह है कि सिविल जज की नौकरी जा चुकी है, जबकि हाईकोर्ट के जज प्रमोशन पाकर सुप्रीम कोर्ट के जज बन चुके हैं। सिविल जज ने उच्चतम यायालय में याचिका दाखिल कर अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज कर फिर से बहाल करने की मांग की। पूर्व सीनियर डिवीजन जज अनिल गौर को 2007 में सालाना गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) खराब होने पर बर्खास्त किया गया था। उनका दावा है कि वह एक वकील और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एक प्रशासनिक जज के बीच टकराव के शिकार बने हैं। इसकी वजह से उनकी सालाना गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) खराब हो गई।

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के प्रशासनिक जज इन दिनों उच्चतम न्यायालय में जज हैं। हाईकोर्ट के प्रशासनिक जज ही निचली अदालतों के जजों के कार्यों और व्यवहार पर नजर रखते हैं और सालाना गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) के लिए इनपुट देते हैं। चीफ जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने सुनवाई चल रही है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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