केरल हाईकोर्ट ने केंद्र से पूछा- आरबीआई से हासिल लाभांश को गरीबों के लिए वैक्सीन पर क्यों नहीं खर्च करते?

मोदी सरकार का इक़बाल खत्म होता दिख रहा है। अब मोदी सरकार के नीतिगत निर्णयों पर भी हाईकोर्ट सवाल उठा रहे हैं। कोविड महामारी जो न करा दे। यह तो किसी ने कल्पना भी नहीं किया होगा कि हाईकोर्ट केंद्र सरकार से कहे या सवाल करे कि आपने रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया से जो सरप्लस धनराशि प्राप्त की है उससे वैक्सीन खरीद के गरीबों को मुफ्त में क्यों नहीं देते? लेकिन ऐसा केरल हाईकोर्ट ने किया। जस्टिस के विनोद चंद्रन ने यह सुझाव तब दिया जब स्वयं और जस्टिस  एमआर अनीता की खंडपीठ ने केंद्र द्वारा वैक्सीन की कीमत के निर्धारण में उदारीकरण और त्वरित राष्ट्रीय कोविड-19 टीकाकरण रणनीति (वैक्सीन नीति) को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।  

लाइव लॉ के अनुसार केरल हाईकोर्ट ने इंडियन एक्सप्रेस के एक आर्टिकल का हवाला देते हुए कहा कि केंद्र, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से प्राप्त 99 करोड़ रुपये के अतिरिक्त लाभांश का उपयोग वैक्सीन की खरीद के लिए कर सकता है। जस्टिस विनोद चंद्रन ने टीकों की खरीद के लिए उपयोग किए जाने वाले अतिरिक्त लाभांश के संबंध में कहा कि केंद्र 150 या 250 रुपये में टीके खरीद सकता है। खंडपीठ ने कहा कि आरबीआई ने केंद्र को सकल घरेलू उत्पाद का 0.5% यानी 95 हजार करोड़ रूपये का लाभांश दिया। 45 हजार करोड़ रूपये अनुमानित (लाभांश) है, इसलिए आपको लगभग 54,000 करोड़ रूपये अधिक मिले हैं। अब केवल एक अंकगणित है। 137 करोड़ (भारत की जनसंख्या) ) x 250 (वैक्सीन की लागत) यानी लगभग 34000 बस इतना देने में आपको क्या दिक्कत है? आरबीआई ने आपको 54 हजार करोड़ रूपये अधिक दिए हैं। घाटा घटकर 1.75 लाख रुपये हो जाएगा। यह सच है, लेकिन आपके सामने पूरा वित्तीय वर्ष है। हम उम्मीद करते हैं कि कोविड-19 की स्थिति में सुधार होगा और अर्थव्यवस्था में भी सुधार होगा। आप इस पर कुछ क्यों नहीं करते?

केंद्र सरकार के वकील के राजकुमार ने जवाब दिया, “यह एक नीतिगत निर्णय है। खंडपीठ ने कहा कि वे नीतिगत फैसले को प्रभावित करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं । वे केवल नीति निर्माताओं को यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि आपके पास इतना पैसा है, आप ऐसा क्यों नहीं करते हैं?

 याचिकाकर्ताओं में से एक के वकील अधिवक्ता संतोष मैथ्यू ने प्रस्तुत किया कि राज्य में कोवैक्सिन की कमी है। अधिवक्ता प्रशांत सुगथन ने यह मुद्दा उठाया कि वैक्सीन नीति से पहले की स्थिति की तुलना में टीकाकरण में गिरावट आई है। उन्होंने कहा कि निजी कंपनियां टीके दे रही हैं, लेकिन लोगों को सरकारी माध्यमों से टीका प्राप्त नहीं हो रहा है।

खंडपीठ ने केंद्र सरकार के वकील से कहा कि यहां पर केंद्र सरकार की भूमिका का विशेष महत्व है। अब आपने आरबीआई से अतिरिक्त लाभांश प्राप्त किए हैं, आप इसे कम से कम गरीबों को क्यों नहीं देते? खंडपीठ ने केंद्र को इस संबंध में जवाब देने का निर्देश देते हुए सरकार के बयान के लिए मामले को स्थगित किया। खंडपीठ ने इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा कि निजी अस्पताल और अन्य सीधे वैक्सीन निर्माताओं से टीके खरीदने के लिए इच्छुक हैं। खंडपीठ ने केंद्र को इस पहलू पर भी विचार करने का निर्देश दिया।

खंडपीठ से स्टेट अटॉर्नी ने कहा कि केरल ने वैक्सीन खरीदने के लिए एक ग्लोबल टेंडर निकाला है। वैश्विक टेंडर ठीक है, लेकिन हम समय के विपरीत दौड़ रहे हैं। अगर निर्माताओं के पास टीके हैं और निजी अस्पताल उसे खरीदने को तैयार हैं तो उन्हें खरीदने दें। खंडपीठ ने सुझाव दिया कि सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए कीमतों को सीमित कर सकती है कि निजी अस्पताल कोविड-19 के मरीजों से इलाज के लिए वैक्सीन की अधिक कीमत न लें। खंडपीठ ने इन टिप्पणियों के साथ कहा कि वह इन पहलुओं पर बाद में दिन में एक अंतरिम आदेश पारित करेगा।

गौरतलब है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बोर्ड ने 31 मार्च 2021 को समाप्त नौ महीने की लेखा अवधि के लिए सरकार को अधिशेष (सरप्लस) के रूप में 99,122 करोड़ रुपये के हस्तांतरण को मंजूरी दी है। केंद्र सरकार को अधिशेष हस्तांतरित करने का निर्णय आरबीआई के केंद्रीय निदेशक मंडल की शुक्रवार को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए हुई बैठक में लिया गया।

एक विज्ञप्ति के अनुसार बैठक के दौरान गवर्नर शक्तिकांत दास की अध्यक्षता में बोर्ड ने संक्रमण अवधि के लिए रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट और खातों को मंजूरी दी।बोर्ड ने 31 मार्च 2021 को समाप्त नौ महीने (जुलाई 2020-मार्च 2021) की लेखा अवधि के लिए केंद्र सरकार को अधिशेष के रूप में 99,122 करोड़ रुपये के हस्तांतरण को मंजूरी दी, जबकि आकस्मिक जोखिम बफर को 5.50 प्रतिशत पर बनाए रखने का निर्णय लिया।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

This post was last modified on May 26, 2021 12:30 pm

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