Sunday, October 24, 2021

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बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष: बुद्ध धम्म और भारत में प्रतिरोध की बहुजन-श्रमण प्रगतिशील परंपरा

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मार्क्स ने कहा था “अब तक विद्यमान सभी समाजों का लिखित इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है।” यह वर्ग-संघर्ष विचारों के संघर्ष के रूप में भी मुखर रूप से सामने आता है। भारत में वर्ग-संघर्ष ने खुद को वर्ण-संघर्ष के रूप में अभिव्यक्त किया। वर्ण-संघर्ष में वर्चस्वशाली वर्णों के हितों की रक्षक विचारधारा के रूप में वैदिक धर्म सामने आया, जिसे सनातन धर्म, ब्राह्मण धर्म और आजकल हिंदू धर्म कहा जा रहा है। इसके विश्व दृष्टिकोण को ब्राह्मणवादी विश्व दृष्टिकोण कहा जाना चाहिए, जो पूरी तरह भाववादी है और द्विजों, विशेषकर ब्राह्मणों के हितों की पोषक रही है और है। इसके बिल्कुल उलट बहुजन-श्रमण परंपरा की वैचारिकी रही है, गैर-द्विजों ( बहुजनों) के दृष्टिकोण और सामूहिक हितों की अभिव्यक्ति करती रही है, इसे गैर-ब्राह्मणवादी विश्व दृष्टिकोण या बहुजन-श्रमण विश्व दृष्टिकोण कहा जाना चाहिए।

ब्राह्मणवादी विश्व दृष्टिकोण की विशेषताएं हैं- आत्मा में विश्वास, शाश्वत सत्य में विश्वास, पुनर्जन्म में विश्वास, पुनर्जन्म आधारित कर्मफल में विश्वास, वर्ण व्यवस्था में विश्वास, असमानता में विश्वास, स्त्री-पुरूष असमानता में विश्वास ( पितृसत्ता, स्त्री पुरुष की तुलना में दोयम दर्जे की है), परजीवीपन में विश्वास, वेदों-स्मृतियों, पुराणों और गीता के दर्शन में विश्वास, नियतिवाद में विश्वास। प्रस्थानत्रयी में विश्वास इसका मुख्य आधार रहा है। श्रीमद्भगवद्गीता, ब्रह्मसूत्र तथा उपनिषदों को सामूहिक रूप से प्रस्थानत्रयी कहा जाता है जिनमें प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों मार्गों का तात्त्विक विवेचन है। ये वेदान्त के तीन मुख्य स्तम्भ माने जाते हैं। इनमें उपनिषदों को श्रुति प्रस्थान, भगवद्गीता को स्मृति प्रस्थान और ब्रह्मसूत्रों को न्याय प्रस्थान कहते हैं।

गैर-ब्राह्मणवादी विश्व दृष्टिकोण की विशेषता है- अनात्मवाद, अनित्यवाद ( सब कुछ परिवर्तशील है ) कार्य-कारण सिद्धांत में विश्वास, वर्ण-व्यवस्था का निषेध, समता-बंधुता में विश्वास, स्त्री-पुरूष समानता में विश्वास, नित्य परिवर्तनशीलता में विश्वास ( शाश्वत सत्य की अस्वीकृति), सब कुछ को तर्क ( कार्यकारण सिद्धांत) और लोककल्याण की कसौटी पर कसना, वेदों-स्मृतियों, पुराणों और गीता के दर्शन का निषेध और प्रस्थानत्रयी को खारिज करना। भारत में बहुजन-श्रमण परंपरा के केंद्रीय व्यक्तित्व गौतम बुद्ध हैं। उन्होंने बहुजन-श्रमण दर्शन-वैचारिकी के बीज रोपे, जिसे बहुत सारे लोगों ने पल्लवित-पुष्पित किया। बुद्ध ने ईश्वर, आत्मा और पुनर्जन्म  आधारित कर्मफल सिद्धांत को खारिज किया और कार्य-कारण सिद्धांत की स्थापना की, जिसे प्रतीत्य समुत्पाद भी कहा जाता है। बुद्ध के अनुसार इस जगत में कारण के बिना किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं हैं।…समस्त कार्य-व्यापारों और वस्तुओं का अपना-अपना कारण और कार्य-संबंध होता है।

उनका कहना था कि एक वस्तु के विनाश से ही दूसरी वस्तु की उत्पत्ति होती है। इसी को ही ‘प्रतीत्य समुत्पाद’ का सिद्धांत कहा गया। इसका निहितार्थ है कि कोई भी घटना बिना कारण के नहीं घटती। बौद्ध धम्म के अनुसार शाश्वत सत्य जैसी कोई चीज नहीं होती, उनके अनुसार समस्त अस्तित्व एक निरंतर प्रवाहमान धारा है और विभिन्न तत्वों से उत्पन्न है। बुद्ध के अनुसार अंतिम सत्य जैसी कोई चीज नहीं होती, सब कुछ निरंतर परिवर्तनशील है। जिस जिस का जन्म हुआ है, उसका विनाश भी अवश्य होगा। इसी कारण से बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनंद द्वारा अंतिम बात कहने के आग्रह को खारिज कर दिया और कहा कि कोई बात अंतिम नहीं होती है। सबसे बड़ी बात बुद्ध ने किसी भी शास्त्र, गुरु और परंपरा आदि को प्रमाण मानने से इंकार कर दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि सिर्फ किसी बात को इसलिए मत मानो कि किसी शास्त्र में लिखा है, किसी गुरु ने कहा है या परंपरा से चला आ रहा है।

बुद्ध का कहना था कि किसी भी चीज को स्वीकार करने का आधार तर्क, विवेक और व्यक्ति विशेष का अनुभव संगत ज्ञान है, लेकिन यह सब भी अंतिम कसौटी नहीं है। बुद्ध अंतिम कसौटी लोक कल्याण को मानते हैं। उनका कहना था कि हर चीज को लोक कल्याण की कसौटी पर कसा जाना चाहिए, यदि उस पर खरी उतरे, तभी उसे स्वीकार करना चाहिए। बुद्ध  खुद को भी प्रमाण मानने के लिए नहीं कहते हैं, उन्होंने साफ कहा कि मेरी बात को भी प्रमाण मत मानो, उसे भी तर्क और लोक कल्याण की कसौटी पर कसो। बुद्ध का लोक कल्याण निरपेक्ष नहीं था, वह लोक कल्याण को बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय के रूप में परिभाषित करते थे। दरअसल बुद्ध ने भारत में भौतिकवादी चिंतन का बीज डाला था, जो बाद में बड़े-पैमाने पर पल्लवित-पुष्पित हुआ। इसी कारण डॉ. आंबेडकर उन्हें मुक्तिदाता नहीं, मार्गदाता कहते हैं।

सच तो यह है कि बुद्ध धम्म कोई धर्म नहीं, बल्कि एक जीवन-पद्धति और संस्कृति है, जो बहुजनों के कल्याण को अपने केंद्र में रखता है।

भारतीय उपमहाद्वीप में जन्मा कोई  व्यक्ति या तो मूलत: ब्राह्मणवादी विश्व दृष्टिकोण का होता है या गैर-ब्राह्मणवादी विश्व दृष्टिकोण ( श्रमण-बहुजन विश्व दृष्टिकोण) का होता है। भारत का अब तक का इतिहास सारत: इन्हीं दो विश्व दृष्टिकोणों के संघर्ष का इतिहास रहा है। ब्राह्मणों और श्रमणों के बीच संघर्ष का क्या रूप था। इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध वैयाकरण पतंजलि (द्वितीय शताब्दी) लिखते हैं कि “श्रमण और ब्राह्मण एक दूसरे के शाश्वत शत्रु (विरोध: शाश्वतिक:) हैं,  उनका विरोध वैसे ही है, जैसे सांप और नेवले के बीच। (उद्धृत डी. एन. झा, पृ. 34, हिंदू पहचान की खोज)

डीएन झा जैसे इतिहासकार प्राचीन कालीन और पूर्व मध्यकालीन इतिहास को ब्राह्मण-श्रमण विचारों-परंपराओं के संघर्ष के रूप में देखते हैं और साक्ष्यों के आधार पर यह स्थापित करते हैं कि ब्राह्मणवादियों ने बड़े पैमाने पर बौद्ध मठों, स्तूपों और ग्रंथों को नष्ट किया और बौद्ध भिक्षुओं की बड़े पैमाने पर हत्या की। नालंदा विश्वविद्यालय और पुस्तकालय को जलाया जाना भी इस प्रक्रिया का हिस्सा था।

प्राचीनकाल में ब्राह्मणवादी विश्व दृष्टिकोण के सबसे प्रातिनिधिक उदाहरण वेदों-स्मृतियों-पुराणों और गीता के रचयिता हैं, जिसमें व्यास, मनु और आदि शंकराचार्य  सबसे प्रातिनिधिक व्यक्तित्व हैं। मध्यकाल में उत्तर भारत में इसके सबसे प्रातिनिधिक उदाहरण तुलसीदास हैं और आधुनिक युग में इसके सबसे प्रातिनिधिक उदाहरण तिलक और गांधी हैं और अन्य बहुत सारे लोग। आज उसका सबसे क्रूर और प्रतिक्रियावादी रूप संगठित तौर पर आरएसएस-भाजपा में दिख रहा है।

जबकि गैर-ब्राह्मणवादी भौतिकवादी- वैज्ञानिक विश्व दृष्टिकोण के प्राचीनकाल में सबसे प्रातिनिधिक उदाहरण बुद्ध-चार्वाक हैं, तो मध्यकाल में उत्तर भारत में कबीर और रैदास हैं और आधुनिक काल में ज्योतिबा फुले, पेरियार और डॉ. आंबेडकर हैं।

आधुनिक काल में भी वैदिक धारा और बहुजन-श्रमण धारा का यह संघर्ष चला, तिलक और गांधी वैदिक धर्म-दर्शन परंपरा के ही मूलत: प्रतिनिधि थे। दोनों वैदिक वर्ण-व्यवस्था में विश्वास करते थे। वैदिक दर्शन के प्रस्थानत्रयी की केंद्र गीता दोनों की आदर्श थी। 

तिलक-गांधी की धारा के विपरीत दो धाराएं थीं। एक वामपंथी धारा और दूसरी दलित-बहुजन धारा। वामपंथी धारा भारतीय बहुजन-भ्रमण धारा ( जिसके केंद्रीय व्यक्तित्व बुद्ध हैं) के साथ रिश्ते को लेकर हमेशा दुविधा में रही। भारतीय वामपंथियों का एक बड़ा हिस्सा वैदिक धारा ( प्रस्थानत्रयी) में ही प्रगतिशीलता खोजता रहा।

सच तो यह है कि भारत में जो उदारवादी-आधुनिकतावादी (लिबरल) और वामपंथी नजरिया आधुनिक काल में दुनिया से आया, वह भी या तो ब्राह्मणवादी विश्व दृष्टिकोण के ब्लैक होल का हिस्सा बन गया या जिसे ब्राह्मणवादी विश्वदृष्टिकोण ने अपने भीतर समा लिया। इसके शिकार वामपंथ के सबसे शीर्ष व्यक्तित्व भी बने।

दलित-बहुजन धारा ने स्पष्ट तौर खुद को बहुजन-श्रमण परंपरा (बुद्ध) से जोड़ा। इसके सबसे बड़े प्रातिनिधिक उदाहरण डॉ. आंबेडकर हैं, जो वामपंथ से समाजवादी अर्थव्यवस्था का सिद्धांत ग्रहण करते हैं और उदारवाद-आधुनिकतावाद से लोकतांत्रिक शासन-प्रणाली, लेकिन उनके चिंतन की जड़ें- भारतीय गैर-ब्राह्मणवादी ( श्रमण-बहुजन परंपरा) परंपरा में है, अकारण नहीं है कि वे अपना पहला गुरु बुद्ध, दूसरा गुरु कबीर और तीसरा गुरु ज्योतिबा फुले को मानते हैं। 

भारतीय वामपंथी खुद को निर्णायक तरीके से भारत की सबसे प्रगतिशील बहुजन-श्रमण परंपरा (बुद्ध) से नहीं जोड़ पाए। यह भारत में उनकी असफलता का एक बड़ा कारण रहा है।

आधुनिक काल में ब्राह्मण परिवार में जन्मे जिन चंद वामपंथी व्यक्तित्वों ने पूरी तरह ब्राह्मणवादी विश्वदृष्टिकोण (नजरिए) के सभी तत्वों को तिलांजलि दे दिया और गैर-ब्राह्मणवादी विश्वदृष्टिकोण को पूरी तरह आत्मसात कर लिया, उन व्यक्तित्वों में प्राचीन काल में अश्वघोष ( बुद्ध चरित),  धर्मकीर्ति (प्रमाण वर्तिका), बौधानंद और   राहुल सांकृत्यायन जैसे लोग हैं।        

मेरा इतिहास का अब तक का अध्ययन यह बताता है कि यदि कोई अपर कास्ट का व्यक्ति, विशेषकर बिना भारत की अपनी भौतिकवादी- वैज्ञानिक गैर-ब्राह्मणवादी ( श्रमण-बहुजन परंपरा) परंपरा से गहरा से रिश्ता कायम किए, सीधे उदारवादी ( आधुनिकतावादी) और वामपंथी बनता है, तो संस्कारों और परिवेश से मिला ब्राह्मणवाद उसके दिल-दिमाग का हिस्सा बना रहता है, वह उससे मुक्त नहीं हो पाता। अपवाद दुनिया में हर चीज का होता है।

अब तक का मेरा अध्ययन यह भी बताता है कि वही अपर कास्ट के व्यक्तित्व पूरी तरह ब्राह्मणवादी विश्व दृष्टिकोण से मुक्त हो पाए, जिन्होंने बौद्ध धम्म-चार्वाक की परंपरा से अपना नाता कायम किया, चाहे वे बुद्ध के ब्राह्मण शिष्य हों या महान बौद्ध धम्म ग्रंथ “प्रमाण वर्तिका’ के लेखक धर्मकीर्ति हों या आधुनिक काल में बोधानंद, धर्मानंद कोसांबी या राहुल सांकृत्यायन।

असल में इसकी वजह मार्क्स के शब्दों में इस तरह से व्यक्त की जा सकती है- मार्क्स ने कहा था कि अब तक का इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है। भारत का इतिहास भी वर्ग-संघर्ष का इतिहास रहा है। यहां भी प्रतिक्रियावादी विचारों और प्रगतिशील विचारों के बीच निरंतर संघर्ष चलता रहा है।

प्रतिक्रियावादी विचारों की प्रतिनिधि विचारधारा ब्राह्मणवादी विचारधारा रही है, जिसे कभी वैदिक विचारधारा, सनातन विचारधारा और ब्राह्मणवादी विचारधारा कहा जाता रहा है, आजकल इसे हिंदू विचारधारा कहा जा रहा।

गैर-ब्राह्मणवादी (श्रमण-बहुजन) विचारधारा ही, भारतीय जन की मुक्ति का रास्ता प्रशस्त कर सकती है।  जिसके केंद्रीय व्यक्तित्व गौतम बुद्ध हैं। भारत की बहुजन प्रगतिशील परंपरा खुद को बुद्ध से जोड़कर ही समता, बंधुता, न्याय और समृद्धि के समान बंटवारे पर आधारित भारत का निर्माण कर सकती है, जिसे चाहे जो नाम दे, समाजवाद कहें, साम्यवाद, बेगमपुरा कहें और या कुछ और।

(डॉ. सिद्धार्थ रामू जनचौक के संपादकीय सलाहकार हैं।)

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