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कोसी सीमांचल, जहां नदी की जमीन की भी देनी होती है लगान

पटना। बिहार विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण का आज चुनाव प्रचार समाप्त हो जाएगा। अंतिम चरण में राज्य की 78 सीटों पर मतदान होना है। महागठबंधन ने लगान माफी की घोषणा कर विशेषकर कोसी सीमांचल के किसानों की दुखती रगों पर हाथ रख दिया है। तीसरे चरण का चुनाव इन्हीं अधिकांश हिस्सों में होने हैं। ऐसे में महागठबंधन के रोजगार के मुद्दे को अपने पक्ष में करने में सफ़ल रहने के कयासों के बीच किसानों को साधने में लगान का सवाल कारगर साबित हो सकता है।

सुपौल जिले के सुपौल, पिपरा, निर्मली, छातापुर विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं को लगान का मुद्दा सबसे अधिक प्रभावित कर रहा है।

कोसी सीमांचल में विशेषकर कोसी के दर्द को लेकर यह कहा जा सकता है कि आज़ादी के बाद से मर्ज की जो-जो दवा की गई, रोग और बढ़ता ही गया। हर वर्ष लाखों की आबादी  सूखे और बाढ़ की मार झेलने को विवश होती है। महागठबंधन के लगान माफी की घोषणा को बाढ़ प्रभावित किसानों की आवाज बन चुका कोसी नव निर्माण मंच अपने लंबे समय से चले आ रहे संघर्षों का परिणाम मानता है। इन इलाकों के कृषि योग्य भूमि नदियों में समा जाने के बाद भी इन्हें लगान देने की विवशता बनी हुई है।

कोसी क्षेत्र के किसानों का दर्द, कुछ किसानों का सामूहिक पक्ष

कोसी क्षेत्र के किसानों का कहना है कि जमीन का सर्वे शुरू है। इस सर्वे में हम लोग काफी परेशानी का सामना कर रहे हैं। कोरोना महामारी और बाढ़, हम तटबंध के बीच के लोगों पर कहर बन कर टूटी है। रोजी, रोजगार, फसल बर्बाद है वैसे भी बालू से रेत बने खेतों और नदी बहती धाराओं की जमीन का मालगुजारी और सेस देना हमारी विवशता है। इतना ही नहीं जिस धार की जमीन का रसीद कटाते है, वह सर्वे मैप में नदी में चली जाएगी। पहले के सर्वे में भी हुआ है कि जिस रैयत की जमीन में नदी बहती थी वह सरकार की जमीन दर्ज हो गयी।

इस जमीन की भी देनी पड़ती है लगान।

अभी हम सभी लोग सहरसा से लेकर दरभंगा तक कागज के लिए दौड़ लगा रहे है और बाबू लोग मनमानी रकम वसूल रहे हैं। उसी प्रकार लगान और सेस जिनका पहले से बाकी है उसे कर्मचारी और उसके बिचौलिए बढ़ी हुई दर से जोड़ कर ले रहे हैं। पहले हम लोगों से लगान और सेस में एक ही लेने की बात हुई थी तटबंध के बीच 4 हेक्टेयर तक का लगान भी सरकार ने माफ़ की थी, परन्तु अब उस माफ़ की गयी जमीन से भी नये दर से मालगुजारी देने की विवशता है। हम लोगों की हालत यह है की अनेक परिवारों को इसे चुकाने के लिए ब्याज पर कर्ज खोजने के लिए जाना पड़ता है।

उसके बाद भी कर्ज नहीं मिल रहा है। लगान के बाद 4 तरह का सेस देना पड़ता है । लगान की राशि का 50% शिक्षा सेस है, जबकि हमारे यहां शिक्षा की बहुत खराब स्थिति है। उसी प्रकार 50% स्वास्थ्य सेस लिया जाता है जबकि बांध के भीतर एक भी अस्पताल नहीं है और तो और खेत हमारे बर्बाद हुए और हम लोगों से लगान की राशि का 20% कृषि विकास का सेस लिया जाता है। इसके बाद 25% सड़क के विकास के नाम पर सेस लिया जाता है। लगान व सेस को खत्म करने की बात और कोशी तटबंध के बीच के लोगों के जीवन स्तर के सुधार के लिए कुर्सी पीड़ित विकास प्राधिकार 1987 मंत्रिमंडल के फैसले पर बना था।

अब उसकी अनुशंसा के आधार पर ही कुछ कार्य होता तो हम लोगों के लिए कुछ बात बनती। हर साल बाढ़ और कटाव की बर्बादी हम लोग झेलने के लिए अभिशप्त हैं। आर्थिक पुनर्वास की बातें सिर्फ घोषणाओं तक ही रहीं। बाढ़ आने पर 6000 रुपये कुछ परिवारों को मिल जाते हैं। बाढ़ पीड़ितों के लिए मानक दर और मानक संचालन प्रक्रिया एसओपी के तहत सरकार द्वारा घोषित अन्य क्षति पूर्ति नहीं मिल पाती। जब बाढ़ से फसलें बर्बाद होती हैं क्षतिपूर्ति के आवेदन के लिए भी रसीद अप टू डेट कराना पड़ता है, जबकि उस समय एक-एक पाई और एक-एक अनाज के दाने के लिए हम लोग तरसते हैं।

कोसी नव निर्माण मंच के आंदोलन के केंद्र में रहा है लगान का मुद्दा

लगान मुक्ति के लिए यहां के किसान पिछले चार वर्ष से लगातार संघर्षरत हैं। जिसकी अगुवाई कोसी नव निर्माण मंच करता है। मंच के संस्थापक महेंद्र यादव कहते हैं कि प्रत्येक वर्ष बाढ़ व सूखे से किसानों की भारी बर्बादी होती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कोसी क्षेत्र का 1.45 लाख हेक्टेयर भूमि दियारा क्षेत्र है। राजस्व व भूमि सुधार विभाग के आयुक्त व सचिव केएएच सुब्रह्मण्यम ने आदेश जारी कर सेस व लगान की राशि बढ़ा दी है। नीतीश कुमार की सरकार ने सेस व लगान को अलग-अलग चरण में बढ़कर दस गुणा कर दिया।

इसको लेकर किसान आंदोलन के क्रम में लगान मुक्ति के लिए जन सुनवाई का आयोजन किया। 26 मई, 2018 को कुरावली बॉर्डर सुपौल से किसानों ने पदयात्रा निकाली जो 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के दिन समाप्त हुआ। यात्रा का शुभारंभ मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित डॉ संदीप पांडे ने किया था। इसको लेकर 20 राज्यों के विभिन्न संगठनों ने मुख्यमंत्री को पत्र भी लिखा। जिसे चर्चित सामाजिक हस्तियों में जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय एनएपीएम की तरफ से सामाजिक कार्यकर्ता व नर्मदा बचाओ आन्दोलन की नेत्री  मेधा पाटकर, मजदूर किसान शक्ति संगठन की नेता व जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय, निखिल डे, रेमन मैग्सेसे से सम्मानित डॉक्टर संदीप पाण्डेय,

मध्यप्रदेश के किसान नेता डॉक्टर सुनीलम, आराधना भार्गव, राजकुमार सिन्हा, कर्नाटक के अवकाश प्राप्त मेजर जनरल सुधीर वोम्बदकरे, उड़ीसा के पर्यावरण के क्षेत्र में गोल्ड मैन पुरस्कार से सम्मानित प्रफुल्ल सामंत्रा, तमिलनाडु से गैब्रियल दिट्रीज, गीता रामकृष्णा, उत्तर प्रदेश से अरुंधति धुरू, ऋचा सिंह, आन्ध्र प्रदेश व तेलंगाना से राम कृष्ण राजू, पी चेन्नईया, मीरा संघमित्रा, पश्चिम बंगाल के जाने माने वैज्ञानिक समर वागची, प्रदीप चटर्जी, अमिताभ मित्रा, दिल्ली से राजेन्द्र रवि, अंजलि भारद्वाज, संजीव, भूपेन्द्र सिंह रावत, मधुरेश, उत्तराखण्ड से विमल भाई, हिमाचल प्रदेश से मनीषा खेहर, व मानसी राजस्थान से कविता श्रीवास्तव, कैलाश मीना इत्यादि प्रमुख है।

महेंद्र यादव।

आंदोलन के क्रम में इस वर्ष 23 फरवरी को सुपौल के गांधी मैदान में आयोजित कोसी महापंचायत में किसानों की बड़ी भागीदारी से सरकार व विपक्ष दोनों को इस मुद्दे पर बोलने के लिए विवश कर दिया। बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव की पहल पर उनके पार्टी के नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने मंच के लोगों से वार्ता कर यह आश्वासन दिया था कि लगान माफी के लिए हम सरकार पर दबाव बनाएंगे। महागठबंधन के घोषणा पत्र में इस को शामिल किया जाना इसी क्रम के साथ जोड़कर देखा जा रहा है।

चुनाव में किसानों ने उम्मीदवारों के सामने रखा वचन पत्र

बिहार विधानसभा चुनाव में कोसी सीमांचल क्षेत्र के विभिन्न दलों के उम्मीदवारों पर लगान के मुद्दे समेत बाढ़ प्रभावित इलाकों की समस्याओं को लेकर दबाव बनाने के लिए कोसी नवनिर्माण मंच ने वचन पत्र भरवाने का अभियान चलाया। वचन पत्र देते हुए किसानों ने कहा कि हम लोगों की समस्यायों के समाधान के लिए प्रण लीजिए और हम लोगों के बीच आये व जब आप जीत जाएं तो हम लोगों के लिए भी निम्न दस निश्चय पर कार्य करें-

(1) किसानों के कल्याण के लिए 30 जनवरी, 1987 के बिहार कैबिनेट के फैसले से गठित ” कोसी पीड़ित विकास प्राधिकार” निष्क्रिय है उसे पुनः सक्रिय व प्रभावी किया जाए।

(2) किसानों से लगान व सेस लेना बंद कर उनकी बर्बाद जमीन की क्षति देने का विधान सरकार बनाए।

(3) सर्वे कार्य में जिस जमीन पर नदी बह रही है उस जमीन को रैयत के नाम ही दर्ज हो ऐसा विधान बनाएं या बनवाएं साथ ही नकल लेने और दफ्तरों में शुरू हुई धांधली पर तत्काल प्रभाव से रोक लगे।

(4) हम लोगों के यहाँ शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं विकसित हों।

(5) पुनर्वास के अवैध कब्जे को हटवाते हुए उसे असली लाभुक को दिलाया जाए और आर्थिक पुनर्वास की बात जो सरकार भूल गयी है उसे पुनः दिलाया जाए।

(6)मजबूरी में पलायन करने वाले किसानों व मजदूरों के कल्याण की योजना बने।

(7 )घाटों पर मुफ्त में नावों से पार करने की वर्ष भर व्यवस्था हो। उन घाटों को चलाने वाले नाविकों के स्थायी नियोजन सरकार करे।

(8) मानकदर व एस ओ पी के तहत राहत व क्षतिपूर्ति दिलाई जाए।

(9 )कोसी की बाढ़ की समस्या का समाधान की खोज शुरू करायी जाए।

(10) मुन्गरार घाट बैरिया मंच पर पुल निर्माण कार्य कराया जाए।

(पटना से स्वतंत्र पत्रकार जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on November 5, 2020 12:48 pm

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