कोविड वैक्सीनः मीडिया का शोर, पीएम का बयान और हकीकत

भारत में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा एक करोड़ पहुंचने से सिर्फ़ सात कदम की दूरी पर खड़ा है। जिस गति से कोविड-19 की सेकेंड वेब देश में बढ़नी शुरू हुई है, उसे देखते हुए कह सकते हैं कि 10-15 दिन में हम ये उपलब्धि हासिल कर ही लेंगे। ये उपलब्धि हासिल करने वाला भारत ट्रंप के यूएसए के बाद दूसरा देश होगा। वहीं लॉकडाउन हटाने के लगभग छः महीने बाद मोदी सरकार नींद से जागी तो उसे कोरोना का ख्याल आया। मंगलवार को वो मीडिया के सामने आए ये बताने के लिए वो वैज्ञानिक नहीं हैं और कोरोना वैक्सीन कब आएगी ये वैज्ञानिकों के हाथ में है। सरकार वैक्सीन को लेकर किसी तरह की जल्दबाजी के मूड में नहीं है। उन्होंने कुछ यूं कहा, “कोरोना वैक्‍सीन को लेकर निर्णय वैज्ञानिक तराजू पर ही तौला जाना चाहिए। हम कोई वैज्ञानिक नहीं हैं। हमें व्‍यवस्‍था के तहत चीजों को स्‍वीकार करना पड़ेगा। हमें इन चीजों को वैश्विक संदर्भ में देखना पड़ेगा।” 

बता दें कि 24 नवंबर मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी मुख्‍यमंत्रियों संग बैठक में कोरोना वैक्‍सीन पर विस्‍तार से बात की थी। उन्‍होंने कहा कि वैक्‍सीन कब आएगी, यह वैज्ञानिकों के हाथ में है। कौन सी वैक्‍सीन कितनी कीमत में आएगी, यह तय नहीं है। भारत अपने नागरिकों को जो भी वैक्‍सीन देगा, वह हर वैज्ञानिक कसौटी पर खरी होगी। वैक्‍सीन के डिस्‍ट्रीब्‍यूशन के लिए राज्‍यों के साथ मिलकर तैयारी की जा रही है। वैक्‍सीन का एक विस्‍तृत प्‍लान जल्‍द ही राज्‍यों से साझा कर दिया जाएगा।

प्रधानमंत्री मोदी ने ये भी कहा कि वैक्सीनेशन कार्यक्रम लंबे समय तक चलने वाला है, इसलिए राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर तक टास्क फोर्स बनाने की जरूरत है। नरेंद्र मोदी की मुख्यमंत्रियों के साथ हुई बैठक का संदेश मोटा-मोटा ये था कि सरकार कोरोना वैक्सीन को लेकर किसी भी तरह की जल्दबाजी नहीं करना चाहती है।

मीडिया का वैक्सीन गान
कोरोना के बिगड़ते हालात में सुप्रीम कोर्ट के स्वतःसंज्ञान के बाद मीडिया अब वैक्सीन वैक्सीन चिल्लाने लगी है। समझ नहीं आ रहा कि वैक्सीन का बाज़ार पैदा करने के लिए कोरोना का भय वापस पैदा किया जा रहा है या फिर कोरोना संकट से निपटने में सरकार की नाकामी को छुपाने के लिए मीडिया द्वारा कोरोना का झुनझुना बजाया जा रहा है।दुनिया भर में फिलहाल कोरोना वायरस की चार-चार वैक्‍सीन (Pfizer, Moderna, AstraZeneca और Sputnik V) का अंतरिम एफेकसी डेटा सामने आ चुका है।

ऑक्‍सफर्ड-एस्‍ट्राजेनेका की वैक्‍सीन जहां ओवरऑल 70.4% असरदार रही, वहीं बाकी तीनों का सक्‍सेस रेट 94% से ज्‍यादा है। ऑक्‍सफर्ड का टीका भी खास डोज पैटर्न पर 90% तक असर करता है। रूसी वैक्‍सीन को छोड़कर बाकी सभी वैक्‍सीन अब रेगुलेटर्स के पास इमर्जेंसी अप्रूवल के लिए जाएंगी। वैक्‍सीन के अगले साल की शुरुआत में उपलब्‍ध होने की संभावना प्रबल हो गई है।

बाज़ार में प्रतिस्पर्धा के बीच कई कंपनियों ने अपनी-अपनी कोरोना वैक्सीन की संभावित कीमतों की जानकारी दी है। अमेरिकी फार्मा कंपनी मॉडर्ना ने बताया कि एक खुराक की कीमत के लिए आपको 25 से लेकर 37 डॉलर (1800- 2800 रुपये) देने पड़ सकते हैं। वहीं Oxford Astrazenca ने कहा है कि उसकी वैक्सीन की 300 करोड़ डोज वर्ष 2021 तक तैयार हो जाएगी और पूरी दुनिया में ये एक ही कीमत करीब 222 रुपये होगी। फाइजर की वैक्सीन की एक डोज करीब 1400 रुपये में उपलब्ध हो सकती है। रूस की Sputnik V की एक डोज 740 रुपये में मिलेगी, जबकि भारत में बन रही कोवैक्सीन के लिए ये क़ीमत सिर्फ़ 100 रुपये तक हो सकती है। हर इंसान को फाइजर, स्पुतनिक वी, और मॉडर्ना की वैक्सीन की दो खुराक देनी पड़ेगी।

एक नज़र दुनिया की चार प्रमुख कोरोना वैक्सीन पर जिनका ट्रायल पूरा हो चुका है।

OXFORD-ASTRAZENECA
वैक्सीन का नाम- AZD1222
डोज- 2
लोगों पर ट्रायल- 20,260
प्रभावी- 90 प्रतिशत
कीमत- एक डोज के लिए 3 से 4 डॉलर
(220-290 रुपये)
देश- अमेरिका, ब्रिटेन और भारत

Pfizer Biontech
वैक्सीन का नाम- mRNA-BNT162
डोज- 2
लोगों पर ट्रायल- 44,000
प्रभावी- 95 प्रतिशत
कीमत- एक डोज के लिए 20 डॉलर (1450 रुपये)
देश- अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोप, जापान

Moderna
वैक्सीन का नाम- mRNA-1273
लोगों पर ट्रायल- 30,000
डोज- 2
प्रभावी- 94.5 प्रतिशत
कीमत- एक डोज के लिए 25 से 37 डॉलर
(1850-2750 रुपये)
देश- अमेरिकी, कनाडा, जापान, यूरोप

Gamaleya Institute
वैक्सीन का नाम- Spuntik-V
डोज- 2
लोगों पर ट्रायल- 40,000
प्रभावी- 95 प्रतिशत
कीमत- एक डोज के लिए 10 डॉलर (741 रुपये)
देश- रूस, भारत, वियतनाम और ब्राजील

रूसी वैक्सीन स्पुतनिक-वी 95% तक असरदार है। रूस ने मंगलवार को अंतिम चरण के परीक्षण के शुरुआती नतीजे जारी किए। इसके साथ ही वैक्सीन की अनुमानित कीमत का भी खुलासा किया। बताया गया कि इस वैक्सीन का एक टीका 10 डॉलर (करीब 741 रु.) से कम में पड़ेगा। जबकि 2 डोज करीब 20 डॉलर (1482 रुपये) में उपलब्‍ध होगी जो अमेरिकी कंपनियों के मुकाबले कम कीमत है। 13-14 नवंबर को रूसी कोरोना वैक्सीन की तीसरी खेप तीसरे चरण का ट्रायल के लिए भारत पहुंची थी, जबकि अगस्त में ही रूस ने स्पुतनिक वी वैक्सीन को मंजूरी दे दी थी। रूस में यह वैक्सीन लोगों को लगाई भी जा रही है।

भारत को चाहिए 170 करोड़ डोज
एक रिपोर्ट के मुताबिक देश की ज्यादातर जनसंख्या को वैक्सीन देने के लिए भारत को 170 करोड़ डोज की जरूरत होगी। भारतीय कंपनियों की क्षमता 240 करोड़ डोज बनाने की है। टीकाकरण के लिए जरूरी पर्याप्त वाइल, स्टोपर्स, सिरिंज, गेज, अल्कोहल स्वाब बनाने की क्षमता भी भारत के पास है, लेकिन, कोल्ड स्टोरेज और रेफ्रीजरेटेड वैन की संख्या कम होने के कारण एक साल में 55 से 60 करोड़ डोज ही लग पाएंगे। बता दें कि ज्यादातर कंपनियों की वैक्सीन को स्टोर करने के लिए 2-3 डिग्री से नीचे के तापमान की जरूरत है।

आम तौर पर वैक्सींस को दो से आठ डिग्री सेल्सियस के तापमान पर स्टोर रखने की जरूरत होती है, अमीर देशों के लिए ये काम मुश्किल नहीं है, लेकिन जिन गरीब और विकासशील देशों में संसाधनों की कमी है और बिजली की उपलब्धता एक बड़ी समस्या है वहां इन्हें स्टोर करके रखना मुश्किल काम हो सकता है।

प्राथमिकता के आधार पर दी जाएगी वैक्सीन
भारत में प्राथमिकता के आधार पर सबसे पहले हेल्‍थ वर्कर्स, फ्रंटलाइन वर्कर्स और सीनियर सिटिजंस को वैक्‍सीन देने की तैयारी है। इस हाई प्रॉयरिटी ग्रुप में जो भी लोग शामिल होंगे, उन्‍हें एसएमएस के जरिए टीकाकरण की तारीख, समय और जगह बता दी जाएगी। मेसेज में टीका देने वाली संस्‍था/हेल्‍थ वर्कर का नाम भी होगा। पहली डोज दिए जाने के बाद, दूसरी डोज के लिए एसएमएस भेजा जाएगा। जब टीकाकरण पूरा हो जाएगा तो डिजिटल QR आधारित एक सर्टिफिकेकट भी जेनरेट होगा तो वैक्‍सीन लगने का सबूत होगा। एक डिजिटल प्‍लेटफार्म बनाया जा रहा है, जिसके जरिए कोविड टीकों के स्‍टॉक और डिस्‍ट्रीब्‍यूशन/वैक्‍सीनेशन को ट्रैक किया जाएगा। सरकार क्रमबद्ध तरीके से टीकाकरण में आगे बढ़ेगी।

कोरोना वैक्‍सीन लग जाने के बाद सरकार लोगों की मॉनिटरिंग करेगी। ऐसा इसलिए ताकि वैक्‍सीन की सुरक्षा को लेकर लोगों में भरोसा बढ़ सके। टीकाकरण को लेकर अलग-अलग तबकों में तरह-तरह की भ्रांतियां रहती हैं, इसलिए सरकार पहले से ही राज्‍यों और केंद्रशासित प्रदेशों को इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाने के लिए कह चुकी है। इसके अलावा वैक्‍सीन के किसी प्रतिकूल प्रभाव से निपटने के लिए भी तैयार रहने को कहा गया है। राज्‍यों से एडर्नालाइन इंजेक्‍शन का पर्याप्‍त स्‍टॉक मेंटेन रखने को कहा गया है, ताकि किसी एलर्जिक रिएक्‍शन की स्थिति में लोगों को वह लगाया जा सके।

सीरम इंस्टिट्यूट का ऐस्ट्राजेनेका से 100 करोड़ डोज बनाने का समझौता
ऐस्ट्राजेनेका ने कहा है कि वह उत्पादन क्षमता बढ़ाएगी और दिसंबर तक 10 करोड़ डोज बना दी जाएगी, जिससे कि पूरे भारत में टीकाकरण शुरू हो सके। सीरम इंस्टिट्यूट ने भी कहा है कि ऐस्ट्राजेनेका से 100 करोड़ डोज बनाने का समझौता किया गया है। अदार पूनावाला का कहना है कि शुरुआत में ही भारत को डोज मिल जाएंगी। वैक्‍सीन के इमर्जेंसी अप्रूवल में अब महीने भर से ज्‍यादा का वक्‍त नहीं लगना चाहिए। ऐसे में उत्‍पादन के रास्‍ते तलाशे जा रहे हैं।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा वैक्‍सीन निर्माता है, इसलिए उसकी इसमें बड़ी अहम भूमिका होगी। रूस, ऑस्‍ट्रेलिया समेत 20 से भी ज्‍यादा देशों के राजदूत आने वाले हैं, यह देखने कि भारतीय कंपनियां कितनी डोज कितने वक्‍त में तैयार कर सकती हैं। सरकार कोविड वैक्‍सीन को एक डिप्‍लोमेसी टूल की तरह इस्‍तेमाल करना चाहती है। यह सभी राजदूत 27 नवंबर को सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया और जेनोवा फार्मास्‍यूटिकल्‍स की फैसिलिटीज का दौरा करेंगे।

सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के साथ मिलकर ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेने का वैक्सीन के तीसरे चरण का ट्रायल कर रहा है।

अमेरिकी वैक्सीन ‘फाइजर’ की शायद जरूरत नहीं पड़ेगी
24 नवंबर को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने इकोनॉमिक टाइम्स से एक विशेष बातचीत में कहा है, “भारत में तीन वैक्सीन परीक्षण के दौर में हैं। हो सकता है भारत को फाइजर और बायो एनटेक के कोरोना वैक्सीन की जरूरत ही न पड़े। अब तक अमेरिका ने फाइजर को लाइसेंस नहीं दिया है। इस हिसाब से भारत जैसे देशों के लिए इस बात का कोई मतलब नहीं है कि वह इससे कोरोना वैक्सीन लेने के बारे में विचार करे। भारत को कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में फाइजर के टीके की आवश्यकता नहीं पड़ सकती है। देश में कोरोना की अन्य वैक्सीन का परीक्षण किया जा रहा है, जो अब तक सेफ्टी ट्रायल में आशाजनक परिणाम दिखा रहे हैं।”

स्वास्थ्य मंत्री ने कहा है कि फाइजर-बायोएनटेक के वैक्सीन पर विचार करने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि अमेरिकी दवा नियामक ने भी अभी तक इसके वैक्सीन को मंजूरी नहीं दी है। अगर फाइजर की वैक्सीन को मंजूरी मिल भी जाती है तो इसके निर्माता दूसरे देशों को वैक्सीन की आपूर्ति करने से पहले अपनी स्थानीय आबादी को वैक्सीन मुहैया कराने का प्रयास करेंगे।

‘कोवैक्सीन’ अगले साल की दूसरी छमाही में आएगा
बता दें कि भारत में अभी तक कम से कम वैक्सीन के पांच कैंडिडेट हैं, जिनके कोविड-19 वैक्सीन का ह्यूमन ट्रायल जारी है। इनमें से तीन वैक्सीन सेफ्टी और प्रभाव साबित करने के लिए दूसरे और तीसरे फेज के ट्रायल में हैं। वहीं भारत बायोटेक के कोविड-19 के टीके कोवैक्सीन के तीसरे चरण का परीक्षण शुरू हो गया है, जबकि कोवैक्सीन के दूसरे चरण का नतीजा अभी नहीं आया है। दवा बनाने वाली कंपनी भारत बायोटेक कोविड-19 के लिए अपनी वैक्सीन को अगले साल दूसरी तिमाही में पेश करने की योजना बना रही है। कंपनी के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि भारतीय नियामक प्राधिकरणों से अपेक्षित मंजूरी मिल जाने की स्थिति में कंपनी इसे अगले साल की दूसरी छमाही में पेश कर सकती है।

असल में, भारत बॉयोटेक कोवैक्सीन का दो फेज का ट्रॉयल सफलतापूर्वक करने के बाद कंपनियां तीसरे फेज के ट्रॉयल में देरी नहीं करना चाहती हैं, इसलिए वह ट्रॉयल के लिए मरीजों की संख्या कम करना चाह रही है, ये संख्या 100 से कम रहने की संभावना है। ये भी तय नहीं हो सका है कि कितने डोज लगेंगे। साथ ही ट्रॉयल के लिए चुने गए संस्थान भी कम किए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक एक-दो संस्थानों को ड्रॉप किया जा चुका है, इसलिए गांधी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) के हमीदिया अस्पताल की तैयारी होने के बाद भी अप्रूवल नहीं मिल पाया है, जिससे वैक्सीन का ट्रॉयल अटक गया है।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

This post was last modified on December 3, 2020 3:36 pm

Share
%%footer%%