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Friday, September 24, 2021

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यूपी के लव जिहाद अध्यादेश को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती

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धर्म परिवर्तन अंतर-विवाह पर उत्तर प्रदेश के अध्यादेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गयी है। इसी बीच उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन बी लोकुर ने इस अध्यादेश का विरोध किया है। जस्टिस लोकुर ने कहा है कि लव जिहाद अध्यादेश जीवन साथी चुनने की स्‍वतंत्रता के खिलाफ है। इसके अलावा इलाहाबाद और दिल्ली उच्च न्यायालयों द्वारा पहले की गई टिप्पणियों को देखते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि यह अच्छी तरह से समझा जाना चाहिए कि किसी भी प्रमुख व्यक्ति का अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने का अधिकार भारत के संविधान में एक मौलिक अधिकार है।

इस बीच उत्तर प्रदेश में लव जिहाद के आरोप में पहली गिरफ्तारी हो गई है। यहां बरेली जिले में ‘लव जिहाद’ का पहला मुकदमा दर्ज होने के बाद फरार चल रहे आरोपी उवैस को आखिरकार पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पांच दिन पहले 28 नवंबर को बरेली के देवरनिया थाने में लव जिहाद का कानून बनने के बाद पहला मुकदमा दर्ज किया गया था। बुधवार को गिरफ़्तारी के बाद आरोपी को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया।

उच्चतम न्यायालय में दो वकीलों, विशाल ठाकरे और अभय सिंह यादव और एक कानून शोधकर्ता, प्राणेश ने धर्म परिवर्तन अंतर-विवाह पर उत्तर प्रदेश के  अध्यादेश के खिलाफ दाखिल याचिका में तर्क दिया है कि अध्यादेश सार्वजनिक नीति के खिलाफ और लोगों के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों के खिलाफ है।

याचिका में कहा गया है कि धर्म परिवर्तन और अंतर-विवाह पर उत्तर प्रदेश अध्यादेश किसी को भी गलत तरीके से फंसाने के लिए बुरे तत्वों के हाथों में एक शक्तिशाली उपकरण बन सकता है। उत्तर प्रदेश कैबिनेट द्वारा धार्मिक रूपांतरण और अंतर-विवाह विवाहों पर लगाए गए अध्यादेश का गलत तरीके से इस्तेमाल लोगों को फंसाने के लिए किया जाएगा और इससे अराजकता और भय पैदा होगा, उच्चतम न्यायालय के समक्ष दायर याचिका में अध्यादेश की वैधता को चुनौती दी गई है।

विवादास्पद अध्यादेश, जिसका शीर्षक उत्तर प्रदेश निषेध धर्म परिवर्तन अध्यादेश, 2020 का उत्तर प्रदेश (उत्तर प्रदेश विधान विरुध धर्म सम्प्रदाय प्रतिष्ठा, 2020) को राज्य मंत्रिमंडल ने नवंबर में मंजूरी दे दी थी यह एक व्यक्ति को दूसरे धर्म में परिवर्तित होने से पहले एक विस्तृत प्रक्रिया का पालन करने का प्रावधान करता  है। उसी का उल्लंघन व्यक्ति पर आपराधिक देयता को बढ़ाता है जो रूपांतरण से गुजरता है और जो व्यक्ति को परिवर्तित करता है।

अध्यादेश के प्रमुख प्रावधानों में से एक धारा 3 है जो निषिद्ध करती है कि कोई व्यक्ति दुव्यपर्देशन, बल, असमयक असर, प्रपीड़न, प्रलोभन के प्रयोग या पद्धति द्वारा या अन्य व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अन्यथा रूप से एक धर्म से दूसरे धर्म में संपरिवर्तन नहीं करेगा/करेगी या संपरिवर्तन करने का प्रयास नहीं करेगा/करेगी और न ही किसी ऐसे व्यक्ति को ऐसे धर्म संपरिवर्तन के लिए उत्प्रेरित करेगा/करेगी, विश्वास दिलाएगा/दिलाएगी या षड्यंत्र करेगा/करेगी परंतु यह की यदि कोई व्यक्ति अपने ठीक पूर्व धर्म मे पुनः संपरिवर्तन करता है/करती है तो उसे इस अध्याधेश के अधीन धर्म संपरिवर्तन नहीं समझा जाएगा।

अध्यादेश की धारा 4 के अनुसार, कोई भी पीड़ित व्यक्ति, उसके माता-पिता, भाई, बहन, या कोई अन्य व्यक्ति जो उससे संबंधित है / उसके द्वारा रक्त, विवाह, या गोद लेने से ऐसे रूपांतरण की एक प्राथमिकी दर्ज हो सकती है जो धारा 3 के प्रावधानों का उल्लंघन करती है। धारा 5 में धारा 3 के उल्लंघन के लिए सजा निर्धारित है। धारा 3 के तहत अपराध का दोषी पाए जाने वाले को 1 से 5 साल की कैद और 15 हजार रुपए तक के जुर्माने की सजा होगी। हालांकि, नाबालिग, महिला या अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति के संबंध में धारा 3 का उल्लंघन, 2 से 10 साल के कारावास की सजा को आकर्षित करेगा और 25,000 रुपये तक के जुर्माने के लिए भी उत्तरदायी होगा।

अध्यादेश का सबसे विवादित पहलू यह है कि अंतर-धार्मिक विवाहों पर इसका प्रभाव पड़ेगा। धारा 6 में कहा गया है कि विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन के एकमात्र प्रयोजन से किया गया विवाह शून्य घोषित होगा-यदि विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन के एकमात्र प्रयोजन से या विपर्ययेन एक धर्म के पुरुष द्वारा अन्य धर्म की महिला के साथ विवाह के पूर्व या बाद में या तो स्वयं का धर्म संपरिवर्तन करके या विवाह के पूर्व या बाद में महिला का धर्म परिवर्तन करके किया गया विवाह। विवाह के किसी पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार के विरुद्ध प्रस्तुत की गयी याचिका पर पारिवारिक न्यायालय द्वारा या जहां पारिवारिक न्यायालय स्थापित न हो, वहां ऐसे मामले का विचारण करने की अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा शून्य घोषित कर दिया जाएगा।

अध्यादेश सिर्फ अंतर-विवाह विवाहों को प्रभावित नहीं करता है। जो कोई भी एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तित होना चाहता है, उसे अध्यादेश द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। प्रक्रिया अध्यादेश की धारा 8 और 9 में व्याख्या की गई है।

यूपी अध्यादेश के अलावा, याचिकाकर्ताओं ने 2018 में उत्तराखंड सरकार द्वारा पारित एक समान – उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता अधिनियम की वैधता पर भी सवाल उठाया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने हालही में ‘लव जिहाद’ से जुड़े  ‘गैर कानूनी धर्मांतरण अध्यादेश’ को मंजूरी दी है।

जस्टिस मदन लोकुर ने कहा है कि उत्‍तर प्रदेश में हाल ही में लागू किया गया वो अध्‍यादेश दुर्भाग्‍यपूर्ण है, जिसमें जबरन, धोखे या बहकावे से धर्मांतरण कर शादी कराने की बात कही गई है। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि यह अध्‍यादेश चुनने की आजादी, गरिमा और मानवाधिकारों की अनदेखी करता है। मदन लोकुर ने यह भी कहा कि धर्मांतरण संबंधी शादियों के खिलाफ ये कानून उच्चतम न्यायालय द्वारा चुनने की आजादी और व्‍यक्ति की गरिमा की रक्षा के लिए विकसित किए गए न्‍यायशास्‍त्र का उल्‍लंघन हैं।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने माना है कि किसी भी बालिग व्यक्ति द्वारा अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने का अधिकार भारत के संविधान के तहत मिला एक मौलिक अधिकार है। न्यायमूर्ति एस सुजाता और न्यायमूर्ति सचिन शंकर मगदुम की खंडपीठ के समक्ष एक वजीद खान की तरफ से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर उसकी प्रेमिका राम्या को मुक्त कराने की मांग की गई थी। खंडपीठ ने इस याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि यह अच्छी तरह से तय है कि किसी भी बालिग व्यक्ति का अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने का अधिकार भारत के संविधान के तहत मिला एक मौलिक अधिकार है और व्यक्तिगत संबंधों (धर्म या जाति का ध्यान किए बिना) से संबंधित दो व्यक्तियों को मिली इस स्वतंत्रता पर किसी के द्वारा भी अतिक्रमण नहीं की जा सकता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की दो बार सिंगल बेंच ने शादी के लिए धर्म परिवर्तन को ग़ैर क़ानूनी क़रार दिया था लेकिन हाईकोर्ट की डबल बेंच ने दोनों सिंगल बेंच के आदेशों को पलटते हुए साफ़ कहा था कि, ‘किसी भी व्यक्ति को अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने का मौलिक अधिकार है। महज अलग-अलग धर्म या जाति का होने की वजह से किसी को साथ रहने या शादी करने से नहीं रोका जा सकता है। दो बालिग लोगों के रिश्ते को सिर्फ़ हिन्दू या मुसलमान मानकर नहीं देखा जा सकता’।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के कथित लव जिहाद पर इस टिप्पणी के बावजूद यूपी की योगी सरकार ने अध्यादेश लाकर कथित लव जिहाद को आपराधिक क़ानून में बदल दिया जिसमें 1 से 10 साल तक की सज़ा का प्रावधान भी कर दिया गया।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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