Monday, April 15, 2024

एक मरे जमीर वाले मीडियाकर्मी को हमला करके जिंदा मत करिए

शाहीन बाग़ को ही इम्तहान देना है। इसलिए मीडिया हो या कोई और हो उसके साथ किसी तरह की धक्का मुक्की या हिंसा नहीं होनी चाहिए। पत्रकार भले वो स्टूडियो से हिंसा की भाषा बोलते रहें। जो आंदोलन की ज़मीन पर उतरता है उसे ही अपने भीतर आत्मबल विकसित करना होता है। उसे ही संयम रखना होता है। इसलिए मेरी राय में उत्तम तो यही होगा कि दीपक चौरसिया के साथ हुई घटना की मंच से निंदा की जाए।

इससे एक काम यह होगा कि वहाँ मौजूद सभी लोगों में अहिंसा के अनुशासन का संदेश जाएगा। जब शाहीन बाग़ कश्मीरी पंडितों पर चर्चा कर सकता है और उनके साथ खड़े होने का एलान कर सकता है तो मुझे उम्मीद है कि यह भी करेगा। पत्रकार के साथ हिंसा हो यह अच्छी बात नहीं। मैं अगर या मगर लगा कर, तब और अब लगा कर यह बात नहीं कहना चाहता।

साथ में मीडिया का अध्ययन करने वाले विनीत कुमार का पोस्ट साझा कर रहा हूँ –

“ शाहीनबाग में दीपक चौरसिया के साथ जो हुआ गलत हुआ। हम इसकी निंदा करते हैं।

कारोबारी मीडिया को पता है कि हम चाहे लोकतंत्र और नागरिकों के खिलाफ कितने खड़े हो जाएं, कॉर्पोरेट की बैलेंस शीट दुरूस्त रखने और अपनी कुंठा की दूकान चलाने के लिए चाहे जिस हद तक गिर जाएं, समाज का संवेदनशील और तरक्कीपसंद तबका ये हम पर हुए हमले, हिंसा की जरूर आवोचना करेगा। उसे खुद को मानवीय दिखने के लिए ऐसा करना जरूरी होगा।

यही कारण है कि सालभर तक जिस कारोबारी मीडिया की कारगुजारियों को जो लोग सिर झुकाकर झेलते हैं या फिर जमकर आलोचना करते हैं, दोनों एक स्वर में ऐसे मीडियाकर्मियों पर हुए हमले की निंदा करते हैं। कोई विकल्प भी नहीं है उनके पास।

राजदीप सरदेसाई को विदेश में जिस तरह जलील करते हैं, हमले करते हैं, एक तबका इस पर जश्न मनाता है और दीपक चौरसिया या फिर जी न्यूज के मीडियाकर्मी पर हुए हमले की निंदा करता है। ऐसा क्यों है ?

यदि आप मानवीय संवेदना के पक्षधर हैं तो आपको समान रूप से सबका विरोध करना चाहिए। लेकिन नहीं। आप ऐसा नहीं कर सकते। अब किसी भी मीडियाकर्मी पर हमला एक राजनीतिक गुट के प्रतिनिधि पर हमला है और आपको उस हिसाब से विरोध या जश्न के साथ होना होता है। बाकी संवेदनशीलता का फायदा तो उन्हें मिलता ही है।

इससे पहले कि आप मुझे इस हमले का समर्थक मान लें, मैं आपसे बस एक सवाल पूछना चाहता हूं कि दीपक चौरसिया ने पिछले एक साल-दो साल- तीन साल…में ऐसी कौन सी रिपोर्टिंग की है जो जनतंत्र को मजबूत करता है ?

अपील : इस हमले का विरोध करते हुए मेरी अपील होगी कि कारोबारी मीडिया के मीडियाकर्मियों को मारिए नहीं, हमले मत कीजिए। आपको लगे कि वो नागरिक के खिलाफ काम कर रहा है, नाम लेना बंद कर दीजिए। एक पब्लिक फेस, मीडियाकर्मी के लिए गुमनामी से बड़ी मौत कुछ नहीं। शाहीनबाग में उन पर हमला करके एक मर चुके ज़मीर के मीडिया कारोबारी को हमलावरों ने लोगों की निगाह में जिंदा कर दिया जो कि गलत हुआ।”

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के फेसबुक पेज से लिया गया है।)

जनचौक से जुड़े

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments

Latest Updates

Latest

Related Articles