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दो राज्यों की सीमा पर हज़ारों मज़दूरों की भीड़, पुलिस की लाठी और भूख की मार! रूह कँपाने वाली अनगिनत कहानियां

3 मई को सिर पर गठरी गोद में बच्चा लिए दो दर्जन स्त्रियां व पुरुष झज्जर से सीतापुर के लिए पैदल ही निकले थे। लेकिन उन्हें दिल्ल- कैंट फिर धौला कुँआ से वापस कर दिया ये कहकर कि जहां से आए हो वहां वापस जाओ। नहीं तो उठाकर जेल में बंद कर दूँगा। जब ये मजदूर वापस झज्जर जाने के लिए उलटा रास्ता पकड़े तो कुछ दूर जाने के बाद दिल्ली कैंट में ही रोजगार दफ्तर के पास बैठकर खाना खाने लगे तो इन्हें वहां बैठा देखकर दिल्ली पुलिस ने उन्हें लाठियों से पीटा और बोली – “ तुम लोग जब घर जा रहे थे तो चले जाते वापस क्यों आए”- अपना दुखड़ा सुनाते हुए है रामजइति बताती हैं।

ये पूछने पर कि स्कूल में खाना तो मिलता है ना फिर क्यों गाँव जाना चाहते हो?- कालिंदी देवी कहती हैं, “ छोटे-छोटे बच्चे हैं साब। इतने दिन कैसे काटें हमीं जानते हैं। स्कूल में दो बार खाना देते हैं वो एक मजदूर की खुराक भर का भी नहीं होता। बच्चों को तो दिन में 4 बार खाना चाहिए। उनको तो छिन छिन पर भूख लगती है। दूध नहीं है तो खाना तो चाहिए न बच्चों का पेट भरने के लिए।”

वहीं उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के, मड़ियाहूँ तहसील के सैंकड़ों मजदूर 5 दिन से भूखे प्यासे उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश बॉर्डर पर फँसे हुए हैं। वो बता रहे हैं कि यूपी पुलिस मारकर हमें मध्य प्रदेश में खदेड़ रही है जबकि एमपी पुलिस हमें मारकर उत्तर प्रदेश में खदेड़ रही है। जहां पर रहते थे वहां खाने के नाम पर खिचड़ी मिलती थी लेकिन उसका भी गिना चुना पैकेट ही आता था किसी को मिलता था किसी को नहीं मिलता था।

पैदल जाने का सिलसिला जारी है

प्रवासी मजदूरों का पैदल घर जाने का सिलसिला जारी है। कुम्मा यादव बीवी बच्चों को लेकर पैदल ही गुड़गांव से मध्य प्रदेश छतरपुर के लिए पैदल चले हैं।

राजेश अपनी बीवी और छोटे छोटे बच्चों को लेकर दो मई को दिल्ली पहुँचे। उन्हें भी मध्यप्रदेश जाना है। राजेश बताते हैं कि छोटे बच्चे ज़्यादा नहीं चल पाते तो जगह-जगह रुकना पड़ता है। कहीं कोई गाड़ी नहीं मिलती तो आगे सफर में मुसीबत बढ़ जाएगी।

अरविंद और देश राज बताते हैं कि पुलिस रोकती पूछती है। कहां जा रहे हो, क्यों जा रहे हो? जब कहते हैं साहेब खाने को कुछ नहीं है। मजबूरी है जाना तो छोड़ देती है।

पन्ना, महेंद्र और राजा बेलदारी करते थे गुड़गांव में। इन लोगों को झांसी जाना है। डेढ़ महीने कैसे काट लिए लेकिन अब मुश्किल हो रहा है। राजा बताते हैं कि ठेकेदार थोड़ा काम चला दिया उसी के सहारे एक डेढ़ महीने काट दिया लेकिन अब नहीं कट रहा।

सरकार मजदूरों के लिए गाड़ी भेज रही थोड़ा और इंतजार कर लेते कहने पर सपना कहती हैं- इंतजार। डेढ़ महीने से हम और क्या कर रहे थे। हमें पता है सरकार हम गरीबों के लिए नहीं है। तो क्यों खुद को और धोखा दिया जाए।

दो दिन से महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश बॉर्डर बिजासन घाट पर फँसे सात हजार प्रवासी मजदूरों ने किया पथराव

मध्यप्रदेश के बड़वानी जिले में स्थित बिजासन घाट एमपी और महाराष्ट्र की सीमा है। यूपी-बिहार के मजदूर घर जाने के लिए महाराष्ट्र से पैदल ही चले थे। लेकिन मध्यप्रदेश की सीमा में प्रवेश करने से उन्हें रोक दिया गया।

महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश बॉर्डर बंद होने के चलते बिजासनघाट पर करीब सात हजार प्रवासी मजदूर फंस गए। बॉर्डर पर फँसे मजदूर 2 दिन से बड़वानी प्रशासन से बॉर्डर खोलने की मांग कर रहे थे। ये सभी मजदूर बिहार-यूपी के रहने वाले हैं। बॉर्डर पर इन्हें रोक कर रखा गया है। रविवार को इन मजदूरों का गुस्सा भड़क गया। तो बिजासनघाट पर फंसे मजदूरों ने आगरा-मुंबई हाइवे को जाम करके मांग करने लगे कि उन्हें गृह राज्य पहुंचाया जाए।

मजदूरों की वजह से वाहनों की लंबी कतार लग गई थी। मजदूरों को रास्ता देने के बजाय समझाने पहुंचे अधिकारियों पर मजदूरों ने पथराव शुरु कर दिया। मजदूरों के पथराव में एएसपी सुनीता रावत और एसडीएम घनश्याम को चोट आई है।

वहीं बड़वानी प्रशासन का कहना है कि यूपी बॉर्डर पर आवाजाही बंद है। यूपी सरकार से प्रदेश की सरकार बात कर रही हैं। निर्देश मिलने के बाद हम आगे की कार्रवाई करेंगे।

शिकारी राजा दशरथ के राज में अभिशप्त श्रवण कुमारों की कथा

एक मजदूर अपनी बूढ़ी माँ को गोद में लिए पैदल ही अपने गंतव्य की ओर चला जा रहा है। उसकी ये तस्वीर सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हो रही है। इस तस्वीर को कैप्शन देते हुए संदीप यादव अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं- ‘देश के पांच ट्रिलियन इकोनॉमी बनने की कहानी’।

40 वर्षीय विश्वनाथ शिंदे मुम्बई में कंस्ट्रक्शन वर्कर हैं। लॉकडाउन में काम बंद होने के चलते उनके सामने  भी जीने खाने का संकट पैदा हुआ। तो परिवार के साथ पैदल ही नवी मुंबई से अकोला के लिए निकल लिए।

चूंकि उनकी 70 वर्षीय चाची वचेलाबाई चलने से लाचार हैं तो विश्वनाथ शिंद ने उन्हें गोद में उठाकर सफर तय किया। बता दें कि वचेलाबाई के विश्वनाथ के अलावा कोई नहीं।

शिकार के शौकीन राजा दशरथ के राज में ऐसे कई श्रवण कुमार बेसमय ही शिकार होने को अभिशप्त हैं।

34 दिन पहले बेंग्लुरु से कोटा राजस्थान के लिए पैदल निकला एक परिवार अभी भी सफर में है। 90 वर्षीय बूढ़ी मां को कैरियर पर बिठाए घर के मुखिया के साथ छोटे छोटे आधा दर्जन बच्चे आंखों में भूख और पांवों में छाले लिए पिछले 34 दिन से लगातार पैदल चल रहे हैं। रास्ते में कोई कुछ दे देता है तो खा लेते हैं।

नेपाल निवासी शेर सिंह को रोटी खींचकर पटना ले आई थी। लेकिन कोरोना महामारी से बचाव के लिए थोपे गए लॉकडाउन के चलते कंपनियां बंद हो गई। जाहिर है शेर सिंह जिस कंपनी में काम करते थे वो भी बंद हो गई।इससे तमाम प्रवासी मजदूरों की तरह शेर सिंह के सामने भी भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई। 40 दिन के लॉकडाउन के बाद जब उसके अगले दो महीने खुलने का विकल्प नहीं दिखा तो शेर सिंह ने साईकिल के कैरियर पर फल का क्रेट बांधा और उस पर 70 वर्षीय मां यशोदा को बैठाकर अपने वतन की ओर चल दिए।

बिहार नेपाल सीमा सील होने के चलते शेर सिंह अब बनारस, प्रतापगढ़, गोंडा, बहराइच होते हुए नेपाल जा रहे हैं। नेपाल बिहार सीमा खुली होती तो ये कुछ सौ किलोमीटर की दूरी होती लेकिन दूरी बढ़कर एक हजार किमी की हो गई है। शेर सिंह दिन भर साईकिल चलाते हैं और फिर रात में सड़क किनारे किसी घर के पास गुजारते हैं  ।

35 दिन में तीन बार क्वारंटाइन किया गया

24 मार्च को आनंद विहार बस टर्मिनल से बिहार के लिए निकला 35 लोगों का जत्था 35 दिन बाद भी घर नहीं पहुंचा है। जबकि दिल्ली से पटना की दूरी 1200 किमी है। इस दौरान इन्हें तीन बार क्वारंटाइन किया जा चुका है।

28 अप्रैल मंगलवार को इस जत्थे को तीसरी बार बेगूसराय जिले में 14 दिन के लिए क्वारंटाइन कर दिया गया इसका मतलब ये है कि ये जत्था अब 49 वें दिन ही अपने परिवार के बीच पहुंच पाएगा।

बता दें कि 35 लोगों के जत्थे को लेकर 24 मॉर्च को आनंद बिहार टर्मिनल से रवाना हुई बस जब उत्तर प्रदेश के कुशीनगर पहुंची तो वहां सभी को उतारकर वहीं 25 दिन के लिए क्वारंटाइन कर दिया गया।

25 दिनों बाद जिला प्रशासन ने बस से इन्हें घर के लिए भेजा। वहां से बस गोपालगंज पहुंची तो यहां उन्हें बस से उतारकर 10 दिनों के लिए दोबारा क्वारंटाइन कर दिया गया। 10 दिन के बाद गोपालगंज जिला प्रशासन ने बस से इन्हें  घर के लिए रवाना किया।

लेकिन फिर सभी को नावकोठी में उतारकर प्रखंड प्रशासन द्वारा तीसरी बार 14 दिन के लिए कन्या मध्य विद्यालय, नावकोठी में बने क्वारंटाइन सेंटर भेज दिया।

कंक्रीट मिक्सर मशीन में बैठकर जाने को विवश मजदूर

मजबूरी की असली शक्ल देखनी हो तो वो वीडियो देखिए जिसमें कंक्रीट मिक्सर मशीन में बैठकर महाराष्ट्र से लखनऊ जा रहे प्रवासी मजदूरों को उज्जैन के पास ट्रैफिक पुलिस ने 2 मई को पकड़ लिया। लॉकडाउन के चलते यातायात के सभी साधन बंद होने और काम काज ठप होने से ये प्रवासी मजदूर निर्माण कार्य में कंक्रीट मिक्सर की आने वाली मशीन में बैठकर अपने घर लखनऊ वापस जा रहे थे।

डीएसपी ट्रैफिक उमाकांत चौधरी द्वारा इंदौर उज्जैन सीमा के पंथपिपलाई बॉर्डर पर ट्रैफिक के पास पकड़ लिया गया। जहाँ मजदूरों को एक गार्डन में रोका गया है, जबकि मिक्सर मशीन को जब्त करके उसके ड्राइवर के खिलाफ सांवेर थाने में केस दर्ज कर लिया गया है।

(अवधू आजाद और सुशील मानव की रिपोर्ट।)

This post was last modified on May 5, 2020 4:37 pm

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