Friday, January 21, 2022

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कृषि कानूनों में काला क्या है -2: आवश्यक वस्तु अधिनियम संशोधन से मोदी ने किया जमाखोरी को वैध

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तीन कृषि कानूनों में एक कानून है आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन कानून जिसे किसानों ने काला कानून बताया है। केंद्र सरकार का दावा है कि इस क़ानून से कृषि क्षेत्र में निजी और प्रत्यक्ष निवेश में बढ़ोत्तरी होगी तथा कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास होगा, जिससे किसानों को अच्छे दाम मिलेंगे। वहीं विरोध कर रहे किसानों का कहना है कि इससे सिर्फ़ जमाखोरों को लाभ होगा। इस कानून के विश्लेषण से पता चलता है कि यह कानून किसानों का भला करने के नाम पर खुली मंडी में व्यापारियों और जमाखोरों को खुली छूट देने वाला है । व्यापारियों और जमाखोरों पर कोई पाबंदी नहीं लग सकती ना ही कोई कंट्रोल ऑर्डर जारी हो सकता है धारा तीन शब्द धारा 1 मैं वही कंट्रोल ऑर्डर जारी हो सकते हैं, वह अभी इस कानून की वजह से एक तरफ किनारे रख दिए गये है।

कृषि सुधार के नाम पर लाए गए आवश्‍यक वस्‍तु (संशोधन) अधिनियम के  जरिये अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेलों, प्‍याज और आलू जैसी वस्‍तुओं को आवश्‍यक वस्‍तुओं की सूची से हटा दिया गया है।दूसरे शब्दों में कहें, तो अब निजी खरीददारों द्वारा इन वस्तुओं के भंडारण या जमा करने पर सरकार का नियंत्रण नहीं होगा ।  इस कानून में व्यापारियों को खुली छूट दे दी गई है खरीदने व बेचने के लिए। मूल्य तय करना सरकार के नियंत्रण से बाहर कर दिया गया है। इस कानून से व्यापारी पर स्टाक भंडारण करने पर कोई रुकावट नहीं होगी।यानि जमाखोरी वैध बना दी गयी है। उपभोक्ता का शोषण होने को रोकने के लिए सरकार अपने हक इस संशोधन के द्वारा खत्म कर चुकी है, जिससे किसान और आम उपभोक्ता वर्ग कारपोरेट का शिकार हो जाएगा।

दरअसल वर्ष 1955 से 2003 तक आवश्यक वस्तु अधिनियम में कई बार संशोधन हो चुके हैं और हर बार यही प्रयास किया गया किस एक्ट को और धारदार यानि मजबूत  कैसे बनाया जाए ।सरकार के कंट्रोल ऑर्डर की अवहेलना करने वाले को क्या सजा दी जाए और उसका क्या तरीका हो। अवहेलना करने वाले के खिलाफ शिकायत करने का अधिकार उपभोक्ता और उसकी संस्था को भी दिया गया।

पहली बार हुआ है कि मौजूदा मोदी सरकार ने पूर्ववर्ती सरकारों के विपरीत इसको खत्म करने का फैसला किया है। इसके लिए कानून की धाराओं को कमजोर करते हुए जो प्रावधान किया गया है। वह इस प्रकार है- धारा 3 के सब धारा 1 मैं चाहे जो मर्जी लिखा गया हो उसका कानून पर कोई प्रभाव नहीं होगा और इस नई जोड़ी जा रही धारा 1ए लागू समझी जाएगी जिसमें प्रावधान है कि

 (ए) खाद्य पदार्थ जिनमें अनाज दालें आलू प्याज खाद्य तेल तेल भी जिन्हें सरकार एक नोटिफिकेशन करके चिन्हित करेगी को केवल असाधारण स्थिति में जैसे की जंग भयानक अकाल कीमतों के असाधारण तरीके से बढ़ना, भयानक किस्म के प्राकृतिक कहर की स्थिति में ही कंट्रोल ऑर्डर जारी किया जा सकेगा। अर्थात कुछ नहीं किया जाएगा। 

(बी) कृषि उपज के स्टाक सीमा के बारे में कोई भी आर्डर कीमतें बढ़ने को आधार बनाकर ही किया जा सकेगा। (एक) यदि फलों की कीमत 100 फ़ीसदी तक बढ़ जाती है (दो) समय के साथ ना नष्ट हो सकने वाली खाद्य वस्तुएं खेती उपज के मूल्य में 50 फ़ीसदी बढ़ोतरी हो जाए तो यह कीमतें तय करने का आधार पिछले 12 महीने की कीमत या पिछले 5 वर्ष की औसत कीमत को गिना जायेगा ।

यह भी शर्त है कि स्टाक करने की सीमा फूड प्रोसेस करने वाले या फूड प्रोसेस करने की श्रृंखला में ऊपर से लेकर डिब्बाबंद होकर उपभोक्ता तक पहुंचने में जितने लोग शामिल होंगे वह फूड प्रोसेसिंग श्रृंखला में गिने जाएंगे और किसी पर भी यह कंट्रोल ऑर्डर लागू नहीं होगा।

यह कानून साल 1955 में ऐसे समय में बना था जब भारत खाद्य पदार्थों की भयंकर कमी से जूझ रहा था।इसलिए इस कानून का उद्देश्य इन वस्तुओं की जमाखोरी और कालाबाजारी को रोकना था ताकि उचित मूल्य पर सभी को खाने का सामान मुहैया कराया जा सके।मोदी सरकार का कहना है कि चूंकि अब भारत इन वस्तुओं का पर्याप्त उत्पादन करता है, ऐसे में इन पर नियंत्रण की जरूरत नहीं है।इसके साथ ही सरकार का यह भी दावा है कि उत्‍पादन, भंडारण, ढुलाई, वितरण और आपूर्ति करने की आजादी से व्‍यापक स्‍तर पर उत्‍पादन करना संभव हो जाएगा, साथ ही कृषि क्षेत्र में निजी/प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित किया जा सकेगा।. इससे कोल्‍ड स्‍टोरेज में निवेश बढ़ाने और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला (सप्‍लाई चेन) के आधुनिकीकरण में मदद मिलेगी।

हालाँकि उच्चतम न्यायालय की रोक के कारण यह कानून अमल में नहीं है ,इसके बावजूद उक्त सभी खाद्य पदार्थों और खाद्य तेलों की कीमतों में जमाखोरी के कारण आग लगी है। इस कानून  से किसान और उपभोक्ता को काफी नुकसान हो रहा है  और जमाखोरी के चलते सिर्फ निजी खरीददारों, ट्रेडर्स, कंपनियों आदि को फायदा हो रहा है।

दरअसल आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के तहत, केंद्र राज्य सरकारों के माध्यम से कुल आठ श्रेणियों के वस्तुओं पर नियंत्रण रखती है।इसमें (1) ड्रग्स, (2) उर्वरक, (3) खाद्य तिलहन एवं तेल समेत खाने की चीजें, (4) कपास से बना धागा, (5) पेट्रोलियम तथा पेट्रोलियम उत्पाद, (6) कच्चा जूट और जूट वस्त्र, (7) खाद्य-फसलों के बीज और फल तथा सब्जियां, पशुओं के चारे के बीज, कपास के बीज तथा जूट के बीज और (8) फेस मास्क तथा हैंड सैनिटाइजर शामिल हैं।केंद्र इस कानून में दी गईं शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए राज्य सरकारों को ‘नियंत्रण आदेश’ जारी करने के लिए कहता है, जिसके तहत वस्तुओं को स्टॉक यानी जमा करने की एक सीमा तय की जाती है और सामान के आवागमन पर नजर रखी जाती है।इसके जरिये लाइसेंस लेना अनिवार्य बनाया जा सकता है और वस्तुओं के उत्पादन पर लेवी (एक प्रकार का कर) भी लगाया जा सकता है। जब कभी राज्यों ने इन शक्तियों का इस्तेमाल किया है, ऐसे हजारों पुलिस केस दर्ज किए गए, जिसमें ‘नियंत्रण आदेश’ के उल्लंघन के आरोप थे।

सरकार ने इसमें संशोधन करके अनाज, दलहन, तिलहन, खाद्य तेलों, प्‍याज और आलू को धारा 3 (1) के दायरे से बाहर कर दिया गया है, जिसके तहत केंद्र को आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति, वितरण पर नियंत्रण करने का अधिकार मिला हुआ है।यह पहली बार नहीं है जब केंद्र ने इस एक्ट के जरिये नियंत्रण के दायरे के कुछ वस्तुओं को बाहर किया है। उदाहरण के लिए साल 2002 में वाजपेयी सरकार ने गेहूं, धान, चावल, मोटे अनाज और खाद्य तेलों पर लाइसेंस और स्टॉक सीमा को समाप्त कर दिया था।

सरकार द्वारा स्टॉक लिमिट या वस्तुओं को जमा करने की सीमा तय करने का फैसला कृषि उत्पाद के मूल्य वृद्धि पर निर्भर करेगी।शीघ्र नष्‍ट होने वाली कृषि उपज के मामले में 12 महीने पहले या पिछले पांच वर्षों के औसत खुदरा मूल्य की तुलना में यदि उत्पाद के वर्तमान मूल्य में 100 फीसदी वृद्धि होती है, तो इसके स्टॉक की सीमा तय की जाएगी।इसी तरह शीघ्र नष्ट न होने वाले कृषि खाद्य पदार्थों के मामले में पिछले 12 महीने पहले या पिछले पांच वर्षों के औसत खुदरा मूल्य की तुलना में यदि उत्पाद के वर्तमान मूल्य में 50 फीसदी वृद्धि होती है, तो इसके स्टॉक की सीमा तय की जाएगी।

हालांकि मूल्‍य श्रृंखला (वैल्‍यू चेन) के किसी भी प्रतिभागी की स्‍थापित क्षमता और किसी भी निर्यातक की निर्यात मांग इस तरह की स्‍टॉक सीमा लगाए जाने से मुक्‍त रहेगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कृषि क्षेत्र में निवेश हतोत्‍साहित न हो।

यह सर्वविदित है कि व्यापारियों का ध्यान फूड प्रोसेसिंग की तरफ है जो सबसे अधिक मुनाफे के अवतार है। किसान से ₹10 किलो मक्की लेकर 250 रुपए किलो मक्की से बना कस्टर्ड पाउडर बेचते हैं, आलू 5 से ₹10 खरीदते हैं और चीप्स ₹200 किलो बेचते हैं, हरी मटर 10 से ₹15 खरीदते हैं और फ्रोजन मटर ₹100 किलो बेचते हैं, काफी के बीच ₹200 से लेकर ₹2000 किलो नेस्कैफे कॉफी बिकती है। इस प्रकार कई वस्तुएं हैं। 

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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