जनता के सवालों पर गंभीर बहसों से भाग रहे हैं नीतीश: दीपंकर भट्टाचार्य

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पटना। भाकपा-माले महासचिव कॉ. दीपंकर भट्टाचार्य ने आज पटना में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जनता के सवालों-मुद्दों पर चर्चा से भाग रहे हैं। यदि वे भाजपा से अलग होने का दावा करते हैं तो उनकी राजनीति भी अलग दिखनी चाहिए। लेकिन हम सब देख रहे हैं कि मोदी सरकार की तर्ज पर ही आज बिहार में तानाशाही का विस्तार हो रहा है। केंद्र से लेकर बिहार तक पार्लियामेंट व विधानमंडलों की नई बिल्डिंगें बनाई जा रही हैं, लेकिन अंदर से लोकतंत्र को खोखला किया जा रहा है। सोशल मीडिया को प्रतिबंधित करने के हिटलरी फरमान की बात कर लें अथवा आंदोलनों में शामिल होने पर नौकरी न देने का आदेश, ये चीजें दिखलाती हैं कि नीतीश कुमार एक तानाशाह की भाषा बोलने लगे हैं। जबकि वे खुद छात्र आंदोलन की उपज रहे हैं। लोकतंत्र के प्रति जो मोदी सरकार को रूख है, वही नीतीश का है। क्या फर्क रह गया है दोनों में?

संवाददाता सम्मेलन में उनके साथ माले राज्य सचिव कुणाल, पोलित ब्यूरो के सदस्य धीरेन्द्र झा व राजाराम सिंह भी शामिल थे।

तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहा किसान आंदोलन आज व्यापक स्वरूप ग्रहण कर चुका है। मोदी सरकार आज छोटे किसानों पर खूब घड़ियाली आंसू बहा रही है, लेकिन वह यह बताए कि छोटे-गरीब-बटाईदार किसानों को सरकार ने कौन सा अधिकार प्रदान किया है? पीएम किसान सम्मान मूलतः 5 एकड़ तक जमीन रखने वाले जमीन के मालिकों को ही मिल रही है। इस कैटेगरी में छोटे-बटाईदार किसान तो शामिल ही नहीं हैं। अधिकांश किसानों को यह राशि नहीं मिल रही है।

आज देश में किसान आंदोलन की जो शानदार विरासत रही है, वह सामने आ रही है। हरियाणा में किसान नेता सर छोटू राम, पंजाब में भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह और बिहार में किसान आंदोलन के नेता स्वामी सहजानांद सरस्वती जैसे किसान नेताओं की विरासत हमारे लिए प्रेरणा स्रोत है। देश में बड़ी-बड़ी किसान महापंचायतों का आयोजन हो रहा है। बिहार में भी हमने 11 मार्च को बिहटा में किसान सम्मेलन आयोजित करने का फैसला किया है। बिहार में धान अथवा अन्य फसलों की सबसे कम कीमत पर सबसे कम खरीद होती है। यहां धान का कारोबार पूरी तरह बिचौलियों के हाथों में है। हमारी पार्टी ने इन सवालों पर पूरे राज्य में 11 से 15 मार्च तक किसान यात्राओं का आयोजन करने का निर्णय किया है। 18 मार्च को विधानसभा मार्च की योजना बनाई गई है, जिस पर महागठबंधन के दलों से बातचीत चल रही है।

संस्थागत भ्रष्टाचार का प्रदेश बन चुके बिहार में हाल फिलहाल में तीन और बड़े घोटाले सामने आए हैं। पहला घोटाला क्वारंटीन, दूसरा कोविड और तीसरा चुनाव से जुड़ा है। कोविड के नाम पर जमुई सहित कई जिलों में हुए फर्जीवाड़े की कलई खुलने के बाद यह स्पष्ट होता जा रहा है कि ऐसे घोटाले बिना उच्चस्तरीय राजनीतिक संरक्षण के नहीं हो सकते। जहां एक ही नंबर पर तीस लोगों के आरटीपीसीआर दिखलाए गए हों और जिस व्यक्ति का मोबाइल नंबर दिया गया है, वह यह कहे कि उसकी तो कभी जांच हुई ही नहीं।

अभी तक की प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार कम से कम 6 जिलों में चुनाव के समय का बड़ा घोटाला सामने आ रहा है। मास्क, सेनेटाइजर आदि के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई की लूट की गई है। इस फर्जीवाड़े में पटना का स्थान दसवां है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनाव में जब जिले में अर्द्धसैनिक बल की 60 कंपनियां आई थीं, तो उन पर 2 करोड़ तीस लाख खर्च हुए, लेकिन 2020 में 215 कंपनियों पर 42 करोड़ का खर्चा दिखलाया गया है। कंपनियों की मात्रा तीन गुना बढ़ी लेकिन खर्च 21 गुना। बिल बस के नंबर का दिखलाया गया, लेकिन बाद में पता चल रहा है कि वह नंबर किसी बस का नहीं बल्कि बाइक का है। सृजन जैसे घोटाले की तरह ये घोटाले भी राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव नहीं हैं। हम मांग करते हैं कि सरकार इस पर श्वेत पत्र लाए।

राज्य में बढ़ते अपराध का ग्राफ, 60 प्रतिशत से अधिक दागियों का मंत्रिमंडल में होना बेहद ही चिंताजनक है। यह ताज्जुब की बात है कि जो सरकार ‘सुशासन’ का दंभ भरती हो, उसके 18-18 मंत्रियों पर गंभीर आरोप हों। जाहिर सी बात है कि राज्य सरकार का क्राइम, करप्शन व कम्युनलिज्म के नाम पर जीरो टॉलरेन्स की बात पूरी तरह बेमानी है।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित।)

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