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Friday, September 24, 2021

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नॉर्थ ईस्ट डायरीः चर्चा में मोदी के असम की चाय नहीं, मजदूरों की बदहाली है!

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रविवार को असम के ढेकियाजुली में एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया, “विदेश में भारतीय चाय की छवि धूमिल करने की साजिश रची जा रही है। मैं आपको देश को बदनाम करने के लिए रची गई एक साजिश के बारे में बताना चाहता हूं। साजिशकर्ताओं ने भारतीय चाय को भी नहीं बख्शा। वे भारतीय चाय की छवि दुनिया भर में व्यवस्थित रूप से बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं।”

यह टिप्पणी एक्टिविस्ट ग्रेटा थुनबर्ग द्वारा साझा किए गए ‘टूलकिट’ की प्रतिक्रिया है, जिसमें कथित तौर पर भारत की सॉफ्ट पावर में योग और चाय को शामिल करने जैसे पहलुओं के बारे में बात की गई थी। मोदी विशेष रूप से चाय श्रमिकों को संदेश पहुंचाना चाह रहे थे, जो असम में एक महत्वपूर्ण वोट बैंक हैं। हकीकत इसके विपरीत है। दुनिया में चाय-बागान श्रमिकों की घोर दुर्दशा की चर्चा होती रही है, विशेष रूप से उनकी कम मजदूरी और मुश्किल काम की स्थिति। दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई यह है कि ये ख़राब स्थितियां भारतीय चाय को ‘बदनाम’ करने का कारण हो सकती हैं।

पूर्वोत्तर राज्य असम की चाय पूरी दुनिया में मशहूर है, लेकिन साथ ही इन चाय बागानों में मजदूरों के शोषण की कहानियां भी नई नहीं हैं। बीते कुछ वर्षों से इस उद्योग में गिरावट के साथ ही मजदूरों का शोषण बढ़ा है और सुविधाओं में कटौती हुई है। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज और आक्सफैम इंडिया की एक रिपोर्ट से यह बात सामने आई है कि असम के चाय बागानों में मजदूरों के अधिकारों का किस बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया जा रहा है।

राज्य के 50 चाय बागानों के 510 मजदूरों से बातचीत के आधार पर तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 200 ग्राम चाय पत्ती का जो पैकेट 68 रुपये में बिकता है, उसमें मजदूरों को सिर्फ पांच रुपये मिलते हैं।  बाकी रकम बागान मालिकों और दुकानदारों के हिस्से में आती है।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज और आक्सफैम इंडिया की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि 12-13 घंटे काम करने के बावजूद बागान मजदूरों को रोजाना 137 से 167 रुपये ही मिलते हैं। इसके अलावा उनको बागानों में मौलिक सुविधाएं भी हासिल नहीं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, असम सरकार ने बागान मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी बढ़ा कर 351 रुपये करने की पहल की थी, लेकिन बागान प्रबंधन वित्तीय दिक्कतों का हवाला देकर इसके लिए सहमत नहीं हुए।

मजदूरों के साथ हुआ वेतन समझौता खत्म होने के बावजूद अब तक इसका नवीनीकरण नहीं हुआ है। बागान मजदूरों के संगठन लंबे अरसे से न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की मांग में आंदोलन पर हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि पुरुषों के बराबर काम करने के बावजूद महिला मजदूरों को रोजाना 110 से 130 रुपये के बीच मजदूरी मिलती है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बागान मजदूर काफी बदहाली में काम कर रहे हैं। वह लोग बेहद गंदगी में जीवन बिताने पर मजबूर हैं और उनको पीने का साफ पानी या समुचित स्वास्थ्य सुविधाएं भी नहीं मिलतीं। इसकी वजह से लगभग आधे मजदूर पानी की वजह से होने वाली बीमारियों मसलन डायरिया, टाइफायड और पीलिया से पीड़ित हैं।

बागानों में नवजातों की देख-रेख और शौचालयों की समुचित व्यवस्था नहीं होने की वजह से खासकर महिला मजदूरों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई बागानों में प्रोविडेंट फंड की रकम कटने के बावजूद मजदूरों को इसकी जानकारी नहीं दी जाती। आर्थिक स्थिति बदहाल होने का हवाला देकर कई बागानों में मजदूरों को रिटायर होने के बाद भी उनका बकाया नहीं मिलता।

आक्सफैम इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ बेहर कहते हैं, “चाय कंपनियां अक्सर आर्थिक दिक्कतों का हवाला देकर मजदूरों को बेहतर मजदूरी नहीं देतीं, लेकिन शोध से साफ है कि चाय की कीमतों में से और दो फीसदी अतिरिक्त रकम निकाल कर लाखों मजदूरों को बेहतर मजदूरी दी जा सकती है।”

रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकार की ओर से प्रस्तावित पेशागत सुरक्षा, स्वास्थ्य और कामकाजी हालत विधेयक के जरिए असम के चाय उद्योग की हालत सुधारने में सहायता मिलेगी। इससे मजदूरों को बेहतर मजदूरी के साथ ही उनका जीवन स्तर भी सुधारा जा सकेगा। बेहर कहते हैं, “सरकार के प्रयासों को अमली जामा पहनाने की स्थिति में मजदूरों के साथ लंबे अरसे से होने वाले अन्याय को दूर किया जा सकेगा।”

असम में चाय उद्योग का इतिहास सदियों पुराना है। वर्ष 1823 में रॉबर्ट ब्रूस ने ऊपरी ब्रह्मपुत्र घाटी में चाय की खोज की थी। वर्ष 1833 में पूर्व में लखीमपुर जिले में सरकार ने एक चाय बागान शुरू किया था। राज्य के छोटे-बड़े साढ़े आठ सौ चाय बागानों में लगभग 10 लाख मजदूर काम करते हैं। देश में चाय के कुल उत्पादन में असम का हिस्सा लगभग 55 फीसदी है, लेकिन इसके बावजूद अक्सर इन मजदूरों की हदहाली सामने आती रही है। रहन-सहन, गंदगी और बेहतर भोजन की कमी से इन मजदूरों में कुपोषण आम है। एक चाय बागान में डॉक्टर निर्मल कुमार डेका बताते हैं, “हर 10 में से नौ मजदूर कुपोषण का शिकार हैं। इन बागानों में कुपोषण का स्तर राष्ट्रीय औसत से भी ज़्यादा है।”

चाय मजदूरों के सबसे बड़े संगठन असम चाय मजदूर संघ (एसीएमएस) के महासचिव रूपेश ग्वाला कहते हैं, “सरकार ने न्यूनतम मजदूरी बढ़ा कर रोजाना 351 रुपये करने का भरोसा दिया था, लेकिन अब तक इस मामले में कोई पहल नही हुई है।”

यह संगठन न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की मांग में आंदोलन कर रहा है। वह कहते हैं कि केरल में न्यूनतम मजदूरी 310 रुपये है। कर्नाटक और तमिलनाडु में यह क्रमशः 263 और 241 रुपये रोजाना है, लेकिन असम में महज 167 रुपये ही मिलते हैं। ग्वाला बताते हैं कि राज्य सरकार की ओर से गठित न्यूनतम मजदूरी बोर्ड की सिफारिशों के आधार पर अंतरिम राहत के तौर पर रोजाना 30 रुपये की वृद्धि के बाद न्यूनतम मजदूरी 137 से बढ़ कर 167 रुपये तक पहुंची है, लेकिन बोर्ड ने न्यूनतम मजदूरी को दूसरे राज्यों की तर्ज पर बढ़ाने के मुद्दे पर अब तक चुप्पी साध रखी है।

बागान मालिकों ने आक्सफैम की रिपोर्ट पर कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है। मालिकों के संगठन इंडियन टी एसोसिएशन (आईटीए) के एक प्रवक्ता कहते हैं, “राज्य का चाय उद्योग पहले से ही जर्जर और बदहाल है। इस उद्योग की धज्जियां उड़ाने के लिए समय-समय पर ऐसी रिपोर्टें सामने आती रहती हैं। हमारा काम चाय पैदा करना है। फिलहाल प्रबंधन के सामने अपना वजूद बचाए रखना ही सबसे बड़ी चुनौती है।”

चाय बागान के मालिकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार का पता है और उन्हें ये भी पता है कि इस रिपोर्ट का असर असम चाय की बिक्री पर भी पड़ सकता है। ऑक्सफैम की रिपोर्ट ‘काली चाय बेदाग दामन?’ जर्मनी सहित यूरोपीय देशों में भी जारी की गई है, जहां ग्राहक सिर्फ अच्छे स्वाद के लिए ही नहीं बल्कि उत्पादन की अच्छी परिस्थितियों के लिए भी ऊंची कीमतें चुका रहा है। जर्मनी में चाय बेचने वाली कंपनियां मेसमर और मिलफोर्ड ब्रांड से असम चाय बेचते हैं।

आधे से ज्यादा चाय पत्तियां आल्डी, लीडल और रेवे जैसे सुपर बाजार चेनों में बेची जाती हैं, जिसकी वजह से खरीद पर उनका एकाधिकार जैसा है। जर्मनी में ऑक्सफैम की बारबरा जेनहोल्त्स वाइनहार्ट कहती हैं, “ये उन्हें होलसेलरों से खरीद की कीमतें दबाने और दूसरी शर्तें रखने की संभावना देता है।” शोध संस्था बेसिक के अनुसार ग्राहकों से ली जाने वाली कीमत का 86 फीसदी उनके पास रहता है, जबकि बागान के मजदूरों को सिर्फ 1.4 फीसदी मिलता है।

(दिनकर कुमार द सेंटिनेल के पूर्व संपादक हैं।)

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