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आपदा में अवसरः बिना हींग-फिटकरी लगाए 400 रुपये प्रति खुराक़ ले रहा सीरम इंस्टीट्यूट!

राज्य सरकारों से कोविशील्ड टीका की प्रति खुराक 400 रुपये लेने के सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के एलान के बाद एक्टिविस्ट साकेत गोखले ने टिप्पणी करते हुए कहा है, “टीका विकसित करने पर सीरम इंस्टीट्यूट ने शून्य खर्च किए। क्योंकि टीका तो ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी ने विकसित किया था। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को अभी भी भारत सरकार से अनुदान और धन मिला है। SII किसी भी लाइसेंस या पेटेंट शुल्क के लिए शून्य भुगतान करता है। जबकि यूरोपीय संघ के राज्य AstraZeneca को प्रति खुराक $ 2.16 (रु 163) का भुगतान कर रहे हैं। फिर सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया किस आधार पर राज्य सरकार से 400 रुपये का शुल्क ले रहा है?”

गौरतलब है कि कोविड-19 की दूसरी लहर वैक्सीन कंपनियों के लिए चांदी काटने का मौका लेकर आयी है। दो महीने पहले तक इन वैक्सीन के खिलाफ़ लोगों के मन में जो संशय था वो भी कोविड-19 के डर ने भर दिया है। हर कोई अब वैक्सीन चाहता है। केंद्र सरकार ने अपनी जिम्मेदारी से हाथ खींचकर राज्य सरकारों के पाले में गेंद डाल दी है। साथ ही वैक्सीन कंपनियों को भी फ्री हैंड दे दिया है, जिसका फायदा उठाते हुए सीरम इंस्टीट्यूट ने कल ‘कोविशील्ड’ वैक्सीन की कीमतों की घोषणा की है। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की तरफ से जारी बयान में अदार पूनावाला ने कहा है कि भारत सरकार के निर्देशों के बाद हम कोविशील्ड वैक्सीन की कीमतों की घोषणा कर रहे हैं। राज्य सरकारों के लिए प्रति डोज की कीमत 400 रुपये और निजी अस्पतालों के लिए प्रति डोज की कीमत 600 रुपये होगी।

अप्रैल के शुरुआती महीने में सीरम इंस्टीट्यूट को ब्रिटिश और स्वीडिश बहुराष्ट्रीय दवा और बायोफर्मासिटिकल कंपनी एस्ट्राजेनेका ने एक कानूनी नोटिस भेजा था। यह नोटिस कोरोना वैक्सीन की सप्लाई में देरी किए जाने पर भेजी गई थी। इसके बाद ही सीरम इंस्टीट्यूट के सीईओ अदार पूनावाला ने कोविशील्ड टीकों का उत्पादन दोगुना करने के लिए भारत सरकार से ग्रांट के रूप में तीन हजार करोड़ रुपये की आर्थिक मदद मांगी थी। बता दें कि ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका द्वारा विकसित कोरोना वैक्सीन को एसआईआई भारत में कोविशील्ड ब्रांड के नाम से बना और बेच रही है।

निवेश के लिए मुनाफा ज़रूरी है- अदार पूनावाला
सीरम इंस्टीट्यूट के सीईओ अदार पूनावाला ने 7 अप्रैल को एक न्यूज चैनल से साक्षात्कार के दौरान कहा था, “भारत में बढ़ी मांग के चलते कोविशील्ड की उत्पादन क्षमता दबाव में है। कोविशील्ड वैक्सीन ज्यादा मात्रा में बनाने के लिए करीब तीन हजार करोड़ रुपये की ज़रूरत है। हम भारतीय बाजार में लगभग 150-160 रुपये में वैक्सीन की आपूर्ति कर रहे हैं, जबकि वैक्सीन की औसत कीमत लगभग 20 डॉलर (1500 रुपये) है। मोदी सरकार के अनुरोध पर हम रियायती दरों पर टीका दे रहे हैं। ऐसा नहीं है कि हम मुनाफा नहीं कमा रहे हैं, लेकिन हमें और मुनाफे की जरूरत है, जो फिर से निवेश करने के लिए ज़रूरी है।”

पूनावाला ने उस इंटरव्यू में आगे कहा था कि कंपनी प्रति दिन 20 लाख खुराक का उत्पादन कर रही है। हमने अकेले भारत में 10 करोड़ से अधिक खुराक दी हैं और अन्य देशों को लगभग छह करोड़ खुराक का निर्यात किया है। सीरम इंस्टीट्यूट के साथ ही अन्य वैक्सीन उत्पादकों ने भी मुनाफा न लेने के लिए सरकार से सहमति जताई है।

वहीं कोरोना की दूसरी मारक लहर के बीच अन्य वैक्सीन कंपनियों पर बढ़त बनाने के लिए भारत बायोटेक और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) ने कोवैक्सीन के तीसरे ट्रायल की रिपोर्ट कल बुधवार को जारी की है। रिपोर्ट में बताया गया है कि इसका क्लिनिकल प्रभाव तो 78 फीसद है, लेकिन कोविड को ख़तरनाक रूप लेने से रोकने में यह सौ फीसद कारगर है। यानी कोविड संक्रमण के शुरुआती या सीमित दौर में यह 78 फीसद तक कारगर है लेकिन इस वैक्सीन के सारे डोज लेने वाले इसकी गंभीर चपेट में नहीं आते हैं और उनकी मौत नहीं होती है। यही नहीं अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत भी कम आती है।

साथ ही भारत बायोटेक और आइसीएमआर ने बताया है कि ये तो फौरी रिपोर्ट है, तीसरे ट्रायल की विस्तृत रिपोर्ट जून, 2021 में प्रकाशित की जाएगी। इन दोनों की तरफ से एक महत्वपूर्ण जानकारी यह दी गई है कि कोवैक्सीन डबल म्यूटेंट स्ट्रेन के असर को खत्म करने में भी कारगर है। यानी ब्रिटेन और ब्राजील में कोरोना के जो वैरिएंट मिले हैं, उनके खिलाफ भी भारतीय कंपनी की वैक्सीन ‘कोवैक्सिन’ रक्षा कवच प्रदान करती है।

भारत बायोटेक के चेयरमैन और एमडी कृष्णा इल्ला का कहना है कि एसआरएस-कोव-2 के खिलाफ़ कोवैक्सीन की क्षमता पूरी तरह से साबित हो चुकी है। यह जबरदस्त सुरक्षा कवच प्रदान करती है और आपातकालीन परिस्थितियों में इस्तेमाल के लिए उपयुक्त है। साफ है कि यह अस्पताल में भर्ती होने की संभावना को कम करती है और संक्रमण का विस्तार होने से भी रोक रही है। कोवैक्सीन की करोड़ों डोज भारत और दुनिया के दूसरे देशों में भेजी जा चुकी हैं। तकरीबन 60 देशों ने इस वैक्सीन को सुरक्षित मानते हुए खरीदने की इच्छा जताई है। कंपनी अपने हैदराबाद और बैंगलोर उत्पादन इकाई की क्षमता बढ़ा रही है, ताकि सालाना वैक्सीन की 70 करोड़ डोज तैयार की जा सकें।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

This post was last modified on April 22, 2021 1:46 pm

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