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कोर्ट ऑफ़ लॉ में नहीं ठहर पाएंगे लव जिहाद पर प्रस्तावित कानून

लव जिहाद के नाम पर उत्तर प्रदेश सहित भाजपा शासित राज्यों की सरकारें कानून बनाने जा रही हैं। वहीं उच्चतम न्यायालय अनेक फैसलों में दोहरा चुका है कि जाति, पंथ या धर्म के बावजूद एक साथी चुनने का अधिकार, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का एक अभिन्न अंग है। इसे देखते हुए कथित लव जिहाद के नाम पर राज्य सरकारों द्वारा प्रस्तावित कानून संविधान पर खरा उतरने के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक शोशेबाजी के लिए अधिक प्रतीत हो रहा है, क्योंकि कोर्ट ऑफ़ लॉ में इसका खरा उतरना संभव नहीं है।

लव जिहाद पर चल रही बहस के बीच इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विशेष रूप से कहा है कि अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार, इसके बाद भी कि आपने किस धर्म को स्वीकार किया है, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में अंतर्निहित है। व्यक्तिगत संबंध में हस्तक्षेप, दो व्यक्तियों की पसंद की स्वतंत्रता के अधिकार में एक गंभीर अतिक्रमण होगा।

यह आदेश न्यायमूर्ति पंकज नकवी एवं न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की खंडपीठ ने कुशीनगर के सलामत अंसारी और प्रियंका खरवार उर्फ आलिया की याचिका पर दिया है। खंडपीठ ने कहा की हम यह समझने में नाकाम हैं कि कानून जब दो व्यक्तियों, चाहे वे समान लिंग के ही क्यों न हों, को शांतिपूर्वक साथ रहने की अनुमति देता है तो किसी को भी व्यक्ति, परिवार या राज्य को उनके रिश्ते पर आपत्ति करने का अधिकार नहीं है।

खंडपीठ ने प्रियांशी उर्फ़ समरीन और नूरजहां बेगम उर्फ़ अंजली मिश्रा के केस में इसी हाई कोर्ट की एकल पीठ के निर्णयों से असहमति जताते हुए कहा कि दोनों मामलों में दो वयस्कों को अपनी मर्जी से साथी चुनने और उसके साथ रहने की स्वतंत्रता के अधिकार पर विचार नहीं किया गया है। ये फैसले सही कानून नहीं हैं।

इस मामले में एक रिट याचिका दायर की गई थी, जिसमें प्रतिवादी के लिए दिशा-निर्देश की मांग की गई ‌थी, याचिकाकर्ताओं (सलामत अंसारी और तीन अन्य) को गिरफ्तार नहीं किया जाए, साथ ही प्रार्थना की गई थी कि धारा 363, 366, 352, 506 आईपीसी और धारा 7/8 पॉक्सो अधिनियम के तहत पुलिस स्टेशन, विष्णुपुरा, जिला कुशीनगर में दर्ज एफआईआर को रद्द किया जाए।

सलामत अंसारी (पति) और प्रियंका खरवार @ आलिया (पत्नी), ने दो अन्य के साथ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें उन्होंने धारा 363, 366, 356, 352, 506 आईपीसी और धारा 7/8 पॉक्सो अधिनियम, के तहत दर्ज एफआईआर, जिसे याचिकाकर्ता संख्या चार प्रियंका खरवार @ आलिया के प‌िता की ओर से दर्ज कराया गया था, पर रोक लगाने की मांग की गई। तर्क दिया गया कि युगल (सलामत अंसारी और प्रियंका खरवार @ आलिया) वयस्‍क हैं, और विवाह का अनुबंध करने में सक्षम हैं।

प्रियंका खरवार द्वारा अपनी हिंदू पहचान का त्याग करने और इस्लाम धर्म अपनाने के बाद उन्होंने 19 अगस्त 2019 को मुस्लिम संस्कार और अनुष्ठान के अनुसार निकाह किया था। यह भी कहा गया कि दंपति पिछले एक साल से शांति और खुशी से एक साथ पति-पत्नी के रूप में रह रहे हैं। यह अनुतोष मांगा गया कि याचिकाकर्ता संख्या चार के पिता द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकी केवल वैवाहिक संबंधों को समाप्त करने के उद्देश्य से दुर्भावना और शरारत से प्रेरित है, कोई अपराध नहीं किया गया, इसलिए एफआईआर को रद्द कर दिया जाए।

एजीए और प्रतिवादी के वकील ने इस आधार पर य‌ाचिकाकर्ताओं की दलीलों का विरोध किया कि विवाह करने के लिए धर्म परिवर्तन निषिद्ध है। उन्होंने कहा कि उक्त विवाह में कानून की कोई पवित्रता नहीं है, इसलिए अदालत को ऐसे युगल के पक्ष में अपने अतिरिक्त साधारण अधिकार क्षेत्र का उपयोग नहीं करना चा‌‌हिए। अपनी दलीलों के समर्थन में उन्होंने नूरजहां और प्रियांशी के फैसलों पर भरोसा किया।

खंडपीठ ने पाया कि प्रियंका खरवार @ आलिया की उम्र पर विवाद नहीं है, क्योंकि उसकी उम्र 21 साल के आसपास बताई जा रही है, और इसलिए याचिकाकर्ता संख्या एक से तीन को धारा 363 आईपीसी, 3 या 366 आईपीसी के तहत अपराध करने का आरोपी नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि पीड़ित ने खुद सलामत अंसारी के साथ रहने के लिए घर छोड़ा है। खंडपीठ ने कहा कि प्रियंका खरवार @ आलिया को किशोर नहीं पाया गया है, इसलिए धारा 7/8 पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराध नहीं बनता है। इसके अलावा, न्यायालय ने कहा कि धारा 352, 506 आईपीसी के तहत अपराध से प्र‌थम दृष्टया अतिरंजित और दुर्भावनापूर्ण प्रतीत होते हैं।

खंडपीठ ने अपने आदेश में कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा, “हम प्रियंका खरवार और सलामत को हिंदू और मुस्लिम के रूप में नहीं देखते हैं, बल्कि दो वयस्कों के रूप में देखते हैं, जो अपनी मर्जी और पसंद से, एक साल से शांति और खुशी के साथ रह रहे हैं। खंडपीठ और विशेष रूप से संवैधानिक अदालत, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को बरकारर रखने की अनुमति देती है। इसके अलावा खंडपीठ ने कहा कि अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार, इसके बाद भी कि आपने किस धर्म को स्वीकार किया है, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में अंतर्निहित है।

खंडपीठ ने कहा कि एक व्यक्ति का अन्य व्यक्ति के साथ रहने का निर्णय, जो वयस्क हैं, संवैधानिक रूप से एक व्यक्ति का अधिकार है और जब इस अधिकार का उल्लंघन होता है, तो यह उसके जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा। व्यक्तिगत स्वतंत्रता में पसंद की स्वतंत्रता का अधिकार, साथी चुनने, प्रतिष्ठा के साथ जीने का अधिकार शामिल है।

शफीन जहां बनाम असोकन केएम (2018) 16 एससीसी  368 के मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले पर भरोसा करते हुए खंडपीठ ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने वयस्कों की स्वतंत्रता का लगातार सम्मान किया है। न्यायालय ने कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी दोहराया कि जाति, पंथ या धर्म के बावजूद एक साथी चुनने का अधिकार, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का एक अभिन्न अंग है।

खंडपीठ ने युवती के पिता की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर खारिज कर दी है। याचिका में कुशीनगर के विष्णुपुरा थाने में 25 अगस्त 2019 को दर्ज आईपीसी की धारा 363, 366, 352, 506 और पॉक्सो एक्ट की धारा 7/8 की एफआईआर रद्द करने की मांग की गई थी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on November 24, 2020 1:15 pm

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