Sunday, October 24, 2021

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कांग्रेस के लिए दुखती रग बनता जा रहा है पंजाब

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पंजाब का मसला कांग्रेस के लिए दुखती रग बनता जा रहा है। अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने को लेकर पार्टी के असंतुष्ट गुट, जी23, के नेताओं ने पार्टी आलाकमान पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं और कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाने की मांग कर दी है। दूसरी और नवजोत सिंह सिद्धू ने रेत घोटाले में तत्कालीन सरकार से इस्तीफ़ा दे चुके दागी नेता राणा गुरजीत सिंह और चन्नी मंत्रिमंडल में शामिल किये जाने के मसले पर सवाल उठाकर आलाकमान को फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है क्योंकि काफी माथापच्ची के बाद आला कमान के ग्रीन सिग्नल पर ही चन्नी मंत्रिमंडल का विस्तार किया गया था। इस बीच चन्नी सरकार के एक और मंत्री गुरकीरत कोटली का मामला भी उछल गया है जिन पर फ्रांसीसी नागरिक कटिया दरनंद के अपहरण, छेड़छाड़ और अवैध हिरासत में रखने का आरोप वर्ष1994 में लगा था।अब इस संकट से निपटने की चुनौती कांग्रेस आला कमान के सामने है। गुरकीरत कोटली पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते हैं।

गौरतलब है कि दागी नेता राणा गुरजीत सिंह को 2018 में अमरिंदर कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। उनके ऊपर रेत खनन अनुबंधों की नीलामी में अनियमितता के आरोप लगे थे, जिसके बाद उन्हें विपक्ष की आलोचना का सामना करना पड़ा था। लिहाजा उन्होंने अमरिंदर सिंह कैबिनेट से अपना इस्तीफा दे दिया था।

इसी तरह 31 अगस्त, 1994 को फ्रांसीसी नागरिक कटिया दरनंद के अपहरण, छेड़छाड़ और अवैध कारावास का मामला गुरकीरत कोटली को बार-बार परेशान करता रहा है जिसमें पीड़िता ने उसे मुख्य आरोपियों में से एक के रूप में नामित किया था। यहां तक कि जब अदालत ने 1999 में गुरकीरत के पांच दोस्तों और पंजाब पुलिस के दो पुलिसकर्मियों सहित सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया था, तब कटिया यह आरोप लगाते हुए फ्रांस लौट आई थीं कि उन्हें धमकियां मिल रही हैं क्योंकि उन्होंने मुख्य आरोपी की पहचान कर ली है। वह अपराधियों के खिलाफ गवाही देने के लिए कभी नहीं लौटी, अंततः 1999 में उन्हें बरी कर दिया गया। यह घटना कथित तौर पर मोहाली में हुई थी। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि उसे अपनी सुरक्षा का डर है क्योंकि गुरकीरत तत्कालीन सीएम बेअंत सिंह का पोता था और कथित तौर पर राजनीतिक दबाव के कारण मामले को ठीक से आगे नहीं बढ़ाया गया था।अब मंत्री बनने के बाद फिर यह मामला उछाला जा रहा है।

इस बीच पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के साथ लंबी बैठक के बाद साफ हो गया है कि नवजोत सिंह सिद्धू राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष बने रहेंगे। नवजोत सिंह सिद्धू की सभी मांगें मान ली गई हैं। इस बैठक के ठीक पहले सिद्धू ने पंजाब के नए डीजीपी पर निशाना साधा है। सिद्धू ने कहा कि डीजीपी ने गुरुग्रंथ साहिब के अपमान मामले में दो सिख युवकों को जान बूझकर फंसाया है। और बादल परिवार को क्लीन चिट दी है।दरअसल ये घटना 2015 में फरीदकोट में हुई थी। इस मामले की जांच बादल सरकार ने एसआईटी को दे दी थी जिसके मुखिया वर्तमान डीजीपी इकबाल प्रीत सिंह सहोटा थे। सहोटा को चरणजीत सिंह चन्नी की तरफ से राज्य डीजीपी का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। इसी के बाद सिद्धू ने इस्तीफा दिया था और अपॉइंटमेंट पर नाराजगी जाहिर की थी।

उधर पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने दिल्ली दौरे के बाद लौटकर कहा है कि वे भाजपा में शामिल नहीं हो रहे हैं लेकिन कांग्रेस में भी नहीं रहेंगे और अपनी नई पार्टी बना सकते हैं।

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के दिल्ली दौरे और हालिया घटनाक्रम से नाराज चल रहे कांग्रेस के पंजाब प्रभारी हरीश रावत ने निशाना साधा है। उन्होंने कैप्टन अमरिंदर पर हमला बोलते हुए कहा है कि कांग्रेस ने हमेशा ही कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनके परिवार को उच्च सम्मान में रखा है। साल 1998 में पटियाला से करारी हार झेलने के बाद भी उन्हें कांग्रेस पार्टी में शामिल किया गया। इसके बाद, उन्हें साल 1999 से 2002, 2010 से 2013 और 2015 से 2017 तक तीन मौकों पर पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष भी नियुक्त किया। वहीं, साल 2002 से 2007 और 2017 से 2021 तक कैप्टन को पंजाब का मुख्यमंत्री भी बनाया गया। इस दौरान उन्हें पूरी छूट दी गई थी। हरीश रावत ने आरोप लगाया है कि कैप्टन फार्म हाउस से सरकार और पार्टी चला रहे थे।

हरीश रावत ने कहा है कि अपने साथियों और नेतृत्व से लगातार याद दिलाने के बावजूद, दुर्भाग्य से कैप्टन अमरिंदर ने बरगदी, ड्रग्स, बिजली आदि जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने वादों को निभाने में विफल रहे। पूरे राज्य में एक आम धारणा थी कि कैप्टन और बादल एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं, और यह एक गुप्त साठगाँठ है। मैं हमेशा से ही विनम्रतापूर्वक उन्हें हमारे चुनावी वादों पर कार्रवाई शुरू करने का सुझाव दे रहा था। कम से कम पांच बार मैंने कैप्टन साहब से इन मुद्दों पर चर्चा की लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

हरीश रावत ने कहा कि बरगदी के पूरे मामले को कैप्टन अमरिंदर सिंह के भरोसेमंद साथियों ने गलत तरीके से हैंडल किया। कैबिनेट की बैठकों में इस मुद्दे पर चर्चा हुई और बाद में, कई प्रमुख मंत्री इस शिकायत के साथ दिल्ली आए कि अब कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस चुनाव नहीं जीत सकती। समाधान खोजने के लिए, कांग्रेस आलाकमान ने अनुभवी कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पैनल का गठन किया।

इस पैनल ने 150 से अधिक प्रमुख नेताओं को सुना, जिनमें विधायक, सांसद, पूर्व विधायक, पूर्व सांसद, पीसीसी अध्यक्ष, पूर्व पीसीसी अध्यक्ष, युवा कांग्रेस, एनएसयूआई, महिला कांग्रेस, सेवा दल के नेता आदि शामिल थे। वहीं, बाद में बैठक में कांग्रेस के अधिकांश विधायकों ने कैप्टन अमरिन्दर सिंह प्रशासन की कार्यशैली पर बहुत स्पष्ट रूप से असंतोष व्यक्त किया और बड़ी संख्या में विधायकों ने उन्हें रिप्लेस करने का सुझाव दिया।

राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद से सोनिया गांधी ही कांग्रेस की कमान संभाल रही हैं, पर हालात हैं कि कुछ भी संभल नहीं पा रहा है। पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और झारखंड को छोड़कर पूरे देश में कांग्रेस सत्ता से बाहर है। महाराष्ट्र और झारखंड में भी पार्टी की भूमिका नंबर तीन और नंबर दो की है। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसमें यूपी भी शामिल हैं। सबसे बड़े राज्य के बारे में कहा जाता है कि दिल्ली की कुर्सी का रास्ता यहीं से होकर जाता है।

कांग्रेस पार्टी के दिल्ली की सत्ता से बाहर होने करे कारण असंतुष्ट गतिविधियाँ जोरों पर हैं इसलिए पार्टी में बिखराव है।लगभग सभी राज्यों में कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी और मतभेदों के चलते गलत संदेश जा रहा है। ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस में सबकी अपनी अलग राय है और कोई किसी की सुनना नहीं चाहता है। पार्टी में नेतृत्व पर वे बड़े नेता सवाल उठा रहे हैं जो स्वयं पिछले कम से कम दो चुनावों में 50हजार से डेढ़ लाख मतों के अंतर से चुनाव हार चुके हैं। जब ये चुनाव जीते भी तो इन्हें इंदिरा गाँधी ,राजीव गाँधी और सोनिया गाँधी की लोकप्रियता ने चुनाव जितवाया। अब हार गये तो इन्हें किसी भी कीमत पर राज्यसभा में भेजने का इंतजाम कांग्रेस आलाकमान करे नहीं तो ये असंतुष्ट ही रहेंगे।

कांग्रेस में जी23 के नेता कपिल सिब्बल की बातों पर भले ही बवाल मचा हो, पर उनका बयान काफी कुछ कह जाता है। कपिल सिब्बल ने सीधे तौर पर कांग्रेस नेतृत्व को ही कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि किसी को नहीं पता कि पार्टी में फैसले कौन लेता है। उन्होंने पार्टी के भीतर आत्मनिरीक्षण की भी नसीहत दे डाली। इसके बाद हालात इस कदर बिगड़ गए कि सिब्बल के विरोध में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने ही उनके घर के बाहर विरोध प्रदर्शन किया और कार में तोड़फोड़ की। उनके घर पर टमाटर फेंके गए।

कांग्रेस पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पूरी तरह से सरकार चला रही है। महाराष्ट्र और झारखंड में गठबंधन में होने के नाते कुछ मनमुटाव पैदा हो सकता है लेकिन यहां तो अपने ही नहीं संभल पा रहे हैं। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हालात यह हैं कि लगता है कांग्रेस सोए हुए ज्वालामुखी पर बैठी है और कभी भी विस्फोट हो सकता है।

कुछ साल पहले ओल्ड बनाम नौजवान नेताओं की कांग्रेस के भीतर लड़ाई थी, वह अब तक नहीं सुलझी है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि बुजुर्ग और अनुभवी नेताओं की नाराजगी दूर नहीं हुई और नए नेता अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए बाहर निकल लिए। अब फिर एकबार पार्टी में नौजवानों को आगे करने की कवायद चल रही है और पंजाब का नेतृत्व परिवर्तन उसी की एक कड़ी है। फिर कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवानी जैसे फायरब्रांड नेताओं का कांग्रेस में शामिल होना भी ओल्ड ग्रुप को बर्दाश्त नहीं हो रहा है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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