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Thursday, September 16, 2021

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रामप्रसाद काजले: समाज सेवा ही जिसके जीवन का उद्देश्य बन गया

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हरदा जिला मप्र के सम्पन्न जिलों में से एक है जहां नर्मदा के पानी की वजह से खेती उन्नत है और अमूमन लोग दो से तीन फसलें ले लेते हैं, घने जंगलों से आच्छादित यह जिला संयुक्त वन प्रबंधन का पायलट जिला रहा है, शिक्षा नवाचार के लिए भी इस जिले को जाना जाता है, प्राथमिक शिक्षा से लेकर माध्यमिक कक्षाओं में विज्ञान शिक्षण के लिए प्रयोग यहाँ एकलव्य नामक संस्था ने लम्बे समय तक किये और यहाँ पुस्तकालय के साथ कई प्रकार के शैक्षिक सामाजिक आन्दोलन हुए हैं। परन्तु आदिवासी क्षेत्रों में जो बदलाव दिखना था वह सहसा नजर नहीं आता जंगलों में आज भी आदिवासी परिवारों के साथ जीव और आजीविका की मूल समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं और निश्चित रूप से यह बाहरी लोग नहीं कर सकते थे स्थानीय नेतृत्व और प्रयासों के यह असंभव था। आज जिले में दो–तीन संस्थाएं प्रयास कर रही हैं पर उनका नेतृत्व स्थानीय नहीं है।

रामप्रसाद काजले आज बत्तीस वर्षीय युवा हैं जो हरदा जिले के टिमरनी तहसील के ग्राम उमरधा में रहते हैं और काफी जागरूक हैं। उमरधा टिमरनी से 40 किलोमीटर दूर स्थित है और यह वनग्राम है। राम ने समाज विज्ञान में स्नातक तक की पढ़ाई की है और परिवार में उनकी दो लड़कियां हैं। राम के साथ प्रकृति ने बड़ा अन्याय किया, 2004 में पिताजी की मृत्यु के बाद 2010 में माताजी की मृत्यु हो गई और फिर 2011 में परिवार पर कहर टूट पड़ा जब उनके कच्चे मकान पर बिजली गिरी और बड़े भाई की पत्नी सहित मृत्यु हो गई, बड़े भाई के तीन बच्चे थे – आज राम उन बच्चों को अपने घर में पाल रहे हैं। इस तरह उनके पांच बच्चे हैं और अपनी पत्नी के साथ रहते हैं, जमीन के नाम पर एक छोटा सा घर है। उनके नाम है और मेहनत मजदूरी करके वो बमुश्किल गुजारा करते है।

राम में शुरू से कुछ करने की जिद और जुनून था, वे कई संस्थाओं के सम्पर्क में आये और उन्होंने अपने आसपास के गाँवों में समस्याएं देखकर उन संस्थाओं के साथ बदलाव लाने की पहल की। दो संस्थाओं में पूर्ण कालिक कार्यकर्ता के रूप में काम भी किया और फिर उन्हें लगा कि स्थानीय आदिवासियों की समस्याएं अलग हैं और संस्थाओं का फोकस अलग, लिहाजा उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और समाज कार्य में स्नातक करके अपनी एक संस्था पंजीकृत की “सफ़र सामाजिक संस्था” परन्तु वित्तीय समस्या हमेशा रहती थी और अभी भी है।

थोड़े समय पहले जब सरकार ने जंगलों के नाम पर आदिवासियों को उजाड़ना शुरू किया तो उन्हें चिंता हुई और उन्होंने “जिंदगी बचाओ” संगठन शुरू किया और लगभग 50 गाँवों में जिनमें से मात्र दस राजस्व ग्राम थे और शेष 40 वनग्राम, में इस संगठन को फैलाया – युवाओं, किशोरों और महिलाओं के माध्यम से अपने मुद्दे और लोगों के मुद्दों को जोड़कर एक बड़ा आन्दोलन खड़ा किया। असल में जल जंगल जमीन के मुद्दे प्रदेश के साथ हरदा जैसे जिलों में भी प्रमुखता से उभरकर आये हैं और सबसे ज्यादा प्रभाव इसका आदिवासियों पर पड़ा है, राम चूँकि खुद कोरकू समुदाय से आते हैं और उनकी पहुँच आस पास के इन 50 गाँवों में थी इसलिए वे भली भाँति समस्याओं को भी जानते हैं और मुद्दों को भी।

गंजाल और मोरन नदियाँ इन जंगलों से होकर गुजरती हैं पास ही बैतूल जिले का चिचोली ब्लाक है, सरकार इन नदियों पर जंगल में 30 हजार हेक्टेयर जमीन को डूबोकर एक बाँध बना रही है जिससे 30 गाँव पूरी तरह से विस्थापित हो जायेंगे, इनमें से 15 गाँव गंजाल नदी यानी हरदा के हैं, 12 मोरन नदी यानी बैतूल जिले के हैं और शेष 3 केसला – होशंगाबाद जिले के हैं। वर्तमान में जिंदगी बचाओ संगठन की सारी ताकत इस बाँध के विरुद्ध है तीनों जिलों में फैले संगठन के स्थानीय लोग लड़ाई लड़ रहे हैं। धरना, रैली, प्रदर्शन और लगातार ज्ञापन देकर आदिवासी समुदाय के लोग अपनी अस्मिता, जंगल जमीन बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।

राम बताते हैं कि यह करने में बहुत श्रम लगा है लोगों के साथ लगातार बातचीत करके हर गाँव में 20–20 युवाओं महिलाओं के समूह बने हैं जो पंचायत की ग्राम सभा से लेकर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में हिस्सेदारी करते हैं, योजनाओं का अनुश्रवण करते हैं और योग्य व्यक्तियों को सही लाभ मिले – इसके प्रयास करते हैं, साथ ही आदिवासी समुदाय में प्रचलित कुप्रथाओं को हटाने में भी पहल करते हैं, गाँवों के स्कूलों में कोशिश होती है कि शत प्रतिशत बच्चे आयें, पढ़ें और आठवीं के बाद ब्लाक या जिले के आदिवासी समुदाय के लिए संचालित होस्टल में उन्हें उच्च शिक्षा के लिए भर्ती करा सकें, इन होस्टल्स का बहुत प्रचार प्रसार करना पड़ा, और आज इसका फ़ायदा सबसे ज्यादा हुआ है आज बहुत से गाँवों में बारहवीं पास छात्र छात्राएं हैं जो संगठन के सदस्य हैं और उन्हें मदद करते हैं, सरकारी तंत्र के साथ एक विश्वास स्थापित हुआ है, होस्टल्स के वार्डन संगठन के सदस्यों की बात को मानकर बच्चों को प्रवेश देते हैं और किसी भी समस्या को बताते हैं, आंगनबाड़ी और मध्यान्ह भोजन की योजनाओं पर संगठन की महिलाएं सतत निगरानी रखती हैं।

संगठन ने वनाधिकार पत्ते के थोक में आवेदन करवाए तब कहीं जाकर आज करीब 50 लोगों को दो से चार हेक्टेयर का मालिकाना हक़ पट्टे के रूप में मिल पाया है। सार्वजनिक राशन प्रणाली की दुकानों को भी संगठन ने प्राथमिकता से अपने काम का हिस्सा बनाया है परन्तु शासकीय कोटा समय पर ना मिल पाने से इसमें लेट लतीफी आये दिन होती रहती है। क्षेत्र में बंधुआ मजदूरी की प्रथा बहुत है क्योंकि आदिवासियों को साल भर तक नगदी की जरूरत पड़ती है और वे स्थानीय साहूकार से उधार लेते हैं और बदले में बंधुआ मजदूरी का करार कर लेते हैं। इस समस्या से भी निपटने के लिए संगठन तैयार है, हाल में संगठन ने जिलाधीश कार्यालय में एक दिवसीय धरना दिया था और हरदा जिलाधीश ने बाँध के सम्बन्ध में उच्चाधिकारियों से चर्चा करने को कहा है।

राम कहते हैं “शिक्षा के बिना सब कुछ अधूरा है और हमारा प्रयास है कि संगठन इतना मजबूत बने कि सबको शिक्षा मिल सके और लोग संगठित होकर अपने हालातों को समझकर बदलाव की पहल खुद करें” कोविड ने संगठन के काम को बुरी तरह प्रभावित किया है पर सदस्यगण प्रभावित परिवारों को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैय्या कराने की व्यवस्थाओं में जुटे हैं।

(संदीप नाईक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और आजकल भोपाल में रहते हैं।)  

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