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हमेशा के लिए शांत हो गयी गरीबों की एक वेशकीमती आवाज, नहीं रहे जस्टिस होसबेट सुरेश

नई दिल्ली। 2002 के गुजरात नरसंहार समेत हिंसा और मानवाधिकारों के हनन की विभिन्न घटनाओं की जाँच करने वाले आयोगों में शामिल रहे मशहूर एक्टिविस्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज होसबेट सुरेश का गुरुवार रात को 91 साल की उम्र में निधन हो गया। वे ताउम्र फासीवाद से लोहा लेते रहे। उन्हें जनवादी अधिकारों के ध्वजवाहक, जन-संगठनों के साथी और प्रेरणास्रोत के रूप में याद किया जाता रहेगा।

1991 में बॉम्बे हाई कोर्ट से रिटायरमेंट के बाद होसबेट सुरेश का जीवन विभिन्न जांच आयोगों, तथ्य अन्वेषक टीमों और जनसंघर्षों के लिए समर्पित हो गया। वे 2002 के गुजरात नरसंहार के बाद गठित की गई इंडियन पीपल्स ट्रिब्यूनल फैक्ट फाइंडिंग टीम का हिस्सा थे। सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश वीआर कृष्णा अय्यर के नेतृत्व वाले इस ट्रिब्यूनल में उनके साथ सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश पीबी सावंत शामिल थे।

ट्रिब्यूनल ने व्यापक तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर अपनी रिपोर्ट `क्राइम अगेन्सट ह्यूमेनिटी` जारी की थी। फरवरी 2012 में होसबेट सुरेश ने यह जानकारी सार्वजनिक की थी कि वे और सावंत गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पंड्या के घर गए थे तो पंड्या ने बताया था कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुलिस को हिन्दू दंगाइयों को नहीं रोकने के लिए कहा था। पंड्या ने यह जानकारी देते हुए जिसका ऑडियो टेप रिकॉर्ड किया गया था, दोनों जजों से अपना नाम जाहिर न करने का अनुरोध किया था। हरेन पंड्या की मार्च 2003 में हत्या कर दी गई थी।

जस्टिस सुरेश उस प्रस्तावित कानून `द प्रिवेन्शन ऑफ जीनोसाइड एंड क्राइम अगेन्सट ह्यूमेनिटी एक्ट 2004` को ड्राफ्ट करने वालों में भी शामिल थे जिसका उद्देश्य नागरिक समूहों के विरुद्ध जनसंहार जैसे मामलों में मंत्रियों और अफसरों की आपराधिक जवाबदेही तय करना था। 1984 और 2002 के जनसंहार में इंसाफ़ न मिलने को लेकर वे बाद में भी अफ़सोस जाहिर करते रहे।

होसबेट सुरेश ने मुंबई की सार्वजनिक खाद्य प्रणाली की जांच के लिए गठित इंडियन पीपल्स ट्रिब्यूनल का नेतृत्व भी किया था। कश्मीर में नागरिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों की जांच के लिए एचआरएलएन और अनहद की पहल पर गठित ट्रिब्यूनल की जूरी की अध्यक्षता भी सुरेश ने ही की थी। इस संबंध में 8 सितंबर 2010 को दिल्ली में जांच रिपोर्ट जारी की गई थी।

जस्टिस होसबेट सुरेश मुंबई के स्लम में रहने वालों के अधिकारों के लिए भी निरंतर संघर्षरत रहे। संजय गांधी नेशनल पार्क के नाम पर स्लम के सफाये के व्यापक अभियान के मामले की इंडियन पीपल्स ह्यूमन राइट्स ट्रिब्यूनल द्वारा की गई जांच में भी वे रिटायर्ड जज राजिंदर सच्चर और सिराज महफ़ूज़ दाउद के साथ शामिल थे। 1992-93 के मुंबई दंगों को लेकर इंडियन पीपल्स ह्यूमन राइट्स ट्रिब्यूनल की ओर से जस्टिस होसबेट सुरेश और और सिराज महफ़ूज़ दाउद की जांच रिपोर्ट `द पीपल्स वर्डिक्ट` प्रकाशित हुई थी। जस्टिस सुरेश मानवाधिकारों के हनन और हिंसा की विभिन्न घटनाओं की जांच करने वाले आयोगों से जुड़े रहे। न्याय प्रणाली में पारदर्शिता के पक्षधर रहे जस्टिस सुरेश अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए भी चर्चित रहे। उनका मानना था कि मीडिया को जुडिशरी के भ्रष्टाचार के मामलों को स्वतंत्र होकर रिपोर्ट करना चाहिए।

मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड ने जस्टिस सुरेश को न्याय और मानवाधिकारों के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं के प्रेरक, गाइड और साथी के तौर पर याद किया। उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों की जांच के दौरान के जस्टिस सुरेश के साथ के अनुभवों को भी याद किया है।

जस्टिस होसबेट सुरेश का जन्म 20 जुलाई 1929 को कर्नाटक के दक्षिणा कन्नड जिले के होसाबेतु कस्बे में हुआ था। आर्ट्स में मास्टर डिग्री हासिल करने के बाद वे कानून की पढ़ाई के लिए कर्नाटक से मुंबई आ गए थे। 1953 में उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट में वकालत शुरू की थी। 29 नवंबर 1968 को उन्हें सेशन कॉर्ट में एडिशनल जज नियुक्त किया गया।

1979 में सेकंड एडिशनल प्रिंसिपल जज के रूप में पदोन्नति के बावजूद उन्होंने वकालत की प्रैक्टिस में लौटने के मकसद से पद छोड़ दिया। सीनियर एडवोकेट के नाते उन्हें 21 नवंबर 1986 में बॉम्बे बाई कोर्ट ने एडिशनल जज नियुक्त किया जहाँ से वे 19 जुलाई 1991 को रिटायर हुए। बतौर जज उन्हें कई यादगार फैसलों के लिए याद किया जाता रहेगा। उन्हें बॉम्बे हाई कोर्ट के सर्वाधिक सम्मानित जजों में शुमार किया जाता था।

(जनचौक डेस्क पर बनी ख़बर।)

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This post was last modified on June 13, 2020 12:17 pm

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