शुद्ध राजनीतिक धोखा है कानून बना कर राममंदिर बनाने की बात

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अरुण माहेश्वरी

आरएसएस प्रमुख ने फिर एक बार मोदी की गिरती साख के चलते बदहवासी में राममंदिर का मुद्दा उछाला है । अन्य कई विमूढ़ लोगों की तरह ही उन्होंने कानून बना कर राममंदिर बनाने की माँग की है जो भारत के संविधान और कानून के बारे में उनकी खुद की अज्ञता अथवा आम लोगों के बड़े हिस्से की अज्ञानता से राजनीतिक लाभ उठाने की उनकी बदनीयती के अलावा और कुछ नहीं है ।

भारत एक धर्म-निरपेक्ष जनतांत्रिक राष्ट्र है जिसमें राज्य का काम एक समतावादी समाज के निर्माण के लिये जन-कल्याणकारी दिशा में नीतियाँ बना कर उन पर अमल करना निर्धारित है । मंदिर, मस्जिद, गिरजा या गुरुद्वारा बनाना राज्य का काम कत्तई नहीं है । राज्य अगर ऐसा कोई भी काम करता है तो वह संविधान के धर्म-निरपेक्ष चरित्र का खुला उल्लंघन होगा और इसीलिये उसे कानून की अदालत में चुनौती दे कर तत्कालनिरस्त किया जा सकता है, बल्कि किया जायेगा । 

इसके अलावा, अयोध्या में राम मंदिर के मामले में तो कानून बना कर मंदिर बनाने का कोई भी कदम संविधान और कानून को दोहरे उल्लंघन का कदम होगा ।

अभी 28 अक्तूबर से सुप्रीम कोर्ट में इस मसले से जुड़े मामले पर रोज़ाना सुनवाई शुरू होने वाली है । इसके पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले निर्णय में यह साफ कर दिया था कि वह राममंदिर या बाबरी मस्जिद के बनने या न बनने के सवाल पर विचार नहीं करेगा । अर्जुन की मछली की आँख की तरह उसकी नज़र सिर्फ और सिर्फ बाबरी मस्जिद जिस जगह थी उस ज़मीन के मालिकाना हक़ से जुड़े दीवानी पहलू पर ही टिकी रहेगी ।

सुप्रीम कोर्ट के इस स्पष्टीकरण के बाद से ही वास्तव में राममंदिर की राजनीति में सुप्रीम कोर्ट को घसीट लाने की सारी कोशिशों पर पानी फिर गया था ।

इस बात को सारी दुनिया जानती है कि इस विवादित स्थल पर पिछले लगभग चार सौ साल से एक मस्जिद थी और वहाँ राम लला की मूर्ति तो चोरी-छिपे 1949 में बैठा कर ज़ोर-ज़बर्दस्ती एक मंदिरनुमा तंबू बना दिया गया है । इसीलिये हर कोई यह भी जानता है कि उस ज़मीन पर मालिकाना हक़ के मामले में राममंदिर वालों की जीत असंभव है । वे कानून के ऊपर अपनी आस्था को रखने की ज़िद ठाने हुए हैं जो किसी भी धर्म-निरपेक्ष संविधान से चालित कानून के शासन में संवैधानिक तौर पर मान्य नहीं हो सकता है । 

इस सच्चाई को अच्छी तरह समझने के कारण ही आरएसएस के सारे तत्व इस मुद्दे को राजनीतिक तौर पर ही आगे और जीवित रखने के लिये अब कानून बना कर राम मंदिर बनाने की बात कहने लगे हैं !

वे यह जानते हैं कि उनका यह कानून, वह किसी रूप में, अध्यादेश या बाकायदा संसद के द्वारा पारित कानून के रूप में क्यों न आए, उस समय तक सुप्रीम कोर्ट में टिक नहीं सकेगा जब तक कि भारत के संविधान को ही पूरी तरह से बदल कर भारत को धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र के बजाय हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं कर दिया जाता है ।

सारे संघी नेता इस सच को जानते हैं, लेकिन वे यह मान कर चल रहे हैं कि इससे वे संभवत: एक नई और लंबी क़ानूनी लड़ाई का प्रारंभ कर पायेंगे, जिसका हर मौक़े-बेमौके वे राजनीतिक लाभ उठा पायेंगे । अर्थात, कानून बना कर राम मंदिर बनाने की बात राममंदिर बनाने का रास्ता साफ करने का कोई वास्तविक उपाय नहीं, आम लोगों को बरगलाने और सांप्रदायिक जहर फैलाने का एक प्रवंचनाकारी कदम भर होगा । इसे भारत में वर्तमान संविधान के रहते कभी भी स्वीकृति नहीं मिल सकती है । इस सच्चाई को सभी नागरिकों को समझ लेने की ज़रूरत है कि भारत सरकार मंदिर बनाने के लिये किसी की भी ज़मीन का अधिग्रहण करने लिये स्वतंत्र नहीं है । अगर ऐसी कोई भी कोशिश की गई तो हम समझते हैं कि उस पर अदालत से रोक लगाने में एक क्षण का भी समय नहीं लगेगा । और, अगर कानून भी बनाया गया, तो उसकी नियति उसके पूरी तरह से खारिज हो जाने के अलावा दूसरी कुछ नहीं हो सकती है । 

धार्मिक आस्थावान लोगों के लिये इस पूरे विषय का सही, संविधान-सम्मत और न्यायसंगत एक मात्र समाधान यही है कि बाबरी मस्जिद की ज़मीन बाबरी मस्जिद वालों को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सौंप दी जाए और उसके बगल में, यदि राममंदिर वालों को ज़मीन उपलब्ध हो तो उसे खरीद कर उस पर या अग़ल-बगल में कहीं भी भव्य राममंदिर बना दिया जाए । इसके अतिरिक्त इस विषय पर ज़हरीली राजनीति हमारे राष्ट्र को अंदर से तोड़ने की राष्ट्र-विरोधी राजनीति होगी । दुर्भाग्य से राष्ट्रवाद की रट लगाने वाले ही आज सबसे अधिक राष्ट्र-विरोधी कामों में लगे हुए हैं ।

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