Friday, March 1, 2024

औरंगाबाद में दबंग ने वोट न देने के शक में दलितों को उठक-बैठक करवाने के बाद थूक चटवाया: माले जांच रिपोर्ट

पटना। अम्बा/कुटुंबा प्रखंड के डुमरी पंचायत के मुखिया पद के लिए चुनाव लड़ने वाले सिंघना गांव निवासी बलवंत कुमार सिंह ने खरांटी गांव के चार महादलित नौजवानों को पैसा लेने के बाद वोट नहीं देने के आरोप में न केवल आधे घंटे तक उठक-बैठक कराया, बल्कि थूक गिरा कर उनसे चटवाने का घृणित काम भी किया। यह घटना उस समय घटी जब पूरा विश्व नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए मानवाधिकार दिवस के रूप में मना रहा था। उसी दिन 10 दिसम्बर 2021 को अहले सुबह करीब 7 या 8 बजे ‘दास प्रथा’ एवं ‘सामंती युग’ में दी जाने वाली सजा और जुल्म-अत्याचार का बिहार में नमूना पेश किया जा रहा था। यह सब सुशासन की सरकार में चल रहा था। जबकि इस सरकार को महादलित से लेकर ऐसे बाबू लोगों का भी समर्थन हासिल है जिनके द्वारा महादलितों पर जुल्म अत्याचार किए जा रहे हैं। नीतीश बाबू की यह इंजीनियरिंग गजब की है। नीतीश कुमार के सामाजिक मैनेजमेंट ने महादलित, अति पिछड़ा से लेकर ऊपर के क्रीम वाले लोगों का भी समर्थन हासिल कर लिया है,  लेकिन दलित-गरीबों को मान-सम्मान और सत्ता का कोई भी अवसर उनके पास तक नहीं फटक रहा है।

सामाजिक स्तर पर जो बनावट है, सामंती उत्पीड़न का विभिन्न तरीकों आज भी बदस्तूर जारी है। क्या सामाजिक स्तर पर बलवंत सिंह अपने समकक्ष लोगों के साथ चुनाव में दिया गए पैसे के एवज में वोट नहीं देने की आशंका के आधार पर ऐसी घटना कर सकते थे ?  
महादलित मुसहर जाति के साथ की गयी इस घिनौनी घटना के लिए बलवंत सिंह को न तो कानून का खौफ था, न ही सुशासन का भय। संविधान के अधिकारों की धज्जियां उड़ाना तो इन लोगों के लिए आम बात हो गयी है।

दरअसल ऐसी घटना को अंजाम देने वाले दबंगों को सत्ता का संरक्षण विभिन्न खतरनाक घटनाओं में भी साफ तौर पर मिलता रहा है तो मनोबल बढ़ना लाजमी है। नीतीश बाबू के ही राज में तो यह संदेश सत्ता के द्वारा दिया जा चुका है। लिहाजा, इन लोगों के द्वारा किसी भी तरह के जुल्म-अत्याचार करने की सजा क्या मिलेगी इन्हें पूरा मालूम है। इसीलिए बेखौफ होकर घटना को अंजाम देते हैं और वीडियो बनाकर अपनी क्रूरता का संदेश गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों को देते रहते हैं। मॉब लॉन्चिंग की अनगिनत घटनायें हम लोगों के सामने हैं।

नीतीश सरकार के राज में एक भी ऐसे हत्याकांड के हत्यारों को सजा दिलाना संभव नहीं हुआ। बाथे,  बथानी,  शंकर बिगहा, मियांपुर से लेकर अभी तक जितने भी बड़े-बड़े गरीबों के जनसंहार हुए सारे के सारे हत्यारे बाइज्जत बरी कर दिए गए। तो इस तरह के थूक चटाने वाले, उठक-बैठक कराने वालों को यह सरकार कौन सी सजा देगी। उन्हें मालूम है। इसीलिए बेखौफ होकर ये लोग दलित-गरीबों के ऊपर जुल्म-अत्याचार करते हैं।

10 दिसम्बर 2021 समय करीब 7 या 8 बजे की घटना। डुमरी पंचायत के सिंघना गांव निवासी बलवंत कुमार सिंह ने खरांटी गांव के 4 मुसहर जाति के नौजवानों को फोन पर खबर देकर बगल के गांव फैजा बीघा में वोटों की गिनती के पहले ही वोट नहीं देने के आरोप में मार-पीट, उठक-बैठक तक करवाया। बलवंत सिंह को जब यह एहसास हो गया कि उसकी जीत पक्की नहीं है, चुनाव में किए गए खर्च को वसूलने के लिए उसने यह रास्ता अख्तियार किया। 1. मंजीत भुइंया (18 वर्ष) पिता रामसूरत भुइंया, 2.  अनिल भुइंया (35 वर्ष) पिता सिरतन भुइंया,  3. कमलेश भुइंया (25 वर्ष) पिता राम सेवक भुइंया 4. अरविंद भुइंया(18 वर्ष )पिता सतेंद्र भुइंया को बलवंत सिंह ने आधे घंटे से भी ज्यादा समय तक उठक-बैठक करवाया और मंजीत भुइंया को थूक तक चटवाया, चुनाव में दिए गए रुपए को वसूलने के लिए। यानि वोट भी ले लिया जैसा कि सभी पीड़ित लोगों ने जांच टीम को बताया, उठक- बैठक भी करवाया और थूक भी चटवाया यह बहुत ही पीड़ादायक घटना है।

जांच टीम के सामने मंजीत, अनिल एवं खरांटी के भारी संख्या में आये गरीबों ने बलवंत सिंह द्वारा किए गए अत्याचार का आप बीती बतायी।

उन्होंने बताया कि उन लोगों को बलवंत सिंह के द्वारा तीन-तीन हजार रुपए चुनाव में खर्च के लिए दिए गए थे। चारों लोग बलवंत सिंह को ही वोट भी दिए थे। जब चारों पीड़ितों की बलवंत सिंह ने पिटाई व उठक बैठक के लिए दबाव बगल के गांव बैजा बिगहा में बनाने लगा तो अनिल, मंजीत, अरविंद एवं कमलेश भुइंया ने जोर देकर कहा कि अभी गिनती शुरू भी नहीं हुई थी और उन लोगों पर वोट नहीं देने का आरोप कैसे लगा सकते हैं। मेरे वार्ड से उन लोगों का वोट नहीं निकलेगा तब कोई कार्रवाई करेंगे। लेकिन उसने एक नहीं मानी।
केंद्र व राज्य सरकारें आजादी के 75 वें अमृत महोत्सव मना रही हैं। लेकिन औरंगाबाद जिले के सुदूर इलाके के गांवों में न तो कोई सरकारी सुविधा ही हासिल है और न ही सामाजिक सुरक्षा। इस घटना से सरकार सबक नहीं लेती है तो केवल कागज पर विकास व सामाजिक सुरक्षा की बात रह जायेगी।

खरांटी गांव में 40 से 45 घर मुसहर जाति, 20 से 25 घर रविदास, 4 घर पासवान, 7 घर पासी जाति के परिवार रहते हैं। रविदास टोला थोड़ा सा अलग है। शेष परिवार एक ही जगह बसे हैं। दलित परिवारों में शादी होते ही अलग- अलग परिवार रहने लगते हैं। लिहाजा, कई वैसे परिवार हैं जिन्हें मां-बाप के नाम पर बने अधूरे पक्का मकान, राशन कार्ड में उनकी हिस्सेदारी नहीं होती है और उस गांव के कई परिवारों को पक्का मकान व राशन कार्ड नहीं उपलब्ध है। वैसे बुजुर्ग महिला-पुरुष भी मिले जिनकी अंगुलियों की रेखा घिस जाने के कारण उन्हें भी राशन नहीं मिलता है। कुल मिलाकर इस गांव में सभी परिवारों को पक्का मकान और राशन भी मयस्सर नहीं है। ज्यादातर पक्का मकान पूर्ण नहीं बना है। डोर लेवल तक बना पक्का मकान को करकट से छत बना कर रहने को विवश हैं।

गांव में एक भी घर में शौचालय का निर्माण नहीं हुआ है। लेकिन सरकार ने तो सभी पंचायत को ओडीएफ घोषित कर दिया है। यानि कागज पर शौचालयों के निर्माण हुए और कागज पर ही ओडीएफ भी घोषित कर दिया गया। यही हाल नल-जल का है। एक भी नल चालू नहीं देखा जा सका।

आजादी के 75 साल के बाद भी सुलभ शिक्षा की व्यवस्था नहीं की गई। गांव में कोई प्राथमिक विद्यालय नहीं है। खरांटी गांव से करीब 3 से 4 किलोमीटर दूर बैजा बिगहा बच्चों को पढ़ने जाना पड़ता है। दूर होने के कारण ज्यादातर बच्चे विद्यालय जाते ही नहीं। लिहाजा, गांव में पढ़ाई का कोई माहौल नहीं है। अनपढ़ों की संख्या ज्यादा है और नई पीढ़ी के लिए भी कोई उम्मीद नहीं दिखती है।

एक खंडहर बना आंगनबाड़ी केंद्र बना है, जिसमें एक भी किवांड़ नहीं है और बच्चों की पढ़ाई भी नहीं होती है। बच्चों को पोषक आहार शायद ही मिलता है। गांव के लोगों ने बताया कि कुछ भी नहीं मिलता है। सरकार के द्वारा जिन लोगों के लिए लोक कल्याणकारी योजनाएं संचालित की जाती हैं वह जमीनी हकीकत से कोसो दूर है।

जांच टीम की मांग

1. बलवंत सिंह को कड़ी सजा मिले
2. पीड़ित परिवार को 2-2 लाख मुआवजा दिया जाए। सभी परिवारों को सुरक्षा की गारंटी की जाए। सरकार ने पीड़ितों के लिए 50-50 हजार रुपये देने की घोषणा की है। लेकिन अभी तक उनके न तो खातों में आया है और नहीं कोई चेक ही दिया गया है। इसलिए तुरन्त उन्हें 50 हजार रुपये देने की मांग करते हैं।
3. गांव में सभी परिवार को पक्का मकान बनवाया जाए और सभी परिवारों के लिए राशन कार्ड बनवाया जाए, जिन बुजुर्गों के अंगुलियों की रेखाएं घिस गई है उन्हें भी राशन की गारंटी की जाए।
4. खरांटी से 3 से 4 किलोमीटर दूर बच्चों को दूर स्कूल जाना पड़ता है। गांव में प्राथमिक विद्यालय बनाने की मांग करते हैं।

भाकपा माले के पोलित ब्यूरो सदस्य कॉमरेड अमर के नेतृत्व में राज्य स्तरीय जांच टीम जिसमें माले राज्य स्थाई समिति सदस्य और अरवल के विधायक कॉ. महानन्द, माले औरंगाबाद जिला सचिव कॉ. मुनारिक राम, खेग्रामस के कार्यकारी राज्य अध्यक्ष कॉमरेड उपेंद्र पासवान, राज कुमार, बिरजू जी, चंद्रमा जी समेत कई माले के वरिष्ठ नेताओं की टीम डुमरी पंचायत के खरांटी गांव पहुंची और पीड़ित परिवार से मुलाकात की। पूरे गांव के लोगों से पूरी घटना की जानकारी ली।


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