Monday, October 25, 2021

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दलबदल विरोधी कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं लोकसभा अध्यक्ष

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मौजूदा वक्त में जब देश के तमाम संवैधानिक संस्थान और उनमें बैठे लोग अपने पतन की नित नई इबारतें लिखते हुए खुद को सरकार के दास के रूप में पेश कर रहे हों, तब ऐसे माहौल में लोकसभा अध्यक्ष भी कैसे पीछे रह सकते हैं! हालांकि इस सिलसिले में सोलहवीं लोकसभा की अध्यक्ष रहीं सुमित्रा महाजन भी ऐसा काफी कुछ कर गई हैं, जिससे इस संवैधानिक पद की मर्यादा का हनन हुआ है। लेकिन जो वे नहीं कर सकीं, उसे अब सत्रहवीं यानी मौजूदा लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिड़ला पूरा करते दिख रहे हैं। बाकी मामलों में भी वे अपनी पूर्ववर्ती के नक्श-ए-कदम पर चल ही रहे हैं।

लोकसभा अध्यक्ष चाहे जिस भी दल का सदस्य चुना जाए, वैसे आमतौर पर वह सत्तारूढ़ दल या उसके किसी सहयोगी दल का ही चुना जाता है। लेकिन चुने जाने के बाद उसकी दलीय संबद्धता औपचारिक तौर पर खत्म हो जाती है और वह दलीय गतिविधियों से अपने को दूर कर लेता है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह सदन की कार्यवाही का संचालन दलीय हितों और भावनाओं से ऊपर उठकर सदन के नियमों और सुस्थापित मान्य परंपराओं के मुताबिक करेगा और विपक्षी सदस्यों के अधिकारों को भी पूरा संरक्षण देगा। इस मान्यता और अपेक्षा के बावजूद देखने में यही आता रहा है कि हर लोकसभा अध्यक्ष की निष्पक्षता का पलड़ा सत्तारूढ़ दल और सरकार की ओर ही झुका रहता है। कोई भी लोकसभा अध्यक्ष इसका अपवाद नहीं रहा और मौजूदा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला तो कतई नहीं।

उनकी मनमानी और सरकार भक्ति का ताजा मामला दो लोकसभा सदस्यों के दलबदल से जुड़ा है, जिनकी सदस्यता दलबदल निरोधक कानून के तहत लोकसभा अध्यक्ष ने अभी तक समाप्त घोषित नहीं की है। इसकी वजह यह है कि दलबदल करने वाले दोनों सदस्य तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं।

तृणमूल कांग्रेस के नेता लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के कई दिनों से गुहार लगा रहे हैं कि पार्टी छोड़ने वाले दोनों सांसदों की सदस्यता खत्म की जाए। अध्यक्ष ने तृणमूल कांग्रेस संसदीय दल के नेता सुदीप बंदोपाध्याय को भरोसा दिलाया है कि वे एक कमेटी बनाएंगे, जो तृणमूल कांग्रेस छोड़ने वाले दोनों सांसदों- शिशिर अधिकारी और सुनील मंडल की सदस्यता के बारे में फैसला करेगी।

लोकसभा अध्यक्ष का यह रवैया मामले को लटकाए रखने वाला है, क्योंकि दलबदल निरोधक कानून के मुताबिक दलबदल करने वाले किसी सांसद या विधायक की सदस्यता समाप्त घोषित करने का फैसला संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी को करना होता है न कि किसी कमेटी को।

तथ्य यह है कि तृणमूल कांग्रेस के दोनों सदस्य पार्टी छोड़ चुके हैं, लिहाजा उनके पार्टी छोड़े जाने के बारे में किसी तरह की जांच करने के लिए कमेटी बनाने की कोई जरुरत ही नहीं है। सुनील मंडल को तो पार्टी छोड़े हुए छह महीने हो चुके हैं। उन्होंने 19 दिसंबर को मिदनापुर में हुई केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रैली में भाजपा में शामिल होने का ऐलान किया था।

शिशिर अधिकारी को भी भाजपा में शामिल हुए तीन महीने हो गए। वे नंदीग्राम में 21 मार्च को हुई अमित शाह की रैली में भाजपा में शामिल हुए थे। इसलिए दोनों के खिलाफ साफ तौर पर दलबदल का मामला बनता है। सुनील मंडल के खिलाफ तो तृणमूल कांग्रेस ने जनवरी के पहले हफ्ते में ही लोकसभा सचिवालय में शिकायत दर्ज करा दी थी। फिर भी कोई कार्रवाई नहीं होने से लोकसभा अध्यक्ष की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं

एक सवाल यह भी है कि आखिर ये दोनों सांसद खुद ही इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे हैं? जब शिशिर अधिकारी के बेटे शुभेंदु अधिकारी ने तृणमूल कांग्रेस छोड़ी थी तो उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया था। ऐसे ही शिशिर अधिकारी और सुनील मंडल भी लोकसभा से इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे हैं? चूंकि दोनों सांसद इस्तीफा नहीं दे रहे हैं और लोकसभा अध्यक्ष भी उनकी सदस्यता समाप्त घोषित नहीं कर रहे हैं, इसलिए यह सवाल उठना लाजिमी है कि दोनों सांसदों को कहीं न कहीं यह भरोसा है कि उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी और मामला लटका रहेगा, लिहाजा इस्तीफा देने की जरूरत नहीं है।

जाहिर है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला अगर मामले को लटकाए हुए हैं तो उन पर भी कहीं से दबाव है या उन्हें संकेत दिया गया है कि वे मामले को इसी तरह लटकाए रखें।

यह सही है कि ओम बिड़ला कोई बहुत अनुभवी राजनेता नहीं हैं। तीन मर्तबा विधानसभा और दूसरी बार लोकसभा के लिए चुने गए बिड़ला ने लोकसभा अध्यक्ष बनने से पहले कभी किसी संवैधानिक पद का दायित्व नहीं संभाला है। उनकी औपचारिक शिक्षा भी औसत दर्जे की ही है। इन्हीं सब वजहों से लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए उनका चयन चौंकाने वाला था। दूसरे दलों की बात तो दूर, खुद उस भाजपा में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के अलावा आज तक कोई नहीं जान सका कि ओम बिड़ला को उनके किन गुणों या काबिलियत के चलते लोकसभा अध्यक्ष बनाया गया।

हालांकि ऐसा नहीं है कि ओम बिड़ला के रूप में पहली बार ही किसी गैर अनुभवी सांसद ने लोकसभा अध्यक्ष का पद संभाला हो। उनसे पहले भी गैर अनुभवी या कम अनुभवी सांसद लोकसभा के अध्यक्ष बने हैं और उन्होंने बेहतर तरीके से अपने दायित्व का निर्वहन किया है। इस सिलसिले में पहला नाम तेलुगू देशम पार्टी के जीएमसी बालयोगी का लिया जा सकता है, जो एनडीए सरकार के समय 1998 में बारहवीं और 1999 में तेरहवीं लोकसभा के अध्यक्ष चुने गए थे। पहली बार जब वे अध्यक्ष चुने गए थे तो वह लोकसभा में उनका दूसरा कार्यकाल था। सन 2002 में एक विमान दुर्घटना में उनका आकस्मिक निधन हो जाने पर उनकी जगह पहली बार ही संसद के सदस्य बने शिवसेना नेता मनोहर जोशी को लोकसभा अध्यक्ष चुना गया था। बालयोगी और जोशी दोनों ने ही सदन में और सदन के बाहर अपने कामकाज और व्यवहार से लोकसभा अध्यक्ष के पद की गरिमा को कायम रखा था।

लोकसभा अध्यक्ष के रूप में वे सिर्फ इस मामले में ही सरकार के इशारों पर काम नहीं कर रहे हैं, लोकसभा की कार्यवाही का संचालन करते हुए भी वे ज्यादातर मौकों पर सरकार और सत्तारूढ़ दल के संरक्षक के तौर पर ही पेश आते दिखे हैं। कुल मिलाकर वे अपने कामकाज और व्यवहार से उन लोगों की उम्मीदों पर खरा उतर रहे हैं, जिन्होंने इस संवैधानिक और गरिमामय पद के लिए उनका चयन किया है।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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