Monday, October 18, 2021

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पराली संकट: तुषार मेहता के विरोध के बावजूद जस्टिस लोकुर की नियुक्ति

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‘खाता न बही जो उच्चतम न्यायालय में सॉलिसिटर जनरल कहें वो सही’, की उक्ति से उच्चतम न्यायालय बाहर निकलता प्रतीत हो रहा है। यह महज संयोग नहीं हो सकता कि पिछले दो-तीन साल के दौरान जब केंद्र सरकार की ओर से उच्चतम न्यायालय की किसी भी पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए और न्यायालय का आदेश उनके पक्ष में रहा, लेकिन उच्चतम न्यायालय में जबसे वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण की अवमानना मामला उछला और वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे के साथ-साथ अवकाश प्राप्त न्यायाधीश जस्टिस मदन बी लोकुर, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस एपी शाह जैसे न्यायविदों ने कानून के शासन और संविधान के उल्लंघन के मामले पब्लिक डोमेन में उठाए, तब से उच्चतम न्यायालय का न्यायिक विमर्श पटरी पर आता दिख रहा है।

दरअसल उच्चतम न्यायालय के चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यन की पीठ ने पराली जलाने की निगरानी और रोकथाम के लिए सेवानिवृत्त जस्टिस मदन लोकुर को नियुक्त किया, तुषार मेहता द्वारा इसका विरोध किया गया, लेकिन उच्चतम न्यायालय ने उनके विरोध को अनसुना कर दिया। दरअसल जैसे ही सुनवाई खत्म हुई और पीठ उठने वाली थी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए बेंच के सामने पेश हुए और जस्टिस लोकुर को वन-मैन पैनल के रूप में नियुक्त करने वाले आदेश पर हस्ताक्षर नहीं करने का आग्रह किया।

चीफ जस्टिस बोबडे ने मेहता से पूछा कि यह अनुरोध क्यों किया जा रहा है, जिस पर मेहता ने जवाब दिया कि कुछ आपत्तियां हैं, जिसके लिए हम पीठ  को परेशान नहीं करना चाहते हैं। मुझे एक आवेदन दायर करना होगा, हम नियुक्ति को रोक सकते हैं। इस पर चीफ जस्टिस ने पूछा, आपको क्या आपत्ति है, हमें मौखिक रूप से बताएं।

चीफ जस्टिस बोबडे ने कहा कि हमने आधे घंटे तक विस्तार से इस मामले को सुना है। हमने सभी को सुना। न्यायाधीश की सहमति ली गई। हमने सबके सामने आदेश पारित किया। आप हमें मौखिक ही अपनी आपत्तियां बताएं। मेहता ने कहा कि याचिकाकर्ता ने सिफारिश की, उन्होंने ही सहमति ली। हमें इसका नोटिस तक नहीं दिया गया।

चीफ जस्टिस ने कहा कि यह मामला केंद्र से नहीं, राज्यों से संबंधित है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जस्टिस लोकुर को कोई अतिरिक्त अधिकार क्षेत्र या अधिकार नहीं दिए जा रहे हैं। इसके बावजूद मेहता ने फिर न्यायालय से आग्रह किया कि इस आदेश को अंतिम रूप नहीं देने पर विचार करें। अंतत: न्यायालय ने एसजी का अनुरोध ठुकरा दिया।

उच्चतम न्यायालय ने पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पराली जलाने को रोकने के लिए निगरानी करने और कदम उठाने के लिए जस्टिस (सेवानिवृत्त) मदन बी लोकुर की एक सदस्यीय समिति नियुक्त की है। पीठ ने तीसरे साल के लॉ स्टूडेंट आदित्य दुबे की याचिका में सुझाव को स्वीकार कर लिया कि पराली जलाने से रोकने के लिए जस्टिस लोकुर की समिति नियुक्त की जाए, जिसमें पंजाब, हरियाणा और यूपी के मुख्य सचिव शामिल हों जो न्यायमूर्ति लोकुर को राज्यों में पराली जलाने से रोकने के लिए अतिरिक्त साधनों और तरीकों को तैयार करने के लिए सक्षम करें।

सीजेआई एसए बोबडे ने कहा, “यह आदेश किसी भी प्राधिकरण के खिलाफ नहीं है। हम केवल इस बात से चिंतित हैं कि दिल्ली एनसीआर के नागरिक ताजा स्वच्छ हवा में सांस लेने में सक्षम हों और अदालत बंद रहने के दौरान, हम इन नौ दिनों के दौरान कुछ भी नहीं करना चाहते हैं।” न्यायालय ने आगे कहा कि एनसीसी, एनएसएस और भारत स्काउट्स एंड गाइड को राज्यों में कृषि क्षेत्रों में जलने वाली पराली की निगरानी में सहायता के लिए संबंधित राज्यों में तैनात किया जाना चाहिए।

हर साल सर्दियों से पहले पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों के खेतों में पराली जलाने से इन राज्यों सहित राजधानी दिल्ली में बढ़े वायु प्रदूषण की समस्या का निराकरण करने की हर साल कोशिशें होती हैं। इस बार उच्चतम न्यायालय ने खुद इस मामले में दखल दिया है। उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण स्तर को देखते हुए पराली जलाने पर निगरानी रखने के लिए एक मॉनिटरिंग टीम का गठन किया है।

यह एक सदस्यीय समिति है। तीनों राज्यों के चीफ सेक्रेटरी जस्टिस लोकुर को सहयोग करेंगे। इसमें एनसीसी, एनएसएस और भारत स्काउट-गाइड के लोग भी सहयोग करेंगे। यह कमेटी फिजिकल सर्वे करेगी। इसके अलावा पीठ ने निर्देश दिया है कि पंजाब और हरियाणा में पहले से ही मौजूद टीमों को जो पराली जलाने से रोकने के लिए हैं, लोकुर समिति को रिपोर्ट करना और निर्देश लेना होगा।

आदेश में कहा गया है कि संबंधित राज्य सरकारें इस कमेटी को उचित सुविधा मुहैया कराएंगी। सचिवालय सुरक्षा और वित्तीय सुविधाएं मुहैया कराएंगे। कमेटी 15 दिन में अपनी रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय को सौंपेगी। इस मामले में अगली सुनवाई 26 अक्टूबर को होगी।

इस मामले में याचिकाकर्ता ने मांग रखी थी कि जस्टिस मदन बी लोकुर को पराली जलाने में नियंत्रण के लिए उच्चतम न्यायालय नियुक्त करे। हालांकि, केंद्र सरकार का कहना था कि एनवायरमेंट पॉल्यूशन कंट्रोल अथॉरिटी (ईपीसीए) को इस मामले में जिम्मेदारी सौंपी गई है और एमिकस क्यूरी पहले से नियुक्त हैं। याचिकाकर्ता ने कहा कि फिलहाल पश्चिमी यूपी में पराली जलाने की गतिविधि रोकने के लिए व्यवस्था की जानी चाहिए।

पंजाब सरकार ने कहा कि दिल्ली में प्रदूषण का कारण वो नहीं है। पंजाब ने कहा कि वो अदालत के हरेक निर्देश का पूरी तरह से पालन कर रहा है। राज्य सरकार ने प्रदूषण को काबू करने के लिए कई सारे कदम उठाए हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के लिए इन राज्यों को जिम्मेदार ठहराया है।

सर्दियां अभी शुरू भी नहीं हुई हैं कि दिल्ली में एक बार फिर प्रदूषण का खतरा दिखना शुरू हो गया है। दिल्ली में इस हफ्ते हल्की धुंध छाने के कारण क्षेत्र की वायु गुणवत्ता सूचकांक ‘बेहद खराब’ श्रेणी में दर्ज की गई। पूर्वी दिल्ली जिले में सबसे ज्यादा प्रदूषण दर्ज किया जा रहा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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