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Friday, September 24, 2021

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पाटलिपुत्र की जंग: नड्डा और भूपेंद्र यादव का बयान बीजेपी की बौखलाहट का नतीजा

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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा है कि भाकपा (माले) ने राजद पर कब्जा कर लिया है, उधर उनके महासचिव भूपेंद्र यादव ने कल ही कहा कि तेजस्वी भाकपा (माले) का मुखौटा हैं।

ऐसा लगता है कि भाजपा ने अब चुनाव में वामपंथी उग्रवाद को प्रमुख मुद्दा बनाने का फैसला किया है। दरअसल, बिहार चुनाव भाजपा के हाथ से निकलता जा रहा है। उसके पास मतदाताओं को देने के लिए, उनसे कहने के लिए कुछ भी सकारात्मक है नहीं। नीतीश कुमार के खिलाफ 15 साल की एन्टी-इनकंबेंसी को साधने तथा उनका कद छोटा कर लगाम खुद हाथ में लेने के लिए बेचैन भाजपा ने चिराग का दांव खेला है। लेकिन दो नावों की इस सवारी का दांव भी उल्टा पड़ गया है और भाजपा नीतीश के सामाजिक आधारों के बीच परस्पर अविश्वास गहरा रहा है, इसका दोनों की सीटों पर असर पड़ना तय है।

नीतीश और भाजपा ने लालू के 15 साल बनाम अपने 15 साल को मुद्दा बनाया लेकिन नीतीश के 15 साल में होश संभाली और जवान हुई पीढ़ी के लिए किसी अतीत की कहानी की बजाय वर्तमान के अपने जीवन के जलते सवाल, बेरोजगारी, पलायन की यातना, विकास का सवाल अधिक महत्वपूर्ण हैं। 

सवालों से घिरे भाजपा के शीर्ष नेता  चुनाव में आतंकवाद और जिन्ना जैसे मुद्दे बनाने की कोशिश कर रहे हैं, पर वह कोशिश कहीं से परवान नहीं चढ़ पा रही है क्योंकि बिहार की जनता को दूसरे ही सवाल मथ रहे हैं।

अब यह वामपंथ को मुद्दा बनाने का ताज़ा दांव है। इसके माध्यम से भाजपा बिहार के सामन्ती-पूंजीवादी-माफिया शासक खेमों को यह संदेश देना चाह रही है कि उनके हित उसी के राज में संरक्षित और सुरक्षित हैं, इसके माध्यम से वह तमाम दबंग power groups को अपने पक्ष में खड़ाकर न सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टियों बल्कि समूचे महागठबंधन के खिलाफ जातीय तौर पर गोलबंद करना चाहती है। किसानों और मध्यवर्ग को एक खतरनाक आंतरिक दुश्मन का काल्पनिक हौवा खड़ा करके विपक्ष से दूर करना चाहती है। लेकिन भाजपा का यह दांव भी खाली जाएगा।

अगर इससे कोई संदेश जाएगा तो यही कि कम्युनिस्ट पार्टियां जिन दबंगों, भ्रष्टाचारियों, सामन्ती, माफिया ताकतों के खिलाफ लड़ती हैं उन्हीं के साथ भाजपा-नीतीश खड़े हैं।

सच्चाई यह है कि लोग विपक्ष के साथ इसलिए जा रहे हैं कि डबल इंजन की सरकार उनके लिए डबल डिजास्टर साबित हुई है, भाजपा-नीतीश के लगभग 15 साल के लंबे राज से उनकी विकास, खुशहाली की जो उम्मीदें थीं, वे टूट चुकी हैं, उनका राज्य बिहार अभी भी एक फिसड्डी राज्य है जहां न रोजी-रोटी है,  न दवा-दारू, न पढ़ाई, न कल कारखाने।

कम्युनिस्टों के खिलाफ भाजपा की इस बौखलाहट का कारण समझा जा सकता है । आज देश में फासीवादी आक्रामकता के खिलाफ देश में जो लड़ाई चल रही है, तमाम लोकतांत्रिक ताकतों के साथ कम्युनिस्ट पार्टियां, उनके जनसंगठन उस लड़ाई के अग्रिम मोर्चे पर हैं। बिहार में वे लगातार नीतीश-भाजपा राज के खिलाफ ग्रामीण गरीबों, किसानों, छात्रों-नौजवानों, कामकाजी महिलाओं के हितों के लिए सड़क से सदन तक लड़ते रहे हैं, संविधान विरोधी नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदेशव्यापी अभियान चलाते हुए नीतीश को जनता ने विधानसभा में यह प्रस्ताव पास कराने के लिए मजबूर कर दिया कि बिहार में NRC लागू नहीं होगा।

 संघर्षशील, ईमानदार कम्युनिस्ट नेताओं व प्रत्याशियों की जड़ें समाज के हाशिये के तबकों में गहराई से जमी हुई हैं, नड्डा जैसों का कोई भी मिथ्या प्रचार अभियान उन्हें न उखाड़ पायेगा, न हरा पायेगा, न ही बदनाम कर पायेगा।

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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