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Tuesday, September 28, 2021

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एनबीएसए को नखहीन, दंतहीन संगठन मानता है सुप्रीम कोर्ट

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उच्चतम न्यायालय न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (एनबीएसए) को नखहीन और दंतहीन संस्था मानता है। तब्लीगी जमात सदस्यों के खिलाफ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा किए गए  सांप्रदायिक दुष्प्रचार के विरुद्ध चल रही सुनवाई में चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और वी रामसुब्रमण्यन की पीठ ने केंद्र से पूछा कि एनबीएसए की तरह ‘निजी संस्था’ को मीडिया के खिलाफ शिकायतों पर गौर क्यों करना चाहिए?

पीठ ने कहा की हम एनबीएसए को संदर्भित क्यों करें जब आपके पास अथॉरिटी है। यदि यह मौजूद नहीं है, तो आप गठित करें हम आपके द्वारा नियोजित तंत्र को जानना चाहते हैं। हमें एनबीएसए आदि का संदर्भ क्यों देना चाहिए जब आपके पास इस पर गौर करने का अधिकार है। हालांकि, सॉलिसीटर-जनरल ने कहा कि एनबीएसए एक स्व नियामक संस्था है।

पीठ ने मंगलवार को कोविड-19 को लेकर तब्लीगी जमात सदस्यों के खिलाफ सांप्रदायिक प्रचार में लिप्त मीडिया आउटलेट्स के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली याचिकाओं पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा दाखिल जवाबी हलफनामे पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की और कहा कि हम आपके हलफनामे से संतुष्ट नहीं हैं। पीठ कहा कि हमने पूछा था कि केबल टीवी नेटवर्क रेग्युलेशन एक्ट से ऐसे मामलों को कैसे रोका जा सकता है? अब तक मिली शिकायतों पर आपने क्या कार्रवाई की है? लेकिन आपका जवाब दोनों मसलों पर कुछ नहीं कहता। बेहतर जवाब दाखिल करें। अगर इस कानून के तहत कोई व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती, तो हमें किसी और एजेंसी को ज़िम्मा सौंपना पड़ सकता है।

इस मसले पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 13 नवंबर को दायर अपने हलफनामे में उच्चतम न्यायालय को सूचित किया था कि तब्लीगी जमात की घटना की सांप्रदायिक रिपोर्टिंग के खिलाफ याचिका ‘अस्पष्ट दावे’ और कुछ निश्चित चेक वेबसाइटों द्वारा प्रकाशित समाचार रिपोर्टों पर आधारित थी। इस बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता है कि समूचा मीडिया सांप्रदायिक विद्वेष फैला रहा था। सरकार ने कहा था कि जो शिकायतें उसे दी गईं थीं, उनमें किसी विशेष रिपोर्ट का हवाला नहीं दिया गया था। पूरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर टिप्पणी की गई थी। ऐसे में कोई कार्रवाई कर पाना संभव नहीं था। सरकार ने यह भी कहा था कि वह मीडिया की स्वतंत्रता की रक्षा करना चाहती है। इसलिए, उसके काम में बहुत दखल नहीं देती।

केंद्र सरकार की तरफ से पेश सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने बचाव करते हुए कहा कि कानूनन सरकार के पास झूठी और शरारतपूर्ण खबरों पर कार्रवाई की पर्याप्त शक्ति है। वह मसले पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करेंगे। इसके बाद कोर्ट ने मामले की सुनवाई तीन हफ्तों के लिए टाल दी।

पीठ मीडिया आउटलेट्स के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई कर रही थी, जो कथित तौर पर कोविड-19 संक्रमण पर तब्लीगी जमात को लेकर सांप्रदायिक प्रचार में लिप्त थे। पीठ ने केंद्र सरकार से केबल टीवी नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 के तहत ऐसे मीडिया आउटलेट के खिलाफ की गई कार्रवाई के बारे में पूछा था। जब मामला सामने आया, तो चीफ जस्टिस बोबडे ने पाया कि संघ द्वारा दायर हलफनामे में कानूनी व्यवस्था के बारे में कोई उल्लेख नहीं है और यह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर केबल टीवी अधिनियम की प्रयोज्यता के बारे में भी चुप है।

इस बिंदु पर, सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ  को सूचित किया कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामग्री विनियमन के लिए कोई नियम नहीं है। उन्होंने कहा कि केबल विभिन्न चैनलों के प्रसारण के लिए केवल एक माध्यम है। केबल टीवी अधिनियम प्रसारण के माध्यम के साथ काम कर रहा है, लेकिन प्रसारण को प्रतिबंधित करने के लिए अधिनियम के तहत एक शक्ति है। चैनलों को देखने के लिए एक समिति है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सामग्री को विनियमित करने के लिए केंद्र के पास पर्याप्त शक्तियां हैं, लेकिन वह प्रेस की स्वतंत्रता के मद्देनज़र अपने दृष्टिकोण में बहुत सतर्क है। पीठ ने कठोरता से टिप्पणी की कि यदि कोई तंत्र नहीं है, तो आप इसे बनाएं।

इससे पहले, 8 अक्तूबर को पीठ ने केंद्र को यह कहते हुए फटकार लगाई थी कि उसका हलफनामा तथ्यों में कमजोर है। इसके बाद, केंद्र ने सोमवार को एक नया हलफनामा दायर किया, जिसके बारे में अदालत ने आज भी असंतोष व्यक्त किया। चीफ जस्टिस बोबडे ने सॉलिसीटर जनरल को बताया कि पहला हलफनामा संतोषजनक नहीं था। बदले हुए हलफनामे में भी, केबल टीवी अधिनियम की कार्रवाई के बारे में कोई उल्लेख नहीं किया गया है। वर्तमान हलफनामे में वर्तमान कानूनी व्यवस्था के बारे में और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को लेकर केबल टीवी अधिनियम की प्रयोज्यता के बारे में भी कोई उल्लेख नहीं है।

दरअसल इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मनमानी क़ानूनी विवादों में फंसती जा रही है, क्योंकि इसकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष नहीं है, बल्कि केंद्र सरकार और एक पार्टी विशेष के एजेंडों के एंगल से हो रही है। इलेक्ट्रॉनिक  मीडिया पिछले कुछ महीनों से तब्लीगी जमात के सांप्रदायीककरण और कोरोना फैलाने के लिए जिम्मेदार बताए जाने, अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत और सुदर्शन टीवी के ‘यूपीएससी जिहाद’ शो के प्रसारण के संबंध में अपनी सामग्री के बारे में लगातार विवादों में है और न्यायपालिका में भी तमाम याचिकाएं लंबित हैं।

सुशांत सिंह राजपूत की मौत से संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए, बॉम्बे हाई कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर नियमन की कमी पर चिंता व्यक्त की थी और केंद्र सरकार से मीडिया ट्रायल की समस्या को नियंत्रित करने के लिए उचित उपायों पर विचार करने का आग्रह किया था। चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जीएस कुलकर्णी की पीठ ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया जैसी कोई वैधानिक नियामक संस्था क्यों नहीं है, जो प्रिंट मीडिया की देखरेख करती है।

चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता ने भारत के सहायक सॉलिसीटर जनरल अनिल सिंह से पूछा था कि प्रिंट मीडिया के लिए एक प्रेस परिषद है। सिनेमाघरों के लिए सेंसर बोर्ड है। आप इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए एक समान वैधानिक निकाय के बारे में क्यों नहीं सोच सकते? जस्टिस कुलकर्णी ने कहा था कि मीडिया को स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार है, लेकिन इसका इस्तेमाल दूसरों के अधिकारों का हनन करने के लिए नहीं किया जा सकता।

इससे पहले सुदर्शन टीवी के मामले में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने टिप्पणी की थी कि स्व-नियामक निकाय, नेशनल ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन एक ‘टूथलेस’ निकाय है। सुनवाई के दौरान पीठ ने अपने स्वयं के नियमों को लागू करने में ढिलाई पर एनबीए को फटकार लगाई थी।

पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें एक स्वतंत्र प्राधिकरण, ब्रॉडकास्ट रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के गठन की मांग की गई है, ताकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनलों को विनियमित किया जा सके और भारत में प्रसारण सेवाओं के विकास की सुविधा दी जा सके, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के दायरे में नहीं आता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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