Sunday, October 24, 2021

Add News

देश में ताकतवर और कमजोर के लिए अलग-अलग कानून व्यवस्थाएं नहीं हो सकतीं: सुप्रीम कोर्ट

ज़रूर पढ़े

उच्चतम न्यायालय के जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस हृषिकेश रॉय की पीठ ने कहा है कि देश में दो समानांतर लीगल सिस्टम नहीं हो सकता जो एक अमीर और शक्तिशाली और राजनीतिक पहुंच वाले लोगों के लिए हो और दूसरा संसाधन से वंचित आम आदमी के लिए। पीठ ने कहा कि ऐसी दोहरी और समानांतर व्यवस्था तो कानून की वैधता को ही नष्ट कर देगी। पीठ ने कहा कि स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र की बुनियाद है और उसमें किसी भी तरह का राजनीतिक दखल व दबाव नहीं होना चाहिए। स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका को तमाम राजनीतिक और अन्य तरह के बाहरी दबावों से मुक्त होना चाहिए। पीठ ने कहा कि राज्य मशीनरी की ड्यूटी है कि वह रूल ऑफ लॉ के प्रति समर्पित रहे। मध्य प्रदेश के दमोह में कांग्रेस नेता देवेंद्र चौरसिया की हत्या के मामले में पीठ ने मध्यप्रदेश  सरकार और उसकी पुलिस की खिंचाई की।

पीठ ने मध्यप्रदेश के दमोह स्थित एडिशनल सेशन जज पर एसपी और दूसरे पुलिस अधिकारियों की तरफ से दबाव बनाने के मामले को गंभीरता से लिया है। डीजीपी को पूरे मामले की एक महीने के भीतर जांच का आदेश दिया है। इसके साथ ही पीठ ने कांग्रेस नेता देवेंद्र चौरसिया की हत्या मामले में मध्यप्रदेश से बीएसपी विधायक रमाबाई के पति गोविंद सिंह की जमानत रद्द कर दी। यह देखते हुए कि मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने दर्ज किया था कि वह अपनी सुरक्षा को लेकर आशंकित हैं, पीठ ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को एएसजे के आरोपों की जांच करने के लिए कहा है।

पीठ ने गुरुवार को कहा कि जिला न्यायपालिका की स्वतंत्रता, रक्षा की पहली पंक्ति होने के नाते, न्याय प्रशासन के लिए आधारभूत है, और अगर नागरिकों के विश्वास को संरक्षित किया जाना है, तो जिला न्यायपालिका के प्रति “औपनिवेशिक मानसिकता” को बदलने की जरूरत है। यह स्वीकार करते हुए कि ट्रायल जज बहुत कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, पीठ ने जिला न्यायपालिका की रक्षा करने की आवश्यकता पर जोर दिया। यह देखते हुए कि निष्पक्षता न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आधारशिला है, यह देखा गया है कि यदि कोई न्यायाधीश किसी दबाव के आगे झुक जाता है, तो राजनीतिक दबदबे का खतरा बढ़ जाता है।

अधीनस्थ न्यायपालिका के प्रोटेक्शन पर जोर देते हुए पीठ ने कहा कि निष्पक्षता ज्यूडिशियरी का आधार है। ज्यूडिशियरी की स्वतंत्रता की अहमियत के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसका मतलब ये है कि किसी भी राजनीतिक दबाव या किसी भी बाहरी दबाव के बिना ज्यूडिशियरी का काम यानी बिना किसी बाहरी कंट्रोल के जज को स्वतंत्रता होनी चाहिए। ज्यूडिशियरी की स्वतंत्रता से मतलब है कि सीनियर के दबाव से भी स्वतंत्रता ताकि फैसले में किसी का कोई दखल न हो।

पीठ ने कहा कि संविधान के तहत न्यायपालिका का कार्य और उसकी शक्तियां अलग हैं। न्यायपालिका बिल्कुल स्वतंत्र होकर काम करे यही अवधारणा है। किसी भी बाहरी बाधा या दबाव के बिना ज्यूडिशियरी और जज काम करें और विवाद को सुलझाने में उन्हें सक्षम होना चाहिए और इसके लिए इस बात की जरूरत है कि जज स्वतंत्र रूप से काम करें। अनुच्छेद-50 में कहा गया है कि जिला न्यायपालिका स्वतंत्र है। इसके लिए जरूरी है कि जज स्वतंत्र तौर पर काम करें। अदालती कार्यवाही के दौरान ज्यूडिशियरी और एग्जीक्यूटिव के कार्य विभाजन का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। राजनीतिक दबाव और किसी भी बाहरी विचार व दबाव से ज्यूडिशियरी को स्वतंत्र होना चाहिए।

पीठ ने इस मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की तरफ से आरोपी गोविंद सिंह को दी गई जमानत के आदेश को निरस्त कर दिया। पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने लीगल सिद्धांतों का गलत इस्तेमाल किया है। पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने इस मामले में गंभीर गलती की है।

पीठ ने कहा कि एडिशनल सेशन जज ने 8 फरवरी 2021 को अपने आदेश के तहत ये संकेत देने की कोशिश की थी कि उन पर दबाव बनाया गया। जज ने कहा कि दमोह के एसपी और अन्य पुलिस अफसरों ने उन पर दबाव बनाने की कोशिश की थी। इस मामले में जज की आशंका के मामले की जांच की जाए। इसके लिए डीजीपी को निर्देश दिया गया है कि एक महीने के भीतर जांच की जाए। दरअसल दिवंगत कांग्रेस नेता देवेंद्र चौरसिया के बेटे और राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। फरार चल रहे आरोपी को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गिरफ्तार किया गया था।

पीठ चौरसिया के बेटे सोमेश चौरसिया की याचिका पर फैसला सुना रही थी जिसमें मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने जुलाई, 2019 में निर्देश दिया था कि जांच तीन महीने के भीतर यथासंभव पूरी की जा सकती है लेकिन 90 दिनों से अधिक में नहीं, जांच पूरी होने पर, यदि सिंह अपराध के गठन में शामिल पाया जाता है, तो उसे तुरंत हिरासत में ले लिया जाए और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाए। यह भी देखा गया कि न तो सिंह गवाहों और शिकायतकर्ता पक्ष को धमकी देंगे और न ही प्रभावित करेंगे। उच्च न्यायालय ने राज्य के अतिरिक्त महाधिवक्ता के बयान को ध्यान में रखते हुए सिंह की जमानत रद्द करने के लिए बेटे की याचिका का निपटारा किया था, कि राज्य सरकार सिंह की ओर से दायर एक आवेदन पर इस मामले की आगे जांच कर रही है, जिसमें कहा गया है कि उसे झूठा फंसाया गया है।

गौरतलब है कि आदेश के बाद से 2 साल तक सिंह को अदालत में पेश नहीं किया गया था। इसी साल फरवरी में सक्षम एएसजे ने उसकी गिरफ्तारी का वारंट जारी किया था। इसके बाद उक्त जज को एसपी व अन्य पुलिस अधिकारियों द्वारा धमकाया जा रहा था और इस संबंध में जिला जज से शिकायत की गई थी। पीठ ने हत्या की जांच पूरी करने में पुलिस की घोर विफलता पर फटकार लगाई, कि आरोपी वारंट जारी करने और उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बावजूद गिरफ्तारी से बच गया और राज्य ने आरोपी को सुरक्षा प्रदान की क्योंकि उसकी पत्नी विधायक है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

कर्नाटक की एक कोर्ट ने भगत सिंह की किताब रखने के देशद्रोह के आरोप से एक पत्रकार और उसके आदिवासी पिता को किया बरी

आप यदि आदिवासी हैं और शहीद भगत सिंह की किताब रखते हैं, पढ़ते हैं तो आप नक्सली जरूर होंगे।...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -