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बाबरी मस्जिद तोड़ने वाले षड़यंत्रकारियों को बरी करना संविधान और सामाजिक ढांचे पर एक और हमलाः दीपांकर

बाबरी मस्जिद तोड़ने के षड़यंत्र केस में सभी अभियुक्तों को बरी किए जाने पर भाकपा-माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा है कि षड़यंत्रकारियों को बरी करना भारत के सेक्युलर संविधान और सामाजिक ढांचे पर एक और हमला है। उन्होंने कहा कि मस्जिद की जगह को राम मंदिर ट्रस्ट को सौंपने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद आए इस फ़ैसले से घृणा-अपराधों से पीड़ित लोगों के लिए न्याय की आखिरी आशा भी समाप्त हो गई है। ये फ़ैसले घृणा-अपराधियों को प्रेरित करते हैं और उन्हें यक़ीन दिलाते हैं कि वे इन अपराधों के राजनीतिक और भौतिक लाभ बग़ैर किसी डर-भय के उठा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि अभियुक्तों में भाजपा के वरिष्ठ नेता एलके आडवाणी भी शामिल थे, जिन्होंने रथ-यात्रा निकालकर ठीक मस्जिद की जगह पर राम मंदिर बनाने की उन्मादी मांग को मुद्दा बनाया था। मस्जिद तोड़े जाने की बात इस मांग से ही जुड़ी हुई थी। इस रथ-यात्रा के साथ हिंदू-सर्वोच्चता के नाम पर मुसलमान-विरोधी हिंसा हुई, जिसमें बहुत से मुसलमानों को जान की क़ीमत चुकानी पड़ी। आडवाणी की नज़रों के सामने उनके द्वारा इकट्ठा किए गए समर्थकों की भीड़ ने औज़ारों का इस्तेमाल करते हुए मस्जिद तोड़ डाली। फिर भी, आडवाणी को अदालत ने बरी कर दिया है। असल में तो सीबीआई कोर्ट ने भाजपा द्वारा बोले जाते खुले झूठ को ही दोहराया है कि मस्जिद को तोड़ा जाना स्वतः स्फूर्त था, किसी योजनाबद्ध षड़यंत्र का परिणाम नहीं।

उन्होंने कहा कि मस्जिद तोड़ी जाते देखते हुए उमा भारती और मुरली मनोहर जोशी ख़ुशियां मना रहे थे, इसके वीडियो मौजूद हैं। उस वीडियो में वे मस्जिद तोड़े जाने में अपनी भूमिका का बखान कर रहे थे। फिर भी वे बरी हो गए। मुसलमानों के नरसंहार और बाबरी समेत और मस्जिदें तोड़ने का आह्वान करता साध्वी ऋतंभरा का ज़हरीला भाषण सार्वजनिक रिकार्ड है पर अदालत ने उन्हें भी बरी कर दिया है। उन्होंने कहा कि बाबरी मस्जिद तोड़ते हुए संघ और भाजपा के कार्यकर्ता चिल्ला रहे थे: ‘एक धक्का और दो!’। उन धक्कों का निशाना सिर्फ़ बाबरी मस्जिद ही नहीं बल्कि भारत का संविधान और हमारा सेक्युलर सामाजिक ताना-बाना भी था। सीबीआई अदालत का यह फैसला इसी ऋंखला में ‘एक और धक्का’ है।

उधर, रिहाई मंच ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में हाई कोर्ट द्वारा साक्ष्य के अभाव में सभी आरोपियों के बरी किए जाने के फैसले पर कहा कि यह मात्र निर्णय है न्याय नहीं है। रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के दृश्य को हजारों–लाखों लोगों ने प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से देश–विदेश में देखा था, इसके बावजूद देश की प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई करीब 28 साल बाद भी उस आपराधिक कृत्य के दोषियों की पहचान कर पाने में असमर्थ रही।

उसने बेशर्मी के साथ अदालत को अपने निष्कर्ष से अवगत कराया और पूरी तत्परता से हाई कोर्ट ने उसे स्वीकार कर देश के न्यायिक इतिहास में एक और काला पन्ना जोड़ दिया। यह पहला अवसर नहीं है जब इस तरह का निर्णय आया है। इससे पहले बथानी टोला जनसंहार समेत कई दूसरे मामलों में साक्ष्यों का अभाव कह कर अपराधियों को बरी किया जा चुका है। इससे यह भी जाहिर होता है कि बहुमत की सरकारों में जांच एजेंसियां न्याय के वृक्ष की जड़ में मट्ठा कैसे डालती हैं।

राजीव ने कहा कि बाबरी मस्जिद विवाद के मृतप्राय जिन्न को कांग्रेस की प्रचंड बहुमत की सरकार के कार्यकाल में बोतल से बाहर निकाला गया था। आज प्रचंड बहुमत की दूसरी सरकार में उसकी अन्त्योष्ठि कर दी गई। यह नहीं भूला जा सकता कि विध्वंस के समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और उत्तर प्रदेश में भाजपा का शासन था। केंद्र सरकार द्वारा भूमि को अधिगृहित कर लेने के बावजूद बाबरी मस्जिद की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी राज्य सरकार पर छोड़ दी थी बहरहाल आज के फैसले से दोनों गुनहगार तत्कालीन सरकारें बरी हो गईं।

आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (आईपीएफ़) ने कहा है कि बाबरी मस्जिद के मामले में आया फैसला बेहद दुर्भाग्यपूर्ण, जनतंत्रीय लोकतंत्र के लिए एक और धक्का और फासीवादी ताकतों का मनोबल बढ़ाने वाला साबित होगा। फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता एसआर दारापुरी ने कहा कि यहा यह भी दर्ज करने लायक है कि आईपीएफ़, सीपीएम, सीपीआई, और वीपी सिंह की अगुवाई वाले जनता दल ने दिसंबर, 1992 के  प्रथम सप्ताह में लखनऊ में बैठक करके उत्तर प्रदेश सरकार को लिखा था कि बाबरी मस्जिद गिरा देने की पूरी साजिश उत्तर प्रदेश सरकार के सक्रिय सहयोग से चल रही है और यदि उचित सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की गई तो निश्चय ही बाबरी म्सिजद गिरा दी जाएगी।

इसी अनुक्रम में 5 दिसंबर,1992 को सभी लोकतान्त्रिक, धर्मनिरपेक्ष और वाम ताकतों से अपील की गई थी कि वे लखनऊ पहुंचें और 5 दिसंबर को चारबाग से अयोध्या कूच करें, जिससे कि शांति और संप्रदायिक सद्भाव वाला वातावरण बनाया जाए और कथित कारसेवकों के हमले से बाबरी मस्जिद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की रक्षा हो सके। उन्होंने कहा कि तय कार्यक्रम के अनुसार चारबाग से अयोध्या के लिए मार्च किया गया। कल्याण सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, आईपीएफ राष्ट्रीय महासचिव अखिलेन्द्र प्रताप सिंह, सीपीआई नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री चतुरानन मिश्र, सीपीएम राष्ट्रीय नेता प्रकाश करात समेत सैंकड़ों नेता और कार्यकर्ताओं को बाराबंकी राम स्नेही घाट पर गिरफ्तार कर लिया गया था।

उन्होंने कहा कि यह भी बता दें कि बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के हज़ारों लोगों के जत्थे ने चारबाग स्टेशन पर जमे आईपीएफ कार्यकर्ताओं के ऊपर हिंसक हमला किया था, जिसे कार्यकर्ताओं ने बड़ी दिलेरी और सूझबूझ से विफल कर दिया था। तात्पर्य यह है कि बाबरी मस्जिद अनायास नहीं गिरा दी गई थी और इसके पीछे की गहरी साजिश पर पर्दा डालना लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है। आईपीएफ ने सीबीआई से मांग की है कि वह उच्चतम न्यायालय में पूरे साक्ष्यों के साथ अपील करे, जिससे लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने वाले गुनाहगारों को सजा मिले और न्याय हो सके।

लोक मार्चो ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सभी 32 अभियुक्तों को दोषमुक्त करने के फैसले को न्याय, कानून और संविधान की हत्या बताया है। लोकमोर्चा के संयोजक अजीत सिंह यादव ने कहा कि भाजपा-विहिप-आरएसएस के सभी शीर्ष नेता जो मस्जिद को ध्वस्त करने के आपराधिक कृत्य का मार्ग दर्शन कर रहे थे, उन्हें अदालत ने निर्दोष माना है तो सवाल उठता है कि क्या मस्जिद खुद ही अपने आप गिर गई।

उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया ने आरएसएस-भाजपा-विहिप के शीर्ष नेताओं को मस्जिद का विध्वंस कराते देखा, लेकिन अदालत द्वारा उन्हें बरी कर दिया गया। इससे जाहिर होता है कि अब भारत में न्याय, कानून और संविधान का शासन नहीं रह गया है और सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों ने संवैधानिक लोकतंत्र की सभी संस्थाओं को अपने कब्जे में ले लिया है। देश में संवैधानिक लोकतंत्र के होने पर प्रश्नचिन्ह लग गया है।

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This post was last modified on September 30, 2020 10:17 pm

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