Subscribe for notification

आलोचना पत्रिका के बहानेः बाजार और जंगल के नियम में कोई फर्क नहीं होता!

पांच दिन पहले ‘आलोचना’ पत्रिका का 62वां (अक्तूबर-दिसंबर 2019) अंक मिला। कोई विशेषांक नहीं, एक सामान्य अंक। आज के काल में जब पत्रिकाओं के विशेषांकों का अर्थ होता है कोरा पिष्टपेषण, एक अधकचरी संपादित किताब, तब किसी भी साहित्यिक पत्रिका का साधारण कविता, कहानी, आलोचनात्मक निबंधों, समीक्षाओं से तैयार किया गया ‘सामान्य’ कहलाने वाला अंक ही आज के गहरे वैचारिक गतिरोध के काल में पत्रिकाओं के लिए बची हुई न्यूनतम भूमिका का कहीं ज्यादा सही तरीके से पालन करता जान पड़ता है। इसकी बहुविधता कम से कम साहित्य जगत की एक छोटी सी तस्वीर तो पेश करती है। बाकी सब बातें बहुत हद तक निरर्थक कवायदें हो कर रह गई हैं। इसी वजह से हमने इस अंक की पूरी सामग्री को शुरू से अंत तक गंभीरता से टटोलने की कोशिश की।

इस अंक के ‘संपादकीय’ में आज के समय के बारे में इतिहास में प्रविष्टि की चिंता का रूपक मानव सभ्यता के स्वरूप पर महामारियों के प्रभाव की तरह के एक सभ्यता के विषय को बेहद हल्का बना देता है। मनुष्यों के लिए इस पर विचार के तमाम आयामों का अपना एक व्यापक परिप्रेक्ष्य है। एक सदी पहले ही स्पैनिश इंफ्लुएंजा में तकरीबन पांच करोड़ लोग मारे गए थे। प्रथम विश्व युद्ध और महामंदी के बीच के उस काल ने दुनिया की गति को किस प्रकार प्रभावित किया, इसे समाजवादी व्यवस्था के उदय से लेकर केंसवाद तक के अक्ष से समझा जा सकता है, और अब नवउदारवाद के अबाध दो दशकों के बाद 2008 के मेल्टडाउन से आंख मूंदे बैठी व्यवस्थाओं के लिए भी कोरोना का संदेश बहुत साफ है कि मानव समाज की किसी समस्या का निदान अनियंत्रित बाजार के पास नहीं है, बल्कि बाजार खुद सबसे बड़ी समस्या है। इसके नियम और जंगल के नियम में कोई फर्क नहीं होता है। जन कल्याण के कामों के प्रति अवहेलना का ही परिणाम है कि यह महामारी अमेरिका, इंग्लैंड से लेकर भारत तक के लिए एक भारी सर्वव्यापी त्रासदी का रूप ले चुकी है। दुनिया की जो भी सरकार, वह महाबली ट्रंप की हो या बहुरूपिया मोदी की, इसके संदेश को सुनने से इंकार करेगी, वह सिर्फ और सिर्फ भारी तबाही का सबब बनेगी, और उसके लिए इतिहास का कूड़ाघर प्रतीक्षा कर रहा है।

अंक का प्रारंभ लाल्टू की कविता ‘मुंशीगंज की वे’ से होता है। वेश्याओं की एक बस्ती के जीवन का इसमें एक ऐसा प्रकृतिवादी चित्र है, जिसकी त्रासदी में जैसे अपने कोई द्वंद्व नहीं है। कोई उन पर रोये, यह उनका निजी मामला है। “उनका हर दिन एक जंग है ऐसा कवि सोचते हैं, पर ऐसा कुछ होता नहीं था।” प्रकृतिवाद और त्रासदी का अस्तित्व साथ-साथ, इसी पर इस कविता की पूरी नाटकीय संरचना खड़ी है।

दूसरी कविता है हिंदी की प्रसिद्ध कहानी ‘दाज्यू’ के लेखक शेखर जोशी की। उनकी कविता को देखना सुखकर था, कि वे आज भी सक्रिय हैं और पहाड़ों और फौज के जीवन के चित्रों को अपने अंदर वैसे ही संजोये हुए हैं। फर्क यह है कि बढ़ती हुई उम्र ने उनके दाज्यू के भाव बोध को ‘भुला’ (अनुज के लिए संबोधन) में बदल दिया है। सचमुच, मानव मनोविज्ञान के आयामों पर उस समय तक कोई चर्चा संभव नहीं है जब तक उसके अवचेतन के पहलू को नहीं समझ लिया जाता है, जिसमें स्मृतियां एक बहुत बड़ी जगह घेरे रहती हैं।

इसके साथ ही इस अंक में शुरू होती है लेखों और टिप्पणियों की श्रृंखला।

नामवर सिंह पर पंकज कुमार बोस का लेख ‘दूसरी परंपरा के नामवर सिंह: खोज के कुछ बिंदु’ में परंपरा के इस अध्यापकीय जंजाल के बारे में किसी विशेष पहलू को तो उजागर नहीं किया गया है पर वे इस एक जरूरी बात को जरूर रख पाए हैं कि साहित्य और ज्ञान के क्षेत्र में विचारकों के बीच मतभेदों को खेमेबाजी के नजरिये से नहीं देखा जाता है। यह अकादमिक दुनिया से उत्पन्न अध्यापकों का दिया हुआ रोग है, जिसमें विचारशीलता को पक्षधरता/खेमेबंदी  से स्थानापन्न किया जाता है। यह छात्रों के लिए विश्वविद्यालीय शोधों की सफलता का एक सबसे सरल नुस्खा है- वर्गीकरण का एक और सूत्र- जो पीढ़ियों तक संक्रमित होता रहता है।

स्वयंप्रकाश पर पल्लव का लेख एक श्रद्धांजलि लेख है, जिसकी अपेक्षित सीमाओं में भी किसी पूर्व-निश्चित ढांचे की जकड़न में दम तोड़ती कहानी की बात कही गई है। किस्सागोई का कोई भी फार्मूलाबद्ध जड़ ढांचा रचना से उसके स्वत्व को हर लेता है।

‘विचार’ स्तंभ में कवयित्री शुभा की एक छोटी सी टिप्पणी है, ‘अधूरी बातें’, जिसमें प्रसंग तो कई हैं, पर शीर्षक के अनुरूप ही हैं, सब आधे-अधूरे। वे मांग करती हैं कि ‘समय का सांचे में ढलना जरूरी है और उसकी शिनाख्त करने वाले का होना भी’। हम नहीं जानते कि जीवन और प्रकृति के किस रूप में समय नहीं होता। जो अभी अदृश्य है, दृष्ट होने को है, उस अदृश्य-दृष्ट के खेल में जरूरत है एक सचेत भूमिका अदा करने की। वे कहती हैं, “सबसे ज्यादा अलगाव होता है ट्रेड यूनियन लीडर का तो हिसाब-किताब देखता है पर श्रमिक का सौंदर्य नहीं देख पाता।”

कम्युनिस्ट घोषणा पत्र का एक बहुत प्रसिद्ध कथन है, पूंजीवाद के युग में “सभी स्थिर और जड़ीभूत संबंध, जिनके साथ प्राचीन और पूज्य पूर्वाग्रहों और मतों की एक पूरी श्रृंखला होती है, मिटा दिए जाते हैं, और सभी नये बनने वाले संबंध जड़ीभूत होने के पहले ही पुराने पड़ जाते हैं। जो कुछ भी ठोस है वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है, वह भ्रष्ट हो जाता है, और आखिरकार मनुष्य संजीदा नजर से जीवन की वास्तविक हालातों को, मानव जीवन के आपसी संबंधों को देखने के लिए मजबूर हो जाता है।” यह है मनुष्य के चित्त पर पूंजीवाद वह प्रभाव, जो अंततः जीवन के ‘आपसी संबंधों’ को सभी प्रकार के ‘पूज्य पूर्वाग्रहों’ अर्थात रूढ़ियों से मुक्त करके मनुष्य को इन संबंधों को ‘संजीदा नजर’ से देखने के लायक बनाता है।

बहरहाल, शुभा ने इस टिप्पणी में ‘पत्थर’ और ‘स्मृति’ को अपना विशेष उपादान बनाया है। यथार्थ और इतिहास की सीमा स्मृति की अपनी सीमा है। जैसे भाषा की भी सीमा है। वह मनुष्य के जीवन के तमाम आयामों को अपने में नहीं समेट सकती है। जीवन का व्यवहार, जो किसी मान्य दस्तूर की तरह जारी रहता है, संकेतकों की किसी श्रृंखला में उकेरा नहीं जा सकता है। यह व्युत्पत्ति और संरचना का तनाव है। पत्थर भी व्युत्पत्ति की एक संभावना है।

जो भी हो, इसके बाद आती है मनमोहन की ‘डायरी का अंश’। कुछ तत्त्वमीमांसक प्रकार की टिप्पणियों से संवलित अंश। दरअसल तत्त्वमीमांसक टिप्पणियां तभी कुछ अर्थवान होती है जब वे सुपरिभाषित धारणाओं पर टिकी होती हैं। मसलन इन टिप्पणियों के स्वरूप से यह सवाल पैदा होता है कि लेखक का ‘यथास्थिति’ से तात्पर्य क्या है, ‘जड़ता और खोल’ से किस बात को इंगित किया जा रहा है। ‘प्रतिक्रिया’, ‘प्रतिरोध’, ‘वर्चस्व’, ‘शासक राजनीति’ की तरह के अति-परिचित शब्द भी यहां एक भिन्न स्तर की मीमांसा की मांग करते जान पड़ते हैं।

गंभीर सवालों से विखंडन की रोशनी में किसी भी साहित्यिक पाठ की ‘आकर्षक’ जटिलता के साथ ही कैसे पूरा पाठ ही हवा में कहीं विलीन हो जाता है, इसे शायद अलग से कहने की जरूरत नहीं है। मनस्तात्विक आधार पर देखें तो जिसे आप यथास्थिति कहते हैं, वह आपके अंदर ही ‘अन्य का क्षेत्र’ होता है, आपका भी एक जरूरी, प्रत्यक्ष का ज्ञान कराने वाला अंश। प्रत्यभिज्ञा दर्शन का वह प्रत्यक्ष जिसके अनुसंधानमूलक निरूपण पर ही यथार्थ का आपका ज्ञान आश्रित होता है।

बहरहाल, अंक में इसके आगे हैं, प्रवीण कुमार की कहानी। कहानी के प्लाट, उसके चरित्र के बारे में किसी भी क्लीशे, घिसेपिटेपन से पैदा होने वाली रचनात्मक समस्या से जुड़ी कहानी। पर अंततः यह कहानी भी एक क्लीशे से दूसरे क्लीशे के बीच डोलने की मजबूरी लिए हुई है। वजह, रचना का स्रोत जीवन का ठोस यथार्थ नहीं, बल्कि कुछ अवधारणाएं ही हैं। पर कहानी की बुनावट सही बनी है।

‘आलेख’ में बजरंग बिहारी तिवारी के लेख को अधिक से अधिक शूद्रक के नाटक ‘मृच्छकटिक’ में न्याय के पहलू को दर्शाने वाला एक लेख तो कहा जा सकता है, पर साहित्य मात्र का अर्थ सिर्फ न्याय की बात है, ऐसी समझ का कोई तुक नहीं है। क्रौंच के शोक का श्लोक रूप काव्य की आत्मा के रूप में शोक के स्थायीभाव का करुण रस से प्रवाहित वह स्वरूप है जिसे ध्वन्याकार चर्वणा के योग्य कहते हैं। चर्वणा की गणना विभाव और अनुभाव के बीच की जाती है। साहित्य में इस चर्वणा की ही अभिव्यक्ति होती है। “प्रमाणों के व्यापार के समान उसका ज्ञापन नहीं होता है और न हेतु के व्यापार के समान उसकी उत्पत्ति होती है।” (अतश्र्चर्वणात्राभिव्यञ्जनमे, न तु ज्ञापनम्, प्रमाणव्यापारवत्। नाप्युत्पादनम् हेतुव्यापारवत् ) शोक मुनि का नहीं, क्रौंच का है। रचना लेखक की चर्वणा से, अनुभूति के विश्लेषणात्मक निरूपण के संकेतों, शब्द व्यापारों से बनती है, किसी प्रकार के शुद्ध ज्ञान या न्यायबोध मात्र से नहीं।

कहना न होगा, एक शास्त्रीय संस्कृत नाटक के आधार पर इस लेख में की गई यह साहित्य चर्चा किसी गंभीर विमर्श की मांग नहीं करती है।

पंकज झा का लेख है- ‘इतिहास, सत्ता और साहित्य: मध्यकालीन परिप्रेक्ष्य में’। सब जानते हैं कि ज्ञान मीमांसा के समग्र क्षेत्र में सत्ता का विषय एक केंद्रीय स्थान ले चुका है। इतिहास के कालक्रम में अन्तरनिहित निरंतरता का यह एक केंद्रीय तत्व है। मिशैल फुको का प्रसिद्ध कथन है, “लगता है जैसे विचार, ज्ञान, दर्शन, साहित्य का इतिहास अधिक से अधिक दरारों को देखने और खोजने की कोशिश करता है जबकि खुद इतिहास की भूमिका स्थिर विन्यासों की तलाश में परिवर्तनकारी विस्फोटों को अस्वीकारने की लगती है। …इतिहास का काम दस्तावेजों को स्मारकों में बदलने का होता है।” ऐसे में इतिहास और सत्ता को खास तौर पर साहित्य से जोड़ कर देखने के लिए स्वाभाविक है कि पहले साहित्य की प्रकृति की विशेषता को सामने लाया जाए। इसके लिए पंकज झा ने टेरी ईगलटन के एक उद्धरण का प्रयोग किया है।

उनका ही कहना है कि “कोई भी साहित्यिक पाठों के बारे में तब तक कोई राजनीतिक या सैद्धांतिक प्रश्न नहीं उठा सकता है, जब तक उसमें उनकी भाषा के प्रति एक खास संवेदनशीलता न हो। …साहित्य के छात्र आम तौर पर जो भूल करते हैं वह यह है कि वे सीधे इस बात पर चले जाते हैं कि इस कविता अथवा उपन्यास में क्या कहा गया है, इसे दरकिनार कर देते हैं कि वह कैसे कहा गया है। …साहित्यिक कृति वह है जिसमें जो कहा गया है उसे कैसे कहा गया है के रूप में लिया जाना चाहिए।” (Terry Eagleton, How to read literature, page ix–4)

कहना न होगा, ईगलटन का यही कथन इतिहास की सामग्री के रूप में साहित्य की सीमित उपयोगिता बताने के लिए भी काफी है। बजरंग बिहारी तिवारी के लेख के इसी मूलभूत दोष के चलते हमने ऊपर साहित्य में स्थायी भावों की चर्वणा की उद्दीपक अभिव्यक्ति पर बल दिया था। जैसे सत्ता को उसके विमर्श की भूमि से अलग करके विवेचन का विषय नहीं बनाया जा सकता है, उसी प्रकार साहित्य भी विवेचन के लिए किसी को भी अपनी भूमि पर आमंत्रित करता है। तुलसी हो या कबीर, सिर्फ अपने कथित प्रतिक्रियावादी अथवा क्रांतिकारी वक्तव्यों के बल पर साहित्य में अपना स्थान नहीं बनाए हुए हैं।

बहरहाल, आगे बढ़ते हुए हम डॉ. रामविलास शर्मा पर कृष्णदत्त शर्मा के लेख पर आते हैं। रामविलास जी के समग्र व्यक्तित्व को निरूपित करने वाला यह एक बहुत अच्छा लेख है। डॉ. शर्मा ने परिवर्तन मात्र के सिद्धांत के रूप में मार्क्सवाद के शाश्वत सत्य को अंगीकार किया था और यही वजह है कि नई-नई दिशाओं में अपनी तमाम शोध यात्राओं के बीच एक प्रकार की संगति बनाए रखने के लिए वे जीवन की अंतिम घड़ी तक अथक रूप से जूझते रहे। पोलेमिक्स विचार जगत के द्वांद्विक सच का ही दूसरा नाम है, जिसके अभाव में कोई भी विद्वान ‘विचार के अंत’ के अलावा किसी दूसरे गंतव्य तक नहीं पहुंच सकता है, लेकिन इसका अर्थ कतई किसी प्रकार की खेमेबाजी नहीं होता। पोलेमिक्स के अभाव और शुद्ध खेमेबाजी से पटे पड़े अकादमिक जगत में इसके अघटन की तमाम कहानियों को कोई भी देख सकता है।

आलोचना के आलोचकों का काम पोलेमिक्स की दिशा पर नजर रखने का होता है। डॉ. शर्मा की पोलेमिक्स में किसी सर्वकालिक सत्य की तरह काम कर रहे मार्क्सवाद ने उन्हें अपने प्रकार से हमेशा भारत की जनता की क्रांति की समस्याओं से जोड़े रखा और यही एक बात उन्हें अन्य सभी से अलगाती है। जरूरत है उन्हें इस आधार पर शुक्ल जी से भी अलग करने की जिनकी पोलेमिक्स लोक के नाम पर पूरी तरह से प्रतिक्रियावादी थी, जो विद्वानों के विचार में अंतःसादृश्यता को नहीं, अन्तर्विरोधों को दर्शाता है। शुक्ल जी और डॉ. शर्मा को सिर्फ उनके लेखन की पोलेमिकल प्रकृति के कारण एक कोष्ठक में नहीं रखा जा सकता है। कृष्णदत्त जी ने अपने लंबे लेख में डॉ. शर्मा की पंक्ति में ही नामवर सिंह और मुक्तिबोध को रख कर एक सही दृष्टि का परिचय दिया है। कृष्णदत्त जी ने रामविलास शर्मा रचनावली का संकलन किया है जो शीध्र ही राजकमल प्रकाशन से आने वाला है।

‘आलोचना’ के इस अंक का एक बहुत दिलचस्प शोधपरक लेख है रतन लाल का “‘मनस्ताप’ बनाम ‘कैफियत’: रामचंद्र शुक्ल का माफीनामा और काशीप्रसाद जायसवाल”। सचमुच बहुत कुछ कहने वाला और एक मंच पर आदमी की तुच्छताओं के प्रदर्शन से काफी हंसाने वाला। काशीप्रसाद जायसवाल के खिलाफ चलाए गए पूरे अभियान और अंत में जायसवाल के प्रति शुक्ल जी के मनस्ताप की पूरी कहानी प्रकाशित उस काल के हिंदी के बौद्धिक प्रभुओं की मनोदशा का यह चित्र बहुत मानीखेज है।

इस 166 पृष्ठों के अंक के अंत में मणि कौल के सिनेमा पर जवरीमल्ल पारख का लेख है, चित्र कला पर मनोज कुलकर्णी की टिप्पणी और कुछ सद्य प्रकाशित पुस्तकों की समीक्षाएं हैं।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक, चिंतक और स्तंभकार हैं। आप कोलकाता में रहते हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on October 1, 2020 1:43 pm

Share