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देश रो रहा है प्याज के आंसू, नीतीश सरकार के भी डूबने का खतरा!

कानपुर में प्याज का खुदरा मूल्य, आलोक दलईपुर 80 रुपये किलो बता रहे हैं, वहीं गुरुवयूर जिला त्रिसूर केरल से सुरेंद्रन अप्पू को प्याज 120 रुपये किलो मिल रहा है। पिछले तीन दिनों के सोशल मीडिया के जरिए किए गए सर्वेक्षण में देश के विभिन्न शहरों में प्याज की कीमतों में लगातार बढ़ोत्तरी देखी जा रही है, जबकि इस दौरान नवरात्रि के अवसर पर प्याज, लहसुन एवं मांस-मछली का सेवन भारी संख्या में हिंदू समुदाय में वर्जित है।

हल्द्वानी से विजय 60 रुपये किलो, पटना से संतोष चंदन 80 रुपये तो लखनऊ से सत्यम वर्मा जी ने फ्रेस्को से पांच किलो प्याज का रेट 369 रुपये अर्थात 75 रुपये किलो की फोटो ही चस्पा कर दी थी। हल्द्वानी से बची सिंह बिष्ट जी ने 70 रुपये तो मसौढ़ी पटना से श्रीकांत सिंह ने 60 रुपये, छत्तरपुर एमपी से निदा रहमान 80, उन्नी अरुमाला ने चंडीगढ़ से 60, सुलतानपुर यूपी से कृष्णा खालिद ने 80, बोधिसत्व मुंबई से 60 रुपये, बारमेर राजस्थान से गोविंद कुरुदिया ने 50, कोटद्वार से मुजीब नैथानी ने 50 वहीं दीप मोहन नेगी ने इसे 60 रुपये किलो बताया है।

बिलासपुर छत्तीसगढ़ से संदीप डे 80, बलिया यूपी से स्वर्ण सिंह 60, रांची से विक्रम आजाद 70, बनारस से जलेश्वर जी ने 60 रुपये, गाजियाबाद से राजेश वर्मा 60, देहरादून से त्रिलोचन भट्ट और रामनगर, उत्तराखंड से हरीश अधिकारी ने 80 रुपये, जमशेदपुर से गौतम सामंत 70, लखनऊ से अभिषेक चौहान भी 70 रुपये किलो की खरीद बता रहे हैं। साहिल ने मोतिहारी और गुडगांव दोनों जगह इसे 60 रुपये किलो बताया है। वहीं अहमदाबाद, गुजरात से पत्रकर कलीम सिद्दीकी 70, संतोष साहू लखनऊ से 60 तो लखनऊ से ही बाबर नकवी इसे 50-65 रुपये किलो जबकि नवीन कुमार 70 रुपये किलो बताते हैं।

हाजीपुर बिहार से हेमंत अहीर और इलाहबाद से सत्येंद्र वीर यादव ने इसे 60 रुपये किलो, शहडोल एमपी से परवेज अहमद तो अपने यहां 100 रुपये किलो, पटना से ध्रुव नारायण 60, नोएडा से प्रशांत कुमार 60, देहरादून से बेनु बबली तिवारी और ज्योति गुप्ता को प्याज दो दिन पहले तक 50 रुपये किलो के भाव से बाजार से मिल रहा था। सर्वे में सेंट पीटर्सबर्ग से गौतम कश्यप जी ने जो आंकड़े दिए हैं वे चौंकाने वाले हैं। उनके अनुसार, “रूस के सेंट-पीटर्सबर्ग शहर में प्याज़ की क़ीमत 14 रुपये प्रति किलो (भारतीय मुद्रा में) यहां एक साल में प्याज़ की क़ीमत अधिकतम 27 रुपये किलो गई है।”

ये सभी कीमतें दो दिन पहले की हैं, जिसमें इस बीच लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। आज शनिवार को इंडियन एक्सप्रेस ने भी प्याज को लेकर लीड स्टोरी की है, जिसमें एक तरफ जहां प्याज की कीमतों में नियंत्रण के सरकारी प्रयासों के बारे में बताया गया है तो वहीं दूसरी ओर प्याज के आयात को लेकर नियमों में छूट देने की बात कही गई है। अपने लेख में एक्सप्रेस ने दामों में लगी आग और इसे कैसे रोका जा सकता है के बारे में विवेचना की है।

ज्ञातव्य है कि पिछले महीने ही केंद्र की बीजेपी सरकार ने बड़े जोरशोर के साथ कृषि अध्यादेश लाने के बाद फटाफट तीन बिलों को संसद के दोनों सदनों में पारित करवा लिया, जिसमें से राज्यसभा में विपक्ष का दावा है कि सरकार ने अल्पमत में होते हुए भी सदन में मुहंजबानी हां, न को बिल की स्वीकृति बताकर पास करा डाला और राष्ट्रपति ने झट अनुमोदन कर दिया, जबकि पंजाब और हरियाणा के किसान पिछले तीन हफ्तों से इसके खिलाफ जगह-जगह धरना प्रदर्शन और रेल रोको आंदोलन चला रहे हैं। पंजाब ने अपने राज्य में इन तीनों बिलों के खिलाफ प्रस्ताव एवं संशोधन तक पारित करा लिया है, जिसमें विपक्ष तक ने उसका विरोध नहीं किया है।

गनीमत की बात यह है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के तहत जिन चुनिंदा खाद्य पदार्थों को फिलहाल नहीं हटाया गया है उसमें प्याज भी शामिल है। इसमें प्याज के अलावा आलू, खाद्य तेल और दालें शामिल हैं, और सरकार को इस बीच इसके स्टॉक करने पर रोक लगाने संबंधी आदेश देने पड़े हैं। सोचिये यदि प्याज भी कंट्रोल से बाहर होते तो आज बड़े-बड़े व्यापारियों का सरकार क्या बिगाड़ लेती, या निर्यात की स्थिति में यदि विकसित देश 200 रुपये किलो प्याज की मांग कर रहे होते तो देश को प्याज भी देखने को नसीब होता या नहीं?

प्याज की फसल इस बार खरीफ के सीजन में कर्नाटक में अत्यधिक बारिश की भेंट चढ़ चुकी है, और महाराष्ट्र तक में प्याज की फसल 50% से अधिक चौपट हो चुकी है। एक्सप्रेस की खबर के अनुसार सितंबर माह में कर्नाटक की प्याज की आवक होती है, जबकि महाराष्ट्र से यह फसल अक्टूबर में बिकने के लिए तैयार हो जाती थी। फसल चक्र में इस व्यवधान के कारण जो भी प्याज उपलब्ध है वह रबी के सीजन की है, और नए प्याज की आवक न होने से दामों में आग लगती जा रही है। अपने आंकड़ों में एक्सप्रेस ने खाद्य एवं प्रसंस्करण मंत्रालय के हवाले से 23 अक्तूबर 2020 के विभिन्न प्रमुख शहरों के आंकड़े इस प्रकार से दिए हैं: दिल्ली 58 रुपये किलो, मुंबई 97, चेन्नई 83, कोलकता 80 रुपये किलो।

इस बीच सरकार ने पहली बार 14 सितंबर को हरकत में आते हुए प्याज के निर्यात पर रोक लगाने का काम किया था। प्याज के स्टॉक पर भी नियंत्रण के संबंध में सरकार ने जो गाइडलाइन जारी की हैं, उसके अनुसार बड़े स्टॉकिस्ट अब 25 टन तक ही प्याज को स्टॉक कर सकते हैं, जबकि खुदरा व्यापारियों के लिए यह लिमिट 2 टन तक की कर दी गई है। इस बीच प्याज के आयात को लेकर भी सरकार ने कदम उठाए हैं और ईरान सहित अन्य देशों से प्याज की खरीद की जा रही है।

ऐसा अनुमान है कि ईरान से आने वाली प्याज की भारत में पहुंच की कीमत 35 रुपये किलो के करीब है, जो बाकी सभी खर्चों के मद्देनजर रिटेल में 45-50 रुपये किलो तक आ सकती है, लेकिन प्याज की यह किस्म भारतीय प्याज से भिन्न है। दिल्ली की सफल सहकारी सब्जी की दुकानों में इस प्रकार की प्याज मिल रही है, और सूत्रों के अनुसार इसका साइज़ इतना बड़ा है और छिलका इतना मोटा है कि एक किलो प्याज में 200 ग्राम बर्बाद हो जा रहा है। लिहाजा इसकी खपत रेस्तरां और होटलों में ही होने की अधिक संभावना है।

पिछले हफ्ते आन्ध्र, तेलंगाना, कर्नाटक और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में भारी बारिश ने प्याज सहित टमाटर की फसल को कितना नुकसान पहुंचाया है, अभी इसका अंदाजा नहीं लगाया गया है। अनुमान है कि सरकार द्वारा प्याज की आवाक के बावजूद दामों में कमी के कोई भी संकेत नवंबर के अंतिम हफ्ते से पहले नहीं हैं। इसके साथ ही लंबी अवधि तक चलने वाले टमाटर की फसल भी आंध्र, तेलंगाना इलाके से यदि बर्बाद होती है तो प्याज की तुलना में टमाटर में जो आग लगने वाली है उसकी आंच बिहार, मध्य प्रदेश के चुनावों में भी देखने को मिल सकती ही।

असल में ये सब सरकारी कवायद के पीछे इन चुनावों की भी काफी अहम् भूमिका है। हालांकि बिहार की जनता प्याज, आलू और टमाटर की बढ़ती कीमतों की तुलना में अभी बेरोजगारी और बुनियादी जरूरतों एवं शिक्षा स्वास्थ्य और सड़क की बदहाल स्थिति से ही आगे नहीं सोच पा रही है, लेकिन यह अवश्य देखना होगा कि शहरी मतदाताओं के दिमाग में कहीं न कहीं फटी जेब में महंगाई ने भी इस बीच भारी सेंध लगाने का काम किया है। बिहार और मध्य प्रदेश में होने वाले चुनावों में कहीं न कहीं प्याज और टमाटर खून के आंसू रुला सकता है, यह देखना दिलचस्प होगा।

साथ ही किसान भी इस बारे में अवश्य पुनर्विचार कर रहा होगा कि दाम जब गिरने लगते हैं और टमाटर प्याज की कीमत 1-2 रुपये हो जाती है तो सरकार के पास उनका हाल लेने का वक्त क्यों नहीं होता। वहीं जब लासलगांव में पिछले हफ्ते प्याज 70 रुपये किलो हो जाती है तो सरकार तुरतफुरत दुनियाभर से आयात के लिए क्यों दौड़ने लगती है? इस बात को याद रखना चाहिए कि किसान को फसल के उचित दाम मिलें, इसे सुनिश्चित करने के लिए जब सरकार को ही चिंता नहीं होती, जिसे पांच साल में एक बार उनके दरवाजे पर वोटों की भीख मांगने के लिए मजबूर होना पड़ता है तो अच्छे दाम बड़े-बड़े निजी पूंजीपति भला क्यों देने लगे? जिनका पहला और आखिरी धर्म ही देश या देशवासियों की समृद्धि के बजाय निजी उन्नति एवं इसके लिए दुनिया के किसी भी स्टॉक मार्केट में झट से भाग जाने की खुली छूट हासिल है?

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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This post was last modified on October 24, 2020 2:43 pm

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