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Wednesday, September 29, 2021

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महिलाओं और दलितों की दुर्दशा प्रशासनिक विफलता नहीं, सत्ता की राजनीतिक सफलता है: शैलेन्द्र शैली व्याख्यान में संध्या शैली

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शैलेन्द्र शैली स्मृति व्याख्यान 2021 में बोलते हुए अखिल भारतीय जनवादी की केंद्रीय कार्यकारिणी सदस्य सुश्री संध्या शैली ने अनेक संवैधानिक प्रावधानों और संरक्षणों के बावजूद महिलाओं और दलितों पर बढ़ते अत्याचारों की वजहें गिनाई।

मध्यप्रदेश में दलितों और महिलाओं के साथ हुए अत्याचारों की कोई दर्जन भर ताज़ी घटनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि महिलाओं पर अत्याचार केवल लैंगिक ही नहीं होते हैं बल्कि एक खास सामंती महिला विरोधी विचारधारा को व्यवहार में लाया जा रहा होता है। इसी तरह दलितों का उत्पीड़न भी उसी विचारधारा के अभिषेक के लिए होता है। इसके लिए सिर्फ प्रशासनिक अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराने को अधूरा और अपर्याप्त बताते हुए उन्होंने कहा कि जब सरकार की ही मंशा कानूनों के सही क्रियान्वयन की नहीं होती तो बनावट से ही दमनकारी और प्रशिक्षण से निरंकुश बनाई गयी। नौकरशाही भी उन्हें लागू करने में दिलचस्पी नहीं लेती। अति उच्च वर्णीय सोच, महिला विरोधी सोच का प्रतिनिधित्व करने वाली सरकार यदि सत्ता में रहेगी तो प्रशासन क्यों संवेदनशील होगा। इस संबंध एससी/एसटी एक्ट को लेकर हुए आंदोलन में ग्वालियर, मुरैना और चम्बल में दलितों की हत्या और उन्हें जेल में डालने की कार्यवाहियों का हवाला भी उन्होंने दिया और कहा कि इन पर हुए अत्याचारों को अनदेखा किया जाना, झूठे मुकदमे हटाने और असली हत्यारों दोषियों को पकड़े जाने के लिए बाद में आयी कांग्रेस सरकार ने भी कुछ नहीं किया।

उन्होंने कहा कि उत्पीड़न कई तरह से होता है। जेंडर बजट का न बनना, महिला कर्मचारियों, मजदूरों, योजना कर्मियों की परेशानियों की ओर ध्यान नहीं देना भी भाजपा की आरएसएस नियंत्रित नीति का परिणाम है। यहां स्थिति इतनी ख़राब है कि एक दलित आईएएस अफसर भी रो पड़ती है, लेकिन उसकी परेशानियों और शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। धर्मातरण कानून, लव-जिहाद के नाम से खुद की इच्छा से शादी न कर सकने वाला कानून, ऐसे कानून जो एक नागरिक की धार्मिक आज़ादी की उसे संविधान ने दी हुयी गारंटी पर हमला करते हैं और अब उत्तर प्रदेश का जनसंख्या नियंत्रण संबंधी विधेयक लाकर वह नागरिकों से उनके बुनियादी अधिकार भी छीन लेना चाहती है।

मध्यप्रदेश की भयावह स्थिति का एक और उदाहरण देते हुए संध्या शैली ने बताया कि कोविड महामारी के पिछले दो सालों में मध्य प्रदेश में बड़ी संख्या में लड़कियां शिक्षा से बाहर हो गयी हैं। इतना ही नहीं एक ओर कोविड के कठोर कानून लोगों को अपनी जरूरत के लिये बाहर निकलने पर भी रोक रहे थे, वहीं दूसरी ओर बच्चों की तस्करी का अपराध भी आराम से चल रहा था। जनवरी से जुलाई 2020 के बीच मानव तस्करी रिकॉर्ड संख्या में हुयी। इस दौरान मध्य प्रदेश में 5,446 बच्चे तस्करी का शिकार हुये जिनमें से 80 प्रतिशत यानि 4,317 लड़कियां थीं।

उन्होंने कहा कि भाजपा और आरएसएस तय करके बैठे हैं कि कितना भी प्रतिरोध हो वे महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, मजदूरों, किसानों के खिलाफ नीतियां लागू करते रहेंगे यही अंतर है इस सरकार में और पूर्व की सरकारों में। इसकी ख़ास वजह की क्रोनोलॉजी याद दिलाते हुए संध्या शैली ने कहा कि आरएसएस शुरू से ही भारत के नए संविधान के खिलाफ तथा मनुस्मृति लागू करने के पक्ष में रहा। अब सरकार में आने के बाद वह उसी दिशा में चल रहा है। इस देश के संविधान को तोड़ने मरोड़ने का  कोई भी मौक़ा भाजपा नहीं छोड़ रही है। उन्होंने याद दिलाया कि डॉ. अंबेडकर ने उसी वक्त कहा था कि “संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो यदि उसे लागू करने वाले शासक अच्छे नहीं होंगे तो इस संविधान को खत्म होते समय नहीं लगेगा।” आज यही हो रहा है। भारत जैसे समाज में जहां न सामाजिक लोकतंत्र है न पारिवारिक लोकतंत्र, वहां यह काम और आसान हो जाता है।

उन्होंने कहा कि जनतांत्रिक सोच का समाज एक आगे बढ़ा हुआ समाज होता है और यह अपने आप नहीं बनता उसे सायास गढ़ना पड़ता है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका सरकार की होती है, क्योंकि यह एक राजनैतिक कवायद होती है। दुनिया के अनेक समाज इस काम को कर रहे हैं; अमरीका तक में यदि जॉर्ज फ्लॉएड जैसी जघन्य घटनायें घटती हैं तो वहां का सारा पुलिस बल घुटनों पर बैठ कर देश की जनता से माफी भी माँगता है।

इसलिए यह समझने की आवश्यकता है कि देश की महिलाओं और दलितों की दुर्दशा सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं है यह सत्ता में बैठे मनुवादियों की राजनीतिक सफलता है- जो इसलिए और सांघातिक हो जाती है क्योंकि इसमें कारपोरेट भी शामिल हो जाता है।

इसलिये लड़ाई केवल प्रशासनिक विफलता या हिंदुत्व से नहीं बल्कि उस कार्पोरेटी पूंजीवादी निजाम से भी है जो हिंदुत्व को साथ में लेकर प्रशासकों की पिछड़ी मानसिकता के सहारे से मजबूत होता है। इसलिये दोनों के खिलाफ बराबरी से मोर्चा लेना होगा। और यह संघर्ष केवल मानदेय बढ़ाने, जातिगत आरक्षण या नौकरियों की मांग करने या फिर महिलाओं की सुरक्षा की मांग करते हुये कलेक्टर, एसपी कार्यालयों पर प्रदर्शन भर करने का संघर्ष नहीं होगा। यह सब तो करना ही होगा – इसे करते करते एक राजनैतिक संघर्ष भी छेड़ना होगा जिसमें समाज के हर तबके को हिस्सेदारी करनी होगी।

अपने व्याख्यान के समापन में दो दिन पहले मानवाधिकारों पर बोली नताशा नरवाल के कथन कि “अकेले-अकेले लड़ना मुश्किल होता है। हमारे सामने जब ताकतवर दुश्मन खड़ा है, वह हमें तोड़ना चाहता है उससे जीतना है तो एकजुट होना होगा।” को रेखांकित करते हुए समापन 26 जुलाई को परसों सरोज सम्मान से सम्मानित झारखंड की युवा कवियित्री जेसिंता केरकेट्टा की कविता से किया;

हिटलर की मौत के बाद भी लंबे समय तक

कई घरों में छिड़ी रही एक लंबी लड़ाई

जहां चुप रहने और विरोध न करने के लिए

कई बच्चे अपने पिता को माफ न कर सके।

वे माफ न कर सके उन पड़ोसियों को भी

जो बंद रहे अपने घरों में चुप

दूसरों के लिए सड़कों पर निकल न सके।

एक दिन युवा सड़कों पर उतरे

अपने पिता और पड़ोसियों के

चुप रहने, प्रतिरोध न कर पाने का प्रायश्चित करने

जिनके लिए उनके पिता न लड़ सके

विश्वविद्यालयों से उनके बच्चे बाहर निकले

मारे गए लोगों को उनका हक दिलाने।

……………………………………………………

आज ठीक वैसा ही एक आदमी

जगह और समय बदलकर

एक सी घटनाओं के साथ फिर नजर आया।

इससे पहले कि वह आदमी

फिर से किसी देश को गर्त में ले जाए

इससे पहले कि पीढ़ियों को सदियों तक

उसके पापों का प्रायश्चित करना पड़े

इससे पहले कि बच्चे अपने पिता

और पड़ोसियों को

चुप रहने और प्रतिरोध न करने के लिए

कभी माफ न कर सके

उस आदमी में बसे हिटलर को

पूरी ताकत के साथ

उसकी असली जगह दिखा देनी चाहिए।

(पूरे व्याख्यान के लिए जाएँ ; https://www.facebook.com/Lokjatan/ ) 

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