Tuesday, April 16, 2024

किसानों के लिए ‘निधि सम्मान’ से अधिक जरूरी है ‘विधि सम्मान’ की व्यवस्था

सपनों का समय आ गया है। एक दौर से निकलकर दूसरे दौर में पहुंच रहे हैं। सपना झूठ होता है। कभी-कभी सच भी हो जाता है। सपना देखना और बुनना मनुष्य का स्वभाव है। क्यों न एक सवाल ही बुना जाये! बस एक ध्यान रखना जरूरी है-जूता पहनकर सपनों में टहलना गुनाह है। सामने 2024 का आम चुनाव है। राजनीतिक दलों में घमासान है। नागरिक परेशान है। कौन जीतेगा? कहना मुश्किल है! नागरिक को इससे क्या फर्क पड़ता है कि कौन जीतता है ? नागरिक के लिए महत्वपूर्ण यह है कि उसके जीवन पर क्या फर्क पड़ता है?

कुल मिलाकर सवाल यह है कि एक नागरिक के रूप में हम चाहते क्या हैं? अपनी इच्छाओं को जानना भी कोई कम मुश्किल काम नहीं है! कहते हैं, एक बार किसी के सामने प्रभु प्रकट हो गये। जिद करने लगे कि जो इच्छा हो मांग लो! भक्त भौंचक्का। मांगे तो क्या मांगे ? कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अपनी सारी अपूर्ण इच्छाओं की सूची खंगाल ली। ऊहापोह था कि खत्म ही न हो रहा था। प्रभु जरा जल्दी में थे। प्रभु तो ठहरे, प्रभु! ऊहापोह ताड़ गये। शर्त लगाना प्रभुओं का विशेषाधिकार होता है। प्रभु ने शर्त लगा दी-तुम्हें जो मिलेगा, तुम्हारे पड़ोसी को उसका डबल मिलेगा। शर्त सुनते ही उसने बिना पलक झपकाये मांग लिया-प्रभु मेरी एक आंख फोड़ दें। प्रभु हक्का-बक्का! करते क्या ?

उनके कुल की रीति थी-प्राण जाये पर वचन न जाये। सो उसकी एक आंख मारी गई। बेकसूर पड़ोसी तो खैर दोनों आंख से निपट गया। प्रभु ने भी तय कर लिया-दोबारा मनुष्य के फेर में नहीं पड़ना है! प्रभु तो फेर में पड़ने से बच गये लेकिन मनुष्य के स्वभाव में यह प्रवृत्ति घर कर गई।

मनुष्य में एक ऐसी प्रवृत्ति घर कर गई है कि हमें अच्छा जो मिले सो मिले, दूसरों को अधिक-से-अधिक उसका आधा ही मिले। जो बुरा मिले दूसरों को उसका डबल मिले! इस प्रवृत्ति की चपेट में पड़ने से बचने के लिए सोचा कि क्यों न नागरिक इच्छाओं का एक ब्योरेवार दस्तावेज बना लूं! जब आम चुनाव के नेतागण वोट मांगने आयें तो उनके सामने पेश कर दूं! पारदर्शिता बनी रहे, यह सोचकर उसी दस्तावेज को यहां रख रहा हूं। नागरिक के कई रूप हैं, सोचा जब दस्तावेज बना ही रहा हूं तो क्यों नहीं पहले किसान नागरिक की इच्छा को समझूं ? ग्रामीण नागरिक की इच्छाओं के बारे में पहले सोचूं? अपनी बाद में सोचूंगा? अपनी-अपनी सोचने के कारण ही तो हमारा यह हाल हुआ है।

एक किसान के रूप में किसान की इच्छा लोकतंत्र में क्या हो सकती है? भारत के आर्थिक विकास में किसानों की बड़ी भूमिका रही है। भूमि से जुड़े रहने वालों की भूमिका तो होनी ही चाहिए। खेतीबारी के लिए भूमि चाहिए। खेतीबारी में दिनानुदिन उन्नति के लिए सरकार को नीतिगत तदर्थता तोड़कर सुव्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। किसान के लिए ‘निधि सम्मान’ की नहीं ‘विधि सम्मान’ की व्यवस्था की जानी चाहिए।

व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाते हुए उपजाऊ खेतिहर जमीन के मृदा-परीक्षण (Soil Testing) एवं अन्य संबंधित सुविधा के लिए किसानों की पहुंच के अंदर पर्याप्त संख्या में उपयोगी कृषि शाला (Agri Clinic) खोलने की व्यवस्था पर अविलंब ध्यान दिया जा सकता है। स्वस्थ-सुरक्षित-पुष्टिवर्द्धक खाद्यान्न के उत्पादन करने के लिए उच्च-उपजनशील बीज की व्यवस्था पर विचार किया सकता है। नकली या निम्न-स्तरीय बीज बेचनेवालों के लिए कड़े कानूनी प्रावधान करने की जरूरत है। कोई माल नकली या निम्न-स्तरीय होता है, तो एक समान की हानि होती है, लेकिन बीज से कई गुणा और बहु-स्तरीय हानि होती है।

पर्यावरण में आ रहे बदलाव को ध्यान में रखते हुए फसल-ऋतु पर पड़ रहे प्रभाव का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सकता है। तदनुसार किसान को यथासमय प्रोयजनीय सूचना एवं जानकारी दी जा सकती है। मृदा-सुरक्षा की दृष्टि से केंचुआ खाद (Vermicompost) के व्यापक प्रचलन पर जोर दिया जा सकता है। बाहरी कारकों से फसलों की सुरक्षा करने के लिए जैविक कीटनाशक (Organic Insecticide) नीम से बनाये गये कीटनाशक के प्रयोग की व्यापक व्यवस्था की जा सकती है।

कृषि पद्धति में सामयिक बदलाव की जरूरत छोटे-बड़े हर किसान को होती है। बदलाव के लिए यथार्थिक दृष्टिकोण (Realistic Approach) अपनाने की जरूरत होती है। बदलाव में एक तरह की स्वाभाविक जड़ता होती है। इन बदलावों को अपनाने के प्रति आग्रहशील बनाने, नई तकनीकों के अपनाव के लिए किसानों के मनो-तकनीकी प्रशिक्षण की निःशुल्क व्यवस्था की जा सकती है।

कृषि संयंत्रों के लिए कम ब्याज पर वित्तीय सहयोग प्रदान किया जाना चाहिए। कृषि संयंत्रों की पलट खरीद (Buy Back) की सम्यक व्यवस्था भी कारगर हो सकती है। पंजीकृत जोतदारों को सुपरिभाषित किसान भत्ता दिये जाने पर विचार किया सकता है। कन्या शिक्षा, विवाह के समय बिना हुज्जत के पंचायत या प्राथमिक कृषि सहकारी समिति (PACS) के स्तर पर सहकारी अर्थ सहयोग की व्यवस्था पर सोचा जा सकता है।

कटनी और विपणन एवं दो फसलों के बीच के समय में अर्थोपार्जक क्रिया-कलापों पर स्थानीय माहौल, जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सूक्ष्म एवं सक्षम योजनाओं पर विचार किया सकता है। विकेंद्रित उत्पादन और केंद्रित विपणन का दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है। कुटीर उद्योग, स्थानीय खपत के लिए सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के संस्थापन को प्रोत्साहन दिया जाना जरूरी है। गुणवत्ता, प्रचार और ब्रांड विश्वसनीयता का विशेष ध्यान रखने की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।

स्वास्थ्य और स्वच्छता का गहरा रिश्ता है। पंचायत स्तर पर स्वच्छता का ध्यान रखे जाने की कुछ व्यवस्था है, निर्मल ग्राम योजना आदि है, पर्याप्त कितनी है यह अलग सवाल है। कहने की जरूरत नहीं है कि गांवों में स्वास्थ्य परिसेवा का बुरा हाल है। इस का एक प्रमुख कारण देश में रोगी डॉक्टर अनुपात में भारी असंतुलनहै, ग्रामीण रोगी डॉक्टर के अनुपात का असंतुलन तो और भी भयावह है। दवाइयों की कीमत बिचौलियों की भूमिकाऔर स्वास्थ्य ठगेरियों, पैथो-रेडियोलॉजिकल लैब और प्रशिक्षित तकनीशियनों की समयानुकूल उपलब्धता की समस्या अपनी जगह है। ग्राम स्वास्थ्य सेवाको सुदृढ़ बनाने पर ध्यान दिया जा सकता है।

अनुपात को ध्यान में रखते हुए ग्रामीण बच्चों के लिए आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था पर विचार किया सकता है। खेल-कूद की व्यवस्था, सभ्य और बेहतर जीवन के अवसरों की उपलबध्ता और ललक दोनों में संतुलन और समायोजन के लिए नीतिगत रूप से प्राथमिकताएँ एवं प्रतिबद्धताएँ तय करना आवश्यक है।

राज्य और केंद्र स्तर पर कृषि सेवा की व्यवस्था की जा सकती है। ग्राम रक्षा दल की तरह, ग्राम कृषि दल के गठन पर भी ध्यान दिया जा सकता है। किसानी की समस्याओं पर बात करने और अनुवर्ती कार्य पर नजर रखने के लिए प्रखंड स्तर पर तैनात कृषि अधिकारी को अधिक सक्रिय किया जाना चाहिए। कृषि प्रशासनिक अधिकारियों की नियमित बैठक, अनुभव साझाकरण के अवसरों का निर्माण और सरकारी या गैरसरकारी स्तर पर कृषि क्षेत्र में योगदान करनेवाले लोगों या वर्ष विशेष में अच्छे शैक्षणिक परिणाम को आधार बनाकर उनके नाम पर प्रयोजनमूलक ग्रामीण मेलों का आयोजन किया जा सकता है। लिये गये कृषि, गैरकृषि, ग्रामीण कारोबारी के द्वारा ससमय ऋण वापसी करनेवाले मॉडल ग्राहकों की उन्नति कथा (Success Story) के प्रचार-प्रसार से सकारात्मक माहौलबंदी की जा सकती है।

इनमें से बहुत कुछ कागज पर हो भी रहा होगा। इसे जमीन पर उतारने के लिए नीति प्रवणता को जनोन्मुखी बनाने की जरूरत है। हमारी कई समस्याओं में से एक बड़ी समस्या सुसंगत और स्थिर नीति (Policy Consistency) केअभाव से भी जुड़ा है। व्यवस्था है, लेकिन सुचारू नहीं है। जो व्यवस्थाएं हैं, उन में से अधिकतर प्रायोगिक स्तर पर ही रुक जाती है।

सरकारी गैरसरकारी संगठनों विशेष रूप से प्रशिक्षित राजनीतिक कार्यकर्ताओं की असली परीक्षा भूमि यही है। राजनीतिक नेताओं के प्रोत्साही नेतृत्व की क्षमता की भी यही परीक्षा भूमि है। नई सरकार उद्यमशील लोगों को जोड़कर अगले पाँच साल में विराट के दबाव और मोह से बाहर निकलकर सूक्ष्म स्तर पर कुछ करने के प्रति सम्मान और समर्पण दिखाती है तो अगले पांच साल में बेहतर जीवन की लालिमा छिटकने लगेगी। ध्यान रहे, सद्भावी उद्यमशीलता से प्रभावी प्रगतिशीलता का स्वाभाविक संबंध होता है।

सभ्य और बेहतर जीवन पर सब का हक है। शहरीकरण और ग्राम नवीकरण के दोहरा दायित्व की गंभीरता को बहुत दिन तक लटकाये नहीं रखा जा सकता है। गांव बदल रहा है। यह बदलाव कैसा है इस पर विचार किया सकता है। कई बार ऐसा लगता है कि शहर की अच्छाइयां कम, और बुराइयां अधिक तेजी से गांव में पसर रही है। यह का और माना जाता रहा है कि भारत गांवों का देश है। इसकी लोकतांत्रिक समस्याओं की जड़ें भी गांव में हैं और निदान भी वहीं है। गांव की समृद्धि में ही भारत की समृद्धि का रहस्य है।

जिस तरह का उत्तेजक और सामाजिक दुराव का वातावरण देश भर में बन गया है, उसे ध्यान में रखते हुए कहना मुश्किल नहीं है कि देश में विश्वास का माहौल बहाल करना बहुत कठिन कार्य है। कठिन है, लेकिन असंभव नहीं। असंभव लगनेवाली बात को संभव कर दिखाना ही तो पराक्रम है। जब तक राजनीतिक और सामाजिक पराक्रम अपना लोकतांत्रिक कमालदिखाये हमें इंतजार करना होगा। अभी कई पड़ाव पार करने हैं। अभी तो लोकतंत्र को बचा लें भारत के नागरिक, तब तक धीरज! हर नागरिक को सोचा चाहिए कि वह कैसा लोकतंत्र चाहता है यह भी कि वह खुद लोकतंत्र से क्या चाहता है! और हां, अभी तो लोकतंत्र खुद अपनी रक्षा के लिए नागरिकों से गुहार लगा रही है। लोकतंत्र की ही चिंता है, जाने क्या होगा। आशा की किरण झिलमिलाती तो है, एक नई हवा इधर आती तो है। फिलहाल अमर कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की याद आ रही है।

फणीश्वरनाथ रेणु की एक कहानी है, 1957 की- “ठेस”। उसका एक अंश पढ़िये। सोचिए की ‘सिरचन’ जैसी कारीगरी गांव से क्यों गायब हो गई? क्यों उसे ठेस लगी? अधिकार-संपन्न लोगों की तरफ से निरंतर जारी भावनात्मक हिंसा की आत्मसिद्ध साक्ष्य है यह कहानी! ‘सिरचनों’ के लिए ‘निधि सम्मान’ से अधिक जरूरी है ‘विधि सम्मान’! शायद समझ और सहानुभूति अधिक संवेदनशील और विकसित हो कि क्यों जरूरी है, जाति-गणना और सर्वेक्षण आर्थिक सर्वेक्षण। पूरी कहानी मिले तो पढ़िये पूरी, तब तक साभार उसका एक अंश-

“मोथी घास और पटरे की रंगीन शीतलपाटी, बांस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंगे डोर के मोढ़े, भूसी–चुन्नी रखने के लिए मूंज की रस्सी के बड़े–बड़े जाले, हलवाहों के लिए ताल के सूखे पत्तों की छतरी–टोपी तथा इसी तरह के बहुत–से काम हैं, जिन्हें सिरचन के सिवा गाँव में और कोई नहीं जानता। यह दूसरी बात है कि अब गांव में ऐसे कामों को बेकाम का काम समझते हैं लोग–बेकाम का काम, जिसकी मजदूरी में अनाज या पैसे देने की कोई ज़रूरत नहीं। पेट–भर खिला दो, काम पूरा होने पर एकाध पुराना–धुराना कपड़ा देकर विदा करो। वह कुछ भी नहीं बोलेगा।…”

(प्रफुल्ल कोलख्यान स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं)

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