Tuesday, October 19, 2021

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तो राहुल को इसलिए जाना पड़ा

जितेन्द्र चतुर्वेदीhttps://janchowk.com
( लेखक यथावत पत्रिका में विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं।)

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राहुल गांधी को ओल्ड गार्ड नापसंद करते हैं। यह बात किसी से छुपी नहीं है। छुपा यह भी नहीं है कि राहुल गांधी भी उनसे परहेज करते हैं। उनका भी इरादा ओल्ड गार्ड को ढोने का नहीं था। वे अपनी दादी की तरह ओल्ड गार्ड को हाशिए पर धकेलना चाहते थे। इसलिए उनका इरादा कांग्रेस को बदलने का था। उसमें वे जुटे भी थे। ओल्ड गार्ड इससे परिचित थे। इस वजह से अड़ंगा लगा रहे थे।
राहुल गांधी उसका मुकाबला कर रहे थे। लेकिन ओल्ड गार्ड के सामने वे बेबस थे। उसकी बड़ी वजह पार्टी पर उनकी पकड़ और दुष्प्रचार पर उनकी जकड़ न के बराबर थी। राहुल गांधी पार्टी को अपने एजेंडे पर ले चलने के लिए तैयार नहीं कर पाए। वह एजेंड़ा क्या था? कहा जा रहा है कि वह पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव का एजेंडा था। वही नरसिंह राव जिनका नाम लेने से भी कांग्रेस परहेज करती है। उन्हें साम्प्रदायिक मानती है। वह इसलिए क्योंकि बाबरी मस्जिद का ढांचा उनके ही दौर में गिरा था।
लेकिन जिनके दौर में ताला खुला, उनको पार्टी सेकुलर मानती है। शायद इसकी वजह उनका नेहरू-गांधी परिवार से जुड़ा होना है। इसलिए उनका निर्णय संदेह से परे है। लेकिन नरसिंह राव के साथ ऐसा नहीं हुआ। इस वजह से उनका हर काम संदेह के घेरे में आता है। चूंकि राहुल गांधी उनका एजेंड़ा पार्टी में लागू करना चाहते थे, इसलिए घेरे में वे भी आ गए।
पर सवाल यह है कि आखिर नरसिंह राव का कांग्रेस को लेकर एजेंडा था क्या? इसके बारे में संजय बारू ने अपनी किताब ‘1991: हाऊ पीवी.नरसिम्हा राव मेड हिस्ट्री’ में लिखा है। उनका दावा है कि राव पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे। उसके लिए जरूरी था कि संगठन का चुनाव हो। जो 1973 के बाद से नहीं हुआ था। यानी पिछले 20 साल से पार्टी में कोई चुनाव नहीं हुआ था। नरसिंह राव चाहते थे कि चुनाव हो। यह तब की बात है जब वे प्रधानमंत्री भी थे और पार्टी अध्यक्ष भी। तय हुआ कि पार्टी में चुनाव होना चाहिए। साल 1992 था। तिरूपति में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। संगठन में चुनाव भी हुआ। हालांकि इसका दस जनपथ के करीबियों ने विरोध किया था। उन्होंने नरसिंह राव को ही आड़े लिया और नारा दिया कि एक व्यक्ति और दो पद नहीं चलेगा। उस वक्त नरसिंह राव पार्टी और सत्ता दोनों के मुखिया थे। दरबारियों को यह नागवार गुजरा। इसलिए वे एक व्यक्ति, एक पद का नारा बुलंद कर रहे थे।
दिलचस्प बात यह है कि इस तरह का नारा न तो इंदिरा गांधी के समय में आया था और न ही राजीव गांधी के कालखंड में। जाहिर है दोनों नेहरू-गांधी परिवार से थे, इस कारण विरोध नहीं हुआ था। पर राव के साथ ऐसा नहीं था। वे नेहरू-गांधी परिवार के नहीं थे और पार्टी को भी उससे मुक्त करने का इरादा रखते थे।
संजय बारू लिखते हैं कि नरसिंह राव कांग्रेस को परिवार की जकड़ से मुक्त कराना चाहते थे। वह तब तक संभव नही था जब तक पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र स्थापित न हो। उसके लिए ही संगठन का चुनाव हो रहा था। राव की नजर में यह चुनाव नहीं नेहरू-गांधी परिवार से मुक्ति का रास्ता था। उनके हिसाब से कांग्रेस के लिए यह जरूरी था। कारण, पार्टी पूरी तरह से नेहरू-गांधी परिवार पर निर्भर हो चुकी थी। उससे बाहर कांग्रेस अपना भविष्य तलाशने के लिए तैयार नहीं थी। वे खुद इसे देख चुके थे। राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस जिस तरह बिखर गई थी, उससे सब वाकिफ है। हर कोई सोनिया गांधी की तरफ देख रहा था।
इसकी बस एक वजह थी। इंदिरा गांधी ने पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को खत्म कर दिया था। इस कारण कोई नेतृत्व उभरा नहीं या फिर यह कहा जाए कि उन्होंने उभरने नहीं दिया। जो उभरे वे नेहरू-गांधी परिवार के दरबारी से ज्यादा कुछ नहीं थे। इंदिरा गांधी को यही चाहिए भी था क्योंकि वे अपने बेटों को तैयार कर रह थी। वही विरासत के वारिस थे। इस लिहाज से पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का होना फायदेमंद नहीं था क्योंकि वह चुनौती दे सकता था। इसी वजह से उन्होंने विरोध के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी। लिहाजा संगठन का चुनाव हुआ नहीं। अगर किसी का चुनाव हुआ तो वह है परिवार के वफादारों का। यही कारण रहा कि इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी और उनके बाद सोनिया गांधी पर पार्टी की नजर टिकी। लेकिन तब सोनिया गांधी पार्टी संभालने के लिए तैयार नहीं थी। लिहाजा नरसिंह राव का भाग्य खुल गया। तो उन्होंने पार्टी को परिवार से मुक्त करने का निर्णय कर लिया। चुनाव उसका सही तरीका लगा। जो सीताराम केसरी के अध्यक्ष रहने तक चला।
लेकिन जब 14 मार्च 1998 को पार्टी की कमान सोनिया गांधी के हाथ में आई तो कांग्रेस फिर दरबारी संस्कृति में चली गई। संगठन का चुनाव स्थगित कर दिया गया। कांग्रेस कार्य समिति में वफादारों को भरा जाने लगा। पार्टी का संविधान दस जनपथ के हिसाब से बदल दिया गया। पार्टी का ढांचा परिवार के अनुरूप ढाल दिया गया।
यह बात राहुल गांधी को सही नहीं लगी। वे पार्टी को लोकतांत्रिक बनाने के पक्ष में थे। संगठन चुनाव उसकी पहली सीढ़ी थी। इसीलिए वे संगठन चुनावों पर शुरू से जोर देते रहे। उनका यह भी मानना था कि पार्टी को परिवारवाद से मुक्त होना चाहिए। इसकी वे कोशिश भी करने लगे। यही सब नरसिंह राव भी करना चाहते थे। लेकिन वे कर नहीं पाए। राहुल गांधी को लगा था कि वे कर लेगे। उन्हें नेहरू-गांधी परिवार का होने की वजह से सहूलियत मिलेगी। पर ऐसा हुआ नहीं। उनके ही दरबारियों ने उनकी ही योजना पर पानी फेर दिया और उन्हें कुर्सी से जाना पड़ा।

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