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राष्ट्रीय कंपनी अधिनियम पंचाटः तकनीकी सदस्यों पर अनावश्यक विवाद

इन दिनों राष्ट्रीय कंपनी अधिनियम पंचाट यानी नेशनल कंपनी ला ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में तकनीकी सदस्यों की मौजूदगी और उनकी कार्यप्रणाली को लेकर अनावश्यक विवाद फैलाया जा रहा है। यह विवाद उनके जज के गाउन पहनने, उनके बैठने के स्थान और उनकी और न्यायिक सदस्य में असहमति की स्थिति के साथ उनकी कानूनी योग्यता और फैसला लिखने की क्षमता के बारे में है।

कंपनी अधिनियम 2013 के तहत 2016 में गठित पंचाट के नियमों में न्यायिक और तकनीकी सदस्यों के अधिकारों और सुविधाओं में कोई विभेद नहीं किया गया है। लेकिन कुछ निहित स्वार्थ के लोगों ने यह विवाद शायद इसलिए खड़ा करना शुरू कर दिया है ताकि तकनीकी सदस्यों की अहमियत को घटाकर धीरे-धीरे इस पंचाट से उनको हटवा दिया जाए और इसे महज एक अदालत बनाकर रख दिया जाए ताकि यहां विवाद जल्दी सुलझने की बजाय लंबे समय तक चलते रहें।

आरोप लगाया जा रहा है कि तकनीकी सदस्यों ने अपने व्यवहार से न्यायिक सदस्यों के साथ एक प्रकार की दरार पैदा कर दी है। वे न्यायिक सदस्यों पर हावी होने की कोशिश करते हैं। तकनीकी सदस्यों के रूप में जो लोग आते हैं वे राजस्व सेवा से होते हैं, चार्टर्ड अकाउंटेंट पेशे के होते हैं, कंपनी सेक्रेटरी होते हैं या भारतीय कंपनी अधिनियम सेवा (आईसीएलएस) से जुड़े होते हैं। आरोप है कि वे लोग राजनीति ज्यादा करते हैं और न्यायिक सेवा के अधिकारियों पर दबाव डालते हैं कि आदेश इस प्रकार लिखो।

जबकि उन्हें आदेश लिखना ही नहीं आता और वे अपने काम के लिए कानूनी सहायक रखते हैं। उदाहरण के तौर पर कहा गया है कि अहमदाबाद में पंचाट के भीतर ऐसे 20 मामले हुए जिनमें न्यायिक सेवा के अधिकारी और तकनीकी सेवा के अधिकारियों के बीच किसी प्रकार की सहमति ही नहीं बन पाई। इस तरह मामले लटके हुए हैं।

इसलिए कानून की भावना के विपरीत अब मांग की जा रही है कि जज का यूनिफार्म यानी गाउन सिर्फ न्यायिक सदस्य ही पहने और तकनीकी सदस्य सामान्य वेशभूषा में रहें। न्यायिक सदस्य दाएं बैठें और तकनीकी सदस्य बाएं बैठें। सिर्फ न्यायिक सदस्य ही फैसला सुनाएं और वे ही आदेश लिखें। तकनीकी सदस्य सिर्फ न्यायिक सदस्य की मदद करें और कभी अदालत न चलाएं। इसके अलावा तकनीकी सदस्य की असहमति के अधिकार सीमित कर दिए जाएं।

 दरअसल इस तरह की कहानी एक अभियान का हिस्सा है जो कि पंचाट यानी एनसीएलटी को गठित किए जाने के प्रावधानों के विरुद्ध है। इस तरह की मांग सुप्रीम कोर्ट के आदेश के भी विरुद्ध है। यह दावा सही है कि न्यायिक सदस्य के लिए दस साल का जिला न्यायालय या हाई कोर्ट का जज होने का अनुभव चाहिए लेकिन यह सही नहीं है कि वकील का 25 साल का प्रैक्टिस का अनुभव होना चाहिए। दोनों ही स्थितियों में न्यायिक सदस्य के लिए दस साल का ही अनुभव चाहिए जबकि तकनीकी सदस्य के लिए अपने क्षेत्र में 15 साल का अनुभव होना चाहिए। इसके अलावा तकनीकी सदस्य को सेक्रेटरी यानी सचिव के स्तर का होना चाहिए।

तकनीकी सदस्य इसलिए रखा जाता है ताकि कंपनी अधिनियम के तकनीकी पक्षों के अनुभवों का लाभ पंचाट को मिले। जबकि न्यायिक सदस्य इसलिए रखा जाता है ताकि विधिशास्त्र के मुताबिक तथ्य और कानून के दायरे में निर्णय लिया जा सके। यह बात सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत सरकार के फैसले में कही है। अदालत ने साफ कहा है कि न्यायिक सदस्य के पास कानून की आवश्यक जानकारी हो सकती है लेकिन कोई जरूरी नहीं उसके पास कंपनी अधिनियम की विशिष्ट जानकारी हो। इसी कारण तकनीकी सदस्य को पंचाट में रखा गया है।

एक जून 2016 को गठित एनसीएलटी में न्यायिक और तकनीकी सदस्यों के अधिकारों, कर्तव्यों और सुविधाओं में किसी तरह का भेदभाव नहीं किया गया है। दोनों को जज का गाउन पहनने का आधिकार है। फैसला कोई भी लिख सकता है और कोई भी उसकी घोषणा कर सकता है। बस निर्णय आम सहमति से होना चाहिए और अगर किसी सदस्य को असहमति है तो वह उसे फैसले में दर्ज कर सकता है। सिर्फ पंचाट के अध्यक्ष को यह अधिकार है कि वह एक सदस्यीय पंचाट गठित करे। वरना आमतौर पर पैनल दो सदस्यों का होता है।

यहां एक बात और भी ध्यान देने की है कि तकनीकी सदस्य भले ही बार में रजिस्टर्ड न हुआ हो और उसने प्रैक्टिस न की हो लेकिन उसमें से अनेक सदस्यों ने  कानून की पढ़ाई भी की होती  है। कुछ तो कानून में पीएचडी भी होते हैं और अपने क्षेत्र में विशिष्ट अनुभव लिए होते हैं। इस पंचाट का काम इस मायने में न्यायालयों के काम से अलग होता है कि उसे फैसला देने से ज्यादा मामले को सुलझाना होता है। फैसला दे देना और अपीली पंचाट में अपील के लिए भेज देने से ज्यादा आवश्यक है मामले को निपटना।

इसी नाते तकनीकी सदस्य की आवश्यकता कानून ने महसूस की। इसलिए तकनीकी सदस्यों को अयोग्य और गैर जरूरी बताकर और उनके और न्यायिक सदस्यों के बीच सत्ता संघर्ष की तस्वीर खींचना एक तरह से लंबे संघर्ष के बाद गठित कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल को उसके मकसद में नाकाम करना है। क़ानून की नज़र में न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की शक्तियां समान हैं तथा एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृति सर्वथा अनुचित है। दोनों में से किसी भी एक सदस्य के न रहने पर दूसरे सदस्य को अदालत चलाने का पूरा अधिकार हैं किन्तु न्यायिक शुचिता को ध्यान में रखते हुए एक सदस्यीय पीठ को कोई भी प्रभावी आर्डर पास करने से बचना चाहिए।

औपचारिक आदेश देने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। साथ ही न्यायिक सदस्यों को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये कि तकनीकी सदस्य भी उसी क़ानून की देन हैं जिसके तहत स्वयं उन्हें भी सदस्य बनाया गया है। बेंच की अध्यक्ष करने का अधिकार सीनियर मेंबर को होना चाहिए। पीठ की गरिमा बनाये रखना दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है यदि न्यायिक और तकनीकी सदस्य आपस में तालमेल बिठाकर काम करेंगे तो जनता, क़ानून और देश का अधिक भला कर सकेंगे।

(लेखक सुरेंद्र नाथ पांडेय सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं।)   

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This post was last modified on August 3, 2020 8:13 pm

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