Monday, October 25, 2021

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पाटलिपुत्र की जंग: जमीन पर दिखने लगी है महागठबंधन की जीत

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बिहार चुनाव का तीसरा चरण 3 दिन बाद 7 नवंबर को पूरा हो जाएगा। कल 5 तारीख को चुनाव प्रचार थम जाएगा। चुनाव प्रचार के दौरान आरोप प्रत्यारोप खूब लगाए गए। चुनाव में लालू यादव और शरद यादव की कमी महसूस की गई।

स्वाभाविक तौर पर जेडीयू-भाजपा गठबंधन एवं महा गठबंधन द्वारा जीत के दावे किए जा रहे हैं। राजद, कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम और माले के गठबंधन के वोटों का बंटवारा न हो इस कारण सपा ने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं।

माले के महासचिव दीपंकर जी, कविता जी और लोकतांत्रिक जनता दल के अरुण श्रीवास्तव जी के साथ मैं सिकटा (पश्चिम चंपारण), औराई, पसोल (मुज़फ्फ़रपुर)   में सभाओं में शामिल हुआ। बड़ी संख्या में पूरे गठबंधन के कार्यकर्ता और समर्थक पूरे उत्साह और आत्म विश्वास के साथ दिखलाई दिए। दीपंकर जी कहते हैं हमारा गठबंधन लगातार जनता के बीच मजबूत हो रहा है मोदी जी का गठबंधन लगातार कमजोर हो रहा है। वे शिव सेना और अकाली दल का उदाहरण देते हैं। तय है कि वामपंथी पार्टियों की ताकत बढ़ेगी। महागठबंधन की सरकार बनने पर वाम पार्टियों के सरकार में शामिल होने की स्थिति बन सकती है।

महागठबंधन का लाभ सभी घटकों को होगा। कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव और वर्तमान विधायक डॉ. शकील अहमद खान के कदवा (कटिहार) विधान सभा क्षेत्र में स्थिति पिछले चुनाव से अधिक मजबूत दिखलाई पड़ रही है।

आज मैं राहुल गांधी की सभा मे शामिल हुआ। शरद यादव की बेटी सुभाषिनी के पक्ष में बोलते हुए राहुल गांधी जी ने कहा कि शरद यादव जी उनके गुरु समान हैं। उनकी बेटी होने के नाते वे उनकी बहन समान है। पिता के बीमार होने की स्थिति में वे बहन की रक्षा करेंगे। उन्होंने तेजस्वी को भावी मुख्यमंत्री के तौर पर संबोधित किया। केंद्र सरकार की किसानों और मज़दूर विरोधी नीतियों को डट कर कोसा। सभा के दौरान विजय उत्सव की तरह का माहौल था।

कल मुरलीगंज (मधेपुरा) में तेजस्वी यादव की सभा में शामिल हुआ था। सभा में युवाओं की दीवानगी चरम पर दिखाई पड़ी। तेजस्वी ने जनता को भाषण ही नहीं दिया जनता के साथ संवाद भी किया। तेजस्वी जो कुछ करना चाहते थे वह सवाल जनता से पूछते थे और जनता चिल्ला चिल्लाकर जवाब देती थी। सभा देखने से स्पष्ट हो गया कि तेजस्वी बिहार के मास लीडर (जन नेता) के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। सभा सुनने वालों की प्रतिक्रियाओं से यह भी स्पष्ट हो रहा था कि मतदाताओं के मन में आशा, विश्वास और उत्साह पैदा करने में वे कामयाब हो चुके हैं। वे पूरे संवाद का वे पढ़ाई, कमाई और दवाई, सिंचाई, सुनवाई और कार्यवाही पर केंद्रित करते हैं। नारे भी लगवाते हैं। साथ ही वह यह भी कहते हैं कि मैं 25 साल का नौजवान अकेले प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से लड़ रहा हूँ।

इस तरह का उत्साह युवाओं में मैंने उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के लिए देखा था जब वे पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। लगता है कि 10 लाख रोजगार का मुद्दा महागठबंधन की नैया पार लगा देगा ठीक वैसे ही जैसे दो लाख के कर्जे के मुद्दे ने मध्यप्रदेश में कमलनाथ और 25 सौ रुपये प्रति क्विंटल धान की खरीद के मुद्दे ने छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की नैया पार कर दी थी।     

बिहार के मतदाताओं के मन में नीतीश द्वारा पिछले चुनाव में बनाए गए गठबंधन को तोड़ने का गुस्सा है। मतदाताओं के मन में नीतीश के शराब बंदी के दावे के बावजूद शराब माफिया के पूरे बिहार में हावी होने, बिहार के लिए सवा लाख का पैकेज और विशेष दर्जा नहीं मिलने से इन  मुद्दों को लेकर जो आशा पैदा की थी वह निराशा में बदल चुकी है। आश्चर्यजनक तौर पर नीतीश के पास तेजस्वी यादव के खिलाफ कहने को कुछ भी नहीं है। यह भी कहा जा सकता है कि लालू के जंगलराज का फोबिया नीतीश के सिर पर चढ़कर बोल रहा है। वे बिहार के मतदाताओं को लालू के जंगलराज का भय दिखाकर सत्ता हासिल करना चाहते हैं वहां दूसरी ओर तेजस्वी जीत के तुरंत बाद 10 लाख नौकरियों को लेकर पहला फैसला करने, पेंशन 400 रुपये से बढ़ाकर 1000 रुपये करने, शिक्षा का बजट 22% तक बढ़ाने का वादा कर रहे हैं। रोजगार बिहार के चुनाव में मुख्य मुद्दा बन चुका है। 

कोरोना काल में प्रवासी श्रमिकों के प्रति नीतीश जी के तिरस्कार के भाव ने बिहार के  आम मतदाताओं में गुस्सा पैदा किया है।

बिहार के जानकार यह बताते हैं कि यहां का चुनाव जातिगत आधार पर होता है, किसी मुद्दे पर नहीं। परन्तु इस बार बिहार विधानसभा का चुनाव जाति समीकरणों को तोड़कर नतीजे देगा। ऐसा कहा जा सकता है। यादव, मुस्लिम का समीकरण राजद के साथ पहले से मौजूद है। महागठबंधन में तेजस्वी यादव ने वामपंथी पार्टियों को जोड़कर जहां एक तरफ गरीबों को जोड़ दिया है वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के जुड़ने से बिहार की उच्च जातियों का एक हिस्सा भी गठबंधन की तरफ रुख करता दिखाई दे रहा है। पूरे जातिगत समीकरण को चिराग पासवान ने बड़ी संख्या में भूमिहारों को टिकट देकर भाजपा के लिए बिगाड़ दिया है। उन्हें सीटें कितनी भी आएं लेकिन वे बिहार में खुद को नेता के तौर पर स्थापित करने में कामयाब हो चुके हैं।

चुनाव में अति पिछड़ों और महिलाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई है। हालांकि शराबबंदी के जिस मुद्दे ने बिहार की महिलाओं को नीतीश कुमार के साथ खड़ा कर दिया था अब वह स्थिति नहीं रह गई है क्योंकि पूरे बिहार में शराब बेचने वालों का एक सशक्त माफिया खड़ा हो गया है जिसे नीतीश कुमार तोड़ने में नाकाम रहे हैं। इसके बावजूद भी नीतीश की साख महिलाओं में बनी दिखलाई पड़ रही  है।

उपेंद्र कुशवाह ने बसपा और ओबैसी की एमआईएमआई से समझौता किया है। पप्पू यादव और प्रकाश अंबेडकर का भी समझौता है उसका भी कुछ सीटों पर असर पड़ना तय है। लेकिन चुनाव दोनों गठबंधन के बीच ही है। पूरे बिहार में कोरोना संक्रमण का कोई असर चुनाव पर नहीं दिखलाई दे रहा है। कोई मास्क लगाता और शारीरिक दूरी का पालन करता दिखलाई नहीं पड़ता। हालांकि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सतीश सिंह जी की कल ही कोरोना से मौत हुई है। बिहार सरकार ने भी पटना तक के लगभग सभी कोविड सेंटर बन्द कर दिए हैं।

चुनाव जब शुरू हुआ था तब स्पष्ट तौर पर जनता दल यूनाइटेड-भाजपा गठबंधन आगे था। तेजस्वी यादव को लेकर भी तमाम किस्म की बातें की जा रही थीं परन्तु हर चरण के बाद महागठबंधन की हवा बनती और बढ़ती चली गयी। आज जब तीसरे चरण का चुनाव प्रचार चरम पर है। मतदाताओं के बीच महागठबंधन  की बढ़त स्पष्ट दिखलाई दे रही है। हालांकि ईवीएम को लेकर जनता की आशंकाएं बरकरार हैं।

नतीजे के लिए 10 तारीख का इंतजार सबको करना होगा।

(डॉ. सुनीलम समाजवादी नेता हैं और आप मध्य प्रदेश के विधायक रह चुके हैं।)

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