Thursday, February 22, 2024

व्हाट्सएप इतिहास से बनाया जा रहा है मुसलमानों के खिलाफ माहौल: एस इरफान हबीब

नई दिल्ली। प्रख्यात इतिहासकार एस. इरफान हबीब ने कहा है कि आजकल इतिहास व्हाट्सएप पर है। रोज कुछ न कुछ वायरल हो रहा है। जिसका नतीजा यह है कि लोग वास्तविक इतिहास से एकदम दूर हो गए हैं। हबीब दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। वैखरी (फेस्टिव ऑफ आइडिया) नाम से दो दिनों तक चलने वाला यह कार्यक्रम सुरजीत भवन में आयोजित किया गया है। कार्यक्रम में किताबों, सिनेमा और समसामयिक मुद्दों पर चर्चा हो रही है। कार्यक्रम का आयोजन लेखक अशोक कुमार पाण्डेय और उनकी टीम ने किया है।

कार्यक्रम की शुरुआत अनहद और मुदासिर के मधुर तबला वादन से हुई। अनहद मात्र 14 साल के हैं और इस कार्यक्रम के सबसे छोटे कलाकार हैं। कार्यक्रम में आज के सामाजिक और धार्मिक परिप्रेक्ष्य पर चर्चा की गई। जिसमें प्रोफेसर एस. इरफान हबीब, प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल, प्रोफेसर अनामिका और कवि गणेश विषपुते ने हिस्सा लिया।

प्रो.अनामिका ने आज के समय में हिंदी साहित्य के इतिहास पर चर्चा की। आज के परिप्रेक्ष्य पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि विश्व में जिनका इतिहास सबसे काला था, बाद में उनका साहित्य उतना ही उभरकर सामने आया। उसके बाद धीरे-धीरे सारी विधा मिलती गई और वैखरी बनती गई।

उन्होंने कहा कि इतिहास में एक ऐसा दौर भी आया जब धर्म ने मार्क्सवाद की अस्मिता को खत्म करने का पूरा प्रयास किया। इसमें वह एक हद तक सफल भी रहा।

अनामिका कहती हैं कि इतिहास में कई गलतियां हुई हैं समय रहते उन गलतियों को सुधारा जा सकता है। आज की स्थिति पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि आजकल सब कुछ काल्पनिक तौर पर चल रहा है। आज करनी और कथनी में बहुत अंतर है।

हमारा समय और इतिहास विषय पर प्रख्यात इतिहासकार एस. इरफान हबीब ने अपनी बात रखते हुए कहा कि आजकल इतिहास व्हाट्सएप पर है। रोज कुछ-कुछ वायरल हो रहा है। जिसका नतीजा यह है कि लोग वास्तविक इतिहास से एकदम दूर हो गए हैं।

देश में लोगों के बीच सिर्फ हिंदू-मुस्लिम करवाया जा रहा है। संघ और बीजेपी पर इशारे से हमला करते हुए उन्होंने कहा कि ये वही लोग हैं जिन्होंने न कभी इतिहास को पढ़ा और न ही उस वक्त की सामग्री को जानना चाहा। अब सिर्फ अफवाहों के ही इतिहास पर भरोसा रखते हैं। जिस पर जल्दी भरोसा कर नतीजे पर पहुंच जा रहे हैं। जिसके बाद एक समुदाय विशेष के खिलाफ जहर उगला जा रहा है।

टेक्नोलॉजी पर अपना रोष जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि व्हाट्सएप का इतिहास ही आखिरी सत्य माना जा रहा है। आज के दौर में राष्ट्रवाद का ऐसा दौर चल रहा है। जहां लोगों को पाकिस्तान तक जाने के लिए कहा जा रहा है।

मुस्लिम इतिहासकारों को आज नकारा जा रहा है। आलम यह है कि हम भगत सिंह को 23 मार्च को फूल माला चढ़ा देते हैं लेकिन न उन्हें पढ़ रहे हैं न ही उनके नक्शे कदम पर चल रहे हैं।

सरकार और मीडिया द्वारा लगातार इतिहास को तोड़ मरोड़कर पेश करने के मामले पर वो कहते हैं कि इतिहास का पहले भी गलत इस्तेमाल होता रहा है लेकिन कभी भी इसमें राज्य उसमें शामिल नहीं होता था। लेकिन आज के दौर में राज्य ही इसका गलत इस्तेमाल कर माहौल बना रहा है।

गणेश विषपुते ने कहा कि आज कल नाम के साथ-साथ कई चीजों को बदला जा रहा है। गणेश कवि हैं और महाराष्ट्र के औरंगाबाद के रहने वाले हैं। हाल में अपने शहर का नाम बदले जाने से वह बेहद नाखुश हैं। यह गुस्सा यहां उनके चेहरे और जबान पर भी दिख रहा था। उनका कहना था कि अगर अब भी हम आगे नहीं आए तो चीजों को संभालना बहुत मुश्किल हो जायेगा। 

देश के मौजूदा हालात पर अपनी बात रखते हुए प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि आज के दौर में सत्य का निर्धारण समय से नहीं उसकी जगह से हो रहा है। हिंदुत्व को मानने वाले अपने मनमाने ढंग से सब कुछ चला रहे हैं। लिंचिंग से लेकर संसद का चलने नहीं चलने देना एक लक्षण है। जिसे समझने की जरूरत है कि सरकार कैसे लोगों के दिमाग को नियंत्रित कर रही है।

उन्होंने साल 2012 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का जिक्र किया। वह कहते हैं कि इसमें कई बुद्धिजीवी लोगों ने हिस्सा लिया। जबकि उसके पीछे का इतिहास क्या था इस पर कोई बात नहीं करना चाहता। क्योंकि गांधी के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाया गया।

वह कहते हैं कि आज के दौर में आरएसएस ने लोगों के दिमाग पर कब्जा कर उसमें मुसलमानों के खिलाफ जहर घोल दिया है। बहुसंख्यक के बीच अल्पसंख्यक के खिलाफ द्वेष भरा जा रहा है। इसलिए ज़रूरी है भय पर विजय पाई जाए क्योंकि जहां भय है वहां करुणा नहीं हो सकती है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सपोले देखने में बहुत सुंदर लगते हैं लेकिन उससे हमारी जान को भय है इसलिए हम उस पर करुणा नहीं करते हैं।

आज के दौर की बात करते हुए वह कहते हैं कि आज ऐसा समय ला दिया गया है जिसमें मॉब लिंचिंग बिल्कुल सामान्य हो गयी है। लोगों की जान की कोई कीमत नहीं है।

कार्यक्रम के संयोजक अशोक कुमार पाण्डेय ने जनचौक से बात करते हुए कहा कि आज के दौर में तरह-तरह के भव्य कार्यक्रम किए जा रहे हैं जिसमें बहुत पैसा लगाया जाता है। लेकिन वहां कंटेंट पर जोर नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में हमने यह निर्धारित किया कि विचारों के ऐसे मंच का आयोजन करें जहां कम पैसों में भी लोगों तक अच्छी सूचना पहुंचाई जा सकती है।

आज एक खास तरह के लोगों और उनके विचारों को ही प्रमोट किया जा रहा है। इसलिए हमारी टीम ने ऐसे फेस्टिवल को कराने का निर्णय लिया जहां देश के अलग-अलग हिस्सों से आकर लोग अपनी बात को रख पाएं। जिसमें गांधीवाद, मार्क्सवाद, आंबेडकरवाद से ताल्लुक रखने वाले लोग को बुलाया गया है।

उन्होंने कहा कि कार्यक्रम की सबसे अच्छी बात ये रही कि इसे सुनने के लिए युवा आए हैं। दिल्ली के आस-पास के इलाकों से स्टूडेंट ने शिरकत की है। ये अपने आप में बड़ी बात है जिस वक्त फासीवाद का दौर चल रहा है। ऐसे में युवाओं का इस तरह के कार्यक्रमों में हिस्सा लेना अपने आप में बड़ी बात है। 

(जनचौक संवाददाता पूनम मसीह की रिपोर्ट।)

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