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Saturday, September 25, 2021

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जहाँ सौ से ज्यादा केस लम्बित हों, वहां स्पेशल सीबीआई कोर्ट का गठन हो

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विधायकों और सांसदों के खिलाफ क्रिमिनल केसों की लंबी पेंडेंसी पर उच्चतम न्यायालय के चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि इस मामले को डील करने के लिए ज्यादा स्पेशल और सीबीआई कोर्ट के गठन की जरूरत है। उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा है कि वह जहां भी स्पेशल कोर्ट के गठन की जरूरत है वहां इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराने में मदद करे। इसके साथ पीठ ने यह निर्देश भी दिया है कि संबंधित राज्यों के उच्च न्यायालय की पूर्व अनुमति के बिना विधायकों के खिलाफ कोई भी आपराधिक मुकदमा वापस नहीं लिया जाना चाहिए तथा सांसदों/विधायकों के खिलाफ मामलों को देखने वाले न्यायाधीशों को उच्चतम न्यायालय के अगले आदेश तक, उनकी मृत्यु या सेवानिवृत्ति के अधीन, अपने पद पर बने रहना चाहिए।

पीठ ने विशेष / सीबीआई न्यायालयों की स्थापना को युक्तिसंगत बनाने की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया। पीठ ने कहा कि एक राज्य में एक/दो न्यायालयों के लिए यह संभव नहीं है कि वे सभी परीक्षणों में तेजी लाएं या धारा 309, सीआरपीसी के संदर्भ में दिन-प्रतिदिन के आधार पर इसे लें। पीठ ने सुझाव दिया कि जिस राज्य में 100 से अधिक मामले हैं, उसके विभिन्न हिस्सों में विशेष / सीबीआई अदालतें होनी चाहिए।

पीठ ने उच्च न्यायालयों को सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मुकदमों के शीघ्र निपटान के लिए जहां भी आवश्यक हो, विशेष / सीबीआई अदालतें स्थापित करने के लिए कहा। पीठ ने उच्च न्यायालयों को केंद्र या राज्य सरकारों द्वारा किसी भी असहयोग की स्थिति में आगे की आवश्यक कार्रवाई के लिए उच्चतम न्यायालय को स्थिति रिपोर्ट भेजने का भी निर्देश दिया। पीठ ने उच्च न्यायालयों से कहा है कि वह इस बात को सुनिश्चित करे कि समय पर ऐसे मामले का ट्रायल सुनिश्चित हो।

भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय की अर्जी पर सुनवाई के दौरान पीठ ने उक्त आदेश पारित किया। उपाध्याय ने कहा है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ पेंडिंग क्रिमिनल केस के जल्द निपटारे के लिए स्पेशल कोर्ट का गठन किया जाए। पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि राज्य में एक या दो स्पेशल कोर्ट न्याय का उपहास होगा क्योंकि बड़ी संख्या में पेंडिंग केस हैं।

पीठ ने इस संबंध में उच्च न्यायालयों द्वारा गठित विशेष खंडपीठ को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि जहां तक शीघ्र निपटान में सहयोग का संबंध है, राज्य पुलिस या अभियोजन एजेंसी की ओर से कोई ढिलाई न बरती जाए। उच्च न्यायालयों द्वारा निरंतर न्यायिक निगरानी, पर्यवेक्षण और सतर्कता होनी चाहिए। पीठ ने सभी उच्च न्यायालयों को पर्याप्त न्यायालय स्थापित करने और समय-समय पर शीर्ष न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों का सावधानीपूर्वक अनुपालन सुनिश्चित करने की उनकी जिम्मेदारी की याद दिलाई है।

पीठ ने मध्यप्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि भोपाल में एक स्पेशल कोर्ट है राज्य के अलग-अलग इलाके से फिजिकल तौर पर लोगों की पेशी संभव नहीं है। ये न्याय का उपहास है। पीठ ने कहा कि राज्यों में कई स्पेशल कोर्ट और सीबीआई कोर्ट के गठन की जरूरत है। ये संभव नहीं है कि राज्य में एक या दो स्पेशल कोर्ट में ट्रायल हो।

पीठ ने सुझाया है कि राज्य के अलग-अलग इलाके में स्पेशल कोर्ट का गठन हो और जहां 100 से ज्यादा केस पेंडिंग है वहां कोर्ट का गठन होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट से कहा है कि पेंडिंग केसों के ट्रायल के लिए जहां भी जरूरत है वहां स्पेशल कोर्ट का गठन करें। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें हाई कोर्ट को पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराएं ताकि जरूरत के हिसाब से स्पेशल कोर्ट का गठन किया जा सके।

पीठ ने कहा कि अदालत के सामने सॉलिसिटर जनरल ने कहा है कि वह सीबीआई डायरेक्टर से मिलकर मामला उठाएंगे कि पर्याप्त मैन पावर और इंफ्रास्ट्रक्चर सीबीआई को मिले ताकि समय पर छानबीन पूरा किया जा सके। पीठ ने एसजी मेहता को अदालत के आदेशों का पालन करने और लंबित मामलों से संबंधित स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने के लिए 2 सप्ताह का समय दिया था।

पीठ ने सीबीआई निर्देश दिया है कि सीबीआई आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाएगी और आरोप तय करने और मुकदमे को समाप्त करने के लिए आगे बढ़ने के लिए सीबीआई अदालतों को आवश्यक सहायता प्रदान करेगी। सीबीआई यह सुनिश्चित करेगी कि अभियोजन पक्ष गवाह को पेश करने में उसकी ओर से कोई चूक न हो।

पीठ ने सीबीआई द्वारा पेश स्थिति रिपोर्ट पर ध्यान देते हुए उपरोक्त निर्देश पारित किए। रिपोर्ट से पता चला है कि विभिन्न सीबीआई अदालतों में मौजूदा सांसदों और पूर्व सांसदों से जुड़े 121 मामले और मौजूदा विधायकों और पूर्व विधायकों से जुड़े 112 मामले लंबित हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, 37 मामले अभी भी जांच के चरण में हैं, जिनमें से सबसे पुराने 24 अक्टूबर 2013 को दर्ज किए गए हैं। लंबित मुकदमे के विवरण से पता चलता है कि ऐसे कई मामले हैं जिनमें वर्ष 2000 तक आरोप पत्र दायर किया गया था, लेकिन अभी भी या तो आरोपी की पेशी, आरोप तय करने या अभियोजन साक्ष्य के लिए लंबित हैं।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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