Sunday, May 22, 2022

बिहार: कोर वोटर भूमिहार बीजेपी से क्यों अलग हो गए? बन रहा है भू+माय समीकरण

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पटना। जाति और बिहार की राजनीति का बेहद ही अनोखा संबंध रहा है। यहां बिना जाति के राजनीति हो ही नहीं सकती। चुनाव 2020 के हर चुनावी मंच से राजनेता जात-पात से ऊपर उठने की बात तो करते थे, लेकिन मत पेटी में वोट जाति को देखकर ही डाला गया। इसी जातिगत वोट बैंक में भूमिहार जाति को अपनी ओर करके राजद ने हाल में ही एमएलसी चुनाव और उप चुनाव जीता है। जिसके बाद से बिहार में नए राजनीतिक समीकरण भू+माय की बात चर्चा में है। यहां भू का मतलब भूमिहार, और माय का मतलब मुस्लिम+यादव है।

आरजेडी ने भूमिहारों को दी तरजीह, राजपूत को तवज्जो

2020 के विधानसभा चुनाव में अगर तेजस्वी यादव के ‘बाबू साहब’ वाले बयान को हटा दिया जाए तो आप समझ जाएंगे कि राजद ने अगड़ा बनाम पिछड़ा की राजनीति छोड़ दी है। आरजेडी के वरिष्ठ नेता जगदानंद सिंह ने कहा था कि उनकी पार्टी सवर्ण समाज को साथ लेकर चलती रही है। हाल में हुए विधान परिषद का चुनाव और बोचहां उपचुनाव इस बात को सच साबित कर दिया है।

‘केवल सच’ पत्रिका के संपादक बृजेश मिश्रा बताते हैं कि, “आरजेडी ने एमएलसी चुनाव को लेकर 24 उम्मीदवारों की सूची जारी की थी, जिसमें नौ यादव, पांच भूमिहार, चार राजपूत, एक-एक टिकट ब्राह्मण-वैश्य, कुशवाहा एवं तीन टिकट मुस्लिम नेताओं को दिया था। राजद ने 6 सीट पर जीत दर्ज की थी। जिसमें तीन भूमिहार और एक राजपूत यादव और वैश्य समुदाय से जीते थे। आरजेडी ने उम्मीद के उलट ‘भूराबाल’ से दुश्मनी के बजाए दोस्ती गांठ ली और नतीजा फायदे का रहा।”

अनंत सिंह

बोचहां उपचुनाव में राजद की जीत, बिहार में बदल जाएगा सियासत का गणित?

मैथिल लेखक और पत्रकार आत्मेश्वर झा बताते हैं कि, “एमएलसी चुनाव के बाद बोचहां विधान सभा उपचुनाव में राजद ने सवर्णों को साधने के लिए तमाम रणनीति बनाई। 

नतीजा बोचहां उपचुनाव में राजद प्रत्याशी अमर पासवान की जीत के रूप में सामने आया। करीब 30-35 साल बाद बिहार की पॉलिटिक्स में भूमिहार समाज के लोगों ने बीजेपी से अलग जाकर किसी पार्टी को दिल खोलकर वोट किया। 2005 से सत्ता से बेदखल लालू यादव का परिवार बिहार में पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए ‘A टू Z’ फॉर्म्यूले पर काम करना शुरू कर दिया है।” 

अनंत सिंह को साथ लाकर शुरू हुई भूमिहार समाज को तवज्जो देने की शुरुआत

2015 में जब लालू नीतीश एक साथ हुए थे तब बाहुबली नेता अनंत सिंह पर बाढ़ में विनय उर्फ पुटुस यादव की हत्या करवाने के आरोप लगे थे। उस वक्त लालू यादव ने 

अनंत सिंह को अरेस्ट करवाकर पटना के बेऊर जेल में बंद करवा दिया था। जिस घटना के बाद लालू यादव कई मंचों पर कहते दिखे कि भूमिहार यादव को परेशान करेगा तो वह उसका अनंत सिंह जैसा हाल कर देंगे। लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव ने उसी अनंत सिंह को मोकामा विधानसभा सीट से टिकट दिया। राजनीतिक पंडितों के मुताबिक एमएलसी चुनाव में अनंत सिंह के कहने पर भूमिहार समुदाय से आने वाले कार्तिकेय मास्टर, इंजीनियर सौरभ और अजय सिंह को टिकट दिया गया। और उन्होंने जीत भी दर्ज की।

भूमिहार ब्राह्मण मंच के संस्थापक आशुतोष कुमार

‘बाभन के चुड़ा यादव के दही दोनों भाई मिल जाए तो हो जाए सही’

राजनीतिक पंडितों के मुताबिक बीजेपी की राजनीति का विरोध करने वाला ‘भूमिहार ब्राह्मण सामाजिक फ्रंट’ का बोचाहां उपचुनाव में राजद को जिताने में महत्वपूर्ण योगदान है। भूमिहार ब्राह्मण मंच के प्रमुख आशुतोष कुमार लिखते हैं कि, “जो भूमिहारों को अपना बंधुआ मजदूर समझ बैठे थे,उन्हें भूमिहारों ने सबक सिखा दिया है। भूमिहार जब एकजुट हो जाएगा, अपना हक और अधिकार सत्ता के कुर्सी पर बैठे मठाधीशों के जबड़ों से छीन कर लाएगा। ये एकता कायम रखिए, बंधुआ मजदूरी अब और नहीं!”

वहीं फ्रंट के कार्यकारी अध्यक्ष पूर्व मंत्री अजीत कुमार बताते हैं कि, “हम किसी भी पार्टी का समर्थन नहीं करते हैं। लेकिन जो हमारी इज्जत करेगा उसके साथ हम खड़े होंगे। वैसे भी अब तक दुश्मन की तरह लड़ते भूमिहार और यादव दोस्त बनते दिख रहे हैं। बाकी बाभन के चुड़ा यादव के दही दोनों भाई मिल जाए तो हो जाए सही।”

रिटायर्ड आईपीएस सुधीर कुमार सिंह भूमिहार ब्राह्मण जाति से ताल्लुक रखते हैं। सुधीर कुमार सिंह सोशल मीडिया पर अक्सर भूमिहार को केंद्र में रखकर बिहार की जातिगत व्यवस्था पर लिखते रहते हैं। बोचहां के चुनावी रिजल्ट के बाद वह लिखते हैं कि, ” बोचहां में राजद की जीत से स्पष्ट हो गया है कि बिहार की राजनीति ने क्रांतिकारी मोड़ ले लिया है। अब तक दुश्मन की तरह लड़ते भूमिहार और यादव दोस्त बनते दिख रहे हैं। बोचहां की पराजय के बाद हर जिले, हर प्रखंड में मारीचि भेजे जायेंगे, जो हर जगह ,हर जिले में भूमिहार बस्तियों में जायेंगे और समझाएंगे कि यादव कभी भूमिहारों के हितैषी नहीं हो सकते। इनकी बातों में मत आना। ये किसी के भक्त नहीं हैं। बोचहां तो बस टेलर है उस रणांगण का जो ’24 और ’25 में सजने वाला है।”

बीजेपी है तो हमारा अस्तित्व जिंदा है

लगभग सभी जिलें के भूमिहार ब्राह्मण समुदाय के लोगों से बात करने के बाद पता चला कि जहां भूमिहार समुदाय के लोग अधिक संख्या में हैं वहां कुछ लोग राजद तो कुछ लोग बीजेपी के पक्ष में बात करते हैं। लेकिन जिस जिले या क्षेत्र में कम संख्या में भूमिहार समुदाय के लोग रहते हैं। वहां अधिकतर लोग बीजेपी के समर्थन में दिखे।

सहरसा जिला के मुकेश ठाकुर बताते हैं कि, ” आज के समय में कोई एक मंच किसी जाति का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है। भूमिहार ब्राह्मण समुदाय 90 के दशक का भुक्तभोगी है। वह बीजेपी छोड़कर किसी भी पार्टी को वोट नहीं देगा।” वहीं समस्तीपुर जिला के राहुल राय बताते हैं कि, “बाप-दादा से सुने किस्से आज भी रुलाने को मजबूर कर देता है। हम लोग भी बेरोजगारी और महंगाई का विरोध करते हैं। लेकिन वोट के वक्त खुद की सुरक्षा को ज्यादा महत्वपूर्ण समझते हैं। एमएलसी चुनाव में धन और बल का खेल चलता है वहीं बोचहां उपचुनाव एक स्थानीय जगह का चुनाव था ना कि बिहार का। इस चुनाव से आप पूरे भूमिहार समुदाय के मन की बात नहीं समझ सकते हैं।”

बिहार में फिर से सवर्ण राजनीति में जान आई

“1990 के विधानसभा चुनाव तक तथाकथित ऊँची जातियों के ख़िलाफ़ पिछड़ी जातियों की जो गोलबंदी थी, देखने को मिलती थी। जिसका बीज पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने रखा था। फिर 1995 के विधानसभा चुनाव में कोइरी-कुर्मी और यादवों की महत्वाकांक्षा आपस में ही टकराने लगी। फिर नीतीश कुमार 1994 में कुर्मियों की रैली में शामिल हुए और 2000 का विधानसभा चुनाव आते-आते यादवों के वर्चस्व को लेकर पिछड़ी जातियों के भीतर से ही आवाज़ उठने लगी। इसके बाद धीरे धीरे बिहार में पिछ़ड़ी जातियों की गोलबंदी टूटी। अब स्थिति ऐसी है कि हर पार्टी सवर्णों की राजनीति कर रही है। 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद राज्य की 243 विधानसभा सीटों में से करीब 64 विधायक अगड़ी जातियों से चुनकर आए। जहां एक तरफ राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण और वैश्य जाति के विधायकों की संख्या बढ़ी वहीं यादव, कुर्मी और कुशवाहा विधायकों की संख्या में कमी आई।” जेएनयू के छात्र और भाकपा बिहार के नेता सुनील बताते है।

(बिहार से राहुल की रिपोर्ट।)

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