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Thursday, August 5, 2021

नागरिकता का कागज मांगने वाले नागरिकों की तरफ कब देखेंगे?

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पिछले साल की ही तरह इस साल भी बाढ़ असम में कहर ढा रही है। पिछले साल असम में आई बाढ़ में तकरीबन 43 लाख लोग प्रभावित हुए थे, तो इस साल अब तक 25 लाख के आस-पास लोग बेघर हो चुके हैं और 70 लाख लोगों का जीवन बाढ़ के चलते बुरी तरह प्रभावित हुआ है। प्रदेश के 33 जिलों में से 24 बाढ़ की चपेट में हैं और अब तक 87 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। छह दर्जन जानवरों सहित विश्वप्रसिद्ध काजीरंगा पार्क 95 फीसद डूब चुका है। 

असम में बाढ़ हर साल आती रही है, लेकिन पिछले सौ सालों के आंकड़े देखें तो दो से चार साल के अंतर पर इसकी भयावहता कम-ज्यादा होती रही है। ऐसा पहली बार है, जब पिछले छह सालों से असम लगातार भयंकर बाढ़ का सामना कर रहा है। और इस बार तो पिछले पांच-छह सालों की सबसे भयंकर बाढ़ है। यूरोप के दो प्रतिष्ठित फुटबॉल क्लबों (चेल्सी और आर्सेनल) ने असम बाढ़ पर चिंता और पीड़ितों के प्रति एकजुटता जताते हुए ट्वीट किए हैं। कई देशी-विदेशी सेलिब्रिटीज ने भी असम बाढ़ पर गहरी चिंता दर्शाते हुए सहायता घोषित की है, लेकिन देश के भीतर अभी भी इसे रोजमर्रा की ही चीज माना जा रहा है।

असम लगातार बाढ़ के घेरे में क्यों है, इसकी वजह साफ है। यहां दुनिया की पांचवीं सबसे ज्यादा पानी और पहाड़ी मलबा ले जाने वाली ब्रह्मपुत्र तो है ही, छोटी-बड़ी तकरीबन 48 नदियों का जाल भी असम को  घेरे हुए है। ब्रह्मपुत्र और बराक नदी की घाटी मिलकर असम की जियोग्राफी में अंग्रेजी के अक्षर ‘यू’ जैसी आकृति बनाती है और जब पानी आता है तो इसी घाटी में भरता है। फिर ब्रह्मपुत्र भी वक्त के साथ बढ़ती जा रही है। सन 1912 से 1928 के बीच हुए एक सर्वे के मुताबिक तब ब्रह्मपुत्र असम का 3, 870 वर्ग किमी एरिया कवर करती थी। साल 2006 में हुए सर्वे के मुताबिक अब यह 6,080 वर्ग किमी फैल चुकी है और लगातार अपना विस्तार करती जा रही है। 

एक आम आदमी के मन में सवाल उठ सकता है कि सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस बाढ़ पर अभी तक काबू क्यों नहीं पाया जा सका? दरअसल सरकारों ने पानी पर काबू पाने के लिए यहां जितने भी बांध बनाए, बताते हैं कि किसी की क्वालिटी खराब निकली तो किसी की इंजीनियरिंग। गुवाहाटी में रहने वाले पल्लब गोगोई बताते हैं कि आज हाल यह है कि जब पानी आता है तो पता ही नहीं चलता कि बांध कहां है और बाढ़ निगरानी कैंप कहां है।

गोआलपाड़ा में रहने वाली ज्योति रूपा सैकिया ने बताया कि सरकार सिर्फ इन्हीं बांधों पर इतनी बुरी तरह से निर्भर रहती है कि दूसरे उपायों पर ध्यान ही नहीं देती। कितनी ही बार क्षेत्र के लोगों ने सरकार से बाढ़ से निपटने के लिए दूसरी प्रूव्ड थ्योरीज पर काम करने की मांग की, जो सुनकर भी अनसुनी कर दी गई। अभी भी असम में तकरीबन 70 से अधिक परियोजनाएं बाढ़ नियंत्रण की चल रही हैं, लेकिन लगभग सारी सिर्फ बांध बनाकर नदी को ही कंट्रोल करने की हैं। जबकि नदी अपने किनारों से कंट्रोल होती है और किनारों को जंगल और वृक्ष ही कंट्रोल में रखते हैं।

वैसे असम में बाढ़ कोई रातोंरात नहीं आ गई है। मई के अंत से ही सरकार को ब्रह्मपुत्र का मिजाज पता था। सरकार को यह भी पता था कि तिब्बत, भूटान, अरुणाचल और सिक्किम का ढलान उसी की ओर है। सरकार यह भी जानती थी कि असम की हिमालयी जमीन अभी इतनी कठोर नहीं है कि बाढ़ का आघात सह ले जाए। इसके बावजूद भी असम सरकार जैसे किसी नींद में रही, नतीजतन आज लॉकडाउन में मजदूरों के बाद दूसरा सबसे बड़ा विस्थापन हो चुका है। असम की बाढ़ सिर्फ बारिश, ब्रह्मपुत्र या बराक की वजह से विकराल नहीं हो रही है। वहां बाढ़ की वजह हमेशा साफ रही है और वक्त भी पहले से ज्ञात रहा है। अब अगर सरकार इससे नहीं निपट पा रही है तो उसे समझना होगा कि इसके पीछे एक वजह वह खुद भी है। 

(राहुल पांडेय की रिपोर्ट। नवभारत टाइम्स से साभार।) 

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