हिंदी और हिंदी समाज को क्या हो गया है?

यह सही है कि हिंदी कई अन्य भारतीय भाषाओं के मुकाबले अपेक्षाकृत नयी भाषा है। पर स्वाधीनता आंदोलन के दौरान और उसके बाद यह तेजी से विकसित हुई। देश के संविधान में कुल 22 भाषाओं को आठवीं अनुसूची में देश की प्रमुख भाषा के रूप में मंजूरी दी गई और संविधान के अनुच्छेद-343 के तहत इसे राजभाषा का दर्जा भी दिया गया। इसी अनुच्छेद के दूसरे खंड में अंग्रेजी को भी सीमित समय के लिए राजभाषा बनाया गया।

अनुच्छेद-345 के तहत राज्यों के विधानमंडलों को अधिकार मिला कि वे हिंदी या अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा यानी राजभाषा के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए स्वतंत्र होंगे। अनुच्छेद-348 के तहत उच्च न्यायपालिका की आधिकारिक भाषा के तौर पर अंग्रेजी को बरकार रखा गया।

इन संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद हिंदी को प्राथमिकता देना तय हुआ ताकि वह निकट-भविष्य में अंग्रेजी का स्थान ले सके। पर संविधान लागू होने के 75 साल बाद भी ऐसी स्थिति नहीं बन सकी है। अंग्रेजी की स्वीकार्यता अगर आज भी हिंदी के मुकाबले ज्यादा है तो इसके बहुत ठोस और वाजिब कारण हैं।

हिंदी आधिकारिक तौर पर राजभाषा तो है पर व्यावहारिक तौर पर नहीं। वह अंग्रेजी का स्थान हासिल करने की स्थिति से आज भी बहुत दूर है। संवैधानिक लोकतंत्र की शुरुआत से ही इसके लक्षण और संकेत मिलने लगे थे कि हिंदी को अंग्रेजी की जगह बैठाना उतना आसान नहीं है। इसके पीछे अगर राजनीतिक कारण थे तो कई सामाजिक और सांस्कृतिक फैक्टर भी थे। हां, यह बात सही है कि सत्तर-अस्सी के दशक तक हिंदी सिनेमा की पूरे देश में धूम थी। सिनेमा की विधा को छोड़ दें तो हिंदी का साहित्य, कला और पत्रकारिता का परिदृश्य अखिल भारतीय स्तर पर न तो अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने में कामयाब हुआ और न ही भाषा के स्तर पर उसे राष्ट्रीय स्वीकार्यता मिली!

उच्च न्यायपालिका में आज भी सारा कामकाज अंग्रेजी में ही होता है। केंद्र सरकार और उसके सभी प्रमुख आयोगों-निकायों के शीर्ष स्तर के सभी प्रमुख कामकाज अंग्रेजी में होते हैं। इस तरह हिंदी की प्रगति आधिकारिक राजभाषा के तौर पर भी अपेक्षा के अनुसार नहीं है। पर हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों में हिंदी को राष्ट्रभाषा कहने का मोह आज और बढ़ गया है, जबकि यह न कभी राष्ट्रभाषा थी और न ही संविधान ने इसे राष्ट्रभाषा के रूप में निरूपित किया। इसे हमारे राजनीतिक नेता शुद्ध राजनीतिक कारणों से हवा देते रहते थे।

सच्चाई ये है कि हिंदी हर स्तर पर अंग्रेजी से बहुत पीछे है। भारतीय अंग्रेजी से उसकी तुलना की बात तो बहुत दूर रही, असलियत ये है कि आज लेखन, सृजन और चिंतन के क्षेत्र में वह तमिल, मलयालम, बांग्ला, कन्नड़, मराठी और तेलुगू के मुकाबले भी पीछे होती जा रही है। हां, हिंदी के नाम पर राजनीति जरूर बढ़ी है। जब हिंदू के नाम पर राजनीति में कुछ गतिरोध या शैथिल्य नजर आने लगता है तो हमारे नेतागण कभी जाति तो कभी भाषा पर राजनीति करना शुरू कर देते हैं।

पिछले दिनों देश के गृह मंत्री अमित शाह ने तो यहां तक कह दिया: ‘इस देश में जो लोग अंग्रेजी बोलते हैं, उन्हें जल्दी ही शर्म आएगी। ऐसे समाज का निर्माण दूर नहीं है, जिसमें अंग्रेजी बोलने वाले शर्म महसूस करेंगे।’ गृहमंत्री ने साथ में यह भी कहा: ‘हमारी संस्कृति, हमारा इतिहास और हमारा धर्म विदेशी भाषाओं में नहीं समझा जा सकता।’

गृहमंत्री के भाषण के इस अंश से हिंदी क्षेत्र में बहुत सारे लोग खुश हुए होंगे पर इसमें खुश होने जैसी कोई बात नहीं थी क्योंकि उसमें तनिक भी असलियत नहीं थी। दरअसल, गृहमंत्री के भाषण में भाषा की असलियत से ज्यादा भाषा की राजनीति ज्यादा भारी थी।

केंद्र की अगुवाई में भाजपा की सरकार पिछले ग्यारह साल से है। बीते ग्यारह सालों में उसने ऐसा क्या काम किया, जिससे अंग्रेजी की हैसियत इतनी नीचे गिर रही है कि कुछ ही समय बाद उसे बोलने वाले शर्म महसूस करेंगे और हिंदी बोलने वाले गर्व महसूस करेंगे?

वरिष्ठ मंत्री के इस विवादास्पद बयान के फौरन बाद सोशल मीडिया के कई विश्वसनीय मंचों से बताया गया कि मौजूदा सरकार के अनगिनत मंत्रियों और सत्ताधारी पक्ष के अनेक सांसदों के बाल-बच्चे देश और परदेस में न सिर्फ अंग्रेजी माध्यम के श्रेष्ठ संस्थानों में पढ रहे हैं बल्कि उनमें कई तो अंग्रेजी के बल पर ही अच्छी नौकरियां कर रहे हैं। किसी भी सरकारी एजेंसी ने इन तथ्यों का खंडन का करने का साहस नहीं किया।

सरकार के बाहर ही क्यों अंदर भी देख लीजिये, बेहतर अंग्रेजी जानने वाले एस जयशंकर, हरदीप पुरी और निर्मला सीतारमण तीनों वरिष्ठ मंत्री हैं। इनमें कोई भी आरएसएस-भाजपा राजनीतिक पृष्ठभूमि का नहीं है। एस जयशंकर और सीतारमण को तो मैं निजी तौर पर भी जानता हूं कि वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ते समय आरएसएस-भाजपा से सम्बद्ध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कभी सदस्य नहीं रहे। पर ये तीनों आज सरकार में बहुत महत्वपूर्ण है।

कुछ साल पहले वे भाजपा के औपचारिक सदस्य बन गये थे। पर शशि थरूर तो अब भी कांग्रेस के सदस्य हैं। पर अच्छी अंग्रेजी और केरल-पृष्ठभूमि के चलते मौजूदा सरकार में उनकी गजब की पूछ है। एक महीने के अंदर उन्हें दूसरी बार बडे राजनयिक मिशन पर रूस, इंग्लैंड और ग्रीस आदि भेजा गया है। इससे पहले उन्हें पिछले महीने अमेरिका और कोलंबिया सहित कई देशों में प्रतिनिधिमंडल के नेता के तौर पर भेजा गया था। भारत सरकार के दूत के तौर पर उन्होंने अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वेंस से भी मुलाकात की थी।

क्या यह सौभाग्य वैदेशिक मामलों के किसी ऐसे जानकार को मिल सकता था, जिसकी अंग्रेजी टूटी-फूटी सी हो! देश और दुनिया में अंग्रेजी के महत्व और मर्म को प्रधानमंत्री मोदी से भला ज्यादा और कौन समझेगा, जो जी-जान से चाहते हुए भी वैश्विक स्तर पर एक स्टेट्समैन के तौर पर नहीं उभर पाये! वैश्विक की बात छोड़िये, दक्षिण एशिया के हमारे पड़ोसी देश भी संकट में हमारे साथ नहीं नजर आते।

पिछले दिनों भारत-पाक कन्फ्लिक्ट के दौरान यह बात खुलकर सामने आई। लेकिन भारत के बिल्कुल नया-नया लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के पहले-दूसरे दशक में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एक बड़े वैश्विक नेता के तौर पर उभरे थे। क्या आज कोई कल्पना कर सकता है कि आधुनिक भारत के निर्माण के पहले-दूसरे दशक में ही इस देश के प्रधानमंत्री ने यूरोप के देश आस्ट्रिया के स्वतंत्र और सार्वभौम राष्ट्र के रूप में उदय का आधार तैयार किया और गुट निरपेक्ष देशों के ताकतवर समूह की नेतृत्वकारी टीम में का हिस्सा बनकर वैश्विक शांति के क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाई। इसमें नेहरू के अनेक गुणों के अलावा अंग्रेजी पर उनकी अच्छी पकड़ और एक छात्र के रूप में यूरोप में बिताये सात सालों के अनुभव की भी भूमिका रही।

बीते अठहत्तर सालों में आई-गई रंग-बिरंगी सरकारों के बावजूद भारतीय राष्ट्र-राज्य आज तक अंग्रेजी के मुकाबले की बात तो बहुत दूर रही, भारत-मूल की एक भी भाषा को अंग्रेजी के आसपास नहीं खड़ा कर सका। भारतीय भाषाओं को समृद्ध करने में सरकारों के मुकाबले हमारे लेखकों-कवियों-शायरों और फिल्मकारों ने ज्यादा प्रभावी काम किया। लेकिन बीते बीस-तीस सालों से वह सिलसिला भी शिथिल हो चुका है।

हाल के कुछ दशकों में हिंदी साहित्य और भाषा में मात्रात्मक काम खूब हुआ है लेकिन उसकी गुणात्मकता का स्तर बहुत नीचे रहा। हिंदी के मुकाबले दक्षिण की कुछ भाषाओं के साहित्य, पत्रकारिता और फिल्म-निर्माण के क्षेत्र में ज्यादातर बेहतर काम हुए हैं। हिंदी की प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा आज अंग्रेजी से नहीं, देश की अन्य प्रमुख भाषाओं से है। आज हिंदी में निकलने वाले सैकड़ों छोटे-बड़े अखबारों में कितने ऐसे अखबार हैं, जिन्हें राष्ट्रीय अखबार कहा जा सकता है?

राष्ट्रीय अखबार को फिलहाल छोडकर कोई ये ही बता दे कि हिंदी के कितने अखबार हैं, जिन्हें समस्त हिंदी-भाषी क्षेत्र का प्रतिनिधि-अखबार कहा जा सकता है? सच ये है कि हिंदी के ज्यादातर अखबार नोएडा स्थित टीवी चैनलों की तरह ‘सत्ता के मृदंग’ बन चुके हैं। वे बस सत्ताधारियों की पसंद की खबरों से भरे रहते हैं।

बेशक, 2016 -17 के बाद अंग्रेजी अखबारों की भी दुर्दशा हुई है पर तमाम मुश्किलों और दबावों के बावजूद अंग्रेजी के कम से कम छह-सात अखबार आज भी न सिर्फ पठनीय हैं अपितु उनकी राष्ट्रीय छवि भी है। सच ये है कि अंग्रेजी के इन छह-सात अखबारों और मलयालम, मराठी, कन्नड, बांग्ला और तमिल के बड़े अखबारों में हिंदी अखबारों से बेहतर प्रोफेशनलिज्म नजर आता है।

इसके पीछे आर्थिक से ज्यादा सामाजिक-राजनीतिक कारण हैं। ‘हिन्दुत्ववादी-मनुवादी राजनीति और सामाजिकता’ ने मीडिया और विचार के अन्य मंचों के स्वतंत्र विकास को बाधित किया है। यह महज संयोग नहीं कि आज हिंदी में साहित्यिक-वैचारिक विमर्श का स्तर देश की कई प्रमुख भारतीय भाषाओं के विमर्श से निम्न है, जबकि हिंदी में प्रकाशकीय स्तर पर न सिर्फ निवेश ज्यादा है अपितु पाठकों-दर्शकों की संख्या भी बहुत बड़ी है। पर साहित्य और विचार-विमर्श में मानवीय गरिमा और मूल्यों का अकाल बढ़ता जा रहा है।

आजादी के बाद जो सत्ता-संरचना उभरी, उसमें बहुत सारी कमियां थीं पर स्वाधीनता आंदोलन और संविधान के मूल्यों का उस पर थोड़ा-बहुत असर कायम था। इससे हिंदी क्षेत्र के सवर्ण समुदायों का बडा हिस्सा आज जैसा ‘अनियंत्रित’ नहीं हुआ था। उसमें कुछ लोग समाजवादी तो कुछ कांग्रेसी और कुछ वामपंथी होते रहते थे। भले ही विचार और व्यवहार का उनमें भी बड़ा अंतर दिखता था पर सत्ता-संरचना के चरित्र में आज जैसा सवर्ण-हिन्दुत्ववाद हावी नहीं था।

नतीजतन विमर्श का स्तर आज जैसा ‘खुला-खेल-फर्रुखबादी’ नहीं हो पाया था। पर आज तो उस दौर के अच्छे-भले लोग भी सोशल मीडिया के आंगन में अपनी पूरी आजादी का इस्तेमाल करते हुए सिर्फ डा अम्बेडकर, बी पी मंडल या वी पी सिंह को ही नहीं नेहरू, इंदिरा गांधी और अर्जुन सिंह को भी कोसते हैं कि इन्हीं सब के चलते हिन्दी समाज में दलितों-पिछड़ों का ‘इतना मन बढ़ गया’ था!

इस ‘मन को नीचे गिराने’ के लिए वे मौजूदा सत्ता-संरचना का अभिनंदन करते हैं और इस ‘प्रतिक्रांति’ का श्रेय प्रधानमंत्री मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को देते हैं। इस तरह के सामाजिक-राजनीतिक बोध ने हिंदी क्षेत्र में साहित्य और विचार के स्तर को बहुत नीचे गिराया है। साहित्यिक और सामाजिक-बौद्धिक विमर्शों में इस ‘वैचारिक प्रतिक्रांति’ की अनुगूंज दिल्ली से पटना और लखनऊ से भोपाल-इंदौर तक सुनी जा सकती है।

विमर्श और विचार के स्तर पर हिंदी को थोडा-बहुत सहारा हिंदी की कुछ चुनिंदा वेबसाइटों, दर्जन भर यूट्यब चैनलों या सोशल मीडिया के अन्य मंचों से मिल रहा है। इसमें कुछ वेबसाइटें मूल हिंदी की हैं और कुछ द्विभाषी वैकल्पिक मीडिया समूहों से संचालित हैं। बाकी का हिंदी सोशल मीडिया तरह-तरह की कुंठाओं, दुराग्रहों, कुचक्रों, विषवमन और निकृष्ट किस्म के आत्मप्रचार या नापसंद लोगों के खिलाफ दुष्प्रचार से बुरी तरह दुर्गंधित पड़ा है।

इनमें एक बड़ा खेमा ऐेसे हिंदी के ऐसे चालाक साहित्यकारों-बुद्धिजीवियों का भी है, जो बीते सात-आठ सालों से देश के मसलों, समाज की स्थिति और राजनीति की तरफ झांकते तक नहीं। वे कभी प्रकृति-महिमा पर लिखते हैं, कभी अपने कवि-सम्मेलनों-मुशायरों पर, कभी अपनी पसंद और नापसंद के साहित्यकारों की प्रशंसा और निंदा में पूरी श्रृंखला शुरू करा देते हैं।

कुछ वरिष्ठ और कनिष्ठ बौद्धिक सोशल मीडिया के खुले आंगन में दिन-रात कूंद-फांद मचाये दिखते हैं। जब चाहे दलित-पिछड़ों और वंचित समाज के नेताओं, बुद्धिजीवियों या उनके साथ बेहतर तालमेल रखने वाले अपने ही वर्ण-वर्ग के कुछ बचे-खुचे बुद्धिजीवियों के खिलाफ तरह-तरह से अपनी भड़ास निकालते रहते हैं।

ऐसे “विमर्शों” को देखकर लगता ही नहीं कि यह वही हिंदी या हिन्दोस्तानी है, जिसमें कभी गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रेमचंद, आचार्य नरेंद्र देव, राहुल सांकृत्यायन, फणीश्वर नाथ रेणु, रामवृक्ष बेनीपुरी, यशपाल, राजेंद्र यादव और रघुवीर सहाय जैसे बड़े लेखक-विचारक और बुद्धिजीवी हुए थे। पर इसका यह भी मतलब नहीं कि हिंदी में विचार और विमर्श का विलोप हो गया है। सीमित ही सही, कुछ नये-पुराने लेखक-विचारक-टिप्पणीकार आज के ज्वलंत सवालों पर लगातार और पूरे साहस के साथ लिख और बोल रहे हैं। पर ये हाशिये पर हैं। सामाजिक-राजनीतिक नवजागरण और बदलाव के अभियानों से ही हालात बदलेंगे।

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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