चुनाव आयोग पहली बार सुप्रीम सुनवाई में क्यों फंसता दिखा? 

10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में चुनाव आयोग द्वारा आनन-फानन में चलाये जा रहे स्पेशल इंटेसिव वोटर लिस्ट रिवीजन के विवादास्पद कार्यक्रम पर भले ही रोक नहीं लगाई लेकिन अपने आब्जर्वेशन्स और सुझावों से उसने वोटर लिस्ट रिवीजन को लेकर दी जा रही आयोग की ज्यादातर दलीलों को गैरवाजिब पाया। मतदाता बनने के लिए उसके11 दस्तावेजों की सूची को भी उसने सुसंगत और दुरुस्त नहीं पाया। दस्तावेजों में आधार, वोटर कार्ड और राशन कार्ड को शामिल करने का सुझाव दे डाला।

आयोग को यह भी कह डाला कि अगली सुनवाई (28 जुलाई) से पहले चुनाव आयोग 21 जुलाई तक कोर्ट को अवगत करा दे कि वह इन तीनों दस्तावेजों को शामिल कर रहा है या नहीं! निश्चय ही बीते कुछ सालों में यह पहला मौका है जब चुनाव आयोग सचमुच मुश्किल में फंसा दिख रहा है। 

चुनाव आयोग हाल के दिनों मे संविधान के अनुच्छेद-326 के हवाले से देश को यह बताने की कोशिश कर रहा था कि नागरिकता की जांच या पहचान करने का उसे अधिकार प्राप्त है। लेकिन माननीय सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के इस दावे को भी सही नहीं पाया। अपने आब्जर्वेशन्स में कोर्ट की दो जजों की बेंच के सदस्य जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने आयोग के वकीलों की इस आशय की दलीलों को निराधार माना!

माननीय न्यायाधीशों ने एक संवैधानिक संस्था के तौर पर चुनाव आयोग को पूरा सम्मान दिया। इसलिए उसके द्वारा शुरू किये गये वोटर लिस्ट रिवीजन को रोका नहीं पर उसे दुरुस्त करने की जरूरत पर जोर दिया। उसकी सिर्फ इसी एक दलील को कोर्ट ने सही माना कि आयोग को वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण का पूरा अधिकार है। पर वह ये काम मनमाने तरीके से नहीं कर सकता! 

आयोग के गहन पुनरीक्षण के तौर-तरीकों को चुनौती देने वाले एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स(ADR) या अन्य के वकीलों के इस तर्क को कोर्ट ने बहुत गंभीरतापूर्वक लिया कि वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेसिव रिवीजन का यह समय सही नहीं है। इसके दो कारण हैं:1-चुनाव बिल्कुल करीब है, महज चार महीने! 2-बरसात और बाढ़ का समय होने के कारण बिहार में यह कार्यक्रम इतने कम दिनों में पूरा करना बहुत कठिन होगा। आम मतदाता को दस्तावेज जुटाने और चुनाव आयोग द्वारा तय किए दफ्तर तक पहुंचाने में बहुत मुश्किलें आयेंगी। 

इसकी काट में चुनाव आयोग की तरफ से स्पेशल इंटेसिव वोटर लिस्ट रिवीजन के कार्यक्रम में अब तक की प्रगति के कुछ ब्योरे तक पेश किये गये पर सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ इस आशय के ब्योरों और दलीलों से ज्यादा प्रभावित नहीं नज़र आई। 

न जाने किस संयोग या योजना से चुनाव आयोग ने 24 जून को तय किया कि बिहार की समीक्षित या संशोधित वोटर-लिस्ट का फिर से गहन पुनरीक्षण किया जायेगा! जनवरी, 2025 में ही संशोधन-परीक्षण या समीक्षा का काम पूरा हुआ था। यह तीन महीने तक चला था। फिर 24 जून को विशेष पुनरीक्षण का ऐलान हुआ और वह 25 जून से चालू भी हो गया ताकि 25 जुलाई तक सारे फॉर्म जमा हो जाएं! तकरीबन 8 करोड़ लोगों का पुनरीक्षण सिर्फ एक महीने में करना तय हुआ। वह भी जुलाई जैसे बरसात के महीने में जब दो-तिहाई बिहार बारिश और बाढ़ से पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है।

मजे की बात है कि 2003 के बाद मतदाता बने लोगों पर मतदाता सूची में बने रहने की बड़ी कड़ी शर्त थोपी गयी। 11 दस्तावेजों की सूची जारी की गई, जिसमें पासपोर्ट, शासकीय संस्था स्तर से जारी बर्थ सर्टिफिकेट, हाई स्कूल सर्टिफिकेट, जाति-प्रमाण पत्र, पेंशनधारी का पहचान-पत्र या इसी तरह के कुछ अन्य दस्तावेज शामिल किये गये! लेकिन इस सूची में आधार कार्ड, राशनकार्ड या चुनाव आयोग का मतदाता पहचान पत्र जैसे ज्यादा प्रामाणिक और लोक प्रचलित दस्तावेज शामिल नहीं किये गये। संपूर्ण विपक्ष ही नहीं, बिहार के मतदाताओं ने भी चुनाव आयोग के इस विचित्र और संदिग्ध फैसले का कड़ा विरोध किया। 

इसी का नतीजा था, 9 जुलाई को ‘बिहार बंद’ का कामयाब कार्यक्रम! बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर एनडीए के कुछ घटक दलों के प्रमुख नेताओं ने भी अनौपचारिक तौर पर इस कार्यक्रम का समर्थन किया। पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा सहित कुछ नेताओं ने चुनाव आयोग के घोषित कार्यक्रम पर एतराज तक जताया। 

हाल के वर्षों में पहली बार देखा गया जब देश के एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त रहे अवकाश प्राप्त उच्चाधिकारी सहित कई पूर्व चुनाव आयुक्तों और अंग्रेजी अखबारों के कई प्रसिद्घ स्तम्भकारों ने भी मौजूदा चुनाव आयोग के संचालकों के इस बेहद विवादास्पद फैसले पर गंभीर सवाल उठाये। सबसे बड़ा सवाल तो यही था कि बिहार की मतदाता सूची का संशोधन और परीक्षण का एक वृहद कार्यक्रम अभी जनवरी में ही जब पूरा हुआ था तो महज पांच महीने बाद यह नया पुनरीक्षण अभियान क्यों आया है? दूसरा सवाल कि यह बरसात और बाढ़ के दिनों में चुनाव से ऐन चार महीने पहले क्यों शुरू किया गया? तीसरा सवाल कि आमतौर पर ऐसे कार्यक्रमों से पहले चुनाव आयोग सर्वदलीय बैठक करता है। इस बार ऐसा क्यों नहीं हुआ?

चौथा सवाल कि 11 कागजात की जो लिस्ट जारी की गई है, उसमें आधार कार्ड, मतदाता पहचान कार्ड और राशन कार्ड जैसे प्रामाणिक और लोक प्रचलित कार्डों की जगह पासपोर्ट, पेंशन कार्ड, हाई स्कूल सर्टिफिकेट या सरकारी बर्थ सर्टिफिकेट जैसे कम प्रचलित या बिहार जैसे राज्य में बहुत कम लोगों के पास पाये जाने वाले दस्तावेजों को ही क्यों शामिल किया गया है? क्या शासन या आयोग सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों को ही मतदाता सूची में रखना चाहते हैं? उदाहरण के लिए बिहार में पासपोर्ट धारियों की संख्या महज 2.4% बताई गई है। 9वीं और 10वीं की सर्टिफिकेट वालों की संख्या 14.71% है। बर्थ सर्टिफिकेट वालों की संख्या 2.8 से 3% बताई गई है। 

बड़ा सवाल है कि इन तथ्यों से अवगत होने के बावजूद चुनाव आयोग ने ऐसे दस्तावेजों को ही सूची में क्यों रखा? क्या वह नहीं चाहता कि बिहार की मतदाता सूची में ज्यादा से ज्यादा वैध मतदाता हों और चुनाव के दौरान ज्यादा मतदान भी हो? सिर्फ़ विपक्षी दलों ने ही नहीं, अनेक स्तम्भकारों, पूर्व उच्चाधिकारियों और सबसे बढ़कर बिहार के आम मतदाताओं ने भी ठोस तथ्यों के आधार पर सवाल उठाये हैं कि फ़र्जी मतदाताओं या कथित विदेशी घुसपैठियों को रोकने के नाम पर चुनाव आयोग के मौजूदा संचालक कहीं वैध और गरीब मतदाताओं को छांटकर मौजूदा मतदाता सूची को सीमित और अपनी पसंद से नियंत्रित तो नहीं करना चाहते हैं?

ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच को भी चुनाव आयोग के इस अभियान में कुछ मूलभूत समस्या साफ नजर आई। इसीलिए कोर्ट ने आधार कार्ड, मतदाता पहचान कार्ड और राशन कार्ड को 11 की सूची में शामिल करने का सुझाव दिया। सिर्फ सुझाव ही नहीं दिया, समय भी तय कर दिया कि 21 जुलाई तक कोर्ट को आयोग इस सुझाव पर अपनी स्थिति साफ कर दे! 21 के बाद 28 जुलाई की सुनवाई निश्चय ही बहुत महत्वपूर्ण होगी!

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं।) 

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