अमेरिका से खबरें आ रही हैं कि कि ट्रंप प्रशासन इंटेल कंपनी में 10% हिस्सेदारी लेने पर विचार कर रहा है। पहली नज़र में यह सामान्य-सी वित्तीय डील लग सकती है, लेकिन यह उस गहरे संकट की झलक है जिसमें आधुनिक पूंजीवाद फँसा हुआ है। दुनिया की सबसे पुरानी और मशहूर चिप निर्माता कंपनी, जिसने कभी तकनीकी नेतृत्व में अपनी पहचान बनाई थी, अब घाटे और प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने की वजह से सरकारी सहारे की मोहताज हो गई है। सवाल यह नहीं है कि इंटेल का भविष्य क्या होगा, बल्कि यह है कि क्या ऐसी कंपनियाँ अब स्वतंत्र रूप से टिक सकती हैं या उन्हें हमेशा राज्य की बैसाखी चाहिए।
इंटेल की हालत किसी से छिपी नहीं है। पिछले साल उसे 18.8 अरब डॉलर का नुकसान हुआ और इस साल के शुरुआती छह महीनों में ही 3.8 अरब डॉलर की हानि दर्ज हो चुकी है। कंपनी ने पिछले साल 15,000 कर्मचारियों की छँटनी की और अब 20,000 और नौकरियों को खत्म करने की तैयारी कर रही है। भारी घाटे और घटती प्रतिस्पर्धा ने उसकी रीढ़ तोड़ दी है। चिप डिज़ाइन में वह एनविडिया से पीछे है, निर्माण तकनीक में ताइवान की TSMC और दक्षिण कोरिया की सैमसंग से पिछड़ चुकी है। मुनाफ़ा नहीं हो रहा, इनोवेशन ठहर गया है, और कंपनी अपनी संपत्तियों को बेचकर कुछ राहत पाने की कोशिश कर रही है, मगर अमेरिकी प्रशासन ने उस पर भी रोक लगा दी।
ऐसे में बचाव का रास्ता कहाँ से आता है? ज़ाहिर है कि सरकार से। 2022 का चिप्स एक्ट इसी तर्क पर बना था कि अमेरिकी कंपनियों को अरबों डॉलर दिए जाएं ताकि वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक सकें। इंटेल को सीधी अनुदान राशि, सस्ते ऋण और टैक्स में राहत का वादा किया गया। बदले में कंपनी से कहा गया कि बच्चों की देखभाल योजनाएँ दिखाइए, सामाजिक उत्तरदायित्व निभाइए, ताकि सरकार जनता को समझा सके कि उसका पैसा केवल मुनाफ़े के लिए नहीं जा रहा।
राष्ट्रपति ट्रंप ने शुरुआत में तो इंटेल के सीईओ की आलोचना की और बाद में तारीफ भी की। व्हाइट हाउस की बैठकों और बयानों के बीच से जो बात उभरकर आई, वह यही है कि सरकार कंपनी में सीधी हिस्सेदारी लेना चाहती है। ऐसे मामलों में प्रायः सरकार केवल दर्शक नहीं रहती। वह फ़ैक्ट्री बंद करने या कर्मचारियों की छँटनी जैसे निर्णयों पर रोक लगाना चाहती है ताकि राजनीतिक आलोचना से बच सके।
असल तस्वीर यह है कि पूंजीवाद अपने दम पर संकट से नहीं निकल पाता। जब भी किसी बड़ी कंपनी की हालत खराब होती है, तो सरकार सामने आती है। कभी अरबों डॉलर की सब्सिडी के रूप में, कभी सस्ते ऋण के रूप में, और कभी सीधे हिस्सेदारी लेकर। राज्य मशीनरी बार-बार इस व्यवस्था को गिरने से बचाती है, क्योंकि अगर ये दिग्गज कंपनियाँ डूब जाएँ, तो पूरा ढाँचा हिल जाएगा। इंटेल अकेला उदाहरण नहीं है। एयर ट्रैफिक कंट्रोल से लेकर एम्ट्रैक तक, कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ निजी कंपनियाँ घाटे में हैं लेकिन राजनीतिक दबाव और सरकारी हस्तक्षेप उन्हें कृत्रिम रूप से जिंदा रखता है।
यह मॉडल अंततः इनोवेशन और स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा को कमजोर करता है। निवेशक यह मानकर चलते हैं कि सरकार किसी बड़ी कंपनी को डूबने नहीं देगी, इसलिए वे जोखिम उठाने और सुधार की दिशा में कठोर कदम उठाने से बचते हैं। कंपनियाँ आराम से सरकारी फंड पर टिक जाती हैं, और तकनीकी बढ़त उनके हाथ से फिसलती जाती है। इंटेल जैसी कंपनी, जो कभी तकनीकी भविष्य की प्रतीक थी, आज इस भरोसे पर जी रही है कि राज्य उसे ‘टू बिग टू फेल’ मानकर सहारा देता रहेगा।
कहानी यही है कि निजी मुनाफ़ा जब तक चलता है तब तक पूँजीपति उसे अपना कौशल बताते हैं, लेकिन जैसे ही घाटा सामने आता है, वही बोझ जनता की जेब से चलने वाली सरकारी मशीनरी पर डाल दिया जाता है। यह चक्र चलता रहता है और यही वजह है कि यह व्यवस्था अब भी बची हुई है। इंटेल की यह कहानी हमें यह समझाती है कि पूंजीवाद का असली सहारा उसका अपना तंत्र नहीं, बल्कि राज्य है, जो हर संकट के समय उसे बचाने के लिए सामने आ खड़ा होता है।
भारत में भी पूंजीवाद की कहानी अमेरिका जैसी ही है। यहाँ भी जब बड़ी कंपनियाँ संकट में फँसती हैं, तो सरकार उन्हें बचाने के लिए आगे आती है। पिछले कुछ वर्षों में हमने बार-बार यह दृश्य देखा है कि घाटे में डूबे निजी उद्योगों को जनता के पैसों से खड़ा किया गया। एयर इंडिया इसका बड़ा उदाहरण है। दशकों तक घाटे में रही इस कंपनी को निजी हाथों में सौंपने से पहले सरकार ने उस पर चढ़ा 60,000 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज अपने ऊपर ले लिया। यानी मुनाफ़ा तो निजी हाथों में जाएगा, लेकिन घाटा करदाताओं की जेब से पूरा किया गया। यही पूंजीवाद का असली चेहरा है—सफलता निजी, असफलता सार्वजनिक।
भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में यह और स्पष्ट दिखता है। हर कुछ साल में बैंकों के एनपीए (गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ) का बड़ा हिस्सा कॉरपोरेट लोन से आता है। उद्योगपति हजारों करोड़ का कर्ज लेकर डिफॉल्ट कर जाते हैं, और फिर सरकार सार्वजनिक बैंकों में पूँजी डालकर उन्हें बचाती है। विजय माल्या, नीरव मोदी, अनिल अंबानी जैसे नाम इसी पैटर्न की उपज हैं। 2017 से अब तक सरकार ने बैंकों में 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूँजी डाली है। यह पैसा कहाँ से आता है? जनता से वसूले गए करों से। यानी पूँजीपति जोखिम उठाने का दिखावा करते हैं, लेकिन असल में उनकी सुरक्षा की गारंटी राज्य देता है।
कोविड-19 महामारी के दौरान यह प्रवृत्ति और स्पष्ट हुई। छोटे व्यवसायों और मज़दूरों को राहत के नाम पर बहुत ही सीमित मदद मिली, जबकि बड़े उद्योगों के लिए लाखों करोड़ के पैकेज घोषित किए गए। कॉरपोरेट टैक्स में कटौती कर दी गई, जिससे सरकार को सालाना करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये का घाटा हुआ, लेकिन उम्मीद यह जताई गई कि कंपनियाँ निवेश बढ़ाएँगी। हुआ उल्टा—कंपनियों ने निवेश बढ़ाने के बजाय मुनाफ़ा अपने पास रखा या शेयर बायबैक में लगाया। यह भी राज्य की उस भूमिका को उजागर करता है जिसमें वह पूंजीपतियों को सहारा देता है, भले ही उत्पादन और रोज़गार सृजन न हो।
भारत में निजीकरण भी इसी ढांचे का हिस्सा है। रेलवे, बीमा, ऊर्जा और खनन जैसे क्षेत्रों में लगातार निजी कंपनियों को प्रवेश दिया गया है। लेकिन जब घाटा होता है या कोई संकट आता है, तो जिम्मेदारी सरकार पर आ जाती है। उदाहरण के लिए, पावर सेक्टर की कई निजी कंपनियाँ कर्ज और घाटे से जूझ रही हैं। कई राज्यों में सरकारों ने इनका बिजली खरीदना सुनिश्चित किया, ताकि ये कंपनियाँ बंद न हों। इसी तरह 2008 के आर्थिक संकट के बाद से लेकर आज तक, इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों को सार्वजनिक धन से बचाया जाता रहा है। घाटा समाजीकरण और मुनाफ़ा निजीकरण का यही नियम भारतीय पूंजीवाद का केंद्रीय तत्व बन चुका है।
असलियत यह है कि भारत का पूंजीवाद अपने दम पर खड़ा नहीं है। यह लगातार राज्य की मशीनरी पर टिककर चलता है। उद्योगपतियों और सरकारों के बीच का घनिष्ठ संबंध सुनिश्चित करता है कि किसी बड़े कॉरपोरेट का पतन न होने पाए। लेकिन इस प्रक्रिया में आम जनता दोहरी मार झेलती है—पहले करों के रूप में अपना धन देकर पूंजीपतियों को बचाती है, और फिर महँगाई, बेरोज़गारी और असमानता का बोझ उठाती है। यही भारत के पूंजीवाद की वास्तविकता है। यह व्यवस्था केवल इसलिए बची हुई है क्योंकि हर संकट में राज्य उसके लिए कवच बनकर खड़ा हो जाता है। बिना इस सहारे के यह ढाँचा बहुत पहले ढह चुका होता।
पूंजीवाद की मूल प्रकृति यही है कि वह लगातार संकट पैदा करता है और उन्हीं संकटों के सहारे आगे भी बढ़ता है। मुनाफ़े की अनियंत्रित लालसा उत्पादन को एक सीमा तक धकेल देती है, लेकिन जैसे ही बाज़ार उस उत्पादन को समाहित नहीं कर पाता, संकट फूट पड़ता है। यह संकट पूंजीपतियों के लिए कोई दुर्घटना नहीं बल्कि इस प्रणाली का स्वाभाविक परिणाम है। लेकिन विडंबना यह है कि हर बार जब यह ढाँचा टूटने की कगार पर आता है, राज्य की मशीनरी उसे सहारा देकर खड़ा कर देती है। इस प्रकार पूंजीवाद अपनी विफलताओं को समाज पर लादते हुए खुद को बचा लेता है।
राज्य और पूंजी का यह रिश्ता किसी बाहरी समझौते का परिणाम नहीं है, बल्कि संरचनात्मक आवश्यकता है। राज्य उस वर्गीय व्यवस्था का प्रतिनिधि बनकर सामने आता है, जिसके बिना पूंजी का पुनरुत्पादन संभव नहीं। कानून, पुलिस, न्यायपालिका और वित्तीय नीतियाँ—ये सभी औज़ार अंततः उसी उद्देश्य के लिए प्रयुक्त होते हैं कि पूंजी के संचय की प्रक्रिया बनी रहे। जब भी बड़े उद्योग संकट में पड़ते हैं, तब राज्य केवल आर्थिक भूमिका नहीं निभाता बल्कि वैधता का आवरण भी देता है। जनता से यह कहा जाता है कि कंपनियों को बचाना राष्ट्रीय हित में है, मानो निजी मुनाफ़े का बचाव ही राष्ट्र की सुरक्षा हो।
यहां सवाल यह नहीं है कि राज्य हस्तक्षेप क्यों करता है, बल्कि यह है कि पूंजीवाद अपनी स्थायित्व की क्षमता क्यों खो चुका है। आधुनिक उद्योग अब अपने विस्तार के लिए केवल बाज़ार की स्वाभाविक शक्तियों पर निर्भर नहीं रह सकते। उन्हें लगातार सब्सिडी, टैक्स छूट और कानूनी सुरक्षा की ज़रूरत होती है। जैसे ही यह सहारा हटेगा, संकट फूट पड़ेगा। इस स्थिति में पूंजीवाद अब वैसा स्वतंत्र ढाँचा नहीं रहा, जैसा कभी औद्योगिक क्रांति के दौर में दिखता था। वह आज अपने अस्तित्व के लिए राज्य की कृत्रिम साँसों पर निर्भर हो गया है।
यही कारण है कि पूंजीवाद को समझने का अर्थ केवल उत्पादन और विनिमय के तर्क को समझना नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक ढाँचे को भी समझना है जो उसे बनाए रखता है। जब तक राज्य की मशीनरी उसकी रक्षा करती रहेगी, तब तक यह व्यवस्था बार-बार संकट से उबरकर खड़ी होती रहेगी। लेकिन हर बार संकट का बोझ समाज पर गिरेगा—करों के रूप में, महँगाई के रूप में, नौकरियों की असुरक्षा के रूप में। इस प्रकार पूंजीवाद केवल आर्थिक ढाँचा नहीं है, यह ऐसा सामाजिक तंत्र है जो अपने विघटन को स्थगित करने के लिए राज्य को लगातार इस्तेमाल करता है। यही उसका जीवन-तत्व है और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी।
(पेशे से अधिवक्ता मनोज अभिज्ञान सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर व्यवस्था के परे जाकर लिखते हैं। यहाँ व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।)