वोट चोरी: कहीं चुनाव आयोग के समानांतर कोई अदृश्य शक्ति तो काम नहीं कर रही?

इस आलेख की हेडिंग पर चर्चा की जाए इससे पहले कुछ बातों पर चर्चा जरूरी है। पिछले कुछ सालों में हमने एक नए शब्द को आत्मसात किया है, नाम है डिजिटल अरेस्ट। यह एक ऐसा घोटाला और अपराध है जिसमें अपराध करने वाला दिखता नहीं लेकिन वह टारगेट को न सिर्फ प्रताड़ित और लूटने का काम करता है बल्कि टारगेट को आत्महत्या करने तक विवश कर देता है। आज के इस डिजिटल दुनिया और कृत्रिम बौद्धिकता के युग में हम सब इसके जाल में फंसे हुए हैं। 

अगर डिजिटल गिरफ्तारी को परिभाषित किया जाए तो कहा जा सकता है कि ”डिजिटल गिरफ्तारी घोटाला व्हाट्सएप , वीडियो कॉल और अन्य डिजिटल तरीकों के माध्यम से डिजिटल रूप से किया गया एक घोटाला है और पीड़ित को विभिन्न अवैध गतिविधियों के लिए दोषी ठहराकर उसे डराता है और इन मामलों को छोड़ने के प्रलोभन के साथ पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करता है। ‘’

इसे दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि ऑनलाइन किए जाने वाले डिजिटल गिरफ्तारी घोटाले पीड़ितों को डराकर या उन पर अवैध गतिविधियों का आरोप लगाकर और उनसे भुगतान करने की मांग और दबाव डालकर उनके धन की धोखाधड़ी करते हैं। कई मामलों में पीड़ितों को उनकी मेहनत की कमाई देने के लिए मजबूर किया जाता है। और जो ऐसा नहीं कर पाते आत्महत्या तक कर लेते हैं। मूलतः इस अपराध का मकसद धन का अनुचित हस्तांतरण या धन शोधन करना, साइबर से जुड़े अपराध को अंजाम देना और मादक पदार्थों की तस्करी तक करना होता है। 

डिजिटल गिरफ्तारी घोटाला “डिजिटल गिरफ्तारी” नामक एक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है, जिसमें धोखेबाज वीडियो कॉल के माध्यम से खुद को कानून प्रवर्तन सदस्यों के रूप में नामित करते हैं और उन्हें बड़ी मात्रा में धन हस्तांतरित करने के लिए प्रस्तुत करते हैं। 

गृह मंत्रालय के अनुसार, डिजिटल गिरफ्तारी घोटालों से भारतीय नागरिकों को अब तक 120.3 करोड़ रुपए  का नुकसान हुआ है। ये घोटाले मुख्य रूप से म्यांमार, लाओस और कंबोडिया से संचालित होते पाए गए। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल ने इन घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है, जो वर्ष 2021 में 4.52 शिकायतों से बढ़कर संबंधित वर्षों के पहले चार महीनों में 7.4 लाख हो गई है। मार्च 2025 में, कर्नाटक में एक बुजुर्ग दंपति ने घोटाले बाजों द्वारा ₹50 लाख रुपए की ठगी के बाद आत्महत्या कर ली। 

अब मुद्दे की बात। जिस तरह से डिजिटल अरेस्ट का संचालन दूसरे देशों से किया जा रहा है ,कहीं ऐसा तो नहीं भारत में वोट चोरी का खेल भी किसी गुप्त एजेंसी के जरिये कहीं और से खेला जा रहा है। जिस तरह से राहुल गाँधी बड़े पैमाने पर साक्ष्य के साथ वोट चोरी के आंकड़े पेश कर रहे हैं और चुनाव आयोग या तो उन साक्ष्यों को नकारता रहा है या फिर मौन रहने में ही भलाई मानता रहा है ऐसे में इस बात की आशंका भी बढ़ती जा रही है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि भारत के कुछ लोगों के साये में इतना बड़ा चुनाव आयोग के समानांतर कोई बड़ा खेल हो रहा है और चुनाव आयोग को पता भी न हो। 

राहुल गाँधी के आंकड़ों ने अब सब कुछ सामने लाकर रख दिया है। ये आंकड़े यह बता रहे हैं कि देश के भीतर जिस तरह से चुनावी तमाशा किया जा रहा है वह वोट चोरी पर आधारित है और यह एक ऐसा खेल है जिसमें हमेशा एक पार्टी की जीत होती है और बाकी पार्टियां ख़त्म होती जाती हैं। आंकड़े से भी पता चलता है कि राजनीति करने और चुनाव लड़ने वाली पार्टियां कई सालों से ईवीएम के जरिये वोट चोरी तलाश रही थीं लेकिन वोट चोरी का असली खेल कहीं और से होता रहा है। 

ऐसे में अब यह जांच का विषय होता जा रहा है। आज कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी भले ही इस मसले पर चुप रहे लेकिन यह सच है कि इस पूरे खेल की जांच नहीं कराई गई तो लोकतंत्र की बात बेईमानी ही होगी और संविधान का कोई महत्व नहीं रह जायेगा। 

राहुल गाँधी के कम से कम दो खुलासे और मीडिया में आई ख़बरों को आप गंभीरता से देखें तो एक बात तो साफ़ है कि अब मोदी सरकार शक के घेरे में आ गई है। खुद पीएम मोदी का इकबाल तार -तार हो गया है। बीजेपी की साख ख़त्म होती जा रही है और बीजेपी की जीत पर लोगों की अंगुली उठने लगी है। ऐसे में अब सरकार की बड़ी जिम्मेदारी हो जाती है कि वह इस पूरे मसले को गंभीरता से जांच करे और सच को उजागर करे। 

पिछले दिनों कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक ‘एक्स’ पोस्ट में देश के युवाओं, खासकर जेन-जी यानी नई पीढ़ी की तारीफ करते हुए उन्हें लोकतंत्र और संविधान की रक्षा करने वाला असली ‘वैंगार्ड’ बताया है। पहले यह जानने की जरूरत है कि जेन -जी है क्या? जेन जी या जनरेशन ज़ेड, 1997 से 2012 के बीच पैदा हुए लोगों को कहा जाता है, जिन्होंने इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक के साथ अपना बचपन बिताया है। वे मल्टीटास्किंग, टेक्नोलॉजी-ओरिएंटेड और अपनी मेंटल और फिजिकल हेल्थ के प्रति जागरूक होते हैं।

जेन जी डिजिटल युग में पैदा हुए हैं और उनके लिए इंटरनेट और सोशल मीडिया जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा हैं। ये लोग एक ही समय में कई काम कर सकते हैं, जैसे वीडियो देखना, चैट करना और पढ़ाई करना। वे अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को लेकर बहुत जागरूक होते हैं। यह पीढ़ी टेक्नोलॉजी पर अधिक ध्यान केंद्रित करती है और उसे तेजी से अपनाती है। ये लोग सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा सक्रिय रहते हैं और अक्सर सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर के रूप में काम करते हैं।

राहुल गांधी का यह संदेश तब आया है जब नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों में छात्रों और युवाओं के आंदोलनों ने सरकारों को पीछे हटने पर मजबूर किया है। वहीं दूसरी तरफ, पूरे दक्षिण एशिया में युवाओं के नेतृत्व में आंदोलनों की लहर देखी जा रही है। इसके साथ ही, यह संदेश 2025 और 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले युवाओं से जुड़ने की उनकी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “देश का युवा, देश का छात्र, जेन-जी संविधान को बचाएगा, लोकतंत्र की रक्षा करेगा और वोट चोरी को रोकेगा। मैं हमेशा उनके साथ हूं।”

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ‘संविधान बचाने’ और ‘वोट चोरी रोकने’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर युवाओं के बीच सक्रिय हो रही नागरिक जिम्मेदारियों की भावना को उभार रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ एक भावनात्मक संदेश नहीं, बल्कि कांग्रेस की ओर से एक रणनीतिक दांव है। राहुल गांधी के इस ‘एक्स’ पोस्ट को रिपोस्ट करते हुए भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कहा, जेन-जी परिवारवाद के खिलाफ है। वह पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी को क्यों बर्दाश्त करेगा?”

उन्होंने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ पोस्ट में आगे लिखा, “वह भ्रष्टाचार के खिलाफ है, वह आपको क्यों नहीं भगाएगा? वह बांग्लादेश में इस्लामिक राष्ट्र तथा नेपाल में हिंदू राष्ट्र बनाना चाहता है, वह भारत को हिंदू राष्ट्र क्यों नहीं बनाएगा? देश छोड़ने की आप करो तैयारी आ रहे हैं…।”

जेन-जी, जो अब बड़ी संख्या में पहली बार वोट डालने जा रही है, 2025 और 2026 के विधानसभा चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। कांग्रेस समर्थकों ने राहुल गांधी के बयान को युवाओं को सक्रिय राजनीति से जोड़ने वाला ‘संकल्प संदेश’ बताया है। वहीं आलोचकों ने इसे महज ‘राजनीतिक बयानबाजी’ करार दिया और कांग्रेस की अब तक की युवा नीति पर सवाल उठाए हैं।

रविशंकर प्रसाद ने राहुल के इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि एक लोकतांत्रिक तरीके से तीसरी बार चुनी गई सरकार के खिलाफ राहुल गाँधी देश के युवाओं को भड़का रहे हैं और नेपाल की जेन जेड की तरह देश में अराजकता फैला रहे हैं। युवाओं को उकसा रहे हैं। यह सब एक गंभीर बात है और वे इसकी भर्त्सना करते हैं।

लेकिन रविशंकर प्रसाद और बीजेपी के दूसरे नेता अनुराग ठाकुर जो भी कह रहे हैं हो सकता है ठीक हो लेकिन वह यह नहीं कह रहे है कि वोट चोरी कैसे हो रहा है? यह आजाद भारत और मोदी सरकार का ऐसा सच है जिस पर कोई खुलकर नहीं बोल रहा। आखिर क्यों ? अगर राहुल गाँधी झूठे आंकड़े पेश कर देश को गुमराह कर रहे हैं तो क्या बीजेपी और चुनाव आयोग यह बता सकते हैं कि सच क्या है ? और जो सच है उसे बताने में उन्हें हर्ज क्या है ?

अगर राहुल गाँधी देश के साथ गलत काम कर रहे हैं और युवाओं को गुमराह कर रहे हैं तो फिर उनके खिलाफ सरकार कोई भी गंभीर सजा भी दे सकती है। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। यह खेल ठीक वैसा ही है जैसा कि नेशनल हेराल्ड केस का है। पूरी दुनिया को बीजेपी और जाँच एजेंसियां यह दिखाने में ज्यादा यकीन रखती है कि गाँधी परिवार नेशनल हेराल्ड केस में आरोपी है और इस परिवार ने गड़बड़ी की है। लेकिन सालों तक यह केस चलते रहने के बाद भी इस परिवार को सरकार गिरफ्तार नहीं कर पायी है। आखिर सरकार ऐसा क्यों कर रही है ? जाहिर है यह सब एक राजनीतिक तमाशा भर है। जनता को गुमराह करो और अपना वोट बैंक तैयार करो। 

लेकिन आज राहुल गाँधी वोट चोरी के खिलाफ जो करते दिख रहे हैं उस पर चुनाव आयोग कुछ ज्यादा ही मौन है। राहुल के हर बयान को वह एक ही लाइन में बेकार बता देता है। उसके बाद बीजेपी की तरफ से सेना तैयार होती है और चुनाव आयोग का बचाव करते हुए राहुल गाँधी को बेकार और नाकारा साबित करते नजर आते हैं लेकिन ये यह नहीं बता पाते कि जो आंकड़े राहुल ने पेश किये हैं उसमें गलत क्या है ? क्या ऐसा लम्बे समय से चल रहा है ?

और ऐसा ही है तो फिर इस पर रोक लगनी चाहिए या नहीं। ऐसे में एक शक की गुंजाइश इस बात पर जाती है कि शायद चुनाव आयोग को पता भी न हो और देश के कुछ राजनीतिक लोगों की सलाह पर विदेश से कोई बड़ा खेल किया जा रहा है। ऐसा खेल करने वाली कंपनी को करोड़ों की राशि दी जा रही हो और लोकतंत्र को बंधक ,पंगु और बेकार बनाने की कोशिश की जा रही हो। और सच यही है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले कुछ समय में लोकतंत्र का खात्मा हो सकता है।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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