आरएसएस की चौतरफा जीत एक कटु सत्य है, इसे अपनी जीत में बदलने का ऐतिहासिक कार्यभार आपके हाथ में है

महाराष्ट्र देशस्थ ऋग्वेदी-चितपावन ब्राह्मणों द्वारा गठित, संचालित एक ब्राह्मणवादी संगठन RSS ने कार्पोरेट के साथ-सहयोग से भारत की निम्न धाराओं, शक्तियों, नायकों के सपनों और भारत की संकल्पना को पराजित करके विजय हासिल कर ली है- संदर्भ- विजय दशमी (RSS के सौ साल), 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) और असोक धम्मविजय दशमी

1-भारतीय संविधान की समता, स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय, कानून के शासन, कानून के सामने सबकी बराबरी पर आधारित आधुनिक लोकतांत्रिक भारत की संकल्पना को RSS और उसके आनुषांगिक संगठनों ने मटियामेट कर दिया है। 

2- गांधी के ‘सर्व धर्म सम्भाव’ पर आधारित सहिष्णु और अहिंसक भारत के सपने को RSS और आनुषांगिक संगठनों ने ऐसी की तैसी कर दी है।

3- नेहरू के धर्मनिपेक्ष समाजवादी और पश्चिमी यूरोप की तरह आधुनिक भारत की नींव को RSS ने खोद डाला है।

4- डॉ. आंबेडकर के स्वतंत्रता, समता, बंधुता और न्याय पर आधारित आधुनिक गणतंत्रात्मक लोकतांत्रिक प्रबुद्ध भारत की संकल्पना को RSS और उसके आनुषांगिक संगठनों ने तहस-नहस कर दिया है।

5- वामपंथियों के हर तरह के शोषण-उत्पीड़न से मुक्त मेहनतकशों के राज की संकल्पना को धूल-धूसरित कर दिया है।

6- भगत सिंह के साम्राज्यवाद-पूंजीवादी शोषण-उत्पीड़न से मुक्त समाजवादी भारत की संकल्पना को RSS और उसके आनुषांगिक संगठनों ने कब्र में दफ्न कर दिया है।

7- पेरियार के अनार्य-द्रविड़ विरासत पर आधारित और ब्राह्मण सर्वोच्चता, द्विज-सर्वोच्चता, मर्दों की सर्वोच्चता और ब्राह्मणवाद से मुक्त भारत की कोशिशों को RSS और उसके आनुषांगिक संगठनों ने नाकाम कर दिया है। 

8- कर्पूरी ठाकुर, जगदेव प्रसाद, रामस्वरूप वर्मा, ललई सिंह, चंद्रिका प्रसाद ‘जिज्ञासु’ और मंडल कमीशन के सामाजिक न्याय पर आधारित भारत की सोच को RSS और उसके आनुषांगिक संगठनों ने रौंद डाला है। 

9- आदिवासियों को दिकुओं के कब्जे से पूरी तरह आजाद करने और उनके खोए गौरव-गरिमा, स्वतंत्रता, बराबरी और समृद्धि में समान साझेदारी की व्यवस्था को स्थापित करने के बिरसा मुंडा, तिलका मांझी और जयपाल सिंह मुंडा के ऐतिहासिक संघर्षों-सपनों को RSS और उनके आनुषांगिक संगठनों ने बहुत दूर का ख्वाब बना दिया है। 

10- असोक के बौद्धमय भारत के स्वप्न को RSS और उसके आनुषांगिक संगठनों ने बहुत पीछे धकेल दिया है। 

11- अकबर के ‘दीने इलाही’ पर आधारित सर्व धर्म सम्भाव, विविधता को सम्मान देने वाले और सहिष्णु भारत की सोच को RSS और उसके आनुषांगिक संगठनों ने रसातल में पहुंचा दिया है।

12- फुले दंपत्ति की न्याय, समता, बंधुता और शोषण-उत्पीड़न से मुक्त बलि राज के राज्य की स्थापना की ऐतिहासिक कोशिशों को RSS और उसके आनुषांगिक संगठनों ने नाकाम बना दिया है।

13- रैदास के ‘बेगमपुरा’ के स्वप्न को RSS और उसके आनुषांगिक संगठनों ने बहुत दूर की कौड़ी बना दिया है। 

14- कबीर के ‘अमर देशवा’ की को स्वप्न को RSS और उसके आनुषांगिक संगठनों ने मिट्टी में मिला दिया है।

15-नानक के निगुर्ण संतों-सूफी फकीरों की बानियों पर आधारित संवेदनात्मक ज्ञान को केंद्र में रखने वाले (गुरुबानी) आदर्श समाज की संकल्पना को RSS और उसके आनुषांगिक संगठनों ने किनारे लगा दिया है।

16- भारतीय उपमहाद्वीप की बहुजन-श्रमण मेहनतकशों की हर प्रगतिशील ऐतिहासिक विरासत को RSS और उसके आनुषांगिक संगठनों की प्रतिक्रियावादी-वर्चस्वादी-परजीवियों की विरासत ने पराजित कर दिया है।

आज महाराष्ट्र के देवस्थ ऋग्वेदी ब्राह्मणों-चितपावन ब्राह्मणों के संगठन RSS के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। आज की तारीख उनके लिए विजय और उल्लास का दिवस है। वे विजयी हुए हैं। वे अपने सपनों को जमीन पर उतारने में सफल हुए हैं।

आज की अनार्य परंपरा के नायकों महिषासुर और रावण पर आर्यों के हिंसक विजय का दिवस भी है। 

आज गांधी की जयंती भी है, जिन्हें भारत ने राष्ट्रपिता का दर्जा दिया है। जिनकी हत्या एक चितपावन ब्राह्मण और आरएसएस के स्वयं सेवक ने की थी। 

आज असोक धम्मविजय दशमी भी है। 

RSS और उनके आनुषांगिक संगठनों की विजय सिर्फ राजनीतिक सत्ता पर विजय नहीं हैं। उन्होंने राजनीतिक सत्ता के केंद्रों- कार्यपालिका (कैबिनेट- नौकरशाही), विधायिका (संसद- लोकसभा-राज्यसभा-राष्ट्रपति), न्यायपालिका (हाईकोर्ट-सुप्रीमकोर्ट), मीडिया, संवैधानिक संस्थाओं (चुनाव आयोग, सीबीआई, ईडी आदि), काफी हद तक सुरक्षा बलों, राज्यों की सरकारों पर नियंत्रण तो कायम कर ही लिया है। इसके साथ उन्होंने समाज और समाज की सोच को नियंत्रित करने में सफलता हासिल कर ली है।

आज वे खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, बोलने-बतियाने, लिखने-पढ़ने, तीज-त्यौहार, शादी-ब्याह, रीति-रिवाज, जीवन-पद्धति और जीवन-मूल्यों को नियंत्रित करने की स्थिति में आ गए हैं।

आज उनके पास राज्य मशीनरी के साथ राज्य से बिलकुल स्वतंत्र सैकड़ों ऐसे आनुषांगिक संगठन हैं, जो राज्य मशीनरी के मौन समर्थन या सक्रिय समर्थन से देश-समाज और व्यक्तियों की गतिविधि को नियंत्रित कर रहे हैं।

RSS और उनके आनुषांगिक संगठनों की इस सौ वर्ष यात्रा के विजयी सफलता में उनके अपने अनथक प्रयासों की भूमिका तो है, लेकिन हमारी आपकी भूल-गलतियों को भी निर्णायक भूमिका है। मुक्तिबोध की भाषा में कहें तो- 

भूल-ग़लती

आज बैठी है ज़िरहबख्तर पहनकर

तख्त पर दिल के,

चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक,

आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज पत्थर सी,

खड़ी हैं सिर झुकाए

सब कतारें

बेजुबाँ बेबस सलाम में,

अनगिनत खम्भों व मेहराबों-थमे

दरबारे आम में।

RSS और उसके आनुषांगिक संगठनों की इस ऐतिहासिक विजय के कटु सत्य को भले ही हमें पचाने में दिक्कत हो, अपने-अपने खोल में सिमटे हमारे योद्धा भाव को भले ही इससे हिला देने वाली चोट लगे, हमारे तथाकथित विजयी भाव को ठेस पहुंचे, लेकिन अपनी भारत की प्रगतिशील शक्तियों की सामूहिक हार के तथ्य-सच को इंकार करके हम अपनी सामूहिक हार को जीत में बदलने की न तैयारी कर सकते हैं, न ही जीत में बदल सकते हैं। हां यह सच है कि उनका प्रतिरोध-प्रतिवाद जारी है।

मानव जाति के इतिहास में न कोई जीत अंतिम होती है और न कोई हार, कभी हमने उन्हें हराया था, बहुत दिनों तक उन्हें पीछे धकेले रखा। पर आज का सच यह है कि उन्होंने हमें सामूहिक तौर पर हरा दिया है। हमारी भूल-गलतियों के साथ वैश्विक हालातों ने भी उनकी खूब मदद पहुंचायी है।

(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)

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