माओवादी उन्मूलन के नाम पर जारी हिंसा, राज्य दमन और कॉरपोरेट लूट को लेकर विचार विमर्श

आदिवासी संघर्ष मोर्चा व झारखंड जनाधिकार महासभा के संयुक्त तत्वावधान में 9 दिसंबर 2025 को रांची के बगईचा में झारखंड-छत्तीसगढ़ क्षेत्र में माओवादी उन्मूलन के नाम पर जारी हिंसा, राज्य दमन और कॉरपोरेट लूट को लेकर एक व्यापक विचार विमर्श आयोजित किया गया। कार्यक्रम में इस पर गहन समीक्षा की गई। कार्यक्रम में झारखंड के विभिन्न जिलों – बोकारो, लातेहार, पलामू, पश्चिमी सिंहभूम, रामगढ़, हजारीबाग, रांची आदि से आए सैकड़ों आदिवासी-मूलनिवासी, सामाजिक कार्यकर्ता, महिला कार्यकर्ता, युवा और जन संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए। 

 सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने अडाणी जैसे कॉरपोरेट समूहों का नाम लेते हुए कहा कि खनन, इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आदिवासी इलाकों को खाली कराया जा रहा है और विरोध करने पर उन्हें देशद्रोही करार दिया जा रहा है। राज्य का दमन केवल सशस्त्र आंदोलनों तक सीमित नहीं है। विस्थापन, जबरन खनन, जबरन सुरक्षा कैंप निर्माण और सैन्यीकरण के खिलाफ चल रहे शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलनों को भी कुचला जा रहा है। मूलवासी बचाओ मंच पर प्रतिबंध और उनके नेताओं पर यूएपीए के मामले इसका उदाहरण हैं। वक्ताओं के अनुसार 2019–23 के बीच देशभर में यूएपीए के तहत 10,400 से अधिक गिरफ्तारियां हुई हैं, जिसमें अकेले झारखंड में 501 गिरफ्तारी हुई है।

अवसर पर वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह विमर्श माओवादी विचारधारा के समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि माओवाद उन्मूलन के नाम पर आदिवासियों के खिलाफ चल रहे दमन पर है। किसी भी प्रकार की हिंसा चाहे राज्य की हो या किसी और की, जायज नहीं है, और ऑपरेशन ग्रीन हंट, सलवा जुड़ुम व ऑपरेशन कगार जैसे अभियानों ने यह साबित किया है कि उनका सबसे बड़ा शिकार आदिवासी समाज ही बनता है।

भाकपा (माले) के राज्य सचिव मनोज भक्त ने कहा कि केंद्रीय गृहमंत्री द्वारा मार्च 2026 तक “माओवाद के सफाये” की घोषणा के बाद आदिवासी क्षेत्रों में मुठभेड़, गिरफ्तारियां और सैन्यीकरण तेज हो गया है, जिसमें छत्तीसगढ़ और झारखंड में सैकड़ों आदिवासी सहित निहत्थे ग्रामीण और आम नागरिक भी मारे गए हैं। हालिया मांडवी हिड़मा की हत्या ने इस अभियान का असली चेहरा उजागर कर दिया है, जहां एक ओर आत्मसमर्पण की अपील होती है और दूसरी ओर तथाकथित मुठभेड़ों में हत्याएं। 

आदिवासी संघर्ष मोर्चा के राज्य सचिव देवकीनंदन बेदिया ने सवाल उठाया कि जब माओवादी संगठनों ने युद्धविराम और शांतिवार्ता की इच्छा जताई थी, तब संवाद की बजाय हिंसा क्यों चुनी गई।

महासभा के दिनेश मुर्मू ने कहा कि यूएपीए, जैसे कानून आज दमन के हथियार बन चुके हैं। इन कानूनों के जरिए हजारों आदिवासी, युवा और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में डाला गया है। संदेश साफ है “हमारे पुरखों की जमीन, जंगल और संघर्ष की विरासत को हमसे छीना जाएगा।” 

गोमिया से हीरालाल टुडू ने बताया कि हेमंत सोरेन सरकार आँख बंद करके केंद्र के माओवादी-खात्मा अभियान के नाम पर आदिवासी-खात्मा के रणनीति के नक्शेकदम पर चल रही है। राज्य में 21 अप्रैल व 16 जुलाई को गोमिया में हुए मुठभेड़ों पर भी कई सवाल खड़े होते हैं। 

संघर्ष मोर्चा की अल्मा खलखो ने कहा कि जमीन लूटने के लिए फर्जी ग्राम सभाओं के जरिए परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। उन्होंने कहा कि ग्राम सभा में 33% महिला भागीदारी जैसे संवैधानिक प्रावधानों का खुला उल्लंघन होता है, अक्सर सिर्फ एक महिला, वह भी मुखिया के नाम पर, कागजों में मौजूद होती है। 

झारखण्ड जनाधिकार महासभा के टॉम कावला ने “अबुआ सरकार” से भी गहरी निराशा व्यक्त की। भूमि बैंक, विस्थापन और दमनकारी नीतियों पर उसकी चुप्पी सवालों के घेरे में है। 

सीपीएम के राज्य सचिव प्रकाश विप्लव द्वारा भारतमाला परियोजना को रांची और आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर विस्थापन के ब्लूप्रिंट के रूप में बताया गया। 

पश्चिमी सिंहभूम से अजीत कांडेयांग ने बताया कि बिना ग्राम सभा की सहमति के लगातार सुरक्षा बल कैम्प लगाए जा रहे हैं।  

गौतम मुंडा ने कहा कि आदिवासियों के मूल मुद्दों को भटका के समुदायों के भीतर जाति-धर्म के आधार पर विभाजन को बढ़ावा दिया जा रहा है—सरना, ईसाई, हिंदू, मुसलमान जैसे खांचों में बांटकर एकता को तोड़ा जा रहा है।

चेरो समुदाय के प्रतिनिधियों ने सतबरवा में 130 एकड़ पहाड़ पर कब्जे, सैकड़ों लोगों पर मुकदमों और आंदोलन के बाद नीलांबर–पीतांबर की प्रतिमा तक पर नोटिस दिए जाने की जानकारी दी, जबकि पलामू टाइगर रिजर्व के नाम पर बड़े पैमाने पर विस्थापन जारी है। 

अशोक वर्मा ने कहा कि एक तरफ मोदी सरकार वंदे मातरम पर सांप्रदायिकता फैला रही है और दूसरी ओर ग्रामीण वंदे मातरम गाते हुए जन विरोधी गोंदुलपुर कोयला परियोजना के विरुद्ध लोकतान्त्रिक आंदोलन कर रहे हैं।

वक्ताओं ने स्व. रामदयाल मुंडा को याद करते हुए कहा कि “सत्ता द्वारा आदिवासियों पर दमन इसलिए होता है क्योंकि उनकी जमीन के नीचे खनिज है।” पेसा, पांचवीं अनुसूची और संविधान ने जो अधिकार आदिवासियों को दिए हैं, उनके बारे में जन-जन तक जानकारी पहुंचाना जरूरी है, नहीं तो दिकू साहब जो कहते हैं, वही अंतिम सच बना दिया जाता है। संविधान के तहत प्रतिरोध करना देशद्रोह नहीं है।

महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों पर लीना पादम ने अनुभव साझा किया। उन्होंने सोनी सोरी सहित अनेक महिलाओं के उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह आदिवासी इलाकों में महिलाओं और युवतियों को जबरन खाना पकाने, यौन हिंसा और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। 

उन्होंने कहा कि इन महिलाओं के प्रतिरोध, साहस और संघर्ष की कहानियों को सामने लाना, उन्हें सम्मान और मंच देना और उनके अधिकारों व गरिमा के प्रति समाज को शिक्षित करना जरूरी है।

सभा में कार्यक्रम के विषय प्रस्तुति करते हुए झारखंड जनाधिकार महासभा के सिराज ने कहा कि माओवादी खात्मा अभियानों के नाम का मुख्य उद्देश्य है आदिवासियों के अस्तित्व को खतम करना और उनके जल, जंगल, जमीन और खनीज को कॉर्पोरेट लूट के सुरक्षित करना। 

कार्यक्रम में जन संस्कृति मंच के मोती बेदिया, सुरेंद्र बेदिया, आदिवासी संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष आर.डी. मांझी, नन्दकिशोर गंझु, नंदिता भट्टाचार्य, भाकपा (माले) लिबरेशन सहित विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने एकजुट प्रतिरोध पर जोर दिया। अंत में 1–9 जनवरी को प्रतिरोध सप्ताह, विधानसभा घेराव जैसे कार्यक्रमों का प्रस्ताव रखते हुए कानूनी जागरूकता, जनशिक्षा, संगठित जनआंदोलन और व्यापक एकजुटता का आह्वान किया गया। चेतावनी दी गई कि यदि अब भी चुप रहे, तो हमारी संस्कृतियाँ, जंगल, जैवविविधता और कई आदिवासी समुदाय समाप्ति की कगार पर पहुँच जाएंगे।

एक अन्य खबर के अनुसार चार श्रम कोड के खिलाफ आज 9 दिसंबर को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को ऐक्टू झारखंड की ओर से एक ज्ञापन प्रेषित किया गया है। जिसमे बताया गया कि 10 दिसम्बर 2025 को इसी मांग पर जोर डालने के लिए ऐक्टू (झारखंड) के बैनर तले सैकड़ों मजदूरों का महाधरना विधान सभा के समक्ष आयोजित किया जाएगा। हमें उम्मीद है कि एक गैर भाजपाई सरकार होने के नाते हेमंत सरकार केंद्र सरकार द्वारा किए जा रहे हमले के खिलाफ झारखंड के मजदूरों के पक्ष में खड़ी होगी।

ज्ञापन में कहा गया है कि ट्रेड यूनियन के सभी साथी इस तरह का ज्ञापन तमाम गैर भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भेजने का पहल करने पर विचार करें।

हम झारखण्ड के सभी मेहनतकशों से अपील करते है की महाधरना में भारी संख्या में शामिल हो और मजदूर वर्ग का चट्टानी एकता प्रदर्शित करें।

Leave a Reply