नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तज़ू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही/
गर इंतज़ार है कठिन तो जब तलक ऐ दिल
किसी के वादा ए फ़र्दा से गुफ़्तगू ही सही।।
फैज अहमद फैज की शायरी के कुछ टुकड़ों को हमने बस अपने हिसाब से उठा लिया और चस्पा कर दिया जिससे कि बात को आगे बढ़ाने में मुझे मदद मिल सके। वैसे भी आज कुछ भी कहना इतना आसान नहीं रह गया है। समय बस साल जाने के बाद पता चलता है कि साल गुजर गया और अब नया आ गया। ये हाल तो हम उन लोगों का है जो दावा करते हैं कि वे समय की नब्ज पर हाथ रखते हैं।
सोचिए उनका हाल जिनके काम के घंटे बढ़ा दिये गये, काम के दाम वहीं के वहीं रह गये। शरीर को समय के साथ सिर्फ लंबवत ही नहीं खींच दिया गया, उनके बच्चों, उसकी पत्नी, मां और पिता से कुछ और दूर कर दिया गया। उसके लिए यह जो समय है उसके हाथ पर हथकड़ी की तरह जकड़कर झूल रहा है। वहां घड़ी की टिक-टिक की आवाज नहीं है, वहां जंजीर के खनकने की आवाज है जो काम की जगहों से लगातार बजती जा रही है।
मजदूर वर्ग:
इस साल भी मैं अपनी मजदूरों के प्रवास पर अधूरी रह गई पुस्तक पूरी नहीं कर सका। यह पिछले तीन सालों से एक ही जगह ठहरी हुई है। 2010 से 2025 तक के बीच काफी कुछ घट रहा था। 2010 में, जब चिदम्बरम देश के वित्तमंत्री-गृहमंत्री हुआ करते थे, उस समय वे ‘आदिवासी समुदाय को सभ्य’ बनाने के लिए माओवाद के खिलाफ अभियान चला रहे थे और जंगलों पर कब्जा करने और उसका आवंटन करने की निविदाएं जारी कर रहे थे।
मोदी राज आने के बाद ‘सभ्य’ बनाने का अभियान खत्म हो गया और देश से माओवाद खत्म करने का अभियान शुरू हुआ। विशाल हाइवे बनाने का विशाल प्रोजेक्ट शुरू हो गया जिससे कि आवाजाही आसान हो सके। कारपोरेट खेती का नारा दिया गया और छोटे उद्यमों पर कड़ा प्रहार किया गया। पैसे का प्रवाह तेजी से शहरों की ओर बढ़ा और इसे और तेज करने के लिए नोटबंदी को देश पर लाद दिया गया।
शेयर बाजार से लेकर ऊपर के चंद हिस्से में संपत्ति का खूब संकेद्रण हुआ। बिना श्रम के श्रम का अतिरिक्त हिस्सा जमा होने की इस प्रक्रिया ने अचानक ही देश के सकल घरेलू उत्पाद के आयतन को बढ़ा दिया। उससे ज्यादा भ्रष्टाचार को बढ़ा दिया। देखते-देखते देश की जनता ही गरीब नहीं बनीं, छोटी छोटी पार्टियां धन के मामले में तबाह हो गईं।
काला धन खत्म करने के लिए लाई गई नोटबंदी का एक उद्देश्य माओवाद को खत्म करना भी बताया गया। माओवाद पार्टी को अभी तो खत्म करना बाकी रह गया है लेकिन विपक्ष का खात्मा होते हुए जरूर देखा गया।
इस बुरे दौर में मजदूर दुनिया के सबसे कम मजदूरी पाने वालों की श्रेणी में आ जाने के बाद भी काम करता रहा। दस-दस साल से उसकी मजदूरी नहीं बढ़ी, फिर भी रिलायंस जैसी कंपनियों में वह काम करता ही जा रहा था, सूरत की साड़ी बनाने और हीरा तराशने में लगा ही रहा। चिंदम्बरम के राज में आदिवासी समुदाय को सभ्य बनाने के लिए उन्हें जंगल से शहर की ओर ठेला जा रहा था। मोदी सरकार ने मजदूरों को शहर से गांव की ओर ठेलना शुरू किया।
नोटबंदी और फिर लाॅकडाउन की नीतियों ने उन्हें न सिर्फ भयावह असुरक्षा की ओर ठेल दिया, उन्हें पैदल चलकर गांवों की ओर जाने के लिए मजबूर कर दिया। यह भयावह दृश्य दुनिया के और देशों में शायद ही देखा गया हो। 21वीं सदी के तीसरे दशक की शुरूआत में लाखों मजदूरों सैकड़ों, हजारों किमी चलते हुए गांव में अपने घरों की ओर लौट रहे थे। रास्ते में लाॅकडाउन की वजह से उन्हें कुछ भी खरीदकर खा सकने की भी स्थिति नहीं थी, न भोजन, न पानी, न दवा और न सोने की जगह, …।
महामारी की भयावह त्रासदी पर मोदी राज की राजनीतिक निर्णय का यह जश्न देश की जनता पर कफन बनकर उतरा और जो तकलीफें थीं वे दिलों में स्थाई दाग बनकर रह गईं।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री गुन्नार मिर्डल ने भारत जैसी अर्थव्यवस्था को ‘एशियन ड्रामा’ नाम दिया था। यह दुखांत नाटक न ग्रीक त्रासदी थी और न भारत का सम्मोहित करने वाला नाट्यशास्त्र। यह विशुद्ध मनु द्वारा कल्पित राज्य की ब्राम्हणवादी संरचना थी जिसे कई और मनुओं ने अपनी लिखित हिस्सेदारी से और भी भयावह बना दिया। यह 2002 की बात है जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी को एक प्रेस सम्मेलन में ‘राजधर्म’ का पालन करने को कहा था। मोदी ने राजधर्म का पालन संसद में बैठकर शुरू कर दिया था।
लाॅकडाउन के दौरान में गरीब और मजदूर वर्ग को उनके चित्रों के साथ भोजन की आपूर्ति शुरू हुई। थोड़ा बहुत मनरेगा से काम दिया गया। जब मजदूरी तय करने की बात शुरू हुई तब उसमें इन खर्चों को जोड़ दिया गया। जिससे वास्तविक मजदूरी की दर गिर गई।
इसी दौरान आपदा में अवसर का नारा देकर विशेष प्रावधान, जो सिर्फ 6 महीने के लिए हो सकते हैं, आपदा-मूलक श्रम अधिनियम लाकर मजदूरों के अधिकार न्यूनतम कर दिये गये, काम के घंटे बढ़ा दिये गये जबकि वास्तविक मजदूरी स्थिर बनाई रखी गई जो मुद्रास्फिति के बरक्स कमतर होती गई।
2025 में गांव में मनरेगा के तहत मजदूरों को दिये जा रहे काम की संख्या में कमी आती गई और डिजिटल वेरिफिकेशन से उनके रोजगार के अवसर कम हुए या उससे बाहर कर दिये गये। बजट और निष्कासन की इस प्रक्रिया ने करोड़ों मजदूरों को प्रभावित किया। 2025 के अंत में मनरेगा का नाम बदलकर वीबी जी-राम-जी कर दिया गया और रोजगार गारंटी को ‘राज्य के निर्णय’ के अधीन कर दिया गया।
केंद्र ने अपना बजट कम किया और भार राज्य सरकारों के कंधे पर डाल दिया जो जीएसटी के चलते पहले से ही बजट की समस्या से जूझ रहे हैं और केंद्र से लगातार संघर्ष की स्थिति में हैं।
फैक्टरी और उद्यमों में काम करने वाले मजदूरों के लिए लाए गये चार श्रम संहिताओं ने न सिर्फ काम के घंटे बढ़ाने के प्रावधान को औपचारिक जामा पहना दिया, संगठित होने, काम के अधिकार की मांग करने जैसे 19वीं सदी के पूंजीवाद के दौर के मजदूर अधिकारों तक को भी छीन लिया गया। सबसे बुरा हाल है महिला श्रमिकों का। उन्हें बिना सुरक्षा के प्रावधान के काम करने के हालात दिये गये हैं। इसका अंतिम नतीजा शहरी श्रमिकों में उनकी भागीदारी कम होने में दिखाई देगा।
यह पहले से ही दुनिया के मानकों के हिसाब से काफी कम है। यहां तक कि अरब जैसे देशों से भी कम। भारत जैसे देश में, जहां शहरों में मध्यवर्ग की महिलाएं तक असुरक्षित हैं वहां महिला श्रमिकों की सुरक्षा की भयावह स्थिति का अनुमान हम लगा सकते हैं। यहां रेखांकित करना जरूरी है कि शहरों में श्रम में महिला की भागीदारी घटी है जबकि गांव में बढ़ी है। महिलाओं को घरों में ठेल देने का यह नमूना है।
यहां मोदी सरकार श्रम कानूनों से वस्तुगत तौर पर कम मजदूरी वाले सघन श्रम से सस्ता माल पैदा करने की जो नीति अपना रही है, उससे उस माल से पूंजीपति कितना मुनाफा कमाएगा, यह आगे देखना है; लेकिन इसका सीधा असर संगठित क्षेत्र का अनौपचारिक क्षेत्र में पतन की ओर जाना तय है। गुड़गांव जैसी जगहों में एक बड़ी फैक्टरी के सैकड़ों सिस्टर इंटरप्राइजेज इसके उदाहरण हैं जो फैक्टरी के कारपोरेट रूप में विकसित होने में बाधा हैं।
भारत में ‘कमाओ और निकल लो’ का जो औद्योगिक माहौल है उससे भारत में विकसित औद्योगिक व्यवस्था बनने का दूर-दूर तक कोई उम्मीद नहीं दिख रही है। यह अडानी-अंबानी. विजय माल्या-ललित मोदी का माॅडल है। इस व्यवस्था में सिर्फ मजदूर ही नहीं पिस रहा है, यहां का मध्यवर्ग भी तबाह हो रहा है। इंडिगो संकट में आप इसे देख सकते हैं। बैंकों के दिवालिया होने में मध्यवर्ग का पैसा डूब जाना भी इसी का एक पक्ष है।
हां, बात की शुरुआत मैंने अपनी अधूरी रह गई किताब से की थी। मजदूरों को लेकर जो भरोसमंद आंकड़े सामने आने चाहिए, वे सरकारी आंकड़ों में सामने नहीं आ रहे हैं। आंकड़ों से जुड़े विभिन्न विभागों की स्थिति अच्छी नहीं है, ऐसा लग रहा है। यह तो मजदूरों की बात है। खुद उद्यमों से जुड़े आंकड़े भी प्रश्न के घेरे में हैं। यह कहा जा रहा है कि सरकार पुराने आंकड़ों को आधार बनाकर काम कर रही है।
इस पर विश्व बैंक और मुद्राकोष जैसे संस्थान सवाल उठा रहे हैं। भारत के अर्थशास्त्री तो इस पर सवाल उठा ही रहे हैं। एक आधुनिक माने जाने वाले देश में जनगणना हुए 15 गुजर जाएं तब आंकड़ों पर गंभीर सवाल उठना लाजिमी है। फिर भी हम उम्मीद कर रहे हैं कि इन आंकड़ों की तंगी और बाजीगरी के बीच से कोई रास्ता निकलेगा और मैं अपनी प्रवास से जूझ रहे मजदूरों पर केंद्रित पुस्तक को पूरा कर पाऊंगा।
किसान:
इस साल के शुरूआती दिनों में किसानों के आंदोलन की सगुबुगाहट हुई। लेकिन, किसान अंततः दिल्ली से रीट्रीट कर गये। इसका यह अर्थ नहीं है कि किसानों के सामने समस्या नहीं है। वे सिर्फ कर्ज के भार से ही दबे हुए नहीं हैं। वे टूटते परिवारों के साथ पूरी किसानी की संरचना के बोझ तले दबे हुए हैं। एक समय में पंजाब और हरियाणा के किसान पूरे देश में किसानी के उदाहरण बने हुए थे। आज ये राज्य दुनिया के धनी देशों के लिए मजदूर आपूर्ती के केंद्र बन गये हैं।
इसकी सामााजिक संरचना इस कदर तबाही की शिकार है कि यहां नशाखोरी लत में बदल गई है। दूसरी ओर बिहार है जहां पिछले दशकों की तुलना में रोजगार की तलाश में किसानों के परिवार के सदस्य सबसे तेजी से प्रवासी बनने के लिए मजबूर हैं। बिहार में बाहुबलियों की सत्ता वापिस आ रही है और भूमिहीन सरकारी खैरात पर जिंदगी बसर करने के लिए मजबूर हैं। मजदूरों का प्रवास और आप्रवास की एक पूरी गोल संरचना में बनी हुई है जिसमें जनसंख्या का अधिकतम दबाव गांव पर बना हुआ है।
मोदी राज में यह दबाव पहले से अधिक हो चुका है। किसान आंदोलन बिखराव का शिकार बना हुआ है जो फिलहाल अभी एकजुट होते हुए नहीं दिख रहा है।
छात्र:
कुछ सालों पहले रोहित वेमुला की मौत और उसका अंतिम पत्र मोदी सरकार की दीवार पर लिखा गया अभिलेख था। उस समय बहुत से लोगों को लगा कि यह जाति आधारित चलने वाले विभेद की सामान्य घटना है। लेकिन, यह सामान्य घटना नहीं थी। यह अपने समय का वह अभिलेख था जिस पर लिखावट का रंग लहू से भरा हुआ था। आने वाले समय में छात्र और युवाओं ने आत्महत्या के मामले मजदूर और किसानों को भी पीछे छोड़ दिया।
21वीं सदी की दहलीज तक केंद्रीय विश्वविद्यालयों को बोलबाला रहा। क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों का पतन या तो शुरू हो चुका था या हो चुका था। मसलन, पटना और इलाहाबाद विश्वविद्यालय इसके उदाहरण हैं। इन दोनों विश्वविद्यालयों के बारे में यह कहा गया कि ये कोचिंग संस्थानों के कारण बर्बाद हो गये। लेकिन, जैसे जैसे समय बदलता गया और मोदी सरकार का आगमन हुआ, इन विश्वविद्यालयों में होने वाले राजनीतिक हस्तक्षेप खुलकर सामने आ गये।
जेएनयू इसका माॅडल बना। इस माॅडल को दिल्ली, जादवपुर, उस्मानिया जैसे विश्वविद्यालयों और आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थानों में दुहराया गया। इन विश्वविद्यालयों को पहले ‘देशद्रोह’ के मामलों में उलझाया गया और फिर उन्हें ‘देशभक्ति’ के आईने के सामने खड़ा कर दिया गया। इस पर जोर देने के लिए बाकायदा मीडिया को तैयार किया गया।
लेकिन, 2025 तक आते-आते नवउदारवादी दौर के निजी शिक्षा संस्थान, जैसे अशोका विश्वविद्यालय और कई अन्य को भी इसमें उलझा लिया गया। सिर्फ छात्र ही नहीं शिक्षकों को इसके लपेटे में ले लिया गया।शिक्षा के प्रचार और प्रसार, नये संस्थानों का निर्माण कागजों में जिस तेजी से बढ़ा उतनी तेजी से न तो शिक्षकों की भर्ती हुई और न ही छात्रों का आगमन हुआ।
विश्वविद्यायलय, जिनमें जेएनयू भी शामिल है, में फंड की कमी की खबरें आने लगीं। शोध संस्थानों की स्थिति बदतर होनी शुरू हो गई। यूजीसी एक नियामक संस्थान से बदलकर एक आदेश देने वाली संस्था में बदलती गई। अभी हाल ही में हुए संशोधनों ने शिक्षा की स्वायत्तता खत्म होने के कगार पर चली गई है।
रोहित वेमूला की मौत सिर्फ विश्वविद्यालय की संरचना और उसमें एक छात्र के अधिकार पर हमला नहीं था। ये छात्रों के बीच से उभर रहे उन थोड़े से हिस्से पर भी हमला था जो शिक्षा को नई तरह से देख रहे थे, उसे अभिव्यक्ति और देश-समाज की नई समझ में परख रहे थे। ये उच्च शिक्षा की ओर बढ़ने वाले नये तरह के छात्र थे जिनकी अकादमिक इच्छा सिर्फ बने बनाये विषयों पर शोध कर डाॅक्टरेट कर लेने और खुद तक सीमित नहीं थी।
रोहित वेमूला की पीढ़ी के ऐसे छात्रों की परम्परा को उच्च शिक्षा के लिए भारत से होने वाले पलायन में देख सकते हैं। इसी धारा में महेश राउत जैसे शोधार्थी को देख सकते हैं जिन्हें भीमा-कोरेगांव केस में गिरफ्तार किया गया।
यदि हम महेश राउत को नहीं देखना चाहें तब हमें जरूर ही यू-ट्यूब चैनल चलाने वाले युवाओं को देखना चाहिए रील्स नहीं बना रहे हैं, वे लंबे पोडकास्ट पर इतिहास, राजनीति, विज्ञान से लेकर राजनीति की जमीनी हकीकत को कहीं अधिक सूक्ष्म तरीके से उकेर कर सामने ला रहे हैं और खुलेआम मोदी राज की गहरी आलोचना के साथ-साथ कांग्रेस राज की नीतियों की गहरी पड़ताल करते हैं।
पिछले कुछ सालों में मोदी राज में छात्रों पर गंभीर हमले के बावजदू उनकी आवाज कमजोर नहीं हुई। उन्होंने बोलना कम नहीं किया। मोदी राज के समर्थक छात्र संगठन और आरएसएस के हमलों के बावजूद छात्रों ने अभिव्यक्ति का रास्ता अख्त्यिार करना नहीं छोड़ा है। अभी हाल के दिनों इंडिया गेट पर ऐसे छात्रों ने नारे बुलंद कर एक मिसाल कायम की है। उनमें से दर्जन भर छात्रों को गिरफ्तार किया गया और उन्हें ‘देशद्रोह’ जैसे केस से नवाजा गया।
इस घटना के थोड़े दिन बाद ही इंडिया गेट पर एक बार फिर छात्र और युवा इकठ्ठा हुए और उन्होंने उन्नाव केस में न्याय के पक्ष में नारा बुलंद किया।
‘छात्र एक ऐसा समुदाय है जिसमें सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व होता है’ इसी रूप में इसकी विशिष्टता किसी वर्ग के साथ जुड़ी नहीं होती। लेकिन, विश्वविद्यालय की संचरना निश्चित ही एक वर्ग के प्रतिनिधित्व में चलती है। यह वर्ग जितना ही अपनी विचारधारा के साथ अपना प्रभुत्व, एकाधिकार बनाता जाता है, प्रतिरोध की आवाजें उतनी ही तेज होती जाती हैं। यहां मानव समाज की विरासत में मिले सामान्य मूल्य ही नैतिक मूल्य होते हैं।
भाजपा नेतृत्व में जिस तरह से एक वर्ग और खास धर्म पर जोर देने और इसी आधार पर भेदभाव करने, वैज्ञानिक मूल्यों को दरकिनार करने का प्रयास बढ़ा है, छात्रों ने ऐसे भेदभाव के खिलाफ चुप रहने से इंकार किया है। छात्रों में भारतीय जीवन में सामान्य तौर पर बने नैतिक मूल्यों को बचाने को लेकर बेचैनी को देखा जा सकता है। इसमें वे आवाजें भी शामिल हैं जो भारत के सबसे हाशिये के लोगों की पक्षधरता के साथ होती हैं और रेडिकल कम्युनिस्ट पार्टी के पक्ष में भी होती हैं।
छात्रों की इस पीढ़ी ने 2025 में जितनी खुलकर आवाज बुलंद की है, वह आने वाले समय के लिए मिसाल है। आज छात्र और युवाओं के सामने रोजगार की समस्या मुंह बाये खड़ी है और दूसरी तरफ बोलना एक खतरा बनता जा रहा है। आज जिस समूह के साथ भविष्य सबसे बड़ी चुनौती की तरह खड़ा है, वह छात्र है।
नवउदारवाद और मोदी के भाषणों ने जिस चमक को पैदा किया उसकी जमीनी हकीकत उतनी संड़ाध से भरी हुई है। यह देश की खुशनसीबी है कि भारत में जब भी राजनीतिक संड़ांध पैदा हुई है उसे साफ करने में छात्रों ने अग्रिम मोर्चा संभाला है। 2025 का अनुभव यही बता रहा है कि यह विरासत परम्परा बनकर आगे बढ़ेगी। देश में जनवाद का रास्ता बंद नहीं होगा।
बुद्धिजीवी:
यह शब्द काफी जटिल है और इसकी परिभाषा और भूमिका को तय करना भी काफी मुश्किल भरा काम है। प्रधानमंत्री मोदी ने एक बुद्धिजीवी के बारे में ‘आंदोलनजीवी’ नाम दिया। ऐसे में यह सवाल जरूर उठता है कि क्या एक बुद्धिजीवी को आंदोलन का हिस्सेदार नहीं होना चाहिए? बुद्धिजीवियों की हाल-फिलहाल में जिस गतिविधि को याद कर लेना जरूरी है, वह ‘पुरस्कार वापसी’ का आंदोलन था।
भाजपा के सत्ता में आने के बाद कई बुद्धिजीवियों को जिस तरह से मारा गया, वह भयावह घटना थी। हिंदी साहित्य के अग्रिम कथाकार उदय प्रकाश ने पुरस्कार वापसी की जो शुरूआत की वह सत्ता के खिलाफ एक अभियान में बदल गया। इसके बाद बुद्धिजीवियों का उस तरह का दखल नहीं दिखा है।
ऐसा नहीं है कि बुद्धिजीवियों की ओर से प्रयास नहीं किये गये। लेकिन, जल्द ही बौद्धिक खेमे में एक बंटवारे की स्थिति बनने लगी। इसमें से एक का पक्ष साफ तौर पर भाजपा और उसकी सत्ता के पक्ष में खड़ा होने लगा।
अभी हाल ही में उपराष्ट्रपति के चुनाव के समय में गृहमंत्री अमित शाह के बयान को लेकर देश के बुद्धिजीवियों ने आपत्ति दर्ज कराई। इसके बाद उसी बयान के संदर्भ में और उसे समर्थन देते हुए बुद्धिजीवियों का एक और समूह खड़ा हुआ और उसने भी एक = संयुक्त बयान दिया। इस तरह के बंटे हुए एक मसले पर संयुक्त बयान की कई बानगी देखी गई।
लेकिन, पर्यावरण खासकर दिल्ली में वायु प्रदूषण और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अरावली पर्वत श्रृंखला की परिभाषा को 100 मीटर ऊंचाई से नापने का जो पैमाना तय किया उससे बौद्धिक समुदाय में यह विभाजन नाकाम साबित हुआ। मीडिया और कुछ बुद्धिजीवी ने भले ही मसल को भटका देने वाले तर्क रखे लेकिन उन्हें सुनने वाला कोई नहीं रह गया था। बाद में, खुद गोदी मीडिया में विभाजन हो गया।
पर्यावरणविद, बुद्धिजीवी, छात्र और जनआंदोलनों ने मोदी सरकार को बार-बार सफाई देने और अंतत: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस परिभाषा और निर्णय पर ही खुद ही तत्काल रोक लगाने का आदेश दिया।
भारत के बौद्धिक परिवेश में जो सबसे नई बात है वह अंग्रेजी के लेखकों का हिंदी में बात करना और अपनी पुस्तक को हिंदी में लाने का प्रयास करना है। यह भाजपा के हिंदी पर दबाव बनाने से हुआ है, ऐसा नहीं है। यदि ठीक नजर से देखा जाए तो वह हिंदी का नुकसान ज्यादा कर रहे हैं। यह मूलतः हिंदी प्रदेशों, जिसे हिंदी स्फीयर/हिंदी हाॅर्टलैंड भी कहा जाता है, में अपनी बात को लेकर जाने की इच्छा है। निश्चित ही इसमें यू-ट्यूब के पोडकाॅस्ट ने बड़ी भूमिका को अदा की है।
हालांकि यह कह सकना मुश्किल है इससे उनकी किताबों की बिक्री पर कितना असर पड़ता है।
बौद्धिक परिवेश में सबसे अधिक बुरा हाल पाठ्यक्रमों के निर्धारण और उसके विषयों का चुनाव और लेखन है। हाल के दिनों में कई सारे बदलाव किये गये हैं जो वैज्ञानिक अवधारणा और शैक्षिक विकास के अनुकूल नहीं हैं। सबसे खतरनाक बदलाव इतिहास में किये गये हैं। बौद्धिक समुदाय के द्वारा लगातार विरोध और यहां तक कि संस्थान से त्यागपत्र दे देने की घटनाएं सामने आईं लेकिन भाजपा सरकार पाठ्यक्रमों को राष्ट्रवादी परियोजना के तहत उसे हिंदुत्व का रंग देने में पीछे नहीं हटी।
हाल ही में किये गये बदलाव बेहद मनमाने और तथ्यों से परे हैं। बुद्धिजीवियों ने विरोध किया लेकिन उनकी आवाज शायद ही सामान्य जन तक पहुंच सकी हो। बौद्धिक दुनिया में इस पर न तो अब खास बहस रह गई है और न ही लोग इस पर तवज्जो दे रहे हैं। जबकि यही वह क्षेत्र जो शिक्षा का निर्धारण करता है और सामान्य जनों के बच्चे उसे पढ़ते हुए बड़े होते हैं।
बौद्धिक दुनिया की गतिविधि स्कूल, काॅलेज और विश्वविद्यालयों में सिमटती हुई दिख रही है। उसका एक हिस्सा कुछ बड़े सम्मेलनों में कभी-कभार दिख रहा है। लेकिन, सार्वजनिक स्थलों पर उनकी उपस्थिति काफी कम होती गई है। प्रिंट पत्रिकाओं की उपस्थिति अभी भी बनी हुई है जो मूलतः उसके संपादक की अपनी मेहनत और खर्च पर चल रही हैं।
युवा बुद्धिजीवीयों की एक बड़ी संख्या सक्रिय होते हुए दिख रही है, लेकिन वे मुख्यतः खुद को किसी आंदोलन, धारा, समूह आदि से स्वतंत्र दिखाने की चेतना से लैस हैं। ऐसे में उनकी जितनी भूमिका बन सकती है वह दिखती नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा कारण ‘भीमा कोरेगांव केस’ हुई गिरफ्तारियां हैं जिसमें बुद्धिजीवी समुदायों को निशाने पर लिया गया। इस बीच बुद्धिजीवियों का एक छोटा सा हिस्सा कांग्रेस के साथ जुड़ा है।
खासकर, दलित समुदाय से सरोकार रखने वाले बुद्धिजीवी प्रोफेसर रतन लाल और प्रोफेसर रविकांत का नाम सबसे ऊपर है। प्रोफेसर रतन लाल ने दलित आंदोलन और उससे जुड़ी राजनीतिक पार्टियों को आलोचनात्मक तरीके से पेश करना शुरू किया है। यह करते हुए उन्होंने डा. आंबेडकर के राजनीतिक निर्णयों की आलोचना को पेश किया है। यह कितना सर्जनात्मक होगा, यह आगे देखना है।
निश्चित ही यह तभी सर्जनात्मक होगा जब इस आलोचना को कांग्रेस के नजरिये से न किया जाए। फिलहाल, उनकी आलोचना का परिप्रेक्ष्य नेहरू और इंदिरा गांधी की पहलकदमी पर खड़ा दिखाई दे रहा है। एक भिन्न धरातल पर ऐसा ही काम वामपंथ से नेहरूवाद की ओर बढ़ रहे अशोक कुमार पाण्डेय ने किया है। उन्होंने तानाशाहों की एक श्रृंखला को पेश की है जिसमें हिटलर के साथ स्तालिन को रखते हैं। हालांकि उनकी आलोचना की जमीन न तो नेहरू में मिलती है और न ही इंदिरा गांधी में।
बौद्धिक समूहों में सत्ता पक्ष सिर्फ अवसरवाद का दलदल ही नहीं बनाता है, वह पतित समूहों को भी निर्मित करता है। यह समय ऐसे समूहों के पैदा होने का भी समय है।
वामपंथ, विपक्ष और सत्ता पक्ष:
2025 में भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के 100 साल पूरे हुए हैं। इस सौ साल पर शायद ही कोई ऐसा सम्मेलन हुआ हो जिससे कोई बहस या बात शुरू हुई हो, खासकर अपने दौर की चुनौतियों पर दिशा हासिल करने के लिए। इस दिशा में कुछ पार्टियां या संगठन भी यह पहलकदमी करते हुए नहीं दिखे। संभव है कि कुछ-कुछ पार्टियों ने अपने स्तर पर यह काम किया हो।
इस सौवें साल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की विरासत में खड़े सीपीआई-माओवादी पार्टी को खत्म करने की घोषणा और इसके लिए उन पर हमले का अभियान चल रहा है। इस पार्टी के महासचिव को उनकी पूरी टीम के साथ भाजपा नेतृत्व की केंद्र सरकार द्वारा चलाये गये ऑपरेशन कगार सैन्य अभियान में ‘मुठभेड़ में मार’ दिया गया। ‘मुठभेड़’ और ‘मौत’ की संख्या इस सौवें साल में सैकड़ा की संख्या कभी का पार कर चुका है।
इसके साथ-साथ चलने वाली गिरफ्तारी दमन की एक अलग ही कहानी बयां करती है। आज इस पार्टी की केंद्रीय कमेटी के कुछ ही सदस्य बच गये हैं जिनके खिलाफ सैन्य अभियान जारी है।
पिछले दस सालों में जैसे-जैसे माओवादी पार्टी का सांगठनिक ढ़ांचा सिमटता गया, इसके नेतृत्व समूह की संख्या कम होती गई, इसके कमजोर तत्व अपने ही साथियों के खिलाफ खड़े हुए और ‘गद्दारी’ करते हुए ‘आत्मसमर्पण’ का रास्ता लिया। यह सबकुछ इस भयावह स्तर पर चल रहा है जिसकी मिसाल आधुनिक भारत के इतिहास में कम ही मिलती है।
मोदी नेतृत्व की केंद्र की सरकार जिस तरह से सैन्य अभियान चला रही है उसे लेकर भारत की विभिन्न कम्युनिस्ट पार्टियों ने जरूर अपना बयान दिया है और इस सैन्य अभियान को रोकने की अपील की है। संभवतः यही एक मसला है जिस पर इस दौरान भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की विभिन्न धाराएं बयान देने के समय एकजुट थीं।
लेकिन, इन धाराओं में हो रहे बिखराव को नकारा नहीं जा सकता। व्यवहार में संकीर्णता और विचार में अवसरवाद आज भी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी की विभिन्न धाराओं में मुख्य पक्ष बना हुआ है जिसमें मार्क्सवाद सुविधाजनक लेकिन अर्थहीन कैटगरी में बदलता जाता है। बंगाल में सीपीएम की सरकार के पतन के बाद इस पार्टी की आत्मालोचना फिलहाल किसी नई दिशा में बदलती हुई नहीं दिख रही है।
केरल में वहां की वामपंथ की सरकार की जमीन अब दरकती हुई दिख रही है। बिहार विधानसभा चुनाव में सीपीआई-एमएल-लिबरेशन की स्थिति काफी बदतर रही। इस दौरान कई छोटी पार्टियों ने ‘चुनाव की दिशा’ में काम करना शुरू कर दिया है जिसमें उन्हें मिले वोट की गिनती बताने का कोई अर्थ नहीं है।
ऑपरेशन समाधान, ऑपरेशन कगार जैसे सैन्य अभियानों से सिर्फ माओवादियों को ही खत्म करने की तिथि निर्धारित नहीं की गई। मोदी ने अपने कई बयानों में भारत को कांग्रेस मुक्त बनाने की भी घोषणा की थी। यह अलग बात है कि इसकी कोई तिथि निर्धारित नहीं की गई थी जैसा माओवादी पार्टी के लिए तय की गई है।
लेकिन, यदि भाजपा की अर्बन नक्सल, माओवादी और कांग्रेस मुक्त भारत की अवधारणा को एक साथ रखा जाए तब इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भाजपा भारत में एक पार्टी संरचना वाली संसदीय व्यवस्था चाह रही थी जिसमें संसद उन्हें वैध बनाये रखने वाले वेल की तरह काम करे। आज जब केंद्र की सरकार संयुक्त पार्टी सरकार है लेकिन इसके व्यवहार में देखा जा सकता है कि ऐसा नहीं है। यह एक पार्टी की बहुमत की सरकार की तरह ही चल रही है।
भाजपा जिस तेजी से कल्ट राजनीति पर आगे बढ़ी और उसने विपक्ष को, जिसमें वामपंथ की धाराओं को भी गिना था पर जिस तरह से हमला करना शुरू किया और सरकारी संस्थानों को पार्टी की गिरफ्त में लेना शुरू किया था उससे जितना समय पहले समझ लेना चाहिए था, उसे समझने में काफी देर हुई।
वामपंथ की धाराएं ‘असेंडिग फासिज्म’ का सूत्र प्रतिपादित करने में लगी हुई थीं और इस मुद्दे पर सीपीआई, सीपीएम से लेकर सभी धाराओं में बहस चलती ही जा रही थी। इस मुद्दे पर सीताराम येचुरी और प्रकाश करात के बीच की बहस बाहर आ गई। वहीं कांग्रेस जैसी पार्टी और उसके नेता मंदिरों का दर्शन करने और खुद को शिवभक्त साबित करने में जुटे हुए थे। उन्हें भाजपा का नया चरित्र समझने में काफी समय गुजर गया।
इस बीच भाजपा ने सैन्य अभियानों के साथ साथ अन्य संस्थानों का सक्रिय प्रयोग किया। इस पूरी प्रक्रिया में जितना माओवाद कम हुआ उससे कही अधिक कम कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियां कम हुईं। विपक्षी पार्टियों में सबसे खतरनाक हमला आम आदमी पार्टी के खिलाफ किया गया जिसमें उनके बड़े-बड़े नेता को जेल में डाल दिया गया। विपक्षी पार्टियों ने जरूर एक मंच पर आने की कवायद शुरू की जो जल्द ही टूट गई और आज यह नाम भर की बची हुई है।
यहां में कतई यह नहीं कह रहा हूं कि वामपंथ को फासीवाद के खिलाफ कांगेस के साथ गठजोड़ करना चाहिए था। यह संभव भी नहीं होता। कुछ मामलों कांग्रेस और भाजपा के बीच बहुत फर्क नहीं है और यह बात खुद राहुल गांधी बता चुके हैं। लेकिन, शासन की कार्यशैली और सत्ता का केंद्रीयकरण जैसे मसलों पर दोनों अलग हैं और मोदी के आने के साथ यह फर्क गुणात्मक तौर पर बदलता दिखा है।
यहां मैं वामपंथ की पार्टियों की ओर लिए जाने वाली पहलकदमी की बात कर रहा हूं जिसमें सत्ता पक्ष की ओर से जिस तरह पार्टियों को खत्म कर देने की तिथि और बयान दिये जाते रहे हैं उसे जेरे-बहस में नहीं लाया गया और न इसे फासीवाद की व्याख्या के साथ जोड़ा गया। जितना जोर मोदी और भाजपा के धार्मिक चरित्र पर दिया गया, उसके राजनीतिक पहलू दरकिनार होते गये।
इस साल के गुजरते दौर में कांग्रेस के अभियानों ने भाजपा सरकार, खासकर मोदी-शाह की कार्यशैली को लेकर गंभीर नैतिक सवालों के बीच खड़ा कर दिया है। इस बीच अन्य विपक्षी दलों ने जमीन पर उतरकर अभियान चलाने का काम किया है। यह जैसे जैसे बढ़ा है सत्ताधारी वर्ग में बेचैनी भी बढ़ी है। कांग्रेस के प्रति उनके रूख में आ रही तब्दीली को बढ़ाकर देखना उपयुक्त नहीं होगा लेकिन सुगबुगाहट से बेखबर भी नहीं रहना चाहिए।
यहां समस्या वामपंथ के घेरे में अधिक दिख रही है। वामपंथ की विचारधारा की आधारभूमि में मजदूर और किसान हैं, छात्र और युवा वर्ग है, आदिवासी, दलित, स्त्री और मेहनतकश समुदाय हैं। गिनती के विश्वविद्यालयों में वामपंथ की उपस्थिति दिखती है, लेकिन अधिकतर छात्र और युवा आज कोंचिग संस्थानों से कहीं अधिक सफलतापूर्वक संगठित हो रहे हैं और आंदोलन में उतर रहे हैं। 2025 में छात्रों और युवाओं के मुख्य आंदोलन वामपंथ की धाराओं ने नहीं कोचिंग संस्थानों और उसके शिक्षकों के नेतृत्व में हुआ है।
सबसे बुरी स्थिति शहरों और गांवों में मजदूरों की है जिनका सिर्फ संगठन ही कमजोर ही नहीं है, वे पूरी तरह से नेतृत्वविहीन हैं। जमीनी स्तर पर उतर कर उन्हें संगठित करने वाले सिर्फ संगठन ही कम नहीं है, उन्हें जोड़ने वाले कार्यकर्ता भी बेहद कम हैं। इसकी वजह से पूंजीवाद के नियमों के तहत भी जो अधिकार उन्हें मिलने चाहिए, नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसे में, वामपंथ का कमजोर बने रहना तय है।
यह ऐतिहासिक सच्चाई है कि इस हिस्से के बीच में न तो कांग्रेस पार्टी जाने वाली है और न ही विपक्ष के अन्य दल। यह उनकी चिंता का हिस्सा नहीं है। वस्तुतः ये उनके संसदीय राजनीति का हिस्सा नहीं हैं। ये समूह उनकी पार्टियों से ऊपर से आने वाले नेतृत्व के वादों और प्रभावों से नियमित किये जाते हैं। उनसे वोट हासिल करने के लिए लेन-देन की प्रक्रिया ही मुख्य होती है।
बिहार में कांग्रेस-राजद की हार के पीछे कई सारे कारणों के साथ वहां के मजदूर और गरीब-मध्यम किसानों तक उसकी पहुंच न होना भी है। यही वे समूह हैं जो भारतीय समाज का मुख्य हिस्सा हैं।
भारत के संदर्भ में यह पढ़ना भयावह है कि दुनिया की 15 प्रतिशत से अधिक आबादी भारत में रहती है और इस आबादी का 15 प्रतिशत ही देश की राजनीति, शिक्षा, अर्थव्यवस्था, संस्कृति आदि का सुविधाजनक उपभोग करता है। शेष आबादी गरीबी के अथाह दलदल में फंसी हुई है। दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाली असमानता की श्रेणी में भारत भी है। शहर से मजदूर गांव ठेले जाते हैं और फिर गांवों से उन्हें शहरों की ओर। यही स्थिति जंगलों की है।
निचला समूह राजनीतिक नेतृत्व और दिशा के बिना समाज की उस अराजक स्थिति में पहुंचाने वाली राजनीति का शिकार हो रहा है जिसमें नफरत और हिंसा मुख्य तत्व है। यह अपने देश की खुशनसीबी है जिसमें मानवीयता का पहलू जिंदा है और मानव समाज का सबसे जरूरी पक्ष उम्मीद एक जिंदा शब्द बनकर अभी भी पूजनीय है। यह उम्मीद जहां जहां टूट रही है वहां से हमें हिंसा, आत्महत्या आदि की खबरें आ रही हैं।
नागरिक:
भारत की राजनीति में नागरिक होना एक राजनीतिक मुद्दा कभी नहीं था। आज के समय में अपने देश में जिस तरह से नागरिक होना एक मुद्दा बना दिया गया है शायद ही वह किसी और देश में रहा हो। यह मुद्दा सबसे पहले धर्म की सवारी करते हुए आया और फिर चुनाव में वोट के अधिकार जैसे ‘वैध’ सवालों से जोड़ दिया गया। इ
स पूरे मसले को मुख्यतः दो पड़ोसी देशों, पाकिस्तान और बांग्लादेश से कथित घुसपैठ को राजनीति के भाषणों में भाजपा ने उठाया। इसमें मुख्य जोर बांग्लादेश था जबकि यह देश भारत के ‘दुश्मन’ की श्रेणी में नहीं आता था। वस्तुतः इस मसले को विदेशी नाव की सवारी के नाम पर देश के भीतर नागरिकता की राजनीति को प्रवेश कराना था। यह दोधारी तलवार भी थी क्योंकि इसमें धर्म के मुद्दे के साथ साथ भाषा का मुद्दा भी जुड़ गया।
अपने ही देश के नागरिकों को बांग्लादेश की सीमा में बल पूर्वक भेज दिये जाने की कई घटनाएं सामने आईं जिसमें सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा और उन्हें अपने देश लाने के लिए आदेश पारित करना पड़ा।
लेकिन, वोट के अधिकार के मसले पर खुद सर्वोच्च न्यायालय ने इस नागरिक होने की अर्हता का तर्क पेश किया और कोर्ट में बहस को और भी तीखा बना दिया। नागरिक होने के अर्थ को जिस तेजी से कानूनी जामा पहनाया गया और उसे औपचारिक बना देने का तर्क सामने लाया गया उसमें यह बात गायब हो गई कि कानून की नजर में तो सभी नागरिक बराबर है लेकिन हरेक नागरिक बराबर नहीं हैं।
एक नागरिक को कई अधिकार और कर्तव्य तय किये गये लेकिन यह बात भुला दी गई कि सभी नागरिक इन दिये गये अधिकारों से बाहर ही रह गये और उनके कर्तव्य संविधान के दायरे का हिस्सा नहीं बन सके। मसलन, हर नागरिक के पास जमीन या मकान नहीं है। हर नागरिक शिक्षित नहीं है। हर नागरिक को जन्म के समय और मृत्यृ के समय भी सरकारी या गैर सरकारी अस्पताल उपलब्ध नहीं है। हर नागरिक एक समान आर्थिक इकाई नहीं है और राजनीतिक परिवेश में भागीदार नहीं है।
भारत का एक बड़ा हिस्सा घूमंतू जीवन का हिस्सा है। ऐसे में नागरिक होने की जो अर्हता पेश की गई उससे भारतीय नागरिक समाज का एक हिस्सा बाहर हो जाता है जो न सिर्फ गरीब है, उसे भारतीय राजनीतिक व्यवस्था ने राजनीति प्रक्रिया से बाहर कर रखा है।
025 इस नागरिक मसले पर का भाजपा के दृष्टिकोण, चुनाव आयोग की भूमिका और सर्वोच्च न्यायालय के रूख को लेकर रूबरू रहा। इस साल के अंत में नागरिक मूल्यों के आधार पर भेदभाव और कुछ हत्या के मामले में सामने आये हैं। बिहार में बड़े पैमाने पर वोट से वंचित लोगों की संख्या लाख से लेकर करोड़ तक गिनी गई। उत्तर प्रदेश में यह संख्या करोड़ों में बताई जा रही है।
संसदीय व्यवस्था में राजनीतिक प्रक्रिया की मूल वैधता वोट से आती है। ‘जनता से, जनता को और जनता द्वारा’ जैसे सूत्र को ‘लोकतंत्र’ की धुरी माना गया। ऐसा लगता है कि इस समय लोकतंत्र ‘कानून से, धर्म से और एक पार्टी’ तय होने की ओर बढ़ रही है। एक पार्टी चुनाव आयोग के माध्यम से अपनी जनता, अपना वोटर और अपनी सरकार चुनने की ओर बढ़ रही है। लेकिन, यह इतना आसान नहीं है।
ब्रेख्त के शब्दों में ‘तुम्हारे टैंको को चलाने वाला इंसान ही होता है’। लोकतंत्र में जनता की उपस्थिति जब तक बनी हुई है संसदीय राजनीति में किसी पार्टी की सरकार बनना कभी सुनिश्चित नहीं होता। इस व्यवस्था में जो सुनिश्चित होता है वह यह कि इसमें जनता खुद नहीं चुनी जाती, वह किसी और को चुनने जाती है जो उसके पास आमतौर पर पांच साल बाद ही लौटता है।
भाजपा नेतृत्व में संसदीय लोकतंत्र के ढांचे पर जिस तरह से गहरी चोट पहुंचाई है, इससे इससे बनने वाली प्रतिनिधि और सरकार पर भी गहरा सवाल खड़ा होता है। निश्चित ही इस तरह की प्रक्रिया से चुने गये प्रतिनिधि और उनकी सरकार कानून, धन और बाहुबल पर बने रहें लेकिन उनकी वैधता का नैतिक आधार टूटता दिख रहा है। इस मसले पर यू-ट्यूबर्स मीडिया और राहुल गांधी के प्रयासों ने वर्तमान में चल रही संसदीय प्रणाली पर गहरा सवाल खड़ा कर दिया है।
इन सवालों के घेरे में अब सर्वोच्च न्यायालय भी आ गया है। खासकर, इस मसले पर ‘तारीख पर तारीख देने’ की उसकी नीति उसकी सर्वोच्चता पर सवाल खड़ा कर रही है। 2025 ने भारतीय राजनीति में उठ रहे गहरे सवालों को देखा है। इन सवालों से खुद शासक वर्ग को मुंह फेरना आसान नहीं होगा। जनता के सामने भी ये गहरे सवाल है।
अपनी बात:
डिजिटल मीडिया का काफी शोर है और उसमें भी एआई के बारे में काफी बातें हो रही हैं। इसके बुरे और अच्छे प्रभावों को लेकर बातें हो रही हैं। दुनिया ने तकनीकी विकास में कभी भी रूकावटों को नहीं देखा है। इन तकनीकों ने इंसान पर गहरा असर डाला और जीवन को नया रूप दिया। लेकिन, कभी भी कोई तकनीक इंसान के जीवन से नहीं गई। वह उसे अपनी यादों और अपने रोजमर्रा के प्रयोगों में लेकर चली।
ऐसी एक तकनीक भाषा थी जिसने इंसान को सबसे अधिक विकसित किया और खुद इंसान के शरीर में बदलाव लाया। इस भाषा में इंसान ने अपने अनुभवों को श्रुतियों के रूप में संकलित किया और उसे कंठस्थ किया। फिर उसे पत्थरों और कागजों पर लिखना शुरू किया। फिर उसे छापना शुरू किया और आज वह डिजिटल माध्यम से उपलब्ध है।
लिखना और चिंतन करना इस प्रक्रिया का हिस्सा रहा है। कंठस्थ करना भी इसी का हिस्सा है। यह सब कुछ की जटिल व्यवस्था इंसान की अपनी बनाई हुई व्यवस्था है जिसमें मूल गति ज्ञान को प्रस्तुत करने की रही है जिसमें डेमोक्रेटाईजेशन मुख्य पक्ष है। श्रुतियां अभिजात्यों का हिस्सा थीं जिसे अशोक ने अपने शिलालेख से तोड़ दिया और उसे लोगों के बीच ले गया। इसके बाद लिखने की शुरूआत होती है।
बौद्ध धर्म में पुस्तक लिखना भी एक धार्मिक कृत्य की तरह देखा गया। आज के दौर में डिजिटाइजेशन और एआई एक बड़ी उपलब्धि है लेकिन यह भारत जैसे देश में एक अभिजात्य समूह का हिस्सा बन गया है। आज तकनीक का प्रयोग अभिजात्यता की निशानी है। इसका डेमोक्रेटाईजेशन नहीं है। हरेक के पास कम्युटर, लैपटाॅप और स्मार्ट फोन नहीं है जिससे मीडिया के नये रूपों का प्रयोग सभी कर सके।
ऐसे में, भारत में ज्ञान के संदर्भ में छपाई, पुस्तक जैसी मीडिया की सख्त जरूरत है और आज भी इसके बिना ज्ञान का डेमोक्रेटाईजेशन संभव नहीं है। भारत और पूरी दुनिया में डीजिटल स्क्रीन को मनोरंजन के लिए पेश किया गया था जिसमें खबरें और चित्रहार दिखाए गये और फिर सीरियल्स की भरमार आ गई। आज भी इस स्क्रीन से यह रिश्ता टूटा नहीं है। एक छोटा सा समूह ही जो इसक अन्य संदर्भों में प्रयोग कर रहा है। आज ये जितना रील्स बनाने और देखने में प्रयुक्त हो रहा है उतना शिक्षा की दिशा में नहीं हो रहा है।
लाॅकडाउन के दौरान ऑनलाइन कक्षाओं का छात्रों पर क्या असर पड़ा और उनकी शिक्षा किस हद बेहतर हुई, इसका अध्ययन सामने नहीं आया है। लेकिन, भारत में इसी दौरान नेटफ्लिक्स जैसे सिनेमा प्लेटफाॅर्म ने बाजार बना लिया।
2026 में मीडिया को नये सिरे से देखें। पत्रिका और अखबारों को न छोड़ें। उसे पढ़ें और संभव हो तो वहां लिखें। किताबों की दुनिया की ओर बढ़े। अपने दोस्तों से मिलें और उन सार्वजनिक स्थलों पर एक बार फिर से जुटें जहां कभी मिलते थे। नुक्कड़ की चाय की दुकान आज भी इंतजार में हैं। लिखी जा रही कहानियों और कविताओं को सुनें। खुद पहलकदमी लेकर नाटक की टीम बनाये।
एक सार्वजनिक जिंदगी की शुरूआत करें। इस अंधेरे दौर में एक दूसरे का हाथ पकड़ें और मिल बैठकर एक नई शुरूआत करें। नया साल मुबारक!
(अंजनी कुमार लेखक पत्रकार और एक्टिविस्ट हैं।)