साम्राज्यवादी टकराहटों के बीच भारत का मुक्त व्यापार का सपना : हकीकत और फसाना

आज पूरी दुनिया में तीसरे विश्व-युद्ध की आहट को सुना जा रहा है। ये बातें निश्चित ही डरावनी हैं। सभी जानते हैं कि इसका परिणाम भयावह होगा और इसका सारा भार आम जन पर पड़ना है। लेकिन, इसके ठीक पहले का जो दौर चल रहा है, वह भी आम जन के लिए अच्छा गुजर रहा है, ऐसा नहीं है। हां, जनता को साम्राज्यवादी पूंजी यह भरोसा दिलाने में लगी हुई है कि अच्छे दिन बस आने ही वाले हैं।

भारत इस बदलती भू-राजनीति से बाहर नहीं है। बल्कि साल भर पहले तक भारत के प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री से लेकर आरएसएस के प्रमुख तक भारत को विश्व में प्रमुख भूमिका निभाने वाले देश की तरह पेश कर रहे थे और इस संबंध में कई सारे दावे कर रहे थे। सच्चाई जब सामने आई तब यह इतने खराब तरह से पेश आई कि इससे शर्मसार होने के अतिरिक्त कोई विकल्प ही नहीं बचा था।

इस दौरान मामले को संभालने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने यूरोप से लेकर विश्व मानचित्र पर बमुश्किल दिखने वाले देशों तक की यात्रा करना शुरू कर दिया। अमेरिकी साम्राज्यवाद जितना ही आक्रामक होता गया, भारत की चुप्पी उतनी ही बढ़ती गई। इसके विकल्प के तौर पर भारत ने इसी दौरान कई सारे ‘मुक्त व्यापार के क्षेत्रों’ में हिस्सेदारी का रास्ता चुना।

इस साल के 26 जनवरी को यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्ष अंतोनियो कोस्टा और यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वोन लेयेन मुख्य अधिति के तौर पर उपस्थित थे। उनकी उपस्थिति अनायास नहीं थी। वे एक लंबी योजना के तहत आये हुए हैं। उनकी योजना भारत के साथ ‘मुक्त व्यापार क्षेत्र’ बनाने की है। मीडिया में आई खबरों के अनुसार इस संबंध में जल्दी ही इसकी घोषणा हो जाएगी।

ऐसा नहीं है कि उपरोक्त योजना कोई नई है। भारत इस दिशा में पिछले कुछ सालों से नये प्रयास में लगा हुआ है। 2025 में ओमान, न्यूजीलैंड और यूके के साथ और यूरोपीय इकाॅनमिक यूनियन के साथ साथ कनाडा और दक्षिणी अफ्रीकन कस्टम्स यूनियन के साथ मुक्त व्यापार की दिशा में भारत ने कई नये समझौते किये। इसके अलावा ब्राजील और इजरायल के साथ भी इसी तरह के समझौते किये गये। इस तरह के व्यापार समझौते के परिणामों को लेकर नीति आयोग ने अप्रैल-जून 2025 की रिपोर्ट जारी की।

यह रिपोर्ट भारत के मुक्त व्यापार में घाटे का दस्तावेज है। इसके अनुसार पिछले वर्ष की तुलना में इस चार महीने में मुक्त व्यापार क्षेत्र के देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा 59.2 प्रतिशत था। सामान्य तौर पर दुनिया के कुल व्यापार में भारत की स्थिति अच्छी नहीं है। अमेरीका द्वारा टैरिफ में की गई बढ़ोत्तरी ने भारत की स्थिति को और भी नुकसान में डाल दिया है। इसका सीधा असर चीन के साथ होने वाले व्यापार में तेजी से होने वाला घाटा है और फिलहाल भात को चीन से निजात मिलने की कोई संभावना नहीं दिख रही है।

इस संदर्भ में यहां यह बात ध्यान में रखकर चलनी होगी कि विश्व-अर्थव्यवस्था में भारत आज पूरी तरह से डालर पर निर्भर है जिसका खामियाजा भारत की अर्थव्यवस्था को झेलनी पड़ रहा है। यूरोपीय यूनियन ने डालर से बाहर कुछ हद तक यूरो को मजबूत बनाया है। चीन और रूस की धुरी ने रूबल और येन के बीच के संबंधों को काफी आसान बनाया है और इन दोनों देशों के साथ व्यापार में इन दोनों में से किसी भी मुद्रा का प्रयोग किया जा सकता है।

भारत एक व्यापक पड़ोसी देशों की सुविधा के बावजूद न तो ऐसी कोई मुद्रा व्यवस्था बना पाया है और न ही इस दिशा में कोई प्रयास करते हुए दिखा है। दक्षेस जैसी व्यवस्था मरने के कगार पर पहुंचाने में भारत की भूमिका काफी महत्वूपर्ण रही है।

ऐसे में, मुक्त व्यापार क्षेत्र में मुद्रा की भूमिका सिर्फ लेन देन तक सीमित नहीं है। यह विश्व के देशों की क्षेत्रीय समूह बनाने को आसान भी बनाती है। भारत के सामने किसी नये क्षेत्रीय समूह को बनाने का विकल्प नहीं दिखता है। वह सिर्फ किसी विकल्प का हिस्सा हो सकता है या किसी चुने हुए देश के साथ इस तरह का समझौता कर सकता है। ऐसे में, मुक्त व्यापार के समझौते से आर्थिक लाभ की संभावना और इसके राजनीतिक परिणाम की उम्मीद काफी कम दिख रही है।

भारत में हाल ही श्रम कानूनों में बदलाव लाकर मजदूरों की हैसियत को दलदल में ठेल देने से श्रम आधारित उत्पादों में वृद्धि का जो फार्मूला अपनाया जा रहा है, उसका अंतिम नतीजा भले ही निर्यात में कुछ बढ़ोत्तरी के रूप दिख जाए (जिसकी संभावना बेहद कम है), लेकिन विश्व आर्थिक मानकों पर भारत की स्थिति और भी बदतर हाल में ले जाएगी। दूसरी बात यह भी है कि पूंजी में श्रम तभी निर्णायक भूमिका निभा सकता है जब दोनों को एक दूसरे को विकसित करने की स्थिति में हों।

यदि हम यह मान भी लें कि विदेशों से आने वाली पूंजी से भारत के मजदूरों को लाभ होगा, तब यह जरूर देखना होगा कि इस पूंजी के कुल लाभ का कितना हिस्सा मजदूरों के हिस्से आया! यह कोई मार्क्सवादी प्रस्थापना नहीं है। यह पूंजीवाद की वह शुरूआती कखग है जिसमें पूंजीवादी राज्य का कुल लाभ का एक हिस्सा मजदूरों को अधिक सक्षम उत्पादनकर्ता और लाभ पैदा करने वाले श्रम में बदलता है।

भारत में आज की स्थिति काफी बदतर हो चली है। प्राथमिक शिक्षा की स्थिति जितनी बदतर है उससे कम उच्चतर शिक्षा भी बदतर नहीं है। आईटीआई नाम से दसवीं कक्षा पास छात्रों को तकनीकी प्रशिक्षण देने वाली संस्थाएं आज प्रशिक्षण से कई कई गुना अधिक सर्टिफिकेट बांटने में लगी हैं। यही हालत पाॅलिटेक्निक और उच्चतर इंजिनियरिंग काॅलेजों की भी हो गई है। ऐसे ही हालात अन्य क्षेत्रों के हैं।

रही सही कसर हिंदुत्व की राजनीति पूरा कर रही है। आईआईटी जैसे संस्थानों में धर्म की घुसपैठ तकनीक की संभावना और विज्ञान के विकास को तबाह करने में लगी हुई है। ऐसे में, मजदूरों को शहर और गांव से उजाड़कर, उन्हें बदतर जीवन की ओर ठेलकर उनकी वास्तविक मजदूरी को सबसे निचले पायदान में पहुंचाकर 12 घंटे काम लेने की नीति भारत की अर्थव्यवस्था को ‘मुक्त व्यापार क्षेत्र’ में लाभदायक स्थिति में पहुंचा देगा, यह कतई संभव नहीं लगता।

विकास और विकसित भारत का सपना बेचने का काम आज भी जारी है। मीडिया इस तरह के विकास की संभावना को निश्चित ही बढ़ाकर दिखाएगा। लेकिन, इसकी हकीकत को, जो सरकारी संस्थाओं की रिपोर्ट में ही सामने आती है, उसे छुपा ले जाएगा या उसे किसी और तरीके से पेश करेगा। इस सबका सारा भार इस देश का श्रमिक वर्ग और गरीब जनता अपने कंधों पर लादे हुए चल रही है। जबकि मध्यवर्ग अब भी संभावनाओं का राग गा रहा है।

(अंजनी कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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