बनारस और चंदौली के बीच गंगा के दो पाटों के दरमियान बसा ढाब आईलैंड दूर से किसी ख़ूबसूरत ख्वाब सा दिखाई देता है। पहली नज़र में यह किसी पोस्टकार्ड की तस्वीर जैसा लगता है। दूर तक फैली दूधिया रेत, सब्ज़ियों की कतारों में सजी हरियाली, धूप में चमकती गंगा की सतह और सिर पर फैला खुला नीला आसमान।
लेकिन इस सौंदर्य के पीछे एक गहरी, ठहरी हुई खामोशी पसरी है। यह खामोशी उन औरतों की है, जिनके शौहर सालों से परदेस में हैं। जिनकी ज़िंदगी गंगा की मझधार की तरह है। न पूरी तरह ठहरी हुई, न पूरी तरह बहती हुई। वे सुहागिन हैं, मगर उनकी प्रतीक्षा ने उन्हें भीतर से विधवा-सी निस्पंद बना दिया है।
ढाब आईलैंड से बड़ी संख्या में युवक दुबई, क़तर, सऊदी अरब, शारजाह और मस्कट जैसे खाड़ी देशों में मजदूरी करते हैं। कोई ऊंची इमारतों की नींव डालता है, कोई ईंट-गारा संभालता है, कोई सेंटरिंग करता है, तो कोई बढ़ईगीरी में हाथ बंटाता है। नखास और नखवां जैसी बस्तियों में शायद ही कोई ऐसा घर हो, जहां परिवार का कोई पुरुष गल्फ में न हो।
बुज़ुर्ग बताते हैं कि यह सिलसिला दशकों पुराना है। पहले जो गए, उन्होंने गांव के दूसरे युवकों के लिए राह बनाई। धीरे-धीरे परदेस जाना यहां की रिवायत बन गया। आज हालात यह हैं कि ढाब आईलैंड के करीब 850 से अधिक नौजवान गल्फ में रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं। लेकिन इस रिवायत की असली कीमत यहां की औरतें चुका रही हैं।
नखवां बस्ती की नीलम निषाद की सुबह चार बजे शुरू हो जाती है। पहले पशुओं को चारा देना, फिर दूध दुहना, उसके बाद बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना। उनके पति दिलीप दुबई में मजदूरी करते हैं। नीलम बताती हैं, “पहले हर महीने समय से पैसा आ जाता था। अब कभी आता है, कभी नहीं। कई बार इतना ज्यादा कर्ज बढ़ जाता है, जिसे उतारने में महीनों लग जाते हैं।”
घर की गाड़ी खेतों में मेहनत करके किसी तरह खींच रही हैं। बच्चे स्कूल जाते हैं। उनका रिज़ल्ट अब वीडियो कॉल पर दिखाया जाता है। पिता और बच्चों का रिश्ता अब मोबाइल स्क्रीन में सिमट गया है-एक छोटी-सी खिड़की में बंद भावनाएं।

राधिका की कहानी भी कुछ अलग नहीं। उनके पति बजरंगी दुबई में मकानों की सेंटरिंग का काम करते हैं। शादी के कुछ ही महीने साथ रहे, फिर परदेस की राह पकड़ ली। राधिका कहती हैं, “उस वक्त बहुत रोई थी मैं। अब तो आदत-सी हो गई है। हमारे लिए पति अब सिर्फ आवाज़ हैं, एहसास नहीं।”
वह कहती हैं, “जब पति घर आते हैं तो कुछ दिन के लिए जैसे जीवन लौट आता है। आंगन में रौनक, चेहरे पर चमक। लेकिन कुछ ही दिनों बाद फिर वही सूना घर, वही इंतज़ार।” बजरंगी बताते हैं कि वहां काम बहुत है, छुट्टी मिलना मुश्किल। दो-तीन साल में कुछ ही दिनों के लिए आ पाते हैं। कंपनी काम दे तो पैसा आता है, वरना वहां भी अनिश्चितता है।
नखवां बस्ती की निर्मला का दर्द और गहरा है। कोरोना महामारी के दौरान उनके पति राम कुंवर और बेटा गोपाल दुबई में फंस गए थे। महीनों तक उनकी सलामती की खबर का इंतज़ार किया। निर्मला कहती हैं, “बहुत से लोगों को गल्फ की नौकरी अच्छी लगती है, लेकिन हमें नहीं। जब पति परदेस जाते हैं तो हमारी जिंदगी पहाड़ जैसी भारी हो जाती है।”
35 वर्षीया लक्ष्मी के पति मुन्ना दोहा (कतर) में काम करते हैं। दो बच्चे हैं, लेकिन उनके जीवन में रंग कम हैं, प्रतीक्षा ज्यादा। लक्ष्मी कहती हैं, “शाम को जब गंगा किनारे दीये जलते हैं, तब ढाब की औरतें चुपचाप बहते पानी को देखती रहती हैं। तभी फोन की घंटी बजती है-दुबई या दोहा से कॉल। कुछ मिनट हाल-चाल, बच्चों की पढ़ाई, पैसों की चर्चा… फिर नेटवर्क कट जाता है। और हम फिर उसी खामोशी में लौट आते हैं।”
इंतज़ार की उम्र, जिम्मेदारियों का पहाड़
36 वर्षीया शशिकला के पति मुन्ना कई वर्षों से दोहा (कतर) में मजदूरी कर रहे हैं। एक बेटा और एक बेटी है। कभी ऐसा समय था जब कंपनी ठीक-ठाक वेतन देती थी। हर महीने पैसे समय से आ जाते थे तो राशन, बच्चों की फीस, दवाइयां और थोड़ी-बहुत बचत-सब संभल जाता था। भविष्य की छोटी-छोटी योजनाएं भी बनती थीं।
लेकिन अब हालात बदल गए हैं। कंपनी ने वेतन घटा दिया है। काम अनिश्चित हो गया है। कभी पैसा समय से आता है, कभी महीनों की देरी से। उधर गांव में महंगाई बढ़ी है। बच्चों की पढ़ाई का खर्च, खेती में लागत, दवा-दरू, सब कुछ महंगा हो गया है। शशिकला बताती हैं, “कर्ज लेते-लेते अब हालत यह है कि समझ नहीं आता पहले किसका पैसा चुकाएं। साहूकार अलग दबाव डालता है, बैंक की किस्त अलग।”
वह कुछ पल चुप रहती हैं, फिर धीमे से कहती हैं, “कभी-कभी लगता है जैसे जिंदगी रुकी हुई है। दिन निकलता है, ढलता है, लेकिन कुछ बदलता नहीं। बस फोन की घंटी बजती है और हम यह यकीन कर लेते हैं कि वो अभी जिंदा हैं, रिश्ता अभी बचा हुआ है।”

उनकी बातों में शिकायत कम है, स्वीकार ज्यादा नजर आता है। शशि कहती हैं, “हम अपने पति से कोई गिला नहीं करते। हमें पता है वहां भी हालात आसान नहीं। पर क्या करें, दिल तो यहीं है। बच्चे बुखार में तड़पते हैं तो हम अकेले रात भर जागते हैं। खेत में नुकसान होता है तो हम खुद संभालते हैं। उनसे सिर्फ इतना कहते हैं कि आप अपना ख्याल रखिए।”
ढाब आईलैंड की औरतें यह भली-भांति समझती हैं कि उनके शौहर भी परदेस में आराम की जिंदगी नहीं जी रहे। तपती धूप में घंटों काम करना, कभी 12-14 घंटे की ड्यूटी, तंग कमरों में छह-छह लोगों के साथ रहना, छुट्टी के लिए ठेकेदार की खुशामद करना-यह भी उनकी रोजमर्रा की सच्चाई है।
इस टापू पर घर की असली बुनियाद औरतें ही हैं। खेत की हरियाली उन्हीं की मेहनत से बची है। पशुओं का चारा, दूध की बिक्री, बच्चों की पढ़ाई, राशन का हिसाब, बैंक की लाइन, अस्पताल के चक्कर-हर जिम्मेदारी उनके हिस्से में है।
उनके लिए मोहब्बत अब सिर्फ साथ बैठकर हंसने-बोलने का नाम नहीं रह गई। मोहब्बत अब दूर रहकर भी निभाने का नाम है। एक-दूसरे की आवाज़ में भरोसा ढूंढने का नाम है। लेकिन यह भी सच है कि लंबा फासला रिश्तों की गरमाहट को धीरे-धीरे ठंडा कर देता है। कई बार बात करने को शब्द नहीं बचते, सिर्फ चुप्पी बचती है।
रिश्तों की बदलती शक्ल
ढाब आईलैंड की कहानी सिर्फ पलायन की कहानी नहीं है। यह मजबूरी में जन्मे जज़्बे की कहानी है। यह उन औरतों की दास्तान है जो न पूरी तरह अकेली हैं, न पूरी तरह साथ। वे मझधार में खड़ी हैं जिसका एक किनारा परदेस में है, दूसरा इस रेत के टापू पर।
गंगा का पानी हर मौसम में अपना रास्ता बदल लेता है। कभी कटान, कभी नई रेत, कभी नई मेड़। लेकिन ढाब की औरतें अपनी जगह अडिग खड़ी हैं। उनके चेहरे पर थकान है, मगर हार नहीं। शायद इस टापू की असली रीढ़ वही हैं, जो इंतज़ार को बोझ नहीं, जिम्मेदारी मानकर ढो रही हैं।
ढाब की औरतें सिर्फ इंतज़ार नहीं करतीं। वो पूरा घर और पूरा गांव संभालती हैं। सुबह चार बजे नींद खुलती है। सबसे पहले पशुओं को चारा, फिर दूध निकालना, फिर चूल्हा जलाना। बच्चों को नहलाना-धुलाना, स्कूल भेजना। खेत की ओर जाना, मजदूरों को लगाना, खाद-बीज का इंतजाम करना।
दोपहर में राशन की चिंता, बैंक जाकर पैसे निकालना या जमा करना, स्वयं सहायता समूह की बैठक में शामिल होना। शाम को फिर पशुओं की देखभाल, बच्चों की पढ़ाई देखना, बुज़ुर्गों की दवा देना। दिन कब शुरू होता है और कब खत्म, उन्हें खुद नहीं पता चलता।
पहले जो काम पुरुषों के जिम्मे माने जाते थे मंडी जाना, सौदे तय करना, खेत की मजदूरी तय करना, सरकारी दफ्तरों में कागज जमा करना अब वही सब औरतें कर रही हैं। कई घरों में महिलाएं खुद मंडी तक जाती हैं और सब्ज़ी बेचती हैं। गीता देवी कहती हैं, “जब मेरी शादी हुई थी, तब मैंने सोचा भी नहीं था कि एक दिन खेत की मेड़ पर खड़ी होकर मजदूरों को हिदायत दूंगी। मगर अब यही जिंदगी है।”
गीता के शौहर कतर में काम करते हैं। पैसे हर महीने आ जाते हैं, लेकिन घर के बड़े फैसले-बेटे की पढ़ाई कहां हो, खेत में कब और क्या बोया जाए और किससे उधार लिया जाए। सब वह खुद तय करती हैं। वह कहती हैं, “डर तो लगता है,” वह स्वीकार करती हैं, “मगर अब आदत हो गई है।” इस ‘आदत’ के भीतर सालों का अकेलापन, चिंता और जिम्मेदारी का बोझ छिपा है।
दूसरी तरफ परदेस गए पुरुषों की अपनी पीड़ा है, जो अक्सर खुलकर सामने नहीं आती। कई वर्षों तक ड्राइवर या मजदूर की नौकरी करने के बाद लौटे कुछ लोगों ने बताया कि दूरी ने रिश्तों में एक अदृश्य खाई बना दी है।
घुरहू निषाद के पुत्र शोभन आठ साल बाद हाल ही में सऊदी अरब से नखवां बस्ती स्थित अपने घर लौटे हैं। वह कहते हैं, “हम सोचते थे पैसा कमाकर घर बनाएंगे, बच्चों को पढ़ाएंगे। लेकिन जब लौटे तो लगा अपना ही घर अजनबी हो गया है। बच्चे हमसे झिझकते थे। पत्नी हर फैसले की आदी हो चुकी थी। हम बस पैसे भेजते रहे, जैसे मशीन हों।”
वह आगे कहते हैं, “अब जमा पूंजी भी नहीं बची। कोरोना के बाद हालात और खराब हो गए। कम वेतन पर भी काम करना पड़ता है। वहां असुरक्षा है और यहां अनिश्चितता।”

भगवानी देवी की कहानी तो जैसे संघर्ष का दूसरा नाम है। उनके पति बालकरन निषाद शादी के कुछ ही समय बाद गल्फ चले गए थे। वर्षों की मेहनत के बाद जब लौटे तो बीमार। शुगर और हाई ब्लड प्रेशर ने उन्हें इस कदर जकड़ लिया कि दोबारा परदेस जाना संभव नहीं रहा।
पांच बेटियां थीं। घर में कमाने वाला कोई और नहीं। भगवानी कहती हैं, “सभी बेटियों की शादी कर दी। जो कमाया था, इलाज और शादी में खत्म हो गया। अब मजदूरी करके घर चला रहे हैं। पति को दवा चाहिए, खाना चाहिए। कर्ज अलग सिर पर है।”
आशा की जिंदगी भी सवालों से घिरी है। उनके पति पप्पू बीस साल से खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं। दो-दो साल पर घर आते रहे। पांच बच्चे-तीन बेटे, दो बेटियां। पहले गल्फ की कमाई से घर चलता था। अब वहां भी काम कम और मजदूरी घट गई है। आशा कहती हैं, “हम उधार लेकर खर्च चला रहे हैं। कब तक चलेगा, कोई नहीं जानता। पति फोन पर कहते हैं कि हिम्मत रखो, सब ठीक होगा। लेकिन उनकी आवाज़ में जो थकान है, वह हमें डरा देती है।”
ढाब में कई औरतें ऐसी हैं, जिनके शौहर दस-पंद्रह साल में कुल मिलाकर दो-तीन साल ही घर पर रहे होंगे। शादी के बाद कुछ महीने साथ, फिर परदेस। बच्चे पैदा हुए तो पिता ने फोन पर मुबारकबाद दी। नामकरण में वीडियो कॉल। स्कूल का पहला दिन-मोबाइल पर तस्वीर और रिजल्ट-व्हाट्सऐप पर।
इस लंबे फासले ने रिश्तों को एक अजीब शक्ल दे दी है-न पूरी नज़दीकी, न पूरी दूरी। साथ है, लेकिन आधा-अधूरा। भरोसा है, लेकिन स्पर्श नहीं। संवाद है, लेकिन साझा जीवन नहीं। और इस सबके बीच खेतों में काम करते हुए ढाब की औरतें गंगा के किनारे खड़ी रहती हैं। बहते पानी को देखते हुए। शायद उन्हें मालूम है कि पानी की तरह जिंदगी भी बहती रहेगी। मगर इंतज़ार की यह मझधार कब किनारा बनेगी, यह सवाल अब भी हवा में तैर रहा है।
मझधार का टापू
ढाब आईलैंड के दिनेश और गोलू दुबई में रहते हैं। उनके घरों की असली “मैनेजर” उनकी पत्नियां ही हैं।
हाल ही में छुट्टी पर लौटे दिनेश साहनी कहते हैं, “हम लोग भले बाहर कमाने चले जाते हैं, मगर घर को संभालने वाली हमारी पत्नियां ही हैं। वे खेत की हरियाली बचाए हुए हैं, पशुओं की देखभाल कर रही हैं, बच्चों को पढ़ा रही हैं, बुज़ुर्गों का सहारा बनी हुई हैं। उनके लिए मोहब्बत सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि दूर रहकर भी निभाने का नाम है। ढाब की औरतों का सब्र ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। वे शिकायत कम करती हैं, काम ज्यादा।”
मुस्तफाबाद के पूर्व प्रधान राजेंद्र सिंह भी ढाब की औरतों की भूमिका को केंद्रीय मानते हैं। वह कहते हैं, “यहां की औरतों की खामोशी हार नहीं है, बल्कि मजबूती है। वे जानती हैं कि उनके शौहर भी वहां आसान जिंदगी नहीं जी रहे। तपती धूप में काम, तंग कमरों में रहना, ठेकेदारों का दबाव-सब कुछ सहकर वे पैसा भेजते हैं, लेकिन इस टापू पर घर की असली बुनियाद औरतें ही हैं।”
राजेंद्र आगे जोड़ते हैं, “ढाब की औरतें अपने शौहर का सिर्फ इंतज़ार नहीं करतीं, वे पूरा घर-गांव संभालती हैं। सुबह चार बजे उठकर पशुओं को चारा देना, दूध निकालना, बच्चों को स्कूल भेजना, खेत देखना, बैंक जाना, राशन लाना, बुज़ुर्गों की देखभाल-हर जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। पहले जो काम मर्दों के जिम्मे माने जाते थे, अब औरतें ही करती हैं। कई घरों में महिलाएं खुद मंडी तक जाती हैं और सब्ज़ी बेचती हैं।”
कई साल खाड़ी देशों में काम कर चुके मुनीब कुमार अब घर लौटकर परचून की दुकान चला रहे हैं। वह कहते हैं, “ढाब आईलैंड की कहानी सिर्फ पलायन की नहीं है। यह उस जज़्बे की कहानी है जो मजबूरी में जन्म लेता है। यहां की औरतें न पूरी तरह अकेली हैं, न पूरी तरह साथ। वे मझधार में खड़ी हैं। एक किनारा परदेस में है, दूसरा इस रेत के टापू पर।”
मुनीब बताते हैं कि नखवां बस्ती से ही 150 से अधिक नौजवान गल्फ में काम कर रहे हैं। ढाब आईलैंड बनारस शहर को बड़े पैमाने पर दूध और ताज़ी सब्ज़ियों की आपूर्ति करता है। दोनों ओर गंगा की धाराएं बहती हैं। कई बार नदी किनारे बदल देती है, खेत काट लेती है, मगर यहां की औरतें अपने घरों की चौखट पर अडिग खड़ी रहती हैं। वह कहते हैं, “शायद ढाब का असली सहारा वही हैं।”
करीब साढ़े सात किलोमीटर के दायरे में फैले इस टापू पर रमचंदीपुर, गोबरहां, मोकलपुर, मुस्तफाबाद और रामपुर जैसे गांव बसे हैं। आबादी लगभग 52 हजार के आसपास मानी जाती है। यादव, मल्लाह, दलित, राजभर, मुसलमान, ब्राह्मण, राजपूत-हर बिरादरी यहां साथ रहती है।
खेती, बागवानी और पशुपालन ढाब की पहचान है। बनारस शहर में हर सुबह जो दूध और ताज़ी सब्ज़ियां पहुंचती हैं, उनमें बड़ी हिस्सेदारी इसी ढाब की होती है। जमीन उपजाऊ है, लोग मेहनती हैं, लेकिन रोजगार के अवसर सीमित हैं। यही वजह है कि यहां के युवाओं के सपने गंगा के इस पार नहीं, बल्कि अरब सागर के उस पार बसते हैं।
ढाब की कहानी सिर्फ आर्थिक नहीं, सामाजिक भी है। कम उम्र में शादी की परंपरा अब भी कायम है। कम उम्र में मां बनना, पति का जल्दी परदेस चले जाना और फिर वर्षों का इंतज़ार-यह सिलसिला कई घरों में दोहराया जाता है। गीता देवी कहती हैं, “हर समय मन में डर रहता है। उधर कुछ हो गया तो? इधर कुछ हो गया तो?”
उम्मीद की पतली डोर
दूसरी ओर, खाड़ी देशों में काम करने वाले पुरुषों की अपनी पीड़ा है। दुबई में अपनी जवानी गुजार देने वाले बालक राम कहते हैं, “नखवां बस्ती में शायद ही कोई घर होगा जिसका आदमी गल्फ न गया हो। सत्तर के दशक में जब हम गए थे, काम बहुत था। मेहनत की, कमाया, घर बनाया। ऊंची-ऊंची इमारतें खड़ी कीं, लेकिन अपने घर की नींव कमजोर रह गई।” वह साफ शब्दों में कहते हैं, “गल्फ सिंड्रोम हकीकत है। सपने वहां बसते हैं, लेकिन टूटते यहां हैं।”
बालक राम बताते हैं कि अब हालात बदल चुके हैं। वेतन कम है, काम ज्यादा। एजेंटों का जाल फैला है। कई बार टूरिस्ट वीजा पर ले जाकर मजदूरों को छोड़ दिया जाता है। काम मिले या न मिले, जूझना मजदूर को ही पड़ता है। वह कहते हैं, “गरीबी आदमी को जिंदगी बहुत दूर तक धकेल देती है। जब तक यहां रोजगार नहीं मिलेगा, लोग वहां जाते रहेंगे।”

ढाब आईलैंड की भौगोलिक स्थिति भी चिंता बढ़ाती रही है। गंगा की धारा तेज होती है तो कटान बढ़ जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि नदी की ड्रेजिंग और अवैध खनन ने टापू का आकार घटा दिया है। कई जगह गहरे गड्ढे बन गए हैं। बरसात में पानी का दबाव बढ़ता है तो भय और गहरा जाता है। नखवां बस्ती का इकलौता अस्पताल बदहाल है और वह जुआरियों और शराबियों का अड्डा बन गया है। यह अस्पताल सरकारी व्यवस्था का पोल खोलता नजर आता है।
रमचंदीपुर के बुज़ुर्ग हरिनाथ तिवारी कहते हैं, “पुल बनने से थोड़ी सहूलियत हुई है। रिंग रोड पास से गुजरती है, लेकिन ढाब के भीतर से शहर तक नियमित व्यवस्था आज भी अधूरी है। जमीन उपजाऊ है, लेकिन खेती आसान नहीं रही। जंगली सुअर और घड़रोज फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। दूसरी ओर गंगा की तेज धारा जमीन को काटती जा रही है। जहां कभी खेत था, आज वहां पानी है।”
“ढाब में पर्यटन की अपार संभावनाएं यहां मौजूद हैं-सफेद रेत के मैदान, गंगा का विस्तृत दृश्य, टूंड़ी बाबा मंदिर, मौनी बाबा की कुटिया। स्थानीय लोग होम-स्टे मॉडल की बात करते हैं। नमो घाट से यह टापू महज चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर है। नाव या स्टीमर से घाटों का दीदार और काशी विश्वनाथ धाम तक की यात्रा एक रोमांचक अनुभव हो सकती है। लेकिन विकास की बातें अक्सर चुनावी भाषणों तक सिमट जाती हैं। रोजमर्रा की मुश्किलें जस की तस रहती हैं।”
बाग-बगीचे, रेत के मैदान और नीला आकाश मोहक दृश्य रचते हैं। दूर तक फैली गंगा की सतह तक जाकर ढाब की खूबसूरती को देखा जा सकता है। भेड़-बकरियों के झुंड, पशुओं की घंटियों की आवाज़, खेतों की हरियाली-सब मिलकर बनारस के आंचलिक जीवन की असली झलक पेश करते हैं।
फिर भी, इस खूबसूरती के भीतर एक कड़वा सच है-लंबा फासला रिश्तों की गरमाहट को ठंडा कर देता है। शाम को जब गंगा किनारे दीये जलते हैं, कई औरतें चुपचाप पानी को निहारती रहती हैं। तभी फोन की घंटी बजती है-दुबई या दोहा से कॉल। कुछ मिनट हाल-चाल, बच्चों की पढ़ाई, पैसे कब भेजेंगे? फिर नेटवर्क कट जाता है। औरत फिर उसी खामोशी में लौट आती है।
मुस्तफाबाद निवासी डॉ. शशिकांत सिंह कहते हैं, “ढाब आईलैंड की कहानी सिर्फ पलायन की नहीं है। यह उस जज़्बे की कहानी है जो मजबूरी में जन्म लेता है। यहां की औरतें न पूरी तरह अकेली हैं, न पूरी तरह साथ। वे मझधार में खड़ी हैं। एक किनारा परदेस में है, दूसरा इस रेत के टापू पर। गंगा बहती रहती है, किनारे बदलते रहते हैं, लेकिन ये औरतें अपनी चौखट पर अडिग खड़ी हैं। शायद ढाब का असली सहारा वही हैं।”
वह आगे कहते हैं, “रेत अब भी चमकती है। दूध अब भी शहर जाता है। सब्ज़ियां अब भी उगती हैं। मगर ढाब की औरतों की आंखों में जो नमक है, वह इस नदी के पानी से ज्यादा खारा है। वे मझधार में खड़ी हैं। हाथ में उम्मीद की पतली-सी डोर थामे हुए। शायद इसी डोर पर ढाब की पूरी दुनिया टिकी है। गंगा की धारा बहती रहती है। नावें आती-जाती रहती हैं। किनारे बदलते रहते हैं। लेकिन ढाब आईलैंड की औरतें अपने घरों की चौखट पर अब भी खड़ी हैं। इंतज़ार में, सब्र में और उम्मीद में।”
(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)