गे, ट्रांसजेंडर लोगों और सेक्स वर्कर्स के रक्तदान करने पर प्रतिबंध जारी रहेगा : केंद्र

केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने ट्रांसजेंडर लोगों, गे पुरुषों, सेक्स वर्कर्स के रक्तदान करने पर प्रतिबंध रखने का फैसला किया है। यह फैसला कोर्ट के कहने पर विशेषज्ञों ने पहले के फैसले पर दोबारा विचार करने के बाद लिया है। भारत की एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया कि विशेषज्ञों ने फिर से कहा है कि यह प्रतिबंध व्यापक जनहित में ज़रूरी था।

लाइव लॉ के अनुसार मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची और न्यायाधीश विपुल पंचोली की बेंच कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत नेशनल ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल और नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन द्वारा जारी “गाइडलाइन्स ऑन ब्लड डोनर सिलेक्शन एंड ब्लड डोनर रेफरल, 2017” को चुनौती दी गई है। इन दिशानिर्देशों के प्रावधान 12 और 51 ट्रांसजेंडर लोगों, गे पुरुषों और महिला सेक्स वर्कर्स को हाई-रिस्क एचआईवी/एड्स श्रेणी से संबंधित मानते हैं और उन्हें रक्तदान करने से रोकते हैं। पिछले साल, अदालत ने केंद्र से प्रतिबंध पर फिर से सोचने को कहा था।

एएसजी भाटी ने आज कहा कि विशेषज्ञों ने फिर से सोचा है और माना कि अगर इस बैन को कम किया गया, तो यह पाने वालों के लिए नुकसानदायक होगा याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील जयना कोठारी ने दलील दी कि कमेटी की दलीलें रिकॉर्ड में नहीं रखी गई हैं। उन्होंने कहा कि यह फैसला सिर्फ सेक्सुअलिटी और जेंडर आइडेंटिटी के आधार पर किसी व्यक्ति को टारगेट कर रहा है।

मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र के फैसले में दखल देने में अनिच्छा जताई। “हमें एक अच्छा कारण बताएं कि हमें निर्देश क्यों जारी करना चाहिए। आखिर, लाखों-करोड़ों गरीब लोग हैं, जो फ्री खून की सुविधा लेते हैं। वे प्राइवेट हॉस्पिटल का खर्च नहीं उठा सकते। यह गरीब तबका ही है जो इस खून पर जी रहा है। ये गरीब लोग क्यों…भले ही किसी इंफेक्शन का एक परसेंट चांस हो, उन्हें क्यों असर होना चाहिए?”

कोठारी ने जवाब दिया कि इंफेक्शन का एक परसेंट चांस किसी के लिए नहीं होना चाहिए। कोठारी ने कहा, “असल बात यह है कि जब कोई रक्तदान करता है, तो दान किए गए रक्त का परीक्षण होना चाहिए और उसके बाद ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। असल में, हर मामले में रक्तदान करने के बाद एचआईवी टेस्टिंग होती है। एनएटी टेस्टिंग होती है।”

यह बताते हुए कि रक्त डोनेट करना और लेना अपनी मर्ज़ी से है, मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “जो कोई भी आपका खून चाहता है, और आप डोनेट करने को तैयार हैं, वे इसे ले लेंगे।”

कोठारी ने जवाब दिया, “आज, अगर कोई हेट्रोसेक्सुअल शादीशुदा इंसान खून दान करना चाहता है, तो उस इंसान से यह सवाल नहीं पूछा जाता कि आपने आखिरी बार अनप्रोटेक्टेड सेक्स कब किया था? जोखिम वाला काम अनप्रोटेक्टेड सेक्सुअल एक्ट है। मेरी पहचान नहीं। कोई हेट्रोसेक्सुअल इंसान हो सकता है जिसने रिस्की काम किया हो। क्या उस इंसान का खून रिस्की नहीं होगा?”

एक और वकील ने कहा कि अगर एनएटी टेस्ट ज़रूरी कर दिया जाए, तो खतरों से निपटा जा सकता है।

मुख्य न्यायाधीश ने इसे “लग्ज़री लिटिगेशन” बताते हुए, आखिरकार मामले को सुनवाई के लिए लिस्ट करने पर सहमति जताई।

कोर्ट में 3 पिटीशन पेंडिंग हैं, ये सभी एलजीबीटीक्यू+ कम्युनिटी के सदस्यों ने दाखिल की हैं। केंद्र ने 2023 में एक हलफनामा दाखिल कर कहा था कि इस बात के काफी सबूत हैं कि ट्रांसजेंडर लोग, पुरुषों के साथ सेक्स करने वाले पुरुष और महिला सेक्स वर्कर को एचआईवी, हेपेटाइटिस बी या सी इन्फेक्शन का खतरा है।

इसमें आगे कहा गया था कि किस आबादी समूह को ब्लड डोनर बनने से रोका जाना है, उसका फैसला चिकित्सकों और वैज्ञानिक विशेषज्ञों वाली एक संस्था एनबीटीसी करती है और यह वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित है।

हलफनामे में यह भी कहा गया है कि उठाए गए मुद्दे कार्यपालिका के दायरे में आते हैं और उन पर व्यक्तिगत अधिकारों के नजरिए के बजाय जनस्वास्थ्य के नजरिए से विचार करने की ज़रूरत है।

दूसरी तरफ, याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 2017 की गाइडलाइंस एलजीबीटीक्यू+ कम्युनिटी के सदस्यों के साथ-साथ महिला सेक्स वर्कर्स के बराबरी, इज्ज़त और ज़िंदगी के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन करती हैं। यह भी कहा गया है कि सिर्फ़ उनकी जेंडर पहचान/सेक्सुअल ओरिएंटेशन के आधार पर ऊपर बताए गए लोगों को बाहर करना न सिर्फ़ गलत है बल्कि अवैज्ञानिक भी है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार यूनाइटेड स्टेट्स, यूनाइटेड किंगडम और कनाडा समेत कई देशों ने गे पुरुषों को ब्लड डोनेट करने की इजाज़त देने के लिए अपने नियम बदल दिए हैं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार यह बैन 1980 के दशक के पुराने और एकतरफ़ा विचारों पर आधारित है, जिसके बाद मेडिकल टेक्नोलॉजी में बहुत सुधार हुआ है, खासकर ब्लड स्क्रीनिंग में।

(जनचौक ब्यूरो)

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