सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अन्य पिछड़ा वर्ग का कोई उम्मीदवार क्रीमी लेयर में आता है या नॉन क्रीमी लेयर में, इसका निर्धारण सिर्फ उसकी आमदनी से नहीं किया जा सकता है।
बुधवार (11 मार्च, 2026) को कोर्ट ने ओबीसी के नॉन-क्रीमी लेयर के निर्धारण में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि क्रीमी लेयर का फैसला सिर्फ माता-पिता की सैलरी या आय पर आधारित नहीं किया जा सकता, बल्कि 1993 के मूल दिशानिर्देशों के अनुसार पद की स्थिति और अन्य फैक्टर्स को भी ध्यान में रखना होगा.
सुप्रीम कोर्ट ने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के उस पत्र के पैरा 9 को अमान्य घोषित कर दिया है, जिसमें बैंक, प्राइवेट सेक्टर/पीएसयू कर्मचारियों की सैलरी को क्रीमी लेयर में शामिल करने की बात कही गई थी। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने मद्रास, केरल और दिल्ली हाईकोर्ट के उन फैसलों की पुष्टि करते हुए यह बात कही है, जो सिविल सेवा परीक्षाओं के लिए ओबीसी (नॉन क्रीमी लेयर) के लाभ का दावा करने वाले उम्मीदवारों की पात्रता से संबंधित हैं।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से 60 से अधिक संघ लोकसेवा आयोग के ओबीसी कैंडिडेट को बड़ी राहत मिली है। इन छात्रों को परीक्षा से बाहर कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा है कि अगर माता-पिता ग्रुप चार में सरकारी नौकरी करते हैं और उनकी आय 8 लाख रुपये सालाना से ऊपर हो गई है, तो भी उन्हें क्रीमी लेयर में नहीं जोड़ा जाएगा। साथ ही ऐसे मामलों में कृषि आय को भी नहीं जोड़ा जाएगा। केवल ‘अन्य स्रोतों’ (बिजनेस, प्रॉपर्टी आदि) से परिवारिक आय (3 साल तक) ₹8 लाख या वर्ष से कम होनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार कार्मिक मंत्रालय ने 2004 में जो पत्र निकाला था, उसका पैरा 9 अब अमान्य हो गया है। इसके अनुसार बैंक या प्राइवेट नौकरी वालों की सैलरी मात्र को क्रीमी लेयर नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में पहले पोस्ट की सरकारी ग्रुप III और IV के साथ एक्विवैलेंस तय की जाएगी। तब तक केवल 1993 ओएम लागू रहेगा। इस निर्णय का फायदा अनेक ऐसे लोगों को मिलेगा, जिन्हें पहले क्रीमी लेयर की गलत परिभाषा के कारण ओबीसी रिजर्वेशन से बाहर रखा गया और वो नौकरी में तो हैं, लेकिन सही कैडर में नहीं हैं। ऐसे सभी मामलों में पिछले डेट से फैसला लागू होगा।
कार्मिक मंत्रालय को इसे लागू करने के लिए 6 महीने का समय दिया गया है। अगर ज़रूरी हुआ, तो सुपरनुमेरैरी पोस्ट बनाए जाएँगे, ताकि दूसरे वर्गों के कर्मचारियों की सीनियोरिटी पर असर न आए। भविष्य के सिविल सर्विसेज एग्जामिनेशन में वैध ओबीसी- एनसीएल सर्टिफिकेट (डीएम/तहसीलदार से) को प्राथमिकता दी जाएगी, सैलरी आधारित रिजेक्शन बंद होगी।
यह फैसला उन हजारों ओबीसी उम्मीदवारों के लिए बड़ी राहत है, जिन्हें पहले सैलरी या अन्य गलत व्याख्या के कारण क्रीमी लेयर मानकर आरक्षण से वंचित रखा गया था। ऐसे लोग सरकारी नौकरी में हैं, लेकिन सही कैडर या पद में नहीं पहुंच पाए।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)