‘जलेश्वर जी ने ‘आज’ अखबार में काम करते पत्रकारिता की एक पूरी पीढ़ी तैयार की’ 

(जनबुद्धिजीवी, वरिष्ठ पत्रकार और संस्कृतिकर्मी जलेश्वर जी आज नहीं रहे। उन्होंने बनारस में अंतिम सांस ली। उनकी उम्र 74 के पार थी। परिजनों, दोस्तों और उनके चाहने वालों की उपस्थिति में आज ही बनारस के हरिश्चंद्र घाट पर उनको अंतिम विदाई भी दे दी गयी। उनके निधन की खबर आने के साथ ही फेसबुक समेत सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफार्मों पर शोक और श्रद्धांजलियों का तांता लग गया। उनमें से जो कुछ महत्वपूर्ण श्रद्धांजलियां लगीं उनको यहां जनचौक पेश कर रहा है-संपादक) 

अभी-अभी बेहद दुखद सूचना सोशल मीडिया से मिली। उनकी पत्नी और बेटी पहले ही इस दुनिया से रुखसत हो चुके थे। जीवन के अंतिम समय वह बेहद एकाकी जीवन जी रहे थे। तमाम बीमारियों से जूझते हुए वह समाज, देश, दुनिया और मानवता की भलाई के लिए अपने दृढ़ विचारों के साथ अंतिम समय तक डटकर खड़े रहे। 

जलेश्वर जी से पहली मुलाकात 1984 में इलाहाबाद में लीडर रोड स्थित दैनिक आज अखबार के कार्यालय में हुई थी, जब वहां मैंने पत्रकारिता की पहली नौकरी ज्वाइन की थी। शशि शेखर जी स्थानीय संपादक थे, जबकि पूरे डेस्क की जिम्मेदारी जलेश्वर जी के हाथ थी। जिस ‘आज’ अखबार को हिंदी पत्रकारिता का सर्वश्रेष्ठ स्कूल माना जाता था, उसमें जलेश्वर जी जैसे संपादकीय स्तम्भ अग्रिम पंक्ति में गिने जाएंगे। मुझे अच्छी तरह याद है डेस्क से लेकर रिपोर्टिंग तक के हर सदस्य को उन्होंने जैसे कुम्हार की चाक पर रखकर कच्ची मिट्टी की तरह गढ़ा था और एक पूरी पीढ़ी तैयार की थी। 

जलेश्वर जी को हरिश्चंद्र घाट पर अंतिम विदाई। फोटो-शिवदास

अपने पत्रकारिता के करियर को आगे बढ़ाने और जीवन को सार्थक बनाने के लिए मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। धीरे-धीरे कब मैं उनके परिवार के सदस्य की तरह हो गया पता ही नहीं चला। जब वह इलाहाबाद आए तो आज अखबार के दफ्तर में ही एक कमरे में ही उनका बिस्तर लगा रहता था, वही उनका घर था। वह अख़बार नवीसी में इतने रमे थे कि अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में सोचने के लिए उनके पास वक्त ही नहीं था।

हम मित्रों सहकर्मियों के दबाव में और खोज पड़ताल के फलस्वरूप उन्हें रूबी भाभी (रूबी रॉय) के रूप में एक सुंदर, सुसंस्कृत बंगाली जीवन संगिनी मिलीं। और एक सुंदर बेटी जिसे वह प्यार से टूबी कहते थे। जलेश्वर जी खैनी और चूना रखने के लिए मुझसे फिल्म की डिब्बी लिया करते थे। टूबी उस फिल्म की डिब्बी से खेलती थी और उसने मेरा नाम “डिब्बा काकू” रखा था। शादी के बाद वह जॉर्ज टाउन स्थित बड़े घर में शिफ्ट हो गए थे। 

वामपंथी जुड़ाव के कारण उनके घर और दफ्तर में तमाम कामरेड लोगों का आना-जाना लगा रहता था। 1988 में मैंने अमृत प्रभात ज्वाइन किया तो वहां भी जलेश्वर जी का सानिध्य मिलता रहा। पत्रिका अमृत प्रभात की बंदी के दौरान कर्मचारियों के संघर्ष में वह पूरी शिद्दत से कर्मचारियों के साथ डटे रहे। 

बनारस से आए जलेश्वर जी पुनः सपरिवार बनारस वापस चले गए थे। भौगोलिक दूरी और व्यावसायिक तथा पारिवारिक व्यस्तता के कारण मिलना जुलना कम हो पाता लेकिन दिल का जुड़ाव गहरा था। कई बार बनारस में मुलाकात भी हुई, पिछले दिनों बेटी के असामयिक निधन के बाद वह पूरी तरह टूट गए थे। उनका पूरा जीवन बेहद संघर्ष में बीता, लेकिन कभी उन्होंने अपनी पीड़ा ज़ाहिर नहीं की। बल्कि इसके उलट वह बेहद जिंदा दिल इंसान थे और सेंस ऑफ़ ह्यूमर उनके भीतर कूट-कूट कर भरा था। आज उनके निधन की खबर सुनकर ऐसा लगा जैसे दिल का एक टुकड़ा निकल गया हो। उनके साथ बिताए गए सुख-दुख के एक-एक पल याद आ रहे हैं। 

जलेश्वर जी आप हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेंगे। 

विनम्र श्रद्धांजलि।

एसके यादव, वरिष्ठ छायाकार/ पत्रकार

ओह! अभी कुछ देर पहले सोशल मीडिया से बहुत दुखद सूचना मिली। साथी जलेश्वर नहीं रहे। बीते कुछ वर्षों से निजी जीवन के विषाद और स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से जलेश्वर लगातार जूझते रहते थे। पर उनका इस तरह जाना बहुत अखर रहा है। बिटिया की बहुत दुखद मृत्यु के बाद वह काफी हद तक टूट गये थे। उनके चारों तरफ दुख, उदासी और निराशा का अंधेरा-सा था। बेटी की स्मृतियां और कुछ दोस्तों से फोन की बतकही ही उसका संबल थीं! पर सेहत साथ नहीं दे रही थी। घर में निपट अकेले थे। जैसा साथी पत्रकार महेंद्र मिश्र की पोस्ट से पता चल रहा है कि बनारस स्थित अपने निवास के बाथरूम में गिरने और लंबे समय तक वहां पड़े रहने से उनकी मृत्यु हुई। 

साथियों, दोस्तों, कॉमरेडों और चाहने वालों ने दी अंतिम विदाई। फोटो-शिवदास

जहां तक याद आ रहा, जलेश्वर से मेरी पहली मुलाकात सन् 78 और 79 के बीच कभी हुई रही होगी। हम कुछ मित्र इलाहाबाद से बनारस गये थे। उनके बड़े भाई, लेखक और वामपंथी कार्यकर्ता महेश्वर जी के यहां जलेश्वर से मिले थे। साथी जलेश्वर से मेरी आखिरी मुलाकात कुछ साल पहले बनारस के लंका से अस्सी की तरफ जाने वाली सड़क के एक चौराहे के पास की एक दुकान पर हुई थी। किसी कार्यक्रम में मैं बनारस गया हुआ था। दोनों ने फोन पर चर्चा के बाद सुबह-सुबह वहीं मिलना तय किया था। मार्निंग वॉक के बाद मैं खोजते-खोजते जलेश्वर की बताई दुकान तक पहुंच गया। वह कुछ मिनट बाद पहुंचा! 

उस दिन पता नहीं क्या मौका था, बनारस के उस हलके में भगवा ध्वज लिये बहुत सारे मोटर साइकिल सवारों का सुबह-सुबह जुलूस भी निकला था। उस दिन हम दोनों के बीच बदलते बनारस की भी चर्चा हुई थी! 

संभवत: उस दुकान की मालकिन एक बूढ़ी औरत थी। हमने वहां कुछ साथ-साथ खाया भी। तब से हम फिर कभी नहीं मिल सके। यदा-कदा फोन पर बातचीत होती थी। उसकी फेसबुक पोस्ट जब भी दिखती मैं जरूर पढ़ता था। उसने अपनी आखिरी पोस्ट में TOI की एक खबर को उद्धृत किया है; जो सोनम वांगचुक की रिहाई के फैसले से सम्बन्धित है। अब उसकी कोई नयी पोस्ट नहीं दिखेगी। पर उसकी आवाज और उसके तेवर की गूंज कभी खत्म नहीं होगी! जब भी उसकी याद आयेगी, उसकी आवाज भी सुनाई देगी! 

उसके जीवन का आखिरी दौर बहुत दुख-तकलीफ में बीता। पर निजी दुखों और समाज में निराशाजनक माहौल के बावजूद उसके अंदर युवा दिनों का धारदार और जानदार जलेश्वर कभी मरा नहीं! इसलिए उसके इस तरह चले जाने पर मैं सिर्फ यही कह सकता हूं:

साथी जलेश्वर जिंदाबाद!

उर्मिलेश, वरिष्ठ पत्रकार

कल रात में ही चेतना ग्रुप से जन प्रतिबद्ध पत्रकार जलेश्वर भाई के न रहने की खबर मिल गई थी! मन इतना खिन्न और उदास हो गया कि समझ नहीं आया उन्हें कैसे याद किया जाए। जलेश्वर भाई से परिचय इलाहाबाद में छात्र संगठन पीएसओ में सक्रियता के दौरान 1985 में हुई जब वे आज अखबार में थे। मैं तब बस शौकिया लिखना पढ़ना करता था और वक्त किसी अखबार में नहीं था। जलेश्वर भाई के यहां जाने का मुख्य मकसद तब पीएसओ और जसम के लिए सहयोग लेना होता था और उस दौर में वे पचास रुपए और कभी-कभी सौ रुपए का भी सहयोग किया करते थे जो उस वक्त पत्रकारों के वेतन को देखते हुए बहुत बड़ी रकम थी। वजह थी क्रांतिकारी वाम धारा से उनका गहरा जुड़ाव क्योंकि वे जसम के महासचिव रहे महेश्वर के भाई भी थे।

भतीजे निखिल ने किया अग्नि को समर्पित। फोटो-शिवदास

समय के साथ पत्रकारिता में बहुत कुछ बदला पर जलेश्वर भाई की प्रतिबद्धता जस की तस रही। और शायद पत्रकारिता के मीडिया में बदलने के दुर्दांत दौर में तालमेल बिठाने में भी असफल रहे इसीलिए बहुत से प्रबुद्ध पत्रकारों की तरह मीडिया की दुनिया में वे हाशिए पर डाल दिए गए। निजी जीवन में आर्थिक तंगी के चलते झंझावातों से ही जूझते रहे। खासकर रूबी भाभी के गुजरने के बाद।! पिछले दिनों बिटिया के गुजरने के बाद तो वे बिलकुल अकेले होकर टूट से गए थे।

फिर भी इस निजी त्रासदी को सरोकारों पर हावी नहीं होने दिया। देश दुनिया में हो रहे परिवर्तनों से सेहत की कठिन स्थिति से जूझते हुए भी बाखबर रहते थे। लेकिन जिस नितांत अकेलेपन की स्थिति में वे हम सबसे बिछड़े हैं वह बेहद चिंताजनक और त्रासद है और मन को अवसाद से भर देने वाला! जलेश्वर भाई जैसा व्यक्ति बाथरूम में गिरकर घंटों पड़ा रहे और उसे अस्पताल तक न पहुंचाया जा सके यह वाकई बेहद त्रासदपूर्ण ही है! इलाहाबाद के बाद उनसे मेरी मुलाकात नहीं है पर इधर फेसबुक और चेतना ग्रुप में होने की वजह से उनसे बात हों जाया करती थी। फासीवाद और बदलते अर्थतंत्र की उनकी अदभुत समझ थी।

सेहत की भीषण त्रासदपूर्ण स्थित से जूझते हुए भी नवीनतम किताबों की जानकारी रखते थे जलेश्वर भाई। जब भी EPW के किसी अंक की जरूरत पड़ती थी मैं उन्हें ही फोन करता था। कड़वा सच यह है एक रीढ़ वाले पढ़ाकू पत्रकार और बौद्धिक को पत्रकारिता के पतन के चलते अकेलेपन और तंगहाली ने मारा है!  सरकारी संगठन शायद इसी वक्त के लिए होते हैं पर क्या कहूं जब औपचारिक श्रद्धांजलियां ही सचमुच के सरोकार की जगह लेने लगें ! भारी मन से आखिरी सलाम जलेश्वर भाई! 

दयाशंकर राय, वरिष्ठ पत्रकार

14 मार्च, 2026 को वरिष्ठ पत्रकार जलेश्वर का निधन हो गया। खबर है कि वह किसी समय कल बाथरूम में गिर गए थे। कब गिरे, यह किसी को नहीं पता। शाम को वहां रहने वाले बीएचयू के शोध छात्रों से लोगों को पता चला कि वह बाथरूम में गिर गए थे। उनकी उम्र 74+ थी। वह अकेले महामनापुरी कालोनी में लंका के पास रहते थे। बनारस में उनका अंतिम संस्कार हरिश्चन्द्र घाट पर हुआ। उनके बड़े भाई महेश्वर के पुत्र निखिल ने मुखाग्नि दी। हरिश्चन्द्र घाट पर उन्हें चाहने वाले लोग बैठे थे। यह तस्वीर तीन माह पहले मैंने उनके घर पर खींची थी। उन्हें सादर श्रद्धांजलि! 

सुरेश प्रताप सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

जलेश्वर भाई से मेरी मुलाकात आज अखबार के दफ्तर में उनके छोटे से निजी कमरे में होती थी, जब मैं चुनाव अभियान के दौरान एक प्याला चाय पीने के लिए चंद मिनट ठहर जाती थी। वहाँ फोटो पत्रकार एसके यादव और पत्रकार एए बेग साहब से मुलाकात हुई थी। जलेश्वर जी बहुत ही जिंदा दिल इंसान थे, जो लगातार छात्र आंदोलन की खबरों को प्रमुखता से लगवाते थे। उनके विवाह के बाद उनके घर जब भी जाती, राजनीतिक बातों में घंटों गुज़र जाते, फिर खाना खिलाकर ही वे और उनकी पत्नी रूबी भेजते।

सभी कार्यकर्ता उनके यहाँ खाना खाया करते, उनका द्वार हमेशा खुला रहता। इस बीच वे सोशल मीडिया पर सक्रिय थे। भारतीय अर्थव्यवस्था और फ़ासीवाद पर उनका गहन अध्ययन था। पर पहले पत्नी फिर बेटी के चले जाने से वे भीतर तक टूट गए। कहते थे ‘मैं जीने की कोशिश कर रहा हूँ, पर आसान नहीं है! ” मैं कहती थी कि आप स्तंभ हैं हमारे वाम आंदोलन के। आपका साथ बेहद ज़रूरी है। पर मानती हूँ कि हम शब्दों के सिवा उन्हें कुछ दे न सके। साथी और प्रतिबद्ध पत्रकार को अंतिम सलाम!

कुमुदिनी पति

जो जीवन सार्थक कर गये!

दादा यानी जलेश्वर। इन्हीं दो नाम से वे पहचाने गए। पत्रकारिता को सिर्फ जीवन यापन के लिए नहीं, जरूरतमंदों की आवाज को ताकत देने के लिए भी अपनाया। समाचारों के साथ गजब का न्याय। उनकी अपनी लिखी रिपोर्ट प्रमाण हैं कि मकसद से नहीं डिगे। मुख्य धारा से हटे तो सोशल मीडिया के माध्यम से डटे रहे। पहले पत्नी, फिर एकमात्र संतान बेटी के जाने के बाद अंदर से चाहे जितना टूटे हों, समाज के लिए अपनी समझ को कायम रखा।

‘आज’ अखबार में नौकरी के लिए इलाहाबाद में जब तत्कालीन सम्पादक शशि शेखर जी के पास पहुंचा, उन्होंने आपको ही बुलाकर मेरा टेस्ट लेने को कहा था। आप जीवन भर वह पारस बने रहे, जिस पर अपने को परखा जा सकता है। ‘श्रद्धांजलि’ लिखने के पहले हाथ ठिठक गया।

प्रभात ओझा, वरिष्ठ पत्रकार

जलेश्वर जी के गुज़र जाने की ख़बर बहुत दुखद है। बेहद धीर, गंभीर व्यक्ति। बहुत पढ़े-लिखे। जनपक्षधर वैचारिक पत्रकारिता के लिए उनके जैसे समर्पित लोग वर्तमान में बहुत कम हैं। फेसबुक पर ही परिचय हुआ, क्लब हाउस पर चर्चाओं में उनके साथ शामिल होने का मौका मिला था। 

बहुत तकलीफदेह है इस समाज में, समाज के लिए समर्पित किसी व्यक्ति का यूं अकेलेपन में ही चला जाना।

विनम्र श्रद्धांजलि।

अमिताभ श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार

हज़रत कल शाम तक तो आप सक्रिय थे। चैतन्य थे। फिर ये अचानक आज आप खामोश हो गए। मैं जानता हूं आपकी जिंदगी रचनात्मक पत्रकारिता की एक नज़ीर थी। पर मैं ये भी जानता हूं कि आपका जीवन दर्द की एक पोटली थी। इन सबके बावजूद आप हमेशा हंसते मुस्कुराते रहे। अपनी पीड़ा छिपाए रहे। आपको मैंने कई दशक पहले तब जाना जब मुझे आज अखबार के इलाहाबाद एडिशन को शुरू करने आपके साथ आज के प्रयागराज भेजा गया। आप कितने हंसोड़ और जिंदादिल थे भाई। आज आप इस अनंत में अचानक विलीन हो गए। लाल सलाम कामरेड जलेश्वर भाई।

विश्वनाथ गोकरन

1980 में इंदिरा गांधी सत्ता में लौटीं तब जेपी की पहल पर गठित लोक स्वातंत्र्य संगठन People’s Union for Civil Liberties को पुनर्गठित किया गया। न्यायमूर्ति वी एम तारकुंडे अध्यक्ष चुने गए।अलाहाबाद में PUCL की उप्र इकाई गठित करने के लिए सम्मेलन हुआ। वाराणसी के लिए चार सदस्यीय संयोजक मंडल बना। इसमें काशीनाथ सिंह, जलेश्वर, सुरेश प्रताप और मैं थे। जल्द ही जलेश्वर और सुरेश प्रताप गांडीव से जुड़ कर सक्रिय पत्रकारिता में आ गए।गांडीव, आज और अमृत प्रभात में जलेश्वर रहे। उजाला के समाचार संपादक थे।

अवकाश प्राप्ति के बाद बनारस आ गए। लंका क्षेत्र में समाजवादी जन परिषद का कार्यक्रम होता तो रुचि पूर्वक भाग लेते थे।

जलेश्वर प्रतिबद्ध मार्क्सवादी थे। फेबु पर खुद का तार्रुफ़ Radical Marxist के रूप में दिया है। कल कार्ल मार्क्स की पुण्यतिथि पर जलेश्वर की अंतिम पोस्टों में एक थी। कॉमरेड कार्ल मार्क्स को लाल सलाम के साथ मार्क्स का प्रसिद्ध उद्धरण जो उनकी समाधि पर लिखा हुआ है,’ “The philosophers have only interpreted the world, in various ways the point however is to change it” (from the Theses on Feuerbach)। 

पहनावे में भी दिखती थी क्रांति की छाप।

बेटी की मृत्यु के बाद जलेश्वर मृत्यु पर भी तार्किक ढंग से सोचते थे।

मैंने उन्हें नबकृष्ण चौधरी द्वारा आपातकाल में जेल से मुझे लिखे एक पत्र से मृत्यु पर उनके विचार को लिख भेजा। गांधी विद्या संस्थान, राजघाट परिसर में सुरेंद्र विक्रम सिंह का बेटा शिशु वरुणा में डूब गया था। उस खबर पर नबकृष्ण चौधरी ने लिखा था-

That suddenly brings to my mind – forgetful due to old age –

the terrible shock I had got on hearing from Baby about Surendra Bhai’s lovely little son’s death! Of all the little ones to play with in the Sadhana Kendra, somehow, he was perhaps the one whom I loved and admired most. I do not know how to console people.

I have never consoled myself. I live with my sorrows, however terrible they may be. That is my philosophy. I think, if I do not suffer I cease to be a human being. Why is it that the mother suffers the most for the lost child? The simple reason is she loves the most.

To lessen her sorrow would she like to be something less than a mother? In the animal kingdom man is the only creature who suffers at the very sight of others suffering because by nature he is capable loving others outside his kith and kin. Let us love more and more  and bear all the suffering that comes out of this game of love. Jesus perhaps

meant this and not what the pious Christians say, when he mounted the gallows which used to be like cross in those days in his country.

जलेश्वर ने इसके जवाब में लिखा,’शुक्रिया। इसको संभाल कर रखूंगा। बार-बार पढ़ने लायक है। 

जलेश्वर फेसबुक पर देश-दुनिया के बहुत चुनिंदा खबरें और लेख (आर्थिक और वित्तीय विषयों पर अधिक) पोस्ट करते थे। फासीवाद, हिटलर आदि पर उनकी कई पोस्टों के कारण हाफ पैंटियों की शिकायत पर उनका खाता फेबु निलंबित भी करता था।

अंतिम जोहार कामरेड जलेश्वर!

अफलातून अफलू

जलेश्वर के आकस्मिक निधन की सूचना से स्तब्ध हूँ ।

अक्टूबर 1978 में राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चे का गठन हुआ था। मैं उसकी गोरखपुर इकाई ‘संचेतना’ की नाट्य टीम  की सदस्य थी जिसके नेता डॉ लाल बहादुर वर्मा थे। जलेश्वर बनारस इकाई ‘अभियान’ के सदस्य थे और नाट्य टोली में भी थे। उनकी टीम के नेता डॉ रामनारायण शुक्ल थे। जब भी संयुक्त अभियान चलते थे तो हम लोगों को साथ-साथ नुक्कड़ नाटक करने का अवसर मिलता था। प्रोसीनियम थियेटर भी हम दोनों करते थे लेकिन साथ में कभी कोई नाटक नहीं किया। सांस्कृतिक कर्म का यह साथ क़रीब पाँच वर्षों तक चला होगा। 

जलेश्वर हम लोगों के बीच सबसे ज़िन्दादिल साथी के रूप में जाने जाते थे। वह हँसोड़ होने के साथ ही बेहद प्रतिभाशाली भी थे लेकिन अफ़सोस! एक हद तक अराजकता के कारण उनकी प्रतिभा के सृजनात्मक प्रतिफल उस हद तक सामने नहीं आ सके।

आगे चलकर राजनीतिक दिशाएँ अलग हो जाने और राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चे के विघटन के बावजूद हम लोगों के दोस्ताना रिश्ते बने रहे और बनारस जाने पर उनसे मिलना होता रहा। जलेश्वर ने पत्रकारिता का पेशा चुना और इलाहाबाद, लखनऊ, पटना, बनारस आदि कई शहरों में काम किया। बरसों के अंतराल के बाद फ़ेसबुक पर फिर उनसे सम्पर्क बना था और जब-तब संवाद हो जाता था। 

जीवन के अंतिम वर्षों में जलेश्वर बेहद अकेले हो गये थे। पत्नी का निधन तो बरसों पहले हो चुका था। तीन वर्ष पहले इकलौती बेटी भी अचानक चल बसी जिस पर वह जान छिड़कते थे। टूटे-थके जलेश्वर बनारस में अकेले दिन बिता रहे थे लेकिन उनकी प्रतिबद्धता अक्षुण्ण थी। देश-दुनिया की राजनीति और आर्थिक स्थितियों पर वह जब तब फ़ेसबुक पर पोस्ट लिखते रहते थे।

48 वर्षों पहले जिन हम सफ़रों के साथ राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन-यात्रा की शुरुआत की थी उनमें से कई, कहें कि अधिकांश, एक-एक कर दुनिया से विदा ले चुके हैं। अब तो जब तक जीवन है तब तक यह यात्रा तो जारी रखनी ही है, पहले से भी अधिक हठी जिजीविषा और युयुत्सा के साथ, नये युवतर साथियों के साथ! गुज़रे दौरों के अपने दिवंगत साथियों को याद करने का यही सबसे बेहतर तरीक़ा है कि अपने समय के आततायी अँधेरे का डटकर मुक़ाबला किया जाये, राख और रक्त की बारिश में भीगते हुए।

अलविदा कामरेड जलेश्वर! लाल सलाम!

कात्यायनी

जलेश्वर, यानी टुन्ना, नहीं रहे। मुलाक़ात तो कम होती थी, लेकिन यूनिवर्सिटी के दिनों से ही हम जुड़े रहे, फ़ेसबुक पर लगातार सम्पर्क रहा। देख रहा हूँ कि कल ही उन्होंने मेरी पोस्ट पर प्रतिक्रिया दी थी। सब जा रहे हैं, तुम भी चले गये। मैं थोड़ा सा कम हो गया। 

यादों में बने रहोगे।

उज्जवल भट्टाचार्य

जलेश्वर भाई नहीं रहे। इसकी सूचना सुबह शशिकांत भाई की फेसबुक पोस्ट से मिली। एकाएक इस खबर ने भीतर तक परेशान कर दिया। फिर मैंने जलेश्वर भाई के फोन पर कॉल किया तो उधर से एक महिला ने फोन उठाया। शायद वह उनकी मकान मालकिन थीं, जहां जलेश्वर भाई बनारस स्थित इस मकान में किराए पर रहते थे। मेरे पूछने पर कि क्या कुछ लोग पहुंचे हैं तो उन्होंने बताया कि हां, एक दो लोग आए थे। उनके परिवार के लोग जो पटना में रहते हैं। उनको सूचना दी गयी है। भतीजे और परिवार के किसी और सदस्य के आने की बात कही गयी है। आपको बता दें कि जलेश्वर भाई प्रख्यात संस्कृतिकर्मी महेश्वर जी के छोटे भाई थे। वह पेशे से पत्रकार थे। 

इलाहाबाद से लेकर लखनऊ और पटना से लेकर बनारस उनके कार्यक्षेत्र रहे। जिसमें वह अमर उजाला से लेकर दैनिक जागरण समेत तमाम अखबारों से जुड़े रहे। फिलहाल इस समय वह बनारस में अकेले रह रहे थे। पत्नी को गए काफी साल हो गए थे। अकेली एक बेटी थी जिसकी तकरीबन 3 साल पहले मौत हो गयी। उसी की मौत के बाद से जलेश्वर भाई बिल्कुल टूट गए थे। वह अकेलापन उन पर भारी पड़ रहा था। तकरीबन चार साल पहले बिहार से इलेक्शन कवरेज से लौटने के दौरान बनारस में उनसे मुलाकात हुई थी। मैं और सिद्धार्थ जी उनके कमरे पर गए थे। बिल्कुल एकाकी जीवन था। कमरे का माहौल उस उदासी और अकेलेपन का गवाह था। यही जलेश्वर भाई को अंदर से मार रहा था। 

जलेश्वर भाई की इस दौर में बहुत जरूरत थी। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं उसके पीछे एक कारण है। मेरे आस-पास और परिचितों में और यहां तक कि तमाम बुद्धिजीवी जो फासीवाद की समझ रखते हैं उससे बेहतरीन समझ फासीवाद की जलेश्वर भाई में थी। उनके पास इस क्षेत्र का बेहद गहरा अध्ययन था। शायद ही उससे जुड़ी कोई ऐसी महत्वपूर्ण किताब रही हो जिसे उन्होंने न पढ़ रखा हो। लेकिन हम लोग उसका कोई उपयोग नहीं कर सके। कई बार सोचा और उनसे बात हुई लेकिन चीजें उस दिशा में आगे नहीं बढ़ सकीं। चूंकि वह वीडियो करना नहीं चाहते थे इसलिए उसके जरिये संभव नहीं हो पाया। उनसे मैंने लिखने के लिए कहा, जिससे लेखों के जरिये फासीवाद से जुड़ी चीजों को सामने लाया जा सके। लेकिन वह भी संभव नहीं हो सका। 

जलेश्वर भाई का इस तरह से जाना खल गया। उनकी मकान मालकिन ने बताया कि रात में आठ बजे वह बाथरूम में खून से लथपथ पाए गए। उनके अनुमान के मुताबिक शायद वह शाम को चार बजे के आस-पास बाथरूम में गिरे होंगे। लेकिन चूंकि कोई और साथ रहता नहीं था और आस-पास भी कोई नहीं था, इसलिए उन्हें मौके से अस्पताल भी नहीं ले जाया जा सका। उनकी मौत काफी ब्लीडिंग होने से हुई है।

विदा जलेश्वर भाई।

महेंद्र मिश्र

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