वारणसी/चंदौली/गाजीपुर। सुबह के धुंधलके में जब बनारस के बड़ागांव, चिरईगांव, चोलापुर और कछवां रोड के खेतों पर हल्की धूप उतरती है तो दूर तक फैली आलू की खुदाई के बाद सूनी पड़ी मेड़ें किसी जश्न का नहीं, बल्कि अधूरी उम्मीदों का मंजर पेश करती हैं। यही वो ज़मीन है, जहां कुछ महीने पहले किसानों ने ख्वाब बोए थे- बेहतर दाम के, थोड़ी राहत के और कर्ज़ की जंजीरों से निकलने के। मगर आज वही खेत गवाही दे रहे हैं कि मेहनत का हिसाब अब मिट्टी नहीं, बाजार तय करता है… और इस बार बाजार ने किसानों को बेआवाज़ लूट लिया है।
पूर्वांचल में आलू की खेती इस वक़्त किसानों के लिए घाटे का सौदा बन चुकी है। दिन ढलता है, खेत खाली हो जाते हैं, लेकिन किसानों के सीने में जमा बोझ कहीं नहीं जाता। मिट्टी में उगा आलू भले बिक जाता है, लेकिन उसके साथ किसानों के अरमान भी औने-पौने दामों में कहीं खो जाते हैं। इतने सस्ते कि उनका हिसाब रखने वाला भी कोई नहीं।
मंडियों में आलू का भाव गिरकर 5 से 6 रुपये प्रति किलो तक सिमट गया है, जबकि इसकी लागत 9 से 10 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुकी है। ये सिर्फ आंकड़ों का फर्क नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के उन किसानों की दास्तान है, जो हर बोरी के साथ अपना यकीन भी बेचने मंडी तक लाते हैं।
मंडी तक पहुंचते ही टूट रहीं उम्मीदें
वाराणसी के राजातालाब और पहड़िया मंडी में सुबह-सुबह ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की लंबी कतार लगती है। बोरी पर बोरी उतरती है, लेकिन चेहरों पर उम्मीद नहीं, एक अजीब सी हिचक और मायूसी तैरती है। राजातालाब मंडी में अराजीलाइन इलाके के किसान रामभरोसे धीमे लहजे में कहते हैं, “आज फिर घाटा तय है।” यहां रोज़ाना 20 से 25 टन आलू की आवक हो रही है, लेकिन ज्यादातर आलू बाहर से आ रहा है।
ऐसे में स्थानीय किसानों की फसल जैसे अनदेखी कर दी गई हो। बनारस की मंडियों में खरीदार कम हैं और माल ज्यादा। ऐसे में व्यापारी भी लाचार हैं, क्योंकि सप्लाई इतनी बढ़ चुकी है कि दाम टिक ही नहीं पा रहे।

चोलापुर के किसान अशोक सिंह अपने खेत के किनारे खड़े होकर कहते हैं, “बीज महंगा, खाद महंगी, डीजल महंगा… अब तो मजदूरी भी पहले जैसी नहीं रही। खुदाई और छंटाई में ही 2 से 3 रुपये किलो खर्च हो जाता है। ऊपर से बोरा, पल्लेदारी, भाड़ा। सब जोड़ लिया जाए, तो लागत 10 रुपये से ऊपर चली जाती है, लेकिन मंडी में कोई पूछने वाला नहीं।”
उनकी बातों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरी थकान है जैसे बार-बार हारने के बाद इंसान शिकवा करना भी छोड़ देता है। बड़ागांव के प्रगतिशील किसान जगदीश तिवारी भी मायूसी में डूबे दिखते हैं। वे धीमे स्वर में कहते हैं, “लगातार घाटे ने उन्हें आलू का रकबा घटाने पर मजबूर कर दिया है। “अब आलू की खेती करना भी एक तरह का जुआ लगने लगा है।”
खुटहां गांव के ध्रुव सिंह ने तो आलू की खेती से पूरी तरह किनारा कर लिया है। पिछले साल तक 12 बीघे में आलू बोने वाले ध्रुव सिंह फर्रुखाबाद से उन्नत बीज लाकर खेती करते थे, लेकिन अब उन्होंने इस खेती से तौबा कर ली है। यह फैसला उनके लिए आसान नहीं था, मगर लगातार घाटे ने उन्हें तोड़ दिया। वे कहते हैं, “तीन साल से नुकसान झेल रहे थे… इस बार सोचा, अब बस… अब कुछ और करेंगे।”
रतनपुर के अकबाल नारायण सिंह अपनी गाड़ी में लदी बोरियों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, “मंडी में अगर 10 रुपये भी मिल जाए, तो भी हमारे हाथ में 3-4 रुपये ही बचते हैं। इस बार तो सीधा घाटा है। कई बार तो दिल करता है कि फसल यहीं छोड़ दें… बेचने का भी मन नहीं करता।”
यह मंजर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि बाजार और व्यवस्था की खामियों को भी बेनकाब करता है। पूर्वांचल में भंडारण की सुविधा बेहद सीमित है। वाराणसी जिले में आठ शीतगृह जरूर हैं, लेकिन छोटे किसानों के लिए वहां तक पहुंच पाना आसान नहीं। किराया, ढुलाई और रखरखाव का खर्च उनके लिए अलग बोझ बन जाता है।

बनारस के वरिष्ठ उद्यान विभाग के निरीक्षक ज्योति सिंह बताते हैं कि इस साल मौसम मेहरबान रहा, जिससे उत्पादन अच्छा हुआ। मगर यही अच्छी पैदावार अब किसानों के लिए मुसीबत बन गई है। मांग के मुकाबले आपूर्ति ज्यादा होने से कीमतें गिर गई हैं। ऊपर से कानपुर, फर्रुखाबाद और मैनपुरी जैसे इलाकों से बड़ी मात्रा में आलू पूर्वांचल की मंडियों में आ रहा है, जिससे स्थानीय किसानों की फसल और सस्ती हो रही है।
राजातालाब मंडी के आलू व्यापारी शंकर सोनकर, राम बाबू सोनकर, प्रकाश जायसवाल, सूरज चौहान, कल्लू जायसवाल, श्रवण राय, अब्बास और दिलीप राजभर मायूसी भरे लहजे में कहते हैं, “अगर यही हाल रहा, तो कुछ दिनों में आलू सड़कों पर फेंकने की नौबत आ सकती है। गर्मी बढ़ रही है, स्टोरेज मुश्किल है और खरीदार कम हैं। सरकार सस्ती सब्जियों का हवाला देकर अपनी कामयाबी गिनाती है, लेकिन यह नहीं देखती कि इन सस्ती सब्जियों की कीमत कौन चुका रहा है।”
बनारस के पहड़िया स्थित लाल बहादुर शास्त्री फल एवं सब्जी मंडी के अध्यक्ष धनंजय मौर्य इस पूरे संकट को बेहद साफ लफ्ज़ों में बयान करते हैं। उनका कहना है कि सबसे ज्यादा मार छोटे और मझोले किसानों पर पड़ रही है। ये किसान मजबूरी में अपनी उपज आधे दाम पर बेचने को मजबूर हैं, जबकि इस हालात का सबसे बड़ा फायदा बिचौलिए उठा रहे हैं। वे सस्ते में आलू खरीदकर मोटा मुनाफा कमाते हुए उसे दूसरे राज्यों की मंडियों में भेज रहे हैं।

वे बताते हैं कि पहड़िया मंडी पूर्वांचल की सबसे बड़ी मंडी है, जहां किसानों को भले ही 5 से 6 रुपये प्रति किलो का भाव मिल रहा हो, लेकिन खुदरा बाजार में कीमतें उसी अनुपात में नहीं घट रहीं। इसका सीधा मतलब है कि मुनाफा किसान के हाथ में नहीं, बल्कि सप्लाई चेन के बीच कहीं अटक गया है।
धनंजय मौर्य के मुताबिक, “करीब 50 किलो आलू की उत्पादन लागत डेढ़ सौ रुपये तक पहुंच जाती है, लेकिन किसान इसे महज 60 से 80 रुपये में बेचने को मजबूर हैं। हमने अपनी पूरी पूंजी खेतों में लगा दी, लेकिन अब लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है।” वे आगे कहते हैं कि अगर सरकार ने वक्त रहते दखल नहीं दिया, तो यह संकट और गहरा जाएगा और किसान पूरी तरह टूट जाएंगे।
“अगर यही हाल रहा, तो हजारों किसानों की फसल या तो खेतों में ही सड़ जाएगी या फिर हाइवे पर फेंकनी पड़ेगी… आखिर भरपूर पैदावार के बावजूद घाटा सहकर किसान कब तक जिंदा रहेगा?” यह सवाल अब हर खेत, हर मंडी और हर किसान की आंखों में तैर रहा है।

उम्मीदों का सफर, मायूसी का अंजाम
कुछ ऐसी ही दास्तान गाजीपुर की मिट्टी भी बयान कर रही है। जिले में करीब 25 हजार हेक्टेयर में आलू की खेती होती है, खासकर भदौरा ब्लॉक के गांवों में। करहिया (सेवराई) गांव उन इलाकों में शामिल है, जहाँ बड़े पैमाने पर आलू उगाया जाता है। इस बार पैदावार अच्छी हुई है। खेत भरे हुए हैं, फसल लहलहा रही है, लेकिन यही खुशहाली अब किसानों के लिए बोझ बन गई है। पहली नजर में सब कुछ सामान्य लगता है, लेकिन जैसे ही निगाह किसानों के चेहरों पर टिकती है, तस्वीर बदल जाती है।
खेत से निकलता हर बोरा जैसे उम्मीदों से भरा होता है, मगर मंडी पहुंचते ही वही उम्मीद चुपचाप दम तोड़ देती है। जब व्यापारी 500 से 600 रुपये प्रति कुंतल का भाव बताते हैं, तो किसान कुछ पल के लिए खामोश हो जाता है। उसे समझ ही नहीं आता कि अपनी फसल बेच दे या फिर उसे वापस घर ले जाए।

अरविंद सिंह अपने खेत के किनारे खड़े हैं। मिट्टी से सने हाथ और चेहरे पर साफ झलकती मायूसी। वे कहते हैं, “5 बीघा में आलू लगाया था… फसल तो अच्छी हुई, लेकिन दाम ने सब खत्म कर दिया। अगर यही हाल रहा तो आगे आलू बोना मुश्किल हो जाएगा।” कुछ देर रुककर वे धीरे से जोड़ते हैं, “मेहनत पूरी की, मगर उसका कोई मोल नहीं मिला…।”
पास ही रामप्रवेश यादव मिलते हैं। उनकी आवाज में थकान भी है और गुस्सा भी। वे कहते हैं, “छह बीघा में आलू बोया था। बीज, खाद, पानी, मजदूरी-सबमें पैसा लगा। लेकिन अब मंडी में 500-600 रुपये कुंतल का भाव मिल रहा है। इतनी कम कीमत में तो लागत भी नहीं निकल रही।”
किसानों के मुताबिक, एक बीघा आलू तैयार करने में 35 से 40 हजार रुपये तक खर्च आता है, लेकिन जब वही आलू बिकता है तो मुश्किल से 26 से 30 हजार रुपये ही मिल पाते हैं। यानी हर बीघा पर 10 से 15 हजार रुपये का सीधा नुकसान। ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हर घर की बिगड़ती रसोई, टलती जरूरतों और बढ़ते कर्ज़ की हकीकत हैं।

मंडी से लौटते वक्त किसान के सामने बस दो रास्ते बचते हैं या तो वह औने-पौने दाम पर आलू बेच दे, या फिर उसे संभालकर रखने का जोखिम उठाए, जो हर किसी के बस की बात नहीं। ज्यादातर किसान मजबूरी में सस्ता बेच देते हैं, क्योंकि उनके पास इंतजार करने की गुंजाइश ही नहीं होती। हर बोरी के साथ उन्हें यह एहसास होता है कि उन्होंने अपनी मेहनत किसी और के हवाले कर दी-बेहद सस्ते में।
खेत से मंडी तक का यह सफर अब सिर्फ दूरी का नहीं रहा, बल्कि उम्मीद से मायूसी तक का सफर बन गया है।
पूर्वांचल ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के कई जिले-आगरा, फिरोजाबाद, कन्नौज, कानपुर देहात भी इसी दर्द से गुजर रहे हैं। आलू उत्पादन का बड़ा केंद्र माने जाने वाले फर्रुखाबाद जिले का कस्बा कमालगंज भी इस संकट से अछूता नहीं है। कमालगंज के एक खेत में खड़े सुनील कुमार ट्रैक्टर की तरफ देखते हुए बताते हैं, “इस बार 20 बीघा में आलू बोया था। सोचा था कुछ बचत हो जाएगी… लेकिन मंडी में जो दाम मिले, उससे समझ आ गया कि सब खत्म हो गया।”
उनकी आवाज भर्रा जाती है। वे कहते हैं, “15 बीघा आलू तो खुद ही ट्रैक्टर से जोतकर मिट्टी में मिला दिया। बेचते तो लागत भी नहीं निकलती।” कमालगंज के खेतों में कहीं मजदूर आलू खोद रहे हैं, तो कहीं किसान उन्हें यूं ही छोड़कर लौट जा रहे हैं। न कोई खरीदार, न कोई उम्मीद-बस एक खामोश बेबसी।

कायमगंज के किसान राकेश अपनी कहानी सुनाते हैं, तो लगता है जैसे आंकड़े नहीं, जख्म गिनाए जा रहे हों। “10 बीघा के लिए 95 हजार रुपये का बीज लिया था। खाद, पानी, मजदूरी मिलाकर करीब एक लाख रुपये और लग गए… लेकिन मंडी में कोई लेने वाला नहीं। जो भाव मिला, उसमें तो घर से पैसा लगाकर बेचना पड़े,” वे कहते हैं। उनकी आंखें भर आती हैं, “अब फसल नहीं, कर्ज़ उगाया है हमने।”
मोहम्मदाबाद के किसान संजय के खेत में इस बार पैदावार शानदार हुई। एक बीघा में 50 से 55 कुंतल आलू निकला। आमतौर पर यह खुशी की बात होती, लेकिन इस बार यही उत्पादन उनके लिए मुसीबत बन गया। वे कहते हैं, “इतना आलू निकालकर क्या करें? दाम इतने गिर गए कि लागत भी नहीं निकल रही। कोल्ड स्टोरेज में रखने का किराया अलग… वो भी नहीं दे सकते।”
फर्रुखाबाद जिले में इस बार आलू का रकबा 42,950 हेक्टेयर तक पहुंच गया और उत्पादन 15.85 लाख मीट्रिक टन रहा। लेकिन भंडारण की क्षमता सिर्फ 10.57 लाख मीट्रिक टन है। यानी लाखों टन आलू के लिए जगह ही नहीं। 113 कोल्ड स्टोरेज होने के बावजूद हर किसान वहां तक नहीं पहुंच सकता, क्योंकि किराया और खर्च उसकी पहुंच से बाहर है।
किसानों और व्यापारियों का कहना है कि इस बार बाजार कई तरफ से दबाव में है। जो आलू कभी मुनाफे की फसल माना जाता था, वही अब घाटे का सौदा बन गया है। इस नुकसान की असली मार खेतों से ज्यादा घरों में दिख रही है। एक किसान राम सिंह धीमे स्वर में कहते हैं, “बेटी की शादी इस साल करनी थी… अब टालनी पड़ी।” दूसरा किसान जोड़ता है, “बच्चों की फीस भी नहीं भर पाए… स्कूल वाले रोज याद दिला रहे हैं।”
यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं, बल्कि आत्मसम्मान पर लगी चोट है। किसान, जो अपने श्रम पर नाज़ करता था, आज अपनी ही फसल को मिट्टी में मिलाने पर मजबूर है। वही आलू, जिसे उगाने में उसने अपनी पूंजी, मेहनत, उम्मीद-सब कुछ झोंक दिया, आज उसी को सड़क पर बिखेरना पड़ रहा है।
कुछ ऐसी ही तस्वीर मैनपुरी के नंगला गैया गांव में भी दिखती है। खेत के किनारे खड़े राकेश कुमार धीमी आवाज में कहते हैं, “आलू की हालत बहुत खराब है सर… समझ नहीं आता क्या करें। पैदावार भी कम रही और जो हुआ, उसका दाम नहीं मिल रहा। मंडी में ले जाओ तो आधा बिकता है, आधा वापस आ जाता है… और जो बिकता है, उसमें खुदाई तक के पैसे नहीं निकलते।”

पास खड़े सहन गांव के कुलदीप पांडे बातचीत में शामिल होते हैं। वे कहते हैं, “इस बार ₹150–₹200 कट्टा तक आलू बिक रहा है। लेबर का खर्चा भी नहीं निकल रहा… फायदा तो बहुत दूर की बात है।” फिर असली वजह बताते हैं, “निर्यात नहीं हो रहा… माल बाहर नहीं जा रहा… इसलिए यहां दाम गिर गया है।”
खेत में खड़े सियाराम इस संकट की जड़ को समझाते हैं। वे कहते हैं, “किसान पूरी तरह आलू पर निर्भर हो गया है। रकबा बढ़ गया है, लेकिन क्वालिटी गिर गई… और बाजार पहले से ही डाउन है। आगे भी यही हालत रहने वाली है।” वे मिट्टी की तरफ इशारा करते हुए जोड़ते हैं, “जिस आलू में थोड़ी भी खराबी है, उसे निकालने का भी पैसा नहीं है। लेबर लगाएंगे तो खर्चा बढ़ेगा… इसलिए किसान उसे खेत में ही छोड़ रहा है।”
अच्छी पैदावार, लेकिन किसान मायूस
मैनपुरी में कई किसानों ने अपने खेतों में ही आलू छोड़ दिया है। ₹15,000 प्रति बीघा तक जमीन किराए पर लेकर खेती करने वाले किसान अब पूरी तरह घाटे में हैं। जब आलू ₹150–₹200 कट्टा बिक रहा है, तो पूरा गणित बिगड़ गया है। एक किसान गुस्से और दर्द के बीच कहता है, “जब आलू 200 रुपये कट्टा बिक रहा है… तो किसान क्या करेगा? मरेगा नहीं?”
कोल्ड स्टोरेज से जुड़े जयचंद पूरा हिसाब समझाते हैं, “₹150–₹200 कट्टा आलू बिक रहा है। उतना ही किराया, बारदाना और पल्लेदारी में चला जाता है… किसान के हाथ में कुछ नहीं बचता। ₹150 कट्टा बिका… ₹150 किराया गया… ₹35 बारदाना… ₹10–15 मजदूरी… अब किसान क्या ले जाएगा?”
यानी किसान जितना कमा रहा है, उतना ही खर्च में खत्म हो जा रहा है। कोल्ड स्टोरेज की हालत भी चिंताजनक है। कई जगह 80 फीसदी से ज्यादा भरे हुए हैं, जबकि गांवों में अब भी करीब 20 फीसदी आलू खुले में पड़ा है। मंजर साफ है-यह संकट अभी थमा नहीं है… बल्कि आने वाले दिनों में और गहराने वाला है।
सीतापुर के रामपुर मथुरा ब्लॉक में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। यहां के किसान हरिनाम मौर्य बताते हैं कि आमतौर पर वे 12 एकड़ में आलू की खेती करते थे, लेकिन इस बार मुनाफे की आस में रकबा बढ़ाकर 15 एकड़ कर दिया। “सोचा था इस बार कुछ बचत हो जाएगी… लेकिन अब समझ आ रहा है कि ज्यादा बोना ही सबसे बड़ी गलती हो गई,” वे हल्की मुस्कान के साथ कहते हैं, जिसमें बेबसी साफ झलकती है।
यह कहानी सिर्फ हरिनाम मौर्य की नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के हजारों किसानों की है, जिन्होंने बेहतर आमदनी की उम्मीद में उत्पादन बढ़ाया। लेकिन जब फसल तैयार हुई, तो बाजार ने साथ छोड़ दिया। अब हालात यह हैं कि कोल्ड स्टोरेज में जगह कम पड़ रही है और प्रशासनिक स्तर पर समाधान की रफ्तार बेहद सुस्त नजर आ रही है।
फर्रुखाबाद के किसान अन्नू सिंह की परेशानी भी कुछ ऐसी ही है। पिछले दो हफ्तों से वे लगातार कोल्ड स्टोरेज के चक्कर काट रहे हैं, मगर कहीं जगह नहीं मिल रही। “हर जगह ‘फुल’ का बोर्ड लगा है… अब समझ नहीं आता कि आलू कहां रखें,” वे कहते हैं। बढ़ती गर्मी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। खेतों और अस्थायी गोदामों में रखा आलू सड़ने लगा है और हर सड़ती बोरी के साथ नुकसान और गहरा होता जा रहा है।
असल में यह संकट सिर्फ एक सीजन की कहानी नहीं है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था की खामियों का नतीजा है। देश में फलों और सब्जियों का बड़ा हिस्सा कटाई के बाद ही खराब हो जाता है। वजह वही पुरानी-कोल्ड स्टोरेज की कमी और कमजोर सप्लाई चेन। अंदाजा है कि हर साल अरबों डॉलर की उपज उपभोक्ताओं तक पहुंचने से पहले ही बर्बाद हो जाती है।
यह तस्वीर तब और ज्यादा चिंताजनक हो जाती है, जब यह समझ आता है कि देश के करीब 82 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत वर्ग से आते हैं। उनके पास न तो संसाधन हैं, न इंतजार करने की ताकत। उनके लिए हर दिन, हर बोरी, हर रुपया मायने रखता है।
हालांकि प्रशासन की तस्वीर कुछ अलग नजर आती है। बाराबंकी के जिला बागवानी अधिकारी महेश कुमार श्रीवास्तव बताते हैं कि जिले में लगभग 19,500 हेक्टेयर में आलू की खेती होती है और यहां 45 कोल्ड स्टोरेज संचालित हैं, जिनकी कुल क्षमता करीब 4.85 लाख मीट्रिक टन है। उनके मुताबिक, इस साल पांच नए कोल्ड स्टोरेज भी तैयार किए गए हैं, जो जल्द ही चालू हो जाएंगे।
वे कहते हैं, “किसानों को घबराने की जरूरत नहीं है। अतिरिक्त भंडारण की व्यवस्था की जा रही है।” जमीनी हकीकत यह है कि किसान अभी भी भंडारण के लिए भटक रहा है और इंतजार में उसकी फसल खराब हो रही है।
सरहदी तनाव भी तबाही की वजह
उत्तर प्रदेश में आलू सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि लाखों किसानों की रोजी-रोटी का सहारा है। “सब्जियों का राजा” कहलाने वाला यही आलू इस बार किसानों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गया है। इस संकट की जड़ अब सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रही, बल्कि दुनिया की सियासत से भी जुड़ गई है।
ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव ने यहां के किसानों की कमर तोड़ दी है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, आगरा और फर्रुखाबाद जैसे इलाकों से बड़ी मात्रा में आलू खाड़ी देशों में निर्यात होता था। लेकिन युद्ध के चलते यह निर्यात फिलहाल ठप पड़ा है। जो आलू विदेश जाना था, वह अब यहीं के बाजारों में अटका पड़ा है और यही अतिरिक्त दबाव दामों को तोड़ रहा है।
भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष हरिनाम सिंह इस हालात को साफ शब्दों में बयान करते हैं। वह कहते हैं, “इस बार किसानों ने आलू ज्यादा बोया। ऊपर से जो माल बाहर जाता था, वह भी नहीं जा पा रहा… इसलिए बाजार टूट गया है।” वे एक सुझाव भी देते हैं, “अगर सरकार कुछ समय के लिए राशन के साथ आलू भी बांट दे, तो बाजार का दबाव कम हो सकता है और किसानों को राहत मिल सकती है।”
उनकी बातों में एक खामोश चेतावनी भी है। “अगर हालात ऐसे ही रहे, तो किसान का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा,” वे कहते हैं।
दरअसल, यह दर्द सिर्फ जेब का नहीं है। यह उस मेहनत का दर्द है, जो पूरे सीजन खेत में पसीना बहाकर की गई थी। महंगी खाद, बढ़ता डीजल, मजदूरी का खर्च-सब कुछ झेलने के बाद भी जब हाथ खाली रह जाएं, तो तकलीफ और गहरी हो जाती है।

किसानों के सामने अब एक और बड़ी मुश्किल खड़ी है-भंडारण। जब आलू तुरंत नहीं बिकता, तो उसे कोल्ड स्टोरेज में रखना पड़ता है। लेकिन वहां तक पहुंचने का सफर ही इतना महंगा है कि छोटे किसान पीछे हट जाते हैं। बोरी, ढुलाई, मजदूरी, फिर स्टोरेज का किराया। हर कदम पर खर्च ही खर्च है। अगर किसी तरह आलू स्टोर में रख भी दिया जाए, तो यह भरोसा नहीं होता कि बाद में अच्छा दाम मिलेगा। यानी जोखिम हर तरफ है-बेचो तो घाटा, रोककर रखो तो अनिश्चितता।
उत्तर प्रदेश में पिछले साल करीब 6.9 लाख हेक्टेयर में आलू की खेती हुई थी और 244 लाख मीट्रिक टन उत्पादन हुआ था। इस साल लगभग 6.98 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 230–235 लाख मीट्रिक टन उत्पादन का अनुमान है। यानी उत्पादन लगभग उतना ही है, लेकिन बाजार की हालत कमजोर हो चुकी है।
इस वक्त हालात यह हैं कि यूपी के कोल्ड स्टोरेज 70 से 80 फीसदी तक भर चुके हैं। गांवों में हजारों पैकेट आलू घरों और खुले में पड़े हैं। धीरे-धीरे सड़ते हुए… जैसे किसान की उम्मीदें भी उन्हीं के साथ गल रही हों। अफसरों का कहना है कि जैसे ही अंतरराष्ट्रीय हालात सुधरेंगे, निर्यात फिर शुरू होगा और किसानों को बेहतर दाम मिल सकेगा। लेकिन किसानों के लिए यह इंतजार आसान नहीं है, क्योंकि उनके पास समय भी कम है और सहनशक्ति भी।
सियासत तेज, किसान फिर भी अकेला
आलू की गिरती कीमतों ने अब सियासत का ताप भी बढ़ा दिया है। खेतों से उठती किसानों की आह अब राजनीतिक गलियारों तक पहुंच चुकी है। समाजवादी पार्टी ने इस मुद्दे को लेकर योगी सरकार को सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया है। सपा के मीडिया सेल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट के जरिए सरकार पर तीखा हमला बोला। समाजवादी पार्टी के आधिकारिक हैंडल @mediacellsp से किए गए पोस्ट में कहा गया कि आलू किसान लगातार भाजपा सरकार में आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं।
पोस्ट में आरोप लगाया गया कि आलू की फसल का किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है, और इसकी वजह सरकार की कथित किसान विरोधी नीतियां हैं। सपा ने कहा कि भाजपा सरकार किसानों की आय दोगुनी करने का वादा करके सत्ता में आई थी, लेकिन आज हालात यह हैं कि किसान अपनी लागत तक नहीं निकाल पा रहा। मेहनत उसकी, मगर मुनाफा कहीं और चला गया है।
पार्टी का कहना है कि किसान अपनी ही फसल का सही दाम न मिलने के कारण आर्थिक तंगी में “खून के आंसू रोने” को मजबूर है। सपा ने आरोप लगाया कि सरकार किसानों की समस्याओं को लेकर गंभीर नहीं है और जमीनी स्तर पर कोई ठोस कदम नजर नहीं आता। बीते सोमवार (23 मार्च, 2026) को समाजवादी पार्टी (एसपी) ने इस संकट को ‘संरचनात्मक संकट’ करार दिया। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे को लेकर केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला।
अखिलेश यादव ने कहा, “भाजपा को किसानों की परेशानियों से ज्यादा अपनी सत्ता की फिक्र है। चुनाव के वक्त हर नेता गांव-गांव नजर आता है, लेकिन जब किसानों को राहत देने की बात आती है, तो सब खामोश हो जाते हैं। सरकार की नीतियां ऐसी हैं कि फसलों के दाम इतने नीचे चले जाते हैं कि लागत तक नहीं निकल पाती। अगर यही हाल रहा, तो किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हो जाएगा… और धीरे-धीरे अपनी जमीन बेचने की नौबत आ जाएगी।”
वे आगे कहते हैं, “वक्त ऐसा भी आ सकता है जब किसान अपने ही खेत में उगाई गई फसल बाजार से खरीदने को मजबूर हो जाए।” उनकी यह बात सिर्फ बयान नहीं, बल्कि उस खौफ की झलक है, जो आज हर किसान के दिल में बैठ गया है।
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राम प्रताप सिंह के मुताबिक, बढ़ती लागत ने खेती का पूरा गणित बिगाड़ दिया है। “प्रति एकड़ खर्च इतना बढ़ गया है कि किसान संतुलन बना ही नहीं पा रहा। फिरोजाबाद और आगरा जैसे इलाकों में भी यही हालत है-ज्यादा निवेश, किराए के भंडारण पर निर्भरता और अनिश्चित बाजार ने खेती को एक जोखिम भरा जुआ बना दिया है,” वे कहते हैं।
वे कोल्ड स्टोरेज व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि भंडारण शुल्क मनमाने तरीके से तय किए जा रहे हैं और उस पर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं है। “किसान पहले ही घाटे में है, ऊपर से स्टोरेज का खर्च उसे और तोड़ देता है,” वे जोड़ते हैं।
हालांकि, इस पूरे मामले पर भाजपा की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन इतना साफ है कि आने वाले दिनों में आलू के दाम और किसानों की हालत को लेकर सियासी टकराव और तेज होगा।
अब आलू की कीमतों में गिरावट सिर्फ आर्थिक मसला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है, जहां बहस तो हो रही है, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित किसान अब भी हाशिए पर खड़ा है।
टूटता किसान, खामोश होती उम्मीदें
बनारस के किसान नेता चौधरी राजेंद्र सिंह और आजमगढ़ के राजीव यादव कहते हैं कि लगातार घाटा, बढ़ता कर्ज़ और भविष्य की अनिश्चितता-ये तीनों मिलकर किसान को भीतर से तोड़ देते हैं। वो कहते हैं, “कई बार यह टूटन इतनी गहरी हो जाती है कि वह आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हो जाता है।”
किसान नेताओं की चेतावनी साफ है कि अगर हालात नहीं सुधरे, तो सिर्फ आंदोलन ही नहीं होंगे, बल्कि आत्महत्याओं की संख्या भी बढ़ सकती है। हर चुनाव में किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया जाता है, लेकिन जमीनी सच्चाई एक अलग ही कहानी बयां करती है। अगर लागत लगातार बढ़ रही है और दाम गिरते जा रहे हैं, तो यह साफ है कि कहीं न कहीं नीति और बाजार के बीच संतुलन बिगड़ चुका है।
राजीव यादव यह भी कहते हैं कि यह संकट सिर्फ आलू तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे कृषि तंत्र की कमजोरी को उजागर करता है। उत्पादन, भंडारण, बाजार और मूल्य निर्धारण-इन सबके बीच समन्वय की कमी साफ दिखती है। जब उत्पादन ज्यादा होता है, तो कीमतें गिर जाती हैं… और जब उत्पादन कम होता है, तो महंगाई बढ़ जाती है। यानी हर हाल में संतुलन गायब है और सबसे ज्यादा नुकसान किसान को उठाना पड़ता है।
वे एक रास्ता भी सुझाते हैं, “अगर आलू से जुड़े उद्योग, जैसे चिप्स, फ्रेंच फ्राइज और प्रोसेस्ड फूड को बढ़ावा मिले, तो किसानों को एक स्थायी बाजार मिल सकता है।”
निर्यातक खेती-बाड़ी के संपादक जगन्नाथ कुशवाहा भी इस संकट को व्यापक नजरिए से देखते हैं। वे कहते हैं, “इस बार दूसरे आलू उत्पादक राज्यों में भी अच्छी पैदावार हुई है। नतीजा यह हुआ कि बाजार में हर तरफ आलू ही आलू है। जब हर जगह माल ज्यादा हो, तो कीमतों का गिरना तय हो जाता है। ऐसे में भाव बढ़ने की उम्मीद भी कमजोर पड़ गई है।”
वे एक अहम सवाल भी उठाते हैं, “सरकार कहती है कि भंडारण की समस्या नहीं है… लेकिन किसान पूछता है, अगर दाम ही नहीं मिलेगा, तो स्टोर में रखकर क्या होगा?”
कुशवाहा के मुताबिक, खेत पर आलू की मौजूदा दरें 340 से 380 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुकी हैं। यानी बाजार मूल्य और लागत के बीच एक गहरी खाई बन चुकी है—एक ऐसी खाई, जिसमें किसान की मेहनत, उम्मीद और उसका भविष्य धीरे-धीरे समाता जा रहा है।
इस संकट की जड़ें सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि लागत के बढ़ते बोझ में भी छिपी हैं। उर्वरकों की कीमतों में लगातार इजाफा खेती को और महंगा बना रहा है। यूरिया का सरकारी मूल्य भले 242 रुपये प्रति बैग तय हो, लेकिन हकीकत यह है कि इस दर पर इसकी उपलब्धता बेहद सीमित है। किसान मजबूरी में इसे ज्यादा कीमत देकर खरीद रहा है। वहीं डीएपी का दाम 1,200 से बढ़कर 1,350 रुपये प्रति बैग हो चुका है और एनपीके जैसे उर्वरकों का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ा है—यानि हर तरफ से लागत का दबाव किसान को जकड़ता जा रहा है।
इधर सरकारी आंकड़े एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। प्रदेश में इस समय 2207 शीतगृह हैं, जिनकी कुल भंडारण क्षमता 192.43 लाख मीट्रिक टन बताई जा रही है। इनमें से अब तक 144.10 लाख मीट्रिक टन आलू भंडारित किया जा चुका है—यानि करीब 48.33 लाख मीट्रिक टन जगह अभी भी खाली है।
सरकार का कहना है कि भंडारण की कोई कमी नहीं है, और किसानों को राहत देने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। कृषि निर्यात को बढ़ावा देने और बेहतर दाम दिलाने के दावे भी किए जा रहे हैं। लेकिन जमीन पर खड़ा किसान इन आंकड़ों को एक अलग नजर से देखता है। उसके लिए 245 लाख मीट्रिक टन उत्पादन कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि एक ऐसा बोझ है जिसे वह अकेले ढो नहीं पा रहा। कोल्ड स्टोरेज की “खाली जगह” उसके लिए महज एक आंकड़ा है, क्योंकि वहां तक पहुंचने का खर्च, किराया और भविष्य की अनिश्चितता उसे रोक देती है।
खेतों में खड़ा आलू अब सिर्फ एक फसल नहीं रहा। वह एक सवाल बनकर खड़ा है-एक ऐसा सवाल, जिसका जवाब अब तक किसी के पास नहीं है। उत्पादन बढ़ रहा है… लेकिन किसान क्यों टूट रहा है?
वाराणसी के पत्रकार एवं एक्टिविस्ट राजकुमार गुप्ता इस पूरे संकट को नीतिगत असंतुलन का नतीजा मानते हैं। उनके अनुसार, अनाज फसलों के विपरीत आलू के लिए कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) या मूल्य-सुरक्षा तंत्र मौजूद नहीं है। ऐसे में किसान को एक साथ कई जोखिम उठाने पड़ते हैं-चाहे वह लागत का हो, बाजार का या भंडारण का।
वे कहते हैं, “यह संकट सिर्फ आलू की फसल का नहीं, बल्कि उस पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का है, जो इस पर निर्भर है। आलू, जो कभी किसानों के लिए नकदी प्रवाह का सबसे भरोसेमंद जरिया था, अब घाटे और अनिश्चितता का प्रतीक बन गया है।”
राजकुमार गुप्ता यह भी बताते हैं कि आलू के दाम गिरने से किसानों के साथ-साथ व्यापारी भी प्रभावित हो रहे हैं। दोनों ही आर्थिक दबाव में हैं, और बाजार में एक अजीब सी ठहराव की स्थिति है। वे कहते हैं, “पिछले पांच महीनों में आलू की औसत कीमत करीब 37 से 40 फीसदी तक गिर चुकी है। यह गिरावट सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि किसानों की बिगड़ती हालत की कहानी है।”
पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैली यह कहानी सिर्फ आलू की नहीं है, यह उस किसान की कहानी है, जो हर सीजन उम्मीद बोता है और हर बार बाजार के हाथों हार जाता है। खेतों में खड़ी फसल अब सिर्फ उपज नहीं, बल्कि सवाल बन चुकी है। सवाल-नीतियों पर, बाजार पर, व्यवस्था पर… और उस वादे पर, जो हर चुनाव में दोहराया जाता है।
आलू, जिसे कभी “सब्जियों का राजा” कहा जाता था, आज खुद अपने ही खेत में बेबस खड़ा है। उसकी कीमत गिर रही है, लेकिन उसके साथ किसानों का हौसला भी टूट रहा है। अगर यही हाल रहा, तो आने वाले वक्त में खेतों में आलू तो शायद फिर उग जाएगा…लेकिन किसान का भरोसा शायद दोबारा नहीं उग पाएगा…।
(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)