पिछले 25 वर्षों क्यों बिता रहे हैं 55 वर्षीय सुरेंद्र सोरेन जंगल में अकेले जीवन?

धनबाद जिला मुख्यालय से लगभग 32 किलोमीटर की दूरी पर बसा है टुंडी प्रखंड। प्रखंड मुख्यालय घने जंगल से घिरा क्षेत्र में स्थित है, जहां से जंगल की सीमा लगभग 0 से 2 किलोमीटर के दायरे में शुरू हो जाती है। यहां के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 67% हिस्सा वनों से घिरा हुआ है। ऐसे में इसके आसपास के इलाके अपने विशाल वन क्षेत्र और पहाड़ियों के लिए जाने जाते हैं। 

इसी जंगल में पिछले 25 वर्षों से अकेले जीवन बिता रहे हैं 55 वर्षीय सुरेंद्र सोरेन। वैसे सुरेंद्र सोरेन की उम्र 55 वर्ष के आसपास है लेकिन वे इतने कृशकाय हो गए हैं कि एक झलक में वे 70 पार के लगते है।

जब आप जिले के टुंडी के कमलपुर क्षेत्र से सटा जंगल में जैसे कदम रखेंगे, आपको एक छोटी सी मिट्टी-पत्थर की झोपड़ी दिखाई देगी। उस झोपड़ी के बाहर दिखेंगे बिखरे बाल, लंबी सफेद दाढ़ी और उम्र के थपेड़ों से कमजोर हो चुका शरीर। संपत्ति के नाम पर सिर्फ सूखी लकड़ियों का ढेर, मिट्टी का चूल्हा और कुछ पुराने बर्तन।

उम्र के इस पड़ाव पर ठीक से नहीं बोल पाने वाले इस शख्स का नाम है सुरेंद्र सोरेन। वे लगभग मौन धारण किए रहते हैं। सवालों के जवाब में हां-ना का उच्चारण इनकी कठिन जिंदगी की पूरी कहानी बयां कर देती है।

उन्होंने खुद अपने हाथों से 5-6 फीट गहरा कुआं खोदा है। उनके पास न हल है, न बैल और न ही कोई आधुनिक औजार। इसके बावजूद उन्होंने अपने दम पर एक छोटा सा खेत तैयार किया है। उसी खेत से पैदा करते हैं अपना पेट भरने का इन्तजाम।

वहीं दूसरी तरफ जंगल से मिलने वाले जंगली आलू, कंदमूल और जंगली चावल भी उनकी भूख मिटाते हैं।

इस उम्र में भी जंगल से लकड़ियां चुनना, चूल्हा जलाकर खाना बनाना और अपनी भूख मिटाना कोई साधारण बात नहीं है। लेकिन यह सब करके सुरेंद्र सोरेन जहां आत्मनिर्भरता का मिसाल कायम करते हैं, वहीं हमारा आधुनिक सामाजिक बनावट, आजादी के आठ दशक और झारखंड अलग राज्य गठन के तीन दशक बाद भी हमारे सिस्टम पर कई सवाल खड़े होते हैं। 

कहना ना होगा कि इस आधुनिक युग में भी ऐसा जीवन पाषाण युग की याद दिलाता है।

सुरेंद्र सोरेन मूल रूप से टुंडी प्रखंड के बसहा गांव के निवासी हैं। वे संथाल समुदाय से आते हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि, सुरेंद्र सोरेन का हंसता खेलता परिवार था। इनके परिवार में पति पत्नी और दो बेटे थे, घर और सामान्य जिंदगी थी। लेकिन अचानक एक दिन मानो इन पर पहाड़ सा टूट पड़ा। एक दिन दोनों बेटों को सांप ने डंस लिया और लाख कोशिशों के बाद भी उनकी जिंदगी बचाने में सुरेंद्र असफल रहे।

पैसों का अभाव और गांव व सामाज के लोगों से कोई सहयोग नहीं मिलने के कारण वे बेटों का इलाज नहीं करा पाए और दोनों बेटों की मौत हो गई। बेटों की मौत ने उन्हें अंदर तक तोड़ दिया। इस घटना के बाद उन्होंने गांव और समाज से दूरी बना ली।

धीरे-थीरे समाज व गांव से मन उचटता गया और एक दिन वे पत्नी को साथ लेकर जंगल आ गए और यहीं बसेरा बना लिया। यहां उन्होंने खुद झोपड़ी बनाई, कुआं खोदा और खेती शुरू की।

लेकिन कुदरत ने यहां भी इन्हें बेचैन किया। करीब सात-आठ साल पहले पत्नी भी दुनिया छोड़कर चल बसी। पत्नी की मौत के बाद वे पूरी तरह अकेले हो गए, लेकिन जंगल नहीं छोड़ा। कई लोगों ने इन्हें जंगल छोड़ गांव लौटने की पेशकश की, लेकिन वे जंगल छोड़ने को तैयार नहीं हुए।

स्थानीय निवासी राजीव ओझा बताते हैं कि “सुरेंद्र सोरेन पिछले करीब 25 वर्षों से जंगलों में रह रहे हैं। गांव वाले कभी-कभी उनसे मिलने जाते हैं, लेकिन वे ज्यादा बातचीत नहीं करते। कई बार उन्हें गांव वापस लाने की कोशिश की भी गई, पर उन्होंने हर बार इनकार कर दिया। वे न किसी से शिकायत करते हैं और न ही किसी की मदद लेते हैं। वे अब अपनी आखिरी सांस तक इस जंगल में अकेले रहना चाहते हैं। उन्हें न किसी की जरूरत है और न ही किसी से कोई काम।”

हम भले ही यह सोचकर सुरेंद्र की तारीफ में कसीदे गढ़ें कि आज का समाज जहां सुविधाओं और भौतिकता के पीछे भाग रहा है, तब ऐसे में सुरेंद्र सोरेन ने प्रकृति के बीच बेहद साधारण जीवन को अपनाकर यह साबित किया है कि इंसान कम संसाधनों में भी आत्मसम्मान और संतोष के साथ जी सकता है। लेकिन हमें यह भी सोचना होगा कि सुरेंद्र जैसे लोगों को आज के इस आधुनिक दौर में इस तरह की परिस्थितियों के बीच जीवन यापन करने की वजह क्या है? 

यह सच है कि जो कुछ सुरेंद्र सोरेन के साथ घटित हुआ है वह यह सोचने पर मजबूर करता है कि अपनों को खोने का दर्द इंसान को किस हद तक बदल सकता है। लेकिन साथ साथ यह भी सवाल उठता है कि समाज के ऐसे ही तबकों के बीच यह परिस्थितियां क्यों उत्पन्न होती हैं?

बताते चलें कि इसी टुंडी क्षेत्र से दिसोम गुरू शिबू सोरेन ने जमींदारों, महाजनों और शोषक वर्गों के संघर्ष शुरू की और झारखंड के आदिवासी समाज को एक सशक्त राजनीतिक चेतना दी। 

इसी संघर्ष का नतीजा रहा कि झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन हुआ और आज झारखंड मुक्ति मोर्चा सत्तासीन है।

और आज उसी क्षेत्र के सुरेंद्र सोरेन का समाज व व्यवस्था से मोह भंग होना कई सवाल खड़े करते हैं।

इन सारे सवालों के बीच सबसे बड़ा सवाल है कि जब क्षेत्र के आम लोगों को सुरेंद्र सोरेन के बारे में जानकारी थी, तो जाहिर है संबंधित क्षेत्र के सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों को भी जानकारी होगी, तो प्रशासनिक स्तर से उनकी सुध क्यों नहीं ली गई? क्या इसलिए कि वे आदिवासी समुदाय से आते थे?

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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